कबूतर महंगा पड़ जाएगा…

सबेरे-सबेरे ही मुहल्ले में फिर से कोहराम मचा हुआ था। आज फिर समय से पहले ही कच्ची नींद से उठना पड़ा था। बगल के कमरे में सोई हुई गांव की दादी ने पूछ ही लिया देखो तो बाहर क्या गड़बड़ हो गई। बहुत देर से हो-हल्ला मचा हुआ है। दादी को छोड़ घर में सबको बाहर चल रही नौटंकी की पटकथा का अंदाज़ा था। बाहर से आ रही आवाज़ें भी जानी पहचानी थी। चमेली चाची पानी पी-पी कर पड़ोसी चतुरी चाचा को कोस रही थी। और चतुरी चाचा भी चाची के हर वार का जबर्दस्त प्रतिकार कर रहे थे। फिल्म के क्लाइमेक्स की तरह जब मामला अंत की ओर बढ़ने लगा, हिंदी फिल्मों की तर्ज पर दोनों पक्ष की आवाज़ें निर्धारित सीमा को पार करने लगी, बैकग्राउंड संगीत अपने चरम को पहुंचने लगा तब एक समझदार जिम्मेदार पड़ोसी के नाते बाहर जाना जरूरी लगने लगा।

 

माजरा काफी कुछ जाना समझा था। बस इस बार तरीका कुछ बदल गया था इसलिए लड़ाई का ये नया एपीसोड शुरू हुआ था। चमेली चाची और चतुरी चाचा की लड़ाई की पृष्ठभूमि बहुत पुरानी है और काफी हद तक ये मुंहजुबानी पैंतरेबाजी तक ही सीमित रहती है। चाची की पोती और चाचा का सबसे छोटे बेटे का प्यार मुहब्बत का रिश्ता है। पर पुराने विचारों की चाची को ये प्यार-व्यार का तरीका बिल्कुल पसंद नहीं। पहले वो चतुरी चाचा के दूध वाले को गरियाती फिरती थी। पूछने पर कहती कि मरजाद चतुरी चाचा का दूध उनके दरवाजे अड़ा जाता है हर रोज। मुहल्ले वालों से पूछा तो बात कुछ और ही निकली। दरअसल मरजाद दूधवाला प्रेमी जोड़े के बीच संदेशवाहक का काम करता था। चाची ने दूध वाले को रंगेहाथ पकड़ लिया था। पर लोकलाज के डर से उसे दूध अड़ाने के बहाने गरियाती रहती थी। बाद के दिनों में चाचा के छोटे लड़के ने अख़बार वाले को संदेशवाहक बना लिया था। पटा पटी के इस दौर में कुछ दिन शांति रही फिर ये भेद भी सामने आ गया और एक बार फिर से चमेली चाची और चतुरी चाचा आमने-सामने आ हो गए थे।

 

बहरहाल ताज़ा वाकए का मजमून भी काफी कुछ सबको पता था। पर फिर भी एक बार बात को करीने से समझने की गरज से पड़ोसियों से मगजमारी करने लगा। इस बार चाची मोबाइल फोन की थुक्का फजीहत कर रही थी। नाश हो इस मोबाइल का… इसीलिए दिलाया था… मुहल्ले में औरतों लड़कियों की इज्जत तो जैसे नीलाम हो गई है… आदि आदि…।

 

 

चाची हाथ में पांच छह सिमकार्ड लिए सबको दिखा-दिखा कर चतुरी चाचा पर लांछन लगा रही थी। और चाचा उनके हर वार को अपने तर्कास्त्र से ध्वस्त करने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे।

चाचा और सिम के इस रिश्ते का मजमून समझने में कुछ वक्त लग गया। चमेली चाची को घर की छत से, घर में इधर-उधर से ये सिम कार्ड पिछले हफ्ते-पंद्रह दिनों में मिले थे। बकौल चाची ये सिमकार्ड चाचा के कुलदीपक ने उनकी पोती को सप्रेम उपहार दिए है। और इस बात को लेकर ये सारा हंगामा बरपा है सुबह-सुबह।

 

 

एयरटेल की पचास रूपए के सिमकार्ड में 150 रूपए के टाक टाइम वाली स्कीम ने प्रेमी जोड़े को आपस में जुड़ने का बढ़िया और ज्यादा कारगर तरीका सुझा दिया था। पचास के सिम कार्ड पर डेढ़ सौ की बात और फिर नया सिमकार्ड। चमेली चाची उस दिन को कोसते हुए घर के अंदर चली गई जब उन्होंने पोती के हाथ में मोबाइल देखा था। जाते जाते फुसफुसाती रहीअब मैं जानू शहर भर के छोरे-छोरियां मोबाइल कान में क्यूं सटाए घूमते हैं। उस दिन तो बड़े मजे से गांव में रिश्तेदारों से बात की थी। आज इस अधम मोबाइल के हाथों सब लुटता दिख रहा है चाची को।

 

प्यार की नई गुटरगूं को विज्ञापन दर विज्ञापन मोबाइल वाले बढ़ावा देने पर उतारू हैं। एयरटेल ने प्यार की शुरुआत से बरास्ता शादी होते हुए पहले बच्चे तक का सफर तय कर लिया है बॉलीवुड के सुंदर सितारों माधवन और विद्या बालन के जरिए। विरोधी रिलायंस ने भी प्रेमी को ‘लायर’ कहती प्रेमिका का विज्ञापन बड़े करीने से पेश किया है। अब चमेली चाची को कौन बताए दिन भर में डेढ़ सौ चैनलों पर डेढ़ हज़ार बार दिखने वाले ये विज्ञापन छोरे-छोरियों को दिमाग में इस क़दर घुस गए है कि चाची की नेक नियामतें इन्हें समझ ही नहीं आती।

 

कबूतर महंगा पड़ जाएगा वाला बयान इनके दिलोदिमाग पर हावी है इसलिए कबूतर से पीछा छुड़ाकर गांवशहर का नया खून सिम-सिम मुहब्बत का पहाड़ा पढ़ रहा है। कागज काले करने की दिन भी बीत गए अब…

   

अतुल चौरसिया   

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भीड़तंत्र की बल्ले-बल्ले

इस देश का अपना अलग शास्त्र है। इसमें विचित्रता है, एकरसता है, बहुत कुछ है। यहां गणेशजी दूध पीते हैं तो पूरे देश में एक साथ पीना शुरू कर देते हैं। साईं बाबा की माला बढ़ती है देश में चहुओंर बढ़ने लगती है। अंधविश्वासों से इतर वास्तविक घटनाओं का भी एक अलग शास्त्र है। एक सिख युवक का केश किसी ने काट लिया तो अगले हफ्ते तक इस तरह की दो-चार घटनाएं जरूर हो जाती हैं। जैसे उचक्के इसी के इंतज़ार में उस्तरे थामे बैठे थे। या फिर देश के अलग अलग हिस्सों में जैसे उनके बीच कोई तार-बेतार संपर्क हो।

 

कुछ घटनाएं घटना चक्र के रूप में चलती हैं। अब देखिए साल भर पहले गुर्जर विवाद हुआ उसे थामते थामते डेरा–सिख समर्थक भिड़ गए। साल भर बाद बिल्कुल अलग ज़मीन पर एक बार फिर इन दोनों विरोधियों ने देश के सामने जैसे पुरानी घटनाओं का रिप्ले पेश कर दिया हो। गुर्जरों ने पुरानी ज़मीन राजस्थान पर बवाल शुरू किया तो इसके शांत होते होते मुंबई में सिख-डेरा समर्थक फिर से आमने सामने हो गए। ये आग मुंबई से चलकर सुदूर पंजाब तक पहुंच गई। यानी एक के बाद दूसरी घटनाओं का ऐसा तारतम्य होता है कि कड़ी टूटने नहीं पाती। सड़क पर उतर कर अपनी अहमियत जताने का जैसा चलन इस देश में विगत कुछ सालों से चल पड़ा है उसे समझना मुश्किल है।

 

महीनों चला डेरा सिख विवाद, उससे पहले पैदा हुआ गुर्जरों का हिंसक आंदोलन, इसके जवाब में शुरू हुआ मीणा संघर्ष, मुंबई में राज ठाकरे का उत्तर भारतीय विरोधी हिंसात्मक अभियान, मुंबई में ख़बरिया चैनल के दफ्तर पर भगवा ब्रिगेड का हमला, जबलपुर में कॉलेज परिसर में प्रोफेसर की मौत, पत्रकार कुमार केतकर के घर पर एनसीपी का हमला, असम में हिंदी भाषियों की चुनचुनकर हत्या, कश्मीर में अमरनाथ यात्रा को लेकर हिंसक विरोध, इसके जवाब में पूरे देश में भगवा ब्रिगेड का हिंसक बंद, दार्जिलिंग में गोरखालैंड का लट्ठमार अभियान, बिहार में भीड़ का न्यायतंत्र और इन सबसे बची खुची कसर पूरी करते हैं देश के 25 फीसदी हिस्से में शासन चला रहे नक्सलीये सभी घटनाएं बीते एक साल के दौरान हुई है।

 

इन घटनाओं ने लगातार देश की राजनीति से लेकर समाजनीति को गरमाए रखा है। किसी स्थिर, मजबूत लोकतंत्र की ये स्वस्थ निशानी कही जा सकती है? शायद ही किसी को विश्वास हो। लोकतंत्र की परिभाषा देने वाले पश्चिम के समाज में इस तरह की भदेस चाल दिखनी दुर्लभ है। मेरा भारत महान का दम भरने वाले इतने भी सहिष्णु नहीं हैं कि देश के न्यायतंत्र का रुख कर सकें। हर आदमी के भीतर खुद ही फैसला करने की अजब धुन इस देश में सवार है।

 

दुनियावालों इस ओर मत देखो, विश्वशक्ति के ख्वाब देख रहा दुनिया का विशालतम लोकतंत्र फिलहाल भीड़तंत्र की चपेट में हैं।

 

अतुल चौरसिया

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कुछ अन्यमनस्क हो रहा हूं…

बहुत छोटे थे हम जब शाहबानों मामले में कांग्रेस ने अपना धर्म निरपेक्ष चोला उतार फेंका था। उस ग़लती के एहसास ने राजीव गांधी को अयोध्या का रास्ता दिखा दिया। जिस भाड़ को आडवाणी आज तक झोक रहे हैं उसकी चिंगारी इन्हीं राजीवजी ने सुलगाई थी। फिर एक मौका आया जब सत्तावर्ग खुद को देश की सबसे मजबूत और सर्वसमाज की पार्टी के रूप में स्थापित कर सकती थी लेकिन मुफ्ती जी की बिटिया पूरे हिंदुस्तानी राजवर्ग पर भारी पड़ गई। और यहां से सिंचित हुई कश्मीर घाटी में अलगाववाद की बयार आज काफी हद तक वटवृक्ष तक का सफर तय कर चुकी है। काफी हद तक आतंकियों को 1999 की गोघूलि की बेला और नई सहस्त्राब्दि की शुरुआत में गांधार योजना की प्रेरणास्रोत मुफ्ती साहब की बिटिया ही थी जिनके बारे में बाद में सुना गया कि उन्हीं आतंकियों में से किसी के साथ घर बसा लिया।

 

अब उन्हीं की एक बिटिया पीडीपी के नाम से कश्मीर की सियासत संभाल रही हैं। पर भाषा उनकी पूरी की पूरी हुर्रियत वालों से होड़ लेती है। सियासत की अपनी मजबूरी है। पर अपनी निजी फायदे के आगे जिस बड़े हित को इन नेताओं ने दांव पर लगाया है उसकी कीमत बहुत महंगी अदा करनी होगी। हिंदुस्तान सिर्फ कश्मीर नहीं है और गंगा जमुनी तहजीब सिर्फ घाटी में नहीं बसती। पर आगे जब पुलिस अपने फर्जी मुठभेड़ों में किसी कश्मीरी को निशाना बनाएगी तो हमेशा से इसके विरोध में उठने वाली पुरज़ोर आवाज़ अमरनाथ यात्रा की तपिश के चलते कमज़ोर पड़ जाएगी। तब शायद उन क्रूर हत्याओं को भी देश का लंबा-चौड़ा तबका अपनी मौन स्वीकृति दे देगा। जिस तरह की भाषा पिछले दिनों कश्मीर में देखने को मिली वो काफी विदारक है। देश के लिए ये भावनाएं कहीं से स्वास्थ्यकर नहीं है। मानसिकता के रास्ते दिलों तक उतरती स्थितियां दिनों दिन मजबूत होंगी। पीडीपी के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि हमने समझौता किया है अपना ईमान गिरवी नहीं रखा है। नेशनल कांफ्रेंस वाले श्राइन बोर्ड को दी गई ज़मीन के मसले पर हुर्रियत से भी कड़ी भाषा में गरिया रहे हैं। और इन सबके बीच एक बार फिर कांग्रेस शाह बानों  के बाद उसी तरह की ऐतिहासिक ग़लती कर गया है।

इस देश में हर राज्य, हर ज़िले में हज कमेटी के लिए ज़मीने दी गई है, उन पर अब जब कोई हिंदूवादी आंखे तरेरेगा तो उसका खुलकर सामना किस मुंह से लोग करेंगे। इस देश ने मुसलमानों को अपना पर्सनल लॉ बोर्ड चलाने की अनुमति दे रखी है। किसी पश्चिमी लोकतंत्र में ऐसी इजाजत किसी को नहीं है। सबके लिए सिर्फ और सिर्फ एक क़ानून होता है। ये हिंदुस्तान है जहां सबको अपने अपने हिसाब से रहने की छूट है इसमें पर्सनल लॉ तक वाजिब है। इस पर रोक की बात होते ही एक आवाज़ उठती है हमारे धार्मिक मामलो में सियासी हस्तक्षेप हो रहा है। अब कश्मीर में क्या हुआ? जब हिंदू कट्टरपंथी कहेंगे कि कश्मीर में हमारे धार्मिक मामलों को श्राइन बोर्ड से छीन कर राजनीति के हवाले क्यों किया गया तो किस मुंह से देश का धर्म निरपेक्ष तबका उनका सामना कर पाएगा?

 

कुतर्क की सीमाएं असीमित हैं। अगर 40 हेक्टेयर ज़मीन से कश्मीर में मुसलमान अल्पसंख्यक हो जाते हैं (जैसा गिलानी ने अपनी रैली में कहा), राज्य का मुस्लिम बहुल चेहरा बिगाड़ने की साजिश है (जैसा मुफ्ती के सिपहसालारों ने और उनकी बेटी ने कहा) तो फिर देश में इतने सारे हज मंज़िलों, मस्जिदों, मदरसों से हिंदू कट्टरपंथियों को भी अल्पसंख्यक होने का ख़तरा पैदा हो सकता है, देश का हिंदू बहुल स्वरूप बिगड़ने का ख़तरा पैदा हो सकता है। फिर किस मुंह से लोग मुस्लिमों का बचाव करेंगे।

 

समस्या की जड़ दरअसल कश्मीर में ही है। यहां का सियासी तबका घाटी की सीमाओं को ही सारे वोटर का गढ़ मानने की भूल में है। उसकी दूरगामी सोच कही से देश की दीर्घकालिक हितों से जुड़ती नहीं दिख रही है। और न ही उसे इसके आसन्न खतरे नज़र आ रहे हैं जो आने वाले समय में देश में जटिल धार्मिक स्थितियां पैदा करने की ताकत रखता हैं। जम्मू, दिल्ली में विहिप, बजरंग दल, शिवसेना की विरोध रैलियों से इसका आभास भी होने लगा है। कांग्रेस तो खैर ऐतिहासिक गलतियों का मकड़जाल बुनने में व्यस्त है और देश की दूसरी बड़ी पार्टी भाजपा इस मकड़जाल की उलझन से पैदा हुए शून्य में अपना सियासी भविष्य देख रही है। तो फिर ये देश किससे उम्मीद करे।

अलगाववाद के जो कश्मीरी तर्क हैं उनके आधार पर तो इस देश के पचास टुकड़े कर दिए जाएं तो भी अलगाववाद की लड़ाई कभी नहीं रुकेगी। पर ये एक अलग मसला है इस पर भी लंबी चर्चा की जा सकती है। फिलहाल राजनीतिक इच्छाशक्ति इस देश और कश्मीर के सत्ता प्रतिष्ठान के लिए सबसे अहम सवाल है। पर इसका अभाव कश्मीर से लेकर महाराष्ट्र तक साफ दिख रहा है।

 

अतुल चौरसिया     

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बाबूजी ज़रा धीरे

11.2 के पलायन वेग (पलायन वेग=मुद्रास्फीति) से जब मंहगाई सरपट भाग रही हो तो कोई चुनाव की कैसे सोच सकता है। वो भी समय से पहले। न्यूक्लियर डील का पंगा भले ही मनमोहनी नौका को डगमगा रहा है पर सारे समीकरण यही कह रहे हैं कि चुनाव फिलहाल नहीं हो सकते और न ही इस सरकार के कार्यकाल में न्यूक्लियर डील की संभावना है। अपनी-अपनी मजबूरी के चलते दोनों तलवारे तो भांजेगे पर इतना घातक वार नहीं करेंगे कि सरकार की मौत हो जाय। पर इस धमाचौकड़ी के खेल ने इंतज़ार में बैठे प्रधानमंत्री जी (आडवाणी) को कुछ इस क़दर अधीर कर दिया है कि अभी से उन्होंने लोकसभा की शतरंजी बिसात पर अपने मोहरे फिट करने शुरू कर दिए हैं। इतनी जल्दी क्या है?

 

बीएसपी के हाथ खींचने के बाद आज की तारीख में लेफ्ट के समर्थन खींचने की दशा में मुलायम सिंह भी मनमोहन की नैया अकेले दम पर पार नहीं लगा सकते। लोकसभा का गणित ही ऐसा है। तो फिर कांग्रेस कैसे न्यूक्लियर डील पर आगे बढ़ सकती है। मंहगाई की दर ऐसी है कि खुद वित्तमंत्री ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। तो फिर ऐसे में सरकार को संकट में डालकर न्यूक्लियर डील के लिए आप को क्या लगता है कांग्रेसी मनमोहन सिंह को आगे बढ़ने देंगे। पार्टी, सरकार और प्रधानमंत्रीजी के पीछे खड़ा रहने या कहें कि खड़ा दिखाने की मजबूरी न हो तो कांग्रेस के भीतर ही अच्छी खासी तादात ऐसे लोगों की है जो कतई नहीं चाहते कि साल भर पहले ही सत्ता की मलाई से वंचित हुआ जाय। वो भी तब जब दूर-दूर तक साउथ ब्लॉक और 7 आरसीआर में वापसी की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही हो।

 

तो फिर आडवाणीजी जो इस खेल के इतने पुराने खिलाड़ी हैं उन्हें कहां से इस बात की भनक लग गई है कि वो चुनावी मूड में आ चुके हैं। हमेशा दूर की सोचकर चाल चलने वाले आडवाणीजी की बेसब्री का सबब क्या है? अटलजी की फिर से वापसी की बची खुची संभावना को ज़मीदोज़ करने की कोशिश भी हो सकती है। वरना कहीं ऐसा न हो कि अंतिम समय में चुनावी नैया पार करवाने का बहाना लेकर अटलजी को फिर से खड़ा कर दिया जाय या फिर पार्टी के ही उनके विरोधी या अटलजी के चाटु शिरोमणि उनके पर कतरने के लिए अटल तराना छेड़ दें।

 

साठ सालों में आडवाणीजी पृथ्वीराज रोड तक का ही सफर तय कर पाए हैं पर यहां से 7 आरसीआर की छोटी सी यात्रा कितनी दुर्गम है उन्हें भी समझ आ गया है। उनकी बेसब्री का मजमून चाहे जो भी हो पर साल भर पहले से ही उम्मीदवारों की घोषणा से एक बात साफ दिखती है कि वो इस बार वहां पहुंचने के लिए कितने बेताब हैं। शायद इस बेसब्री की एक वजह ये भी है कि उन्हें इस बात का अहसास है कि ये उनके लिए भी आखिरी मौका है। इस बार चूके तो न उमर साथ रहेगी न शरीर साथ देगा। बहरहाल अपन तो यही चाहेंगे कि बाबूजी ज़रा धीरे चलो इस भदेस लोकतंत्र में जो दिखता है दरअसल वैसा होता नहीं। वरना इंडिया शाइनिंग के जमाने की याद भला किसे नहीं होगी। इस बात को आडवाणीजी से ज्यादा भला कौन समझेगा। तब तो सभी एक सुर से उन्हें ही सत्ता में वापसी का राजकुमार मान रहे थे। पर जनता ने संसद की कुंजी सोनियाजी को थमा दी। आडवाणीजी अधीर न होइए सिर्फ कोशिश करिए बाकी जनता के मन में क्या है न आप जानते हैं न हम। इतनी पक्की मत मान कर चलिए। 7 आरसीआर की राह बड़ी रपटीली है।

 

अतुल चौरसिया  

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लालूजी का हिंदी अंग्रेज़ी पॉपकॉर्न

फोटो साठ??र-चेन्नई टीवीकुछ दिनों पहले जब अमिताभ बच्चन ने अपना ब्लॉग लिखना शुरू किया था तब ये ख़बर सुर्खियां बन गई थी। बाद में आमिर खान से लेकर अनुराग कश्यप तक तमाम लोगों के नाम सामने आए जो या तो ब्लॉग लिख रहे थे या हाल फिलहाल उन्होंने लिखना शुरू किया था। अमिताभ, आमिर जैसे सेलिब्रेटी सितारों के ब्लॉग लेखन की ख़बर उड़ते ही बड़ी शिद्दत से ये चर्चा भी छिड़ी थी कि क्या इन सितारों के पास लिखने के लिए फुर्सत है? मिनट-मिनट की कमाई का हिसाब लाखों में दिखाने वाले सितारों के ब्लॉग प्रेम पर चर्चा छिड़नी लाजिमी था। क्या नाम को भुनाने के लिए हर हथकंडे अपनाने वाले ये सितारे ब्लॉग का भी स्वहिताय उपयोग करेंगे? लिखेगा कोई और छापेगा कोई और नाम होगा अपना। आखिर किसको पता चलता है जैसी तमाम बातें हुई।

 

हाल ही में एक और नेता कम अभिनेता ने भी अपना ब्लॉग शुरू किया है। रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव के पॉपकार्न डॉट कॉम की चर्चा ब्लॉग जगत में है। दातून से लेकर दूध दूहने तक को मीडिया में बेचने का हुनर जानने वाले लालू के ब्लॉग पर चर्चा छिड़ना उतना ही जायज था जितना संसद में उनके द्वारा पेश किए गए रेलबजट पर जिरह जरूरी होती है। बड़ी चर्चा के बीच किसी मित्र ने बताया कि लालू का ब्लॉग तो क्या रेल शिकायत निवारण फोरम है। लोग उनके लेख से सरोकार कम रखते हैं रेल से जुड़ी अपनी शिकायतें वहां टिप्पणियों के रूप में जरूर दर्ज करवा देते हैं। बहरहाल देश के इतने बड़े नेता ने ब्लॉग शुरू किया था तो उस पर एक नज़र डालना भी जरूरी था। एक पत्रकार के नज़रिए से, एक ब्लॉगर के नज़रिए से और सबसे ऊपर एक आम नागरिक के नज़रिए से।

 

किसी वेबसाइट ने ख़बर छापी थी कि अपने ब्लॉग में लालूजी ने शाहरुख ख़ान के साथ फिल्म में काम करने की हसरत का इजहार किया है लगे हाथ वो हेमा से अपने पुराने प्रेम का इजहार करना भी नहीं भूले। उनकी दलीले भी लाजवाब हैं, जब फिलम वाले नेतागिरी में आ सकते हैं तो नेता लोग फिलम में क्यों नहीं जा सकते। यानी कि दोस्ती यारी की गंगा दोनों तरफ से बराबर बहनी चाहिए। बहुत राज कर लिया फिल्म वालों ने एकतरफा। राजनीति क्या कोई पार्ट टाइम धंधा है कि पूरी ज़िंदगी फिल्म में बिताई और बुढ़ापा सुख से काटने के लिए यहां आ गए। अब ऐसा नहीं चलेगा। लालू जी बिल्कुल तैयार हैं। फिल्मों को पार्ट टाइम धंधा बना कर छोड़ेंगे।

 

बहरहाल अपना मुद्दा कुछ और था। मैंने भी लालूजी का पॉपकॉर्न देखा। मन में वही शंका थी कि क्या लालूजी खुद इन ब्लॉग्स को लिखते होंगे। अब सीधे सीधे आरोप तो नहीं लगाया जा सकता लेकिन मन ये मानने को तैयार नहीं कि लालू ने इस तरह की भाषा में लिखा होगा। मेरी आंशंका के दृढ़ होने की वजह है। लालूजी का ब्लॉग हिंदी और अंग्रेज़ी दोनो भाषाओं में उपलब्ध है। पहले अपन ने उनकी अंग्रेजी वाला तर्जुमा पढ़ा (पता नहीं हिंदी से इंगलिश में तर्जुमा है या इंगलिश से हिंदी में)। वहीं से दिमाग में खुजली होने लगी। लालूजी की इतनी बेहतरीन इंगलिश देखकर विश्वास ही नहीं हुआ। दिमाग में तीन महीने पहले उनका लाइव इंटरव्यू घूम गया जिसे वो एनडीटीवी 24 सेवेन के मुखिया प्रनय रॉय को दे रहे थे। लालूजी की अंग्रेजी जिस अटकाव और भटकाव के दौर से गुजर रही थी उससे ये विश्वास करना मुश्किल हो गया कि ये लालूजी का ब्लॉग है। तीन महीने में इतना जबर्दस्त सुधार हजम नहीं हुआ। अपन लोग भी उसी परिवेश से आए हैं लिहाजा अनुमान लगा सकते हैं। इसके बाद दिमाग में आया कि अंग्रेजी तो छोड़ो चलो हिंदी वाली देख ली जाय। यहां मामला नागनाथ से छूटे तो सांपनाथ गले पड़ गए वाला हो गया। इतने फूहड़ अंदाज़ में हिंदी लिखी देखकर दिमाग चकरा गया। पिछला वाक्य कहां खत्म होगा और अगला कहां से शुरू होगा इसी का तारतम्य बिठाने में लेख समाप्ति की घोषणा हो गई।

 

अब हिंदी हृदय प्रदेश से आने वाले लालूजी की हिंदी इतनी खराब होगी ये बात भला किसके गले उतरेगी। कुल मिलाकर समझ में आया कि लालूजी की बोलचाला की नकल करने के चक्कर में लिखने वाले ने सारा बंटाधार कर दिया। होना उलट चाहिए था कि उनकी हिंदी अच्छी होती और अंग्रेज़ी गड़बड़। तो बात गले से उतर जाती। अगर किसी को विश्वास न हो तो नीचे लालूजी के एक लेख का हिंदी और अंग्रेज़ी तर्जुमें का लिंक दे रहा हूं ग़ौर फरमाइएगा…

 

http://www.mypopkorn.com/blogs/celebrityblog.html?blogid=MTA=&hindi=1

http://www.mypopkorn.com/blogs/celebrityblog.html?blogid=MTA=

 

अपन तो यही कहेंगे लालूजी कि लगे रहिए मगर खुद लगिए तो ज्यादा मज़ा आएगा। आख़िर आपकी मौलिक अदा के ही तो भारतीय दीवाने हैं। दूसरों के जरिए इसे कैसे बरकरार रख पाएंगे।

 

अतुल चौरसिया

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कुछ ऐसा विनम्र प्रभाव है अनुपमजी का

यूं ही एक मित्र की राय पर घूमते-घूमते गांधी शांति प्रतिष्ठान जाना हुआ था। दरअसल एक स्टोरी के चक्कर में जलयोद्धा राजेंद्र सिंह की तलाश थी। मित्र ने कहा अनुपम जी से मिल लो तुम्हारी परेशानी दूर हो जाएगी। परिसर के एक तरफ मौजूद साधारण से कमरे में फाइलों, किताबों के बेतरतीब ढेर के बीच वो बैठे थे। पहली ही वाणी ने मन के पोर-पोर को एक नई ऊर्जा दी थी। ब्लूलाइन बस के कंडक्टरों की लठ्ठमार हरियाणवी सुनते सुनाते उनके दरवाजे पर पहुंचा था। यहां इतनी मधुर वाणी और उतना ही सौम्य व्यवहार देखकर हैरत भरी खुशी महसूस हुई थी। बातों ही बातों में उनका प्रभाव मन पर छाने लगा था। उनका बृहद व्यक्तित्व उनके विनम्र आचरण से खुद ब खुद स्थापित होने लगा। अब तक उनके बारे में मेरा व्यक्तिगत ज्ञान काफी कम था। बातचीत के सिलसिले के बीच ही उन्होंने अपनी लिखी एक पुस्तक “आज भी खरे हैं तालाब” भेंट की। इतनी सरल भाषा में इतनी विश्लेषणात्मक, रिपोर्ताज आधारित पुस्तक के दो चार पन्नों ने ऐसा लगा अपनी सारी खोज पूरी कर दी है। जिस उद्देश्य के लिए अनुपमजी के पास आया था ऐसा लगा उनसे मिलकर ही सारा उद्देश्य पूरा हो गया। ऐसा संपूर्ण गांधीवादी इस जमाने में, एक विरल अहसास था उनसे मिलना।

“आज भी खरे हैं तालाब” के बारे में एक बात बताना जरूरी है। पर्यावरण, तालाब, पानी के ऊपर इतनी गहरायी से हिंदी में शायद ही कोई पुस्तक उपलब्ध होगी। देश समाज के बारे में उनके सूक्ष्म ज्ञान की गवाही देती है ये पुस्तक। इसे कालजयी रचनाओं में शामिल किया जा चुका है। इंडिया टुडे ने देश में लिखी गई अब तक की दस सर्वश्रेष्ठ, सबसे ज्यादा छपी, बिकी और पढ़ी गई पुस्तकों में इसे शुमार किया है। इसके इतर आज कोई भी प्रकाशन संस्था, कोई भी व्यक्ति इस पुस्तक को सिर्फ साभार प्रेषित करके छपवा सकता है, बंटवा सकता है। इसके बदले में उन्हें किसी रॉयल्टी की दरकार नहीं है। उनके पास पुस्तक का कोई कॉपीराइट नहीं है। देश की लगभग सभी भाषाओं में लोगों ने इसका अनुवाद किया है। आज पानी और पर्यावरण की समस्या से जूझ रही देश और राज्य की सरकारें भी इस पुस्तक का सहारा लेती हैं। तमाम इलाकों में उनके सुझावों को लागू करके सूखे पड़े जोहड़ों-तालाबों को सदानीरा बनाने का अभियान या तो पूरा हो चुका है या फिर चल रहा है।

बहरहाल अपनी मुलाक़ात की बात करूं तो इसी तरह के किसी पर्यावरण के मुद्दे पर राजेंद्र सिंह की खोज अनुपमजी से मुलाकात की वजह बनी थी। दिमाग में आया कि अपनी स्टोरी के लिए इस भली आत्मा से बेहतर भला कौन हो सकता है। पर तुरंत झटका लगा। अनुपमजी मीडिया और कैमरे की चकाचौंध से हमेशा दूर रहते हैं। अपनी धुन में मगन इस पर्यावरणवादी को किसी तरह की प्रशंसा, नाम, यश की लालसा भी नहीं है। कुछ इस तरह के प्रभाव में उनसे पहली मुलाकात के बाद विदा हुआ मैं।

इस मुलाक़ात के कुछ ही दिनों बाद ही अपने घर जाना हुआ। रास्ता काटने और पढ़ने का कीड़ा शांत करने के लिए चलते चलते “आज भी खरे हैं तालाब” अपने पास रख लिया था। किताब पढ़ा तो अहसास हुआ कि तालाबों को पाट कर, कूंओं पर घर खड़ा कर किस विनाश को न्यौता दे रहे हैं हम। रोडवेज़ पर उतरा तो दिमाग में घूम रहा था, पहले हम कैसे सब्जी मंडी वाले कूंए की मुंडेर पर बैठकर अपने ही अक्स को पत्थर मारते रहते थे और छपाक की गूंजती हुई आवाज़ पर उछलते थे। फिर याद आयी अपने घर के पिछवाड़े वाले कूंए की जिसमें एक बार जवाहिर चाचा कि जलती हुई टॉर्च गिर गई थी। पानी की रोशनी अंदर तली से ऊपर आ रही थी। पूरा मुहल्ला रस्सी में चुंबक बांध कर ऱोशनी के आस-पास इस उम्मीद से डुबाता-निकालता रहा कि शायद टॉर्च निकल आए। पता नहीं उनकी रस्सी टॉर्च तक पहुंचती भी थी या नहीं। पर धीरे धीरे टॉर्च की रोशनी मद्धिम पड़ती हुई बंद हो गई। इतना साफ पानी था उस कूंए का। कूंए की मुंडेर से सटा हुआ चबूतरा था। जिस पर मुहल्ले के दो चार लोग रोज़ नहाते और तुलसी के पेड़ को जल चढ़ाते थे। वैसे इस कूएं का सबसे बड़ा उपयोग तब देखने को मिलता था जब किसी के घर किसी की मृत्यु के बाद दशवां यानी शुद्धिकरण होता था। कूएं के चारो ओर बाल मुंडवाए लोगों का जमघट लगता था। यहां से शुद्ध होकर लोग तेरहवीं की तैयारी करते थे।
आज जब मैं रोडवेज़ से उतर कर बाज़ार में घुसा तो याद आया सब्जी मंडी वाला कूआं पट गया है। अब उसकी मुंडेर को तोड़ दिया गया है। वहां दो-चार सब्जी वाले अपनी रेहड़ी लगा कर बैठते हैं अब। आगे बढ़ा तो सूर्यबली के तिराहे के पास वाला कूआं याद आया इस पर उन्ही सूर्यबली के छोटे भाई ने अपनी दोमंज़िला बिल्डिंग खड़ी कर ली है। आगे बढ़ा तो चौराहे पर आ पहुंचा। जहां खेलकर हम लोग जवान हुए हैं। इस कूएं को भी लोगों ने पाट दिया। तर्क ये था कि अगर पाटा नहीं गया तो ज़हरीली ग़ैस निकल सकता है। वैसे भी अब कौन कूएं का पानी पीता है। वहां से सामने ही अपना घर था पर निगाह मवेशी खाना जाने वाली सड़क की ओर चली गई। महाजनी टोला के दोनों कूओं में से एक पर बर्नवाल परिवार ने ये कह कर मिट्टी डलवा दी कि बच्चों के गिरने का ख़तरा हैं, दूसरे पर जायसवालजी ने चेयरमैन से सांठगांठ कर अपनी दुकान खड़ी कर ली। आज बाज़ार के सारे कूएं पट गए हैं कुछ पर बिल्डिंगे खड़ी हो गई हैं, कुछ पर रेहड़ी पटरी वालों ने कब्जा कर लिया है। तर्क ये दिया जाता हैं कि इसमें टाउन एरिया का ही फायदा है, तहबाजारी जो वसूल होती है।

“आज भी खरे हैं तालाब” अपने पास थी। पर समझ नहीं आ रहा था कि इसे किसे देकर समझाया जाय। किसे पढ़ाया जाय। दो-तीन दिन ही बीते थे घर पर कि सुबह-सुबह बगल की सेठानी चाची रोते हुए अपने घर आयी। माताजी से जाने क्या बात की और उन्हें लेकर अपने घर चली गईं। थोड़ी देर बाद बाहर से तेज़ तेज़ आवाज़े आने लगी। बाहर गए तो देखा मेरे पिताजी गुस्से में सेठानी चाची के पति यानी हमारे लालजी चाचा को समझा रहे थे। थोड़ी देर में माजरा कुछ यूं समझ में आया कि चाचाजी अपने पुराने घर को तुड़वा कर उसका मलबा घर के पीछे वाले कूएं में फिंकवा रहे थे। सुबह से ही मजदूर इस काम में लगे हुए थे। इस बात से खुद उनकी पत्नी जी भी नाराज़ थी। वो आज भी हर दिन तुलसी चौरे पर जल चढ़ाती हैं। पर वो उनकी सुनने को तैयार नहीं थे। इसीलिए वो रोते हुए हमारे घर आयी थीं। अब पापाजी और चाचाजी में तर्क-वितर्क हो रहा था। बहरहाल दोनों लोगों को शांत करके मैंने सबसे पहले उन मजदूरों को रोका जो लगातार मलबा कूएं में फेंक रहे थे। फिर एकदम से लगा कि “आज भी खरे हैं तालाब” सार्थक हो जाएगी। सबके बीच मैंने वो किताब चाचाजी को दी। कुछ पन्ने जल्दी-जल्दी में पढ़ कर उन्हें सुनाए। बात उनकी समझ में आने लगी थी। तभी पापाजी ने धर्म की दुहाई दी किसी को पानी पिला नहीं सकते तो किसी का पानी छीनों भी मत। लोगों ने तो जाने क्या-क्या पूण्य करके कूएं बनवाए। इसे पाटकर पाप का बागीदार क्यों बन रहे हो?

बहरहाल “आज भी खरे हैं तालाब” के खरेपन पर अंदर से अभिमान हुआ और बाहर से ये संतोष की कूआं पटने से बच गया। कुछ इस तरह का विनम्र प्रभाव है अनुपमजी का। अब कूएं की साफ-सफाई और उसमें कूड़ा करकट ना पड़े इसके लिए जाली लगाने का प्रबंध मुहल्ले के लोग कर रहे हैं।

अतुल चौरसिया

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पूत के पांव गर्भ में…

जब बात अपनी गिरेबान में झांकने की हो तो बेशर्मी की चादर ओढ़ना कोई इनसे सीखे। दिल्ली से दरभंगा तक समाज सुधार की दुहाई देनी हो, नैतिककता के हर तकाजे की चिंता में मरे जा रहे टीवी मीडिया की बात कर रहा हूं। हालांकि मीडिया पर लिखने पर आज ये आरोप लगाना आसान हो गया है कि ये कुंठा निकालने का जरिया है। पर कहने वाले कहते हैं लिखने वाले लिखते हैं।

आज से 50 साल बाद जब पत्रकारिता के स्कूलों में टीवी मीडिया का इतिहास पढ़ाया जाएगा तो एक हल्लेदार बात जरूर पड़ाई जाएगी। ख़बरिया चैनलों के शुरुआती दिनों में एक ऐसा चैनल हुआ करता था जिसे दो महीनों के लिए प्रसारण से प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसकी वजह थी एक रिपोर्टर की आपराधिक महत्वाकांक्षा और एक मीडिया हाउस द्वारा सतही, ग़ैर जिम्मेदार तरीके से प्रसारित की गई एक रिपोर्ट। कर्ता धर्ता थे प्रकाश सिंह नाम के एक महाशय जिन्हें पत्रकारिता के ऊंचे मानको न सही उसे शर्मसार करने के लिए जरूर याद किया जाएगा।

अपना तो अपना ही होता है। तो फिर अपने लाल को टीवी वाले ऐसे कैसे छोड़ देते। पुरानी कहावत है उंगली में जख़्म हो तो उंगली काट कर नहीं निकाल देते। इसी कहावत को गांठ मार लिया है टीवी वालों ने। बिल्कुल नेताओं की तरह बीती ताहि बिसार के आगे की सुधि लेहु।

गुड़िया की सारे देश के सामने पंचायत लगवाने वाला मीडिया, आरुषी हत्या के मामले में 8 दिनों में 88 संभावनाएं पेश कर चुका टीवी मीडिया पत्रकारिता के इतिहास के कुछेक दुर्लभतम कारनामों में से एक को अंजाम देने वाले प्रकाश सिंह को साल भर से भी कम समय में क्षमादान दे चुका है।

जब मुंशी का डंडा सूचना प्रसारण मंत्रालय से निकलता है तो सब के सब एक सुर से घिंघियाते हैं– ये प्रेस की आज़ादी पर हमला है, अपने ऊपर रोक-रपट मीडिया खुद ही लगाएगा। किसी सरकारी फरमान की जरूरत नहीं है। क्या दिखेगा, क्या लिखेगा और क्या नहीं इसका फैसला मीडिया अपने आप करेगा तो लोकतंत्र, राजनीति, समाज सब सुरक्षित रहेगा।
ऊपर से ये चिकनी बातें कितनी अच्छी लगती है। पर दिखता क्या है– ख़बर के नाम भूत प्रेत, नाग नागिनों से पीछा छूटा तो अब महादेव शंकर के दर्शन से साईं बाबा और तो और रावण के विमानपत्तन तक पहुंचने का दम सब के सब कर रहे हैं। इसी रेलमपेल में टीआरपी देवता प्रसन्न हैं और चैनल एक नंबरी-दो नंबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसी को सेल्फ रेगुलेशन कहते हैं। खबरों पर आत्म नियंत्रण का ये कैसा चेहरा है? सब छुट्टा सांड़ों की तरह ख़बरों के नाम पर पत्रकारिता को रौंद रहे हैं।

बुजुर्गों ने कहा था कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं यहां तो गर्भ में ही दिख रहे हैं। वॉयस ऑफ इंडिया नाम का नया ख़बरिया चैलन भीड़ में शामिल होने की कशमकश में लगा है। चैनल अभी प्रसारित भी नहीं हुआ है इन्होंने प्रकाश सिंह महोदय को बतौर अपना कर्मचारी नियुक्त किया है। ख़बर है ये त्रिवेणी वाले उनसे फिर से पत्रकारिता करवाएंगे। यही है मीडिया का सेल्फ रेगुलेशन। इतनी मोटी सी बात भी घुटनाग्रस्त दिमाग में नहीं आती तो कोई क्या करे?

अतुल चौरसिया।

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ये दुनिया का दर्द है

हॉलीवुड की मशहूर तारिका हैं शैरोन स्टोन। दुनिया भर में इनके प्रशंसक इनकी फिल्मों के दीवाने हैं। लेकिन इतनी मशहूर फनकार होते हुए भी उनसे इतनी बचकानी नासमझी की उम्मीद किसी को नहीं रही होगी। कॉन फिल्म समारोह के दौरान बातों ही बातों में शेरोन ने कह डाला, चीन में भूकंप और तबाही उसकी करनी का नतीजा हैं। उनके मुताबिक दूसरों के साथ बुरा करने वाले का हश्र भी बुरा ही होता है। शेरोन का निशाना चीन की तिब्बत नीति पर था। तिब्बतियों से उनका अनुराग तो समझ में आता है पर लाखों निरीह चीनियों के प्रति उनका संवेदनशील मन इतना कठोर कैसे हो सकता है? या फिर ये संवेदनशीलता तथाकथित है।

हॉलीवुड की चमक-दमक में चुंधियाए सेलिब्रेटीज़ का ज़मीन से दो इंच ऊपर चलना कोई बड़ी बात नहीं है। कुछ गंभीर विचार भी यहां से निकले हैं लेकिन ज्यादातर सांसारिक मामलों में हॉलीवुड की सोच सतही ही रहती है। अब चीन सत्ता प्रतिष्ठान से विरोध की बात समझी जा सकती है, नीतियों से दुराव हो सकता है, विचारधारा की कटु आलोचना मुनासिब है लेकिन प्राकृतिक आपदा के लिए नीतियां कैसे जिम्मेदार हो सकती हैं। तिब्बत में मानवाधिकारों के हनन से तो सबको सहानुभूति है। लेकिन अगर आम चीनी मर रहा है तो इससे तिब्बत खुश कैसे हो सकता है। इससे तो शेरोन जैसी सतही सोच ही खुश हो सकती है।

एक बार को अगर ये मान भी लिया जाय तो कुतर्क के कई रास्ते हो सकते हैं। क्या शेरोन कभी ये कहने की हिम्मत दिखा सकती हैं कि अमेरिकी में जब केटरीना और रीटा ने तबाही मचाई थी उसके लिए अमेरिका द्वारा इराक में किए गए कुकर्म जिम्मेदार थे। केरोलीना जब उजड़ रहा था तब उसके पीछे अमेरिकी के अफगानिस्तान, सोमालिया से लेकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में किए गए दुष्कर्म अपनी भूमिका निभा रहे थे। बहरहाल ये तो कुतर्क हैं इनका कोई अंत नहीं। पर एक छोटी समझ की आशा तो इतनी बड़ी हस्ती से की ही जा सकती है कि अमेरिकी मानवता, तिब्बति मनुष्यता या फिर चीनी इंसानियत में कोई फर्क नहीं होता। पूरी दुनिया की मानवता का एक ही दर्द है, जब प्रकृति अपना कोप बरसाती है तो वो अमेरिका-चीन में भेद नहीं करती। विरोध विचारधारा से, संस्थान से होता है व्यक्ति से नहीं।

अतुल चौरसिया

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ये मन से जुड़ने का सवाल है

“भइया तोहार साली” यही फिल्म का नाम था जिसने पिछले हफ्ते भर से शिवम टाकीज़ की हमेशा शांत रहने वाली टिकट खिड़की पर खिचखिच मचा रखी थी। टिकट के लिए मारामारी देखकर ऐसा लगता था कि 70 के दशक की कोई अमिताभ बच्चन की फिल्म रिलीज़ हुई हो। लोगों से बातचीत में पता चला कि फिल्म तो पिछले एक हफ्ते से लगी थी लेकिन हर रोज़ इवनिंग और नाइट शो में इसी तरह की मारामारी मचती है। अब जिज्ञासा और बढ़ गई। सिर्फ इसी फिल्म के लिए या फिर हर फिल्म के लिए टिकट खिड़की पर मारामरी मचती है। तो पता चला कि अरे हर फिल्म के लिए कहां भीड़ आती है, ये तो भोजपुरी फिल्म है इसलिए ये हाल है।

भोजपुरी फिल्मों के लिए हाल के कुछ सालों में पैदा हुआ प्यार अचानक कहां से आया है, ये विचार का विषय है। पहले तो भोजपुरी फिल्मों का बाज़ार इतना व्यापक नहीं था। भोजपुरी पिछड़ों, गंवारों की भाषा थी। शुद्ध रूप से मुनाफे पर आधारित फिल्मी दुनिया का अर्थशास्त्र भोजपुरी को इतनी तरजीह इससे पहले तो कभी नहीं दे रहा था। अब इसके लिए किसी मनोज तिवारी या रवि किशन को श्रेय देने की जरूरत नहीं है। इन्होंने भोजपुरी को ये मुकाम नहीं दिलाया है बल्कि भोजपुरी ने इन्हें पहचान दी है।

एक दौर में निम्न और मध्यम तबके के गुस्से और रोष को एंग्री यंग मैन ने जुबान दी थी। तो इसमे अमिताभ से ज्यादा योगदान एक ऐसे नायक का शिद्दत से इंतज़ार को जाता है जिसे सबसे पहले अमिताभ ने समय रहते दोनों हाथों से लपका था। दर्शकों को 70 के दशक में जिस नायक की दरकार थी उसे अमिताभ के रूप में एक प्रतीक मिल गया था जो अगले दो दशकों तक उनकी कुंठाओं, दबी हुई चिंगारियों को दमदार संवादों और अधकचरी विकसित स्टंट तकनीकों की बदौलत तुष्ट करता रहा। बाद में अमिताभ का जादू कुछ फीका पड़ा तो मिथुन के रूप में अगली कतार में बैठे दर्शकों को एक नया तारणहार मिल गया। आधी फिल्म पूरी होने तक घर बार से रुखसत, ज्यादातर अनाथ ये हीरो जब बदला लेता था तो सीटियों, तालियों के साथ लोगों को अपना गुबार को शांत करने के लिए गालियां निकालते हुए भी सुना जा सकता था। एक ही तर्ज पर लगातार फिल्में करने के बावजूद मिथुन सिनेमा के गंवई बाज़ार के बादशाह बने रहे। पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार के सिनेमा हॉल्स में इनकी फिल्में खूब तालियां बटोरती। लेकिन ये दौर भी जाना था सो चला गया।

अब 90 का दौर हैं। यहां शाहरुख, सलमान जैसे चॉकलेटी सितारे हैं जो स्विटज़रलैंड की खूबसूरत वादियों में 0 डिग्री तापमान पर झीनी साड़ी में लिपटी हिरोइनों के साथ कमर हिलाते हैं। ये शानदार महलनुमा घरों में रहते हैं। 70-80 का चालों, गांव की झोपड़ियों में रहने वाला हीरो पर्दे से लुप्त हो गया है। 90 के उत्तरार्ध के दशक के हिंदी सिनेमा ने तो अपना चेहरा बिल्कुल ही बदल डाला। अब यहां सिर्फ मल्टीप्लेक्स, ओवरसीज़ के लिए फिल्में बनने लगी हैं। ऊप्स जैसी ऊटपटांग फिल्मों के लिए तो इंडस्ट्री में पैसा है पर गांव-समाज को फिल्मों में दिखाना शान के खिलाफ है। कुल मिलाकर हिंदी सिनेमा काफी लकदक हो गया है और हां इसके साथ ही हिंदी सिनेमा की भाषा भी अब हिंदी न रहकर हिंगलिश हो गई है।
पर अफसोस ये सारा बदलाव एकतरफा था। अमिताभ, मिथुन, गोविंदा की फिल्मों को हिट कराने वाला ग़ैरशहरी, गांवो, कस्बों में रहने वाला तबका अभी भी मौजूद है। पर अब उसके लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने फिल्में बनाना बंद कर दिया है। इंडस्ट्री ने एकतरफा फैसला कर लिया कि जितने एडवांस फिल्मवाले हो गए हैं उतना ही विकसित उनका दर्शक वर्ग भी हो गया है। वो कहते हैं न कि फिल्मी दुनिया हकीकत से परे सपनों की दुनिया है। इसी तरह हिंदी फिल्म वाले भी सपनो में जीने लगे हैं। आज 10 में 9 फिल्में पिट जाती हैं फिर भी उस तबके के लिए फिल्में बनाने को कोई राजी नहीं है जो अमिताभ के लिए पहले दिन का पहला शो देखने के लिए सुबह आठ बजे से खिड़की पर जम जाता था। मिथुन के लिए भरी दुपहरी में लाइन लगाने वाले दर्शक के लिए कोई फिल्म अब नहीं बन रही। उसकी भाषा में जबर्दस्ती अंग्रेज़ी को घुसा कर उसे जबर्दस्ती घोंटने के लिए मजबूर किया जाता है।

तब उसकी नज़र अपनी भाषा में बनने वाली भोजपुरी फिल्मों की ओर गई। यहां उसकी अपनी कहानी मौजूद थी। अपना गांव-देहात मौजूद था। यहां का नायक उनकी जुबान बोलता था। गरीब हीरो अमीर लड़की और खलनायक बाप का मजबूत गठजोड़ उसे भोजपुरी फिल्मों में देखने को मिला। शहरी लड़की गंवई छोरे पर मिटी तो आगे की सीट पर बैठा दर्शक इसे अपनी जीत समझ कर उछाल मारता था। इसलिए भोजपुरी फिल्म आज हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए हॉट मार्केट बन गया है। हिंदी की बिसात पर अपना उल्लू सीधा करने में लगे फिल्मवाले, 10 में से 9 शब्द अंग्रेजी में बोलने वाले फिल्मवाले आज भोजपुरी का गुणगान करते नज़र आते हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां आसानी से खूब पैसा बनया जा सकता है।

जब बड़े-बड़े सितारों की फिल्में पिटती हैं तो अदने से कलाकारों और बजट वाली भोजपुरी फिल्म पूर्वी यूपी में बॉक्स ऑफिस तोड़ रही होती है। इसलिए “भइया तोहार साली” के लिए लाइल लगती है तो टशन, सांवरिया पानी नहीं मांगती। ये मन से मन के जुड़ने का सवाल है। मन से जुड़ो तो पैसा खुद बन जाएगा।

अतुल चौरसिया

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चचा सैम और अधनंगे फकीरों-सपेरों की भूख…

खा-खा के मुटियाए अमेरिकियों पर उनकी नज़र नहीं जाती। दस में नौ सर्वे चिल्लाते रहते हैं कि अमेरिकी मोटापे से बेजार हैं। वजह भी सबको पता है। लेकिन अपने बारे में इस तरह की ख़बरें उन्हें परेशान नहीं करती बल्कि उनका सीना और चौड़ा हो जाता है। पैसे के अगाध स्रोत में अंधराए अमेरिकियों के पास करने को कम है इसलिए खाना उनकी उच्च प्राथमिकता में आता है। सर्वे तो ये भी बताते हैं कि मन भर खाने के बाद जितना जूठा खाना अमेरिकी नदी नालों में बहा देते हैं उतने में दरिद्रई के शिकार छोटे मोटे अफ्रीकी देशों की पूरी जनसंख्या का पेट भर जाय और “जुग-जुग जियो” का आशीर्वाद मुफ्त में मिले। पर ये बाते न तो राष्ट्रपति महोदय को नज़र आती हैं न ही उनकी विदेशमंत्री कोंडलिज़ा ख़ातून को।

हफ्ते भर पहले खातून ने हिंदुस्तानियों को ज्यादा खाने-पीने के लिए जिम्मेदार ठहराया था, और इसे ही दुनिया में खाद्यान की समस्या का कारण बताया था। अब हफ्ते भर बाद चचा सैम ने भी हिंदुस्तानियों के खान-पान की लानत-मलानत की है। उनके मुताबिक भारत का मध्य वर्ग जब से पैसे वाला हुआ है उनकी खान-पान की जरूरत बढ़ गई हैं। यहां के 35 करोड़ मध्यवर्गियों ने मिलकर पूरी दुनिया की नाक में दम कर दिया है। दुनिया को खाने की मोहताजगी हो गई है। पैसा आने के बाद भी किसी सर्वे में ये तो नहीं कहा गया कि हिंदुस्तानी खाना बर्बाद करते हैं। यहां अमेरिकियों की तरह खाने, मुटियाने की बात तो कोई नहीं कहता। तो फिर अपने गिरेबान में झाकने में तकलीफ क्यों है?

चचा सैम चाहते हैं कि हिंदुस्तानी हमेशा भूखे ही रहें। अधनंगे फकीरों, सपेरों का देश तो फिरंगियों ने पहले ही घोषित कर दिया था। लगता है चचा अभी भी उसी चश्मे से गाफिल हैं। दुनिया के ईंधन का चालीस फीसदी हिस्सा अकेले ढकारते वक्त उन्हें नहीं सूझता कि हम कुछ ज्यादा माल उड़ा रहे हैं। कुल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन का अस्सी फीसदी हिस्सा अकेले उगलते समय उन्हें दुनिया पर मंडराते ख़तरे का अंदाज़ा नहीं होता। तब तो उन्हें इसकी फिकर भी नहीं होती कि उनके कुकर्मों की सज़ा पूरी मानवजाति, समाज, पर्यावरण, जलवायु, जल, जंगल, ज़मीन, नदी, पहाड़, सागर को भुगतनी पड़ रही है। और आगे ये खटकरम दुनिया के सिर पर और भारी पड़ने वाला है। बेशर्मी की हद में इराक से लेकर ईरान तक तेल-तेल की हाय-हाय करते समय इन्हें दुनिया पर संकट नज़र नहीं आता। पर कुछ दशक पहले के भूखे भारतीयों का भरपेट खाना इनकी आंखों में गड़ रहा है। इतने महत्वपूर्ण काम को छोड़कर पूरा अमेरिकी सियासी कुनबा हिंदुस्तानियों के खान-पान पर निगाह रखने के अतिमहत्वपूर्ण काम में लग गया है। कितनी रोटी, कितना चावल, कितनी दाल मिलेगी इसका भी फैसला अब आठ हज़ार किलोमीटर दूर बैठे चचा ही करेंगे। हम तो यही कहेंगे कि भूखे पेट की हाय बहुत भारी पड़ती है। इसलिए मुंह का निवाला छीनने की कोशिश मत करो वरना बुरे फंसोगे।

अतुल चौरसिया

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