मुंबई टू मैंगलोर वाया अपनी अपनी सुविधा से

पहले मुंबई में राज समर्थकों की गुंडई पर जमकर सियासत हुई, अब मैंगलोर में वही कहानी दोहराई जा रही है. कांग्रेस जमकर हल्ला बोल रही है कि मुतालिक के रिश्ते भाजपा से हैं, उसे कर्नाटक की भाजपा सरकार का संरक्षण प्राप्त है. ये काफी कुछ मुंबई में मनसे के गुंडो द्वारा की गई गुंडई के रिप्ले जैसा ही है, बस मंगलोर में करने वाले मुंबई में कांग्रेस सरकार पर हमलावर मुद्रा में थे तो मुंबई में करने वाले मंगलोर में हमलावर बन गए हैं. मनसे की खुलेआम-बेलगाम गुंडई पर मूकदर्शक बने पुलिस और प्रशासन की भूमिका से ये बात समझते देर न लगी कि सत्तासीन कांग्रेस सरकार मनसे को शह देकर शिवसेना-भाजपा गठबंधन की गांठ में दरार डालना चाहती थी. ले देकर उसे इस बात का पूरा यकीन था कि मनसे वोटो का जितना काटापीटी करेगी वो शिवसेना-भाजपा के पाले से ही आएगा. और हर्र लगे न फिटकरी कांग्रेस की तूती महाराष्ट्र में बोलती रहेगी.
अब काफी कुछ ऐसा ही मंगलोर हादसे के बाद देखने को मिल रहा है. बस यहां पर मुंबई में कांग्रेस को घेरने वाली शिवसेना-बीजेपी यहां बचाव की मुद्रा में है तो मुंबई में रक्षात्मक रही कांग्रेस यहां हमलावर बन गई है. पर कुल मिलाकर निष्कर्ष यही है कि विचारधारा कोई भी हो राजनीति का रंग एक लगे है, इसका ढंग एक लगे है इसकी मोटी चमड़ी पर जल्दी शिकन-सिलवटें नहीं पड़ती.
टाइम्स नाउ पर कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी चिल्ला-चिल्ला कर लोकतांत्रिक मूल्यों के हनन की दलील दे रहे थे पर मुंबई की बात पर वो बेहयाई की हद तक बात को गोल मोल कर देते है. काफी कुछ ऐसा ही स्मिता ईरानी भाजपाई कुनबे की ओर से कर रही थी. पर पुरानी और सौ फीसदी खरी बात है- किसी के पास जितना कम सच होता है वो उतना ही ज्यादा हल्ला मचाता है.

दरअसल समस्या हमारी उस जड़ से जुड़ी है जिसे हमने किसी दौर में अपनी अस्मिता, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम के नाम पर दबे-छुपे ही गर्व के साथ स्वीकार किया था. 80-90 के दशक में जब पाकिस्तान के विरोध के नाम पर शिवसेना के गुंडे वानखेड़े से लेकर फिरोजशाह कोटला तक की पिचें खोद रहे थे तब हमने अंदर ही अंदर तहेदिल से इसका स्वागत किया था. कहीं न कहीं शिवसेना की ये फासीवादी हरकतें हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान की प्रतीक सी बन गई थी. वो हमारे दबे मनोभावों का प्रतिनिधित्व कर रही थीं. और उस अंध आवेग में हमने देश में पड़ रही एक विकृत परंपरा की विषबेल की अनदेखी ही नहीं की बल्कि उसे पनपाने में भी पूरी मदद की. लोकतांत्रिक देश में लाठी के जोर पर अपनी मनमानी करवाने की उस शुरुआती चरण को हमने पूरा समर्थन दिया, कहीं से भी सरकारों ने उसे ग़ैरकानूनी मानकर कार्रवाई की जहमत नहीं उठाई. ऐसा इसलिए भी था क्योंकि फासीवाद का ये चेहरा राष्ट्रवाद के मुखौटे में छिपकर हमसे रूबरू हो रहा था. दूसरे उसका निशाना हमारे मानस गहरे तक बैठ चुका स्थाई दुश्मन पाकिस्तान था इसलिए भी शायद दबे-छुपे ही सही सबने उसका स्वागत किया था. 1965 औऱ 71 के दौर की यादें अभी पूरी तरह से ओझल नहीं हुई थी, मन में कड़वाहट लिए ये पीढ़ी उस दौर की गुंडई पर मन ही मन मुस्करा रही थी. किसी ने भी अंदर ही अंदर फैलते उस भस्मासुर पर नजर नहीं डाली जो आज पूरी हिंदुस्तानी व्यवस्था का सर्वनाश करने पर उतारू है. गांधी के देश में लाठी के जोर से सबकुछ हासिल कर लेने की जो विनाशक लहर चल रही है इसका खामियाजा गृहयुद्ध से लेकर देश के एक और बंटवारे तक कुछ भी हो सकता है.हर पैमाने पर हम पीछे की ओर बढ़ रहे हैं. मध्ययुगीन परंपराओं के प्रति हिंदुस्तानियों का प्रेम बढ़ता जा रहा है. भारत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सहिष्णुता खत्म होती जा रही है. महिला पूजनीय होती है पर सरेआम उसकी पिटाई करने में हमें कतई शर्म नहीं आती है. माता स्वरूपा को निर्वस्त्र करने में 30-40 लफंगों का समूह बड़ी शान समझता है. और सत्ता के ऊपरी पायदान पर विराजमान लोग वहीं से इन मोहरों को मौन सहमति देते रहते हैं. अपने घर के भीतर जिनकी नहीं चलती वो लोग पूरे समाज को अपने इशारों पर चलाने की हवा-हवाई कल्पनाएं पाले जंगलराज फैला रहे हैं. समाज के सबसे बड़े हितैषी बनने का दावा कर रहे ये लोग एक बार अपने घरों में भी पूछ लें कि उनके इस कुकर्म से किस हद तक उनकी माताएं-बहने सहमत हैं. पर ऐसा नहीं होगा क्योंकि फासीवाद तर्क-वितर्क में विश्वास नहीं करता. उसे सिर्फ बंदूक की भाषा आती है उसी पर विश्वास करता है. एक औऱ तालिबान हिंदुस्तान में भी तेजी से पैर पसार रहा है कहना बहुत छोटी बात होगी.

विडंबना की बात है जिस देश ने अभी-अभी 26/11 देखा है, जिसके सामने विदेश से आयातित कट्टरपंथी आतंकवाद एक विकराल समस्या बन गया है वो खुद ही उन्हीं कट्टरपंथियों की राह पर चल रहा है, गाहे-बगाहे उन्हीं की भाषा बोल रहा है. जिन्हें 26 नवंबर को हम एक सुर से गरियाते फिरते हैं अगले दिन उन्हीं की राह अपनाने में हमें कोई शर्म नहीं आती है. एक बात और जो मन को बार-बार झिंझोड़ती है- पिताजी बचपन में सिखाते थे पढ़ लिख लो वरना कसाई टोले वालों की तरह मोटर मैकेनिक बन कर रह जाओगे. थोड़ा और बड़े हुए थे तो पिताजी समझाते थे पढ़ोगे लिखोगे नहीं तो क्या कश्मीर-पंजाब वालों की तरह हथियार लेकर लोगों की हत्या करोगे. बाद में जब घर से बाहर निकले तो पिताजी परेशान हो गए ये क्या हो रहा है पड़ोस में तालिबान का उदय हो रहा है. ये लोग औरतों महलाओं को पढ़ने-लिखने तक नहीं देते, उन्हें बाहर तक नहीं निकलने देते. पिताजी के विचार चाहे जो रहे हों, भले ही किसी तरह का भेदभाव रहा हो, भले ही किसी विशेष वर्ग के लिए कुंठा रही हो पर एक बात तो साफ थी ही कि उन्हें इस बात पर गर्व था कि इस देश का बहुसंख्यक समझदार, पढ़ा लिखा होता है, जाहिल नहीं होता. हमें इसी बात पर गर्व होता है कि हिंदुस्तानी कूप-मंडूक नहीं है. तालिबानियों की तरह हम किसी पर जंगली कानून नहीं थोपते, सभ्य समाज की भूमिका पर विश्वास करते हैं. पर क्या आज ये बातें किसी लिहाज से सच लगती हैं?
अतुल चौरसिया

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वही परम पद पाएगा

2006091606061201बीजेपी ये दिखाने की कोशिश में काफी शांत है कि कल्याण के जाने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा है. सियासत की अपनी मजबूरियां हैं. कल्याण को भी इस बात का अहसास है. पहले भी एक बार पार्टी से नाता तोड़ कर अपनी दिग्गजई की अंदाजा लगा चुके हैं. पर बाद में लौट के उसी कुनबे में आए थे. अब एक बार फिर से वही राग छेड़ा है. दोनों की अपनी अपनी मजबूरियां हैं पर कल्याण भी ज्यादा लंबे पैंतरे न चल कर कहीं न कहीं मैान मनौव्वल की संभावना को जिंदा रखे हुए हैं. मसलन वो न तो किसी पार्टी में जाएंगे न ही कोई पार्टी बनाएंगे. अपनी जिद पर अड़कर अपनी खास सहयोगी कुसुम राय को राज्यसाभा भेज चुके हैं खुद भी एटा से लोकसभा का टिकट झोली में डाल चुके थे. पर पुत्रमोह ने सरा टंटा खड़ा कर दिया. अशोक प्रधान को बुलंदशहर की सीट देना उन्हें नागवार गुजरा. अब कल के आदमी को अपने सामने तवज्जो देते देखकर कल्याण बर्दाश्त भी तो नहीं कर सकते थे.
हालांकि जो मामला ऊपर से पुत्रमोह लगता है अंदर से बात कहीं ज्यादा गहरी है. दरअसल हिंदुस्तानी लोकतंत्र के साथ ही पार्टी में भी अपनी हैसियत अपने समर्थक विधायको सांसदों की संख्या तय करती है. इस लिहाज से एक समय उत्तर प्रदेश भाजपा की तकदीर का मालिक रह चुका 76 वर्षीय नेता आज पार्टी के भीतर अपनी जमीन तलाश रहा था. पर मंदिर आंदोलन का सारा पानी कब का बह चुका है. उनके सामने सियासत में कूदे राजनाथ आज पार्टी के अध्यक्ष हैं. तो फिर चारा क्या था? अंदर ही अंदर दबाव बना रहे थे. पर पार्टी ने भी इस दफा ज्यादा न झुकने का मन लगता है बना लिया है.
हालांकि कल्याण फिलहाल राज्य में कोई बड़ी ताकत भले ही न हों मगर एक इलाके में अभी भी वो काफी अंतर पैदा कर सकते हैं. यानी बचपन में बच्चों के बीच होने वाली लड़ाई ‘न खेलूंगा न खेलने दूंगा पर खेल बिगाड़ुंगा’ की भूमिका कल्याण बखूबी निभा सकते हैं. ये चिंता बीजेपी को अंदर ही अंदर परेशान कर रही होगी भले ही ऊपर से वो इसे दिखा न रहे हों. अजित सिंह की आरएलडी से समझौता करके पार्टी इस नुकसान की भरपाई की कोशिश कर सकती है. पर इस राह में भी रोड़े तमाम हैं. मसलन अजित सिंह की अपनी विश्वसनीयता का पैमाना बेहद निचले पायदान पर है और कल्याण की नाराजगी की एक वजह ये अवसरवादी गठबंधन भी माना जा रहा है.
भाजपा द्वारा कल्याण को नजरअंदाज करने की एक वजह और भी ज्यादा स्पष्ट है, पार्टी की हालत प्रदेश में पहले से ही खस्ताहाल है. पिछले लोकसभा चुनाव में उसे मात्र 10 सीटें मिली थी. इस लिहाज भाजपा की स्थित उत्तर प्रदेश में कम से कम ऐसी हो गई है कि उसके पास खोने को कुछ ज्यादा है नहीं. इसलिए किसी लंगड़े घोड़े की मान-मनौव्वल में अपनी ऊर्जा बर्बाद करने की बजाए आरएलडी टाइप खच्चरों को पटाना भाजपा को ज्यादा फायदेमंद लग रहा होगा.
कल्याण सिंह ने किसी पार्टी में न जाने का या फिर कोई पार्टी न बनाने का फैसला करके कहीं न कहीं अपनी इज्जत भी खुद ही बचाई है. इसकी एक वजह तो उनका पिछला अनुभव है जो हर लिहाज से उन्हें मंहगा पड़ चुका है हालांकि वो उतना ही महंगा भाजपा को भी पड़ा था. प्रदेश में भाजपा और कल्याण की राजनीतिक हैसियत का अंदाजा होने की वजह से मुलायम सिंह ने भी 2000 की तरह एकदम से कल्याण सिंह को गले लगाने की भूल नहीं की है. दूसरे जिस तरह से कल्याण ने उन्हें बीच मंझधार में छोड़ कर दोबारा से भाजपा का दामन थामा था उस दर्द की कसक भी कहीं न कहीं मुलायम को रही होगी. पर कहते हैं न कि सियासत में दोस्ती या दुश्मनी स्थाई नहीं होती. तो मुलायम ने भी थोड़ा सा चारा तो फेंका ही है ताकि भविष्य के लिए सारे दरवाजे एकसाथ बंद न हो जाए. उन्होंने कल्याण के पुत्र राजवीर को लोकसभा टिकट इच्छा के आधार पर देने की घोषणा कर दी है.
एक बार फिर से लोकसभा की नई पारी की संभावना में संसद के पिछवाड़े सियासती पहलवानों की आपसी गुत्थम-गुत्था तेज हो गई है. आखिर जो जितनी ज्यादा मजबूती से आज ताल ठोंक लेगा वहीं अगले पांच सालों तक परम पद पाएगा.
आतुल चौरसिया

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हाथ बांधकर नदी पार करने की कवायद

साल

की शुरुआत है पर देश में इसके स्वागत की कुछ ज्यादा उत्सुकता नजर नहीं रही. वजह भी बड़ी जायज है मुंबई में हुए बर्बर आतंकवादी हमले ने पूरे देश को एक सामूहिक नैराश्य की वजह दी है. और इसी गाढे़ वक्त में मीडिया के समक्ष विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के समक्ष एक और विकट चुनौती पेश गई है. सरकार ने मुंबई हमलों के प्रसारण में मीडिया द्वारा बरती गई तथाकथित लापरवाही से निपटने के लिए नियम कानूनों का हंटर चलाने की घोषणा कर दी. चहुओर हल्ला मच गया. आखिर ऐसा क्या कर दिया मीडिया ने जिसे लेकर सरकार इतनी बेरुखाई पर उतारू हो गई?

 

यद्दपि
अपने ही बीच के कुछ लोगों की भुताई ओझाई और नागनागिन नर्तन ने भारत के वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की समझ उसकी तथ्यपरकता, उसकी स्थिरचित्तता पर कई सवाल भी खड़े किए हैं. पर 8-9 वर्षों की शैशवावस्था को ध्यान में रखते हुए इसमें कुछ ढिलाई की उम्मीद तो मीडिया कर ही सकता है. वैसे भी कुछेक लोगों से अनजाने में हुई भूल के आधार पर पूरे मीडिया के अनगिनत बड़े कार्यों को कोई सरकार, सत्ता कैसे नजरअंदाज कर सकती है. आखिर मीडिया पर एक बार लगाम लगाने के बाद उन लोगों पर निगाह कौन रखेगा जो जो अपने घृणित कारनामों की वजह से आए दिन बेशर्मी की इबारतें लिखते रहते हैं. और फिर एक बार को अगर इन कानूनों को वाजिब मान लिया भी जाए तो इसको लागू करने का अधिकार किसके हाथों में होगा. कौन होगा नैतिकता का लंबरदार जिसे पूरे देश की कार्यपालिका, विधायिका, कार्यपालिका के साथ-साथ अम जनता का भी विश्वास हासिल हो. लालू यादव, मुलायम सिंह या फिर मायावती जैसे नेता जिनकी अपनी विश्वसनीयता ही हमेशा निम्नतम धरातल पर पड़ी रसातल को जाने को तत्पर रहती है. कोई चारा घोटाले में जेल जा चुका है तो कोई राजनीतिक दुश्मनी साधने के लिए दूसरी पार्टी के विधायक को देशद्रोह के लिए बने कानून पोटा के तहत गिरफ्तार कर चुकीं हैं या फिर जिनके परिवार की अथाह संपत्ति का अंदाजा लगाने में देश की सर्वोच्च जांच संस्था सीबीआई को भी पसीने गए हैं. वो फिर वो लोग जो अपने घरों में 10,000 साड़ियों और 3000 चप्पलों का जखीरा लगा कर रखते हैं.

 

 

कदम
कदम पर ओछी हरकतों से लोकतंत्र को शर्मसार करने वाले नेता ही अगर मीडिया को हांकेंगे तो लोकतंत्र का क्या होगा. कभी सीनेमावालियों से अश्लील बातचीत की सीडी को लेकर तो कभी संसद भवन में करोड़ो रूपए का लेनदेन करने वाले ही सबसे ज्यादा मीडिया पर अंकुथ की बात करते हैं, उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं. अजीब विडंबना है कि अपने दामन में झांकने की कभी कोशिश करने वाले काफी हद तक स्वच्छ, जिम्मेदार और लोकतंत्र के अहम स्तंभ को पाठ पढ़ाने की जुर्रत करने से बाज नहीं आते.

 

विचारधारा
चाहे कोई भी हो सत्ता का चरित्र एक जैसा ही होता है चाहे गुजरात हो, 1984 के सिख विरोधी दंगे हों या फिर हाल के सिंगूर और नंदाग्राम. लेकिन ये अलगअलग विचारधाराएं भी मीडिया पर कोड़ा बरसाने की बात से गाहेबगाहें मूक सहमति जताती चली रही थी. हालांकि इस बार वाम और दक्षिणपंथियों ने सरकारी सुर से सुर मिलाने से परहेज किया है पर कब तक इसका भरोसा किसी को नही हैं.

 

अक्सर
सत्ताधारी मीडिया के बीच प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक की दीवार खींचने की भी सतही-उथली कोशिशें करते नजर आए. मसलन इसी बार के एजेंडे में देख लीजिए, उनका साफ कहना है कि हम इस रेगुलेशन से प्रिंट मीडिया को बाहर रखना चाहते हैं. तो क्या प्रिंट मीडिया अपने ही सहोदर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर थोपे जा रहे एक अनैतिक बंधन को आंख बंद करके स्वीकार कर ले? मसला किसी के ऊपर थोपे जा रहे प्रतिबंधों से परे सही और गलत के बीच अंतर करने का है. और अगर एक बार इस तरह की कोई परंपरा पड़ जाती है तो इसका अंत क्या होगा? कल को जब सत्ताधारी इसकी आड़ में प्रिंट मीडिया पर इसी तरह के बंधन थोपने की कोशिश करेगा तब किस मुंह से प्रिंट वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से सहायता मांगेगें और क्योंकर वो प्रिंट वालों की सहायता करेंगे?

 

इस
लिहाज से तो इस बंधन को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता. वैसे भी मीडिया ने चाहे वो प्रिंट हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक सबने अपने नियम कायदे बनाएं है और अपने लिए एक आचार संहिता स्वयं ही खींची है. प्रधानमंत्री का प्रस्ताविक नियामक कानून पर रोक लगाने का फैसला न्यायोचित से भी ज्यादा उचित कहा जा सकता है. और उन्हें इस मजमून को कूड़े के ढेर में फेंकना होगा, लेकिन लगे हाथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी अपनी शैशवावस्था से किशोरवास्था की ओर कदम बढ़ाने का अहसास सरकार, समाज सबको करवाना होगा.

 

अतुल
चौरसिया 

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राजनीति का दोगलापन या दोगलेपन की राजनीति

ये बात समझने की कोशिश में सिर खपा कर भी कुछ ख़ास समझ नहीं आया। लिहाजा थके हारे ये निष्कर्ष निकाला कि राजनीति महाठगिन हम जानी। कब कहां ये अपना रंग किस माहौल के हिसाब से ढाल लेगी किसी को ख़बर नहीं लगेगी।
जिस दिन जामिया नगर के एल-18 में पुलिस ने एनकाउंटर किया था और अपने एक सिपाही एमसी शर्मा को खोया था उस दिन की राजनीति की मांग थी कि सियासतदान उनके घर जाएं, उनके परिवार के साथ संवेदना जताएं हो सके तो कुछ रुपया पैसा दान करें। आखिर जिस आतंकवाद की चोट से झुंझला झुंझला कर देशवासी दो चार हो रहे थे, उसका सफाया करते समय अगर कोई मारा गया तो उसे तो नायक का दर्जा मिलना ही था।
बस सियासत इस बात का जोड़-घटाना कर रही थी कि इसमें वोट का कितना गणित है। सारी गुणा गणित यही कहती है कि इस देश में शहीद का दर्जा अमूमन सभी नायकों से ऊंचा होता है। लिहाजा उनके पक्ष में खड़ा होना सियासतदानों के लिए फायदे का ही सौदा है। हुआ भी वहीं। तमाम लोगों में अपने अमर सिंह भी शामिल थे। उन्होंने दस लाख रूपए का चेक भी शहीद के परिजनों को दिया था। ये बात अलग है कि चेक भुनाने लायक ही नहीं पाया गया। पर कहते हैं न कि सियासत समय का मिजाज देखकर रंग बदल लेती है। यहां भी वैसा ही हुआ। अपने जामिया के उप कुलपति मुशीरुल साहब ने पहले ही अपना रुख साफ कर दिया था कि वो अभियुक्तों को क़ानूनी सहायता मुहैया करवाने जा रहे हैं। संवैधानिक नज़रिए से और उनकी जिम्मेदारियों को देखते हुए इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है। पर नैतिकता के तकाजे में ऐसी तमाम बातें खड़ी होती हैं जो उनके रुख पर सवाल उठाती हैं। 

अगर कल को आरोपी दोषी साबित हो जाते हैं तो मुशीरुल साहब क्या सफाई देंगे। उससे भी अहम बात जो मुशीरुल साहब ने कही कि जामिया को बदनाम किया जा रहा है यहां कोई भी कट्टरपंथी नहीं है और मुझे अपनी उदारता और देशभक्ति का प्रमाण देने की जरूरत नहीं है। पर क्या ये सच्चाई नहीं है कि सलमान रश्दी की 

सैटनिक वर्सेज़ को लेकर उसी जामिया में तीन सालों तक उनका घुसना मुहाल किया जा चुका है। क्या करके वो दोबारा से जामिया में प्रवेश पा सके ये तो वही जानें। अपना सवाल ये है कि जब उन्हें खुद इस तरह के कट्टरपंथ का सामना करना पड़ चुका है तो फिर वो कैसे पूरे जामिया के पाक-साफ होने की जिम्मेदारी अपने माथे ले सकते हैं? आखिर उन्हें जामिया से धकियाने वाले कोई उदारपंथी, देशभक्त मुसलमान तो नहीं रहे होंगे। तो फिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि दो चार लोगो इस तरह की उल्टी सीधी गतिविधियों में लिप्त हों असमाजिकता का प्रभाव तो देश के अमूमन हर विश्वविद्यालय में ही है। इलाहाबाद से लेकर बनारस और अलीगढ़ तक छात्रों के बीच खूनी संघर्षों की एक लंबी चौड़ी दास्तान सुनाई जा सकती है। तो इसका ये मतलब तो नहीं कि हर जगह के वाइस चांसलर अपराधियों के पक्ष में खुलेआम बयान देना शुरू कर दें, उन्हें क़ानूनी संरक्षण की दुहाई देना शुरू कर दें।अपना मकसद यहां मुशीरुल साहब को ग़लत ठहराना नहीं है। हो सकता है उन्होंने काफी साफ मन से ऐसा करने का फैसला किया हो। पर ज्यादा संभावना इस बात की भी है कि शायद उन्हें जामिया में मौजूद प्रभावी कट्टरपंथी समूहों के सामने खुद के टिके रहने का आधार खोजेना ज्यादा जरूरी लगा हो। वरना शायद एक बार फिर से उनका स्पष्ट उदार रवैया उन्हें सैटनिक वर्सेज़ की हालत में पहुंचा सकता था। इसकी संभावना कहीं ज्यादा थी।
इन दिनों अमर सिंह भी खूब बोलने लगे हैं। वरना तो यूपी में माया और दिल्ली में यूपीए के आने के बाद कोई उन्हें दो के भाव नहीं पूछ रहा था। बहरहाल दलाली की महिमा अपरंपार। अमर सिंह भी सांत्वना देने वालों में शामिल थे। अब राजनीति का दोगलापन देखिए एक तरफ वो शहीद के परिजनों को दस लाख का चेक देते हैं। और बमुश्किल बीस दिन के भीतर ही एनकाउंटर को फर्जी करार देने में उन्हें कोई शर्म नही आती। अब इनसे भला बिना पेंदी का लोटा नहीं है जो पकड़े रहने पर कम से कम एक लोटा पानी तो सहेज ही सकता है। मुस्लिम वोटो की गाड़ी पर अपनी सियासत चलानें में क्या बुराई है। खूब करिए। पर शहर-गांव की राजनीति और देशव्यापी मुद्दों में भी अगर आपको हित-लाभ का अलगाव करने की तमीज नहीं है तो खुद को राजनेता कहने में खुद ही शर्म आनी चाहिए। किस मुंह से चेक दिया और फिर किस मुंह से कह रहे हैं कि शर्मा अपनी पोस्टिंग के लिए भागा-भागा फिर रहा था।
आपने भी धमाकों के आरोपियों को क़ानूनी सहायता अपने पैसे पर मुहैया करवाने का ऐलान किया है। यहां मामला मुशीरुल साहब से थोड़ा अलग है, इसलिए इसकी चीरफाड़ जरूरी है। आजतक किसी राजनीतिक पार्टी ने कम से कम देश के खिलाफ की गई किसी साजिश के आरोपियों को इस तरह से खुलेआम सहायता देने का ऐलान नहीं किया है। तो दिनों दिन पतित हो रही भारतीय राजनीति का ये एक नया चेहरा दिख रहा है। अमर सिंह का मामला इसलिए भी अलग है क्योंकि उन्होंने क़ानूनी सहायता देने का तो ऐलान कर दिया पर आरोप सिद्ध होने की सूरत में वो क्या करेंगे इसकी घोषणा भी उन्हें करनी होगी, एकतरफा चाल से कमा नहीं चलेगा। आखिर आप खुद को सार्वजनिक जीवन में होने का दावा करते हैं। तो फिर देश-समाज के हित से ऊपर अगर संगीन आरोपों के आरोपियों के हित हैं आपकी नज़र में, तो फिर आरोप साबित होने की सूरत में आपको ये ऐलान भी करना चाहिए था कि मैंने एक आतंकी का बचाव किया इसके लिए मैं शर्मिंदा हूं, सियासत से सन्यास ले रहा हूं। दोनों हाथों में लड्डू लेकर दोगलेपन की राजनीति को जनता भी समझती है। जिस वोट के लिए ये सारी कसरत कर रहे हैं उसका सच समझ में आता है जनता को। इस देश की लोकतांत्रिक परंपरा बहुत निराली है। जब एनडीए हवा में उड़ रही थी तो बिना इशारा किए जनता ने जमीन पर ला पटका था। और आपसे ज्यादा इसकी चोट भला किसे महसूस होगी जिसे साल भर पहले जनता ने यूपी में मुंह के बल दे मारा था। तो संभल के चलिए जनता हिसाब मांगेगी। कोर्ट को अपना काम करने दीजिए।
आखिर में दो लाइने, धमाकों पर धमाके, सैंकड़ों लोगों के चीथड़े, उनके परिजनों की मार्मिक चीत्कारें, बर्बादी के नज़ारे तो आपके दिलों में करुणा नहीं भर सके पर चंद आरोपियों के मानवाधिकारों के लिए आपकी सारी इंसानियत गले से टपकने को बेताब है। कोर्ट को अपना काम करने दीजिए सारा सच सामने आ जाएगा। आखिर आप भी तो न्यायालय का झंडा ही उठा रखे हैं तो फिर इतनी चिल्लाहट क्यों 
अतुल चौरसिया

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बेशरम मुखिया और ग़ैरजिम्मेदार नागरिक

धमाके होने पर भी अगर देश के गृहमंत्री को तीन घंटे में तीन बार कपड़े बदलने की चिंता ज्यादा हो तो ये सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है कि नाकारा लोगों की फौज के सिर पर जरूर किसी न किसी माई-बाप का वरदहस्त है। दिल्ली के रिसते जख्मों के दो दिन बीतते-बीतते जब ये अटकलें लागई जा रही थी कि शायद अब बहुत हो चुका, इस बार बांसुरीवादव नीरो को उसकी बेपरवाह छवि के लिए बख्शा नहीं जाएगा तभी अचानक उसने ये खुलासा करके उस आशंका को सही साबित कर दिया कि उसके सिर पर महामाता सोनिया का आशिर्वाद पूरी दृढ़ता से विराजमान है।

 

निर्दोष खून से इनकी आत्मा नहीं पिघलती, जितेंद्र स्टाइल में नख-शिख श्रृंगार करने की अदा आम लोगों की सुरक्षा पर भारी पड़ रही है। पर पाटिल नाम्ना बेशर्मी की चादर ओढ़े ये बयान देते हुए नहीं सकुचाता कि उसे सोनिया गांधी का पूरा समर्थन हासिल है यानि उसकी कुर्सी को कोई छू नहीं सकता। तो क्या निकम्मों को बनाए रखने का सारा जिम्मा सोनिया ने उठा रखा है? जनता के दरबार में जिस पाटिल को 2004 के चुनाव में सिरे से नकार दिया गया था उसे अगले ही दिन मंत्रिमंडल में शामिल करके सोनिया ने जता दिया कि जनता कोई देश की मालिक थोड़े ही है। वो तो भेड़ बकरियों की जमात है, उसे जो कहना था कह दिया अब किसे क्या देना है ये फैसला तो देश की महारानी को करना है। सो उन्होंने नख-शिख श्रृंगारप्रेमी को गृहमंत्रालय जैसा महत्पूर्ण पदभार सौंप दिया। तुरंत ही ये संदेश दिमाग में घूमा कि यहां उसी को परम पद मिलेगा जो रीढविहीन, आंख-नाक-कान बंद रखने की कला और 24 घंटे साष्टांग दंडवत योग की माया में निपुण होगा। जिसकी जी-हुजूरी जितनी तेज़ सुनाई पड़ेगी उसे उतना ही उच्चफल प्राप्त होगा। जी-हुजूरी से कन्नी काटे अर्जुन की बुढापे में दुर्दशा भला किसी से छिपी है। बहरहाल ये कुनबे की बात है उनकी सिरफुटौव्वल वो ही जाने। अपना सरोकार सिर्फ ये है कि कब तक लोग खून के आंसू रोएंगे और हम उनकी आध्यात्मिक ओज से भरी बकवास सुनेंगे। पर वो ये न समझें कि सत्ता हमेशा महारानी के पैरों की दासी बनी रहेगी। बेगुनाहों का खून उन्हें भी एक दिन सड़क पर ला खड़ा करेगा। पड़ोस की आग से आंख मूंद कर बैठे लोग यूं ही नहीं सो सकते वो आग कब उनके अपने घरों को दबोच लेगी किसी को इसका अंदाज़ा भी नहीं लगेगा। ज्यादा दूर नहीं हैं उनकी गिरेबान भी।

 

एक दो कौड़ी का इंडियन मुजाहिदीन इतने विशाल विकराल भारतीय गणराज्य के साथ आंख मिचौली का खेल खेल रहा है, खुलेआम चुनौती दे रहा है। लाखों का अमला, करोड़ों-अरबों रूपए का बजट डकारने के बाद भी पूरी तरह से क्लूलेस है। एक के बाद एक धमाके हो रहे हैं और किसी भी एक मामले को उसके अंजाम तक पहुंचाने में सरकारी अमला अक्षम है। 

 

 

धमाकों के बाद आम जनता को जो तकलीफें होती हैं, जो जख्म मिलते हैं, जिनके अपने बिछड़ जाते हैं उनका दर्द तो दूसरा कोई नहीं समझ सकता। पर एक सुर से पुलिस प्रशासन से लेकर सरकार को कोसने का सिलसिला जरूर शुरू हो जाता है। आम आदमी के इस बर्ताव में उसकी बेचारगी, उसकी मजबूरी और उसका दर्द छिपा होता है। और फिर वही आम आदमी आतंकवादियों से मुकाबले के लिए क्या कर रहा है? दिन भर हॉक्स कॉल, बम रखने की अफवाहें फैला रहा है। क्या इसी रुख से आतंकवाद का मुकाबला करेंगे लोग। दिन भर ऊंची बिल्डिंग्स से लेकर रेलवे स्टेशन तक बम रखने की खबरें देकर लोग किस तरह का आनंद उठा रहें हैं ये बात समझ से परे हैं। जब पूरा शहर, पूरा देश एक साथ सौ पचास लोगों की मौत के ग़म से उबरने की कोशिश कर रहा है, नासूर बन चुके आतताइयों से मुकाबले की हिम्मत जुटा रहा हैं, अपनो को खो कर फिर से पैरों पर खड़ा होने का सहारा ढूंढ रहा है तब हमारे बीच के ही कुछ लोगों के लिए ये मौका मौज-मस्ती का साधन बन गया है। बात-बात पर अपने नागरिक अधिकारों की दुहाई देने वालों को नागरिक कर्तव्यों, जिम्मेदारियों का अहसास क्यों नहीं है। दिन भर जिस पुलिस को धमाकों का सिरा खोजने में सिर खपाना चाहिए वो पुलिस कुछ लोगों की हुल्लड़ई के चक्कर में पसीना बहा रही है। इसके बाद भी अतंकवादियों से निपटे की उम्मीद की जा रही है। दूसरों पर बात-बात में उंगलियां उठाने वाले अपने गिरेबान में कब झाकेंगे। या फिर बगदाद, वजीरिस्तान की तरह जीने की आदत डाल लें हम सब। आने वाली पीढ़ियां एक ऐसे माहौल के बीच पनपेंगी जहां आए दिन उनके भाई बहनों का खून होता रहेगा। बचे खुचे लोग लंगड़े लूलों की शक्ल में उन हादसों के निशान लिए घूमेंगे। यही मंशा है तो फिर अफवाहें फैलाना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य होना चाहिए। जिस शहर की एक गली से एक साथ आठ अर्थियां उठी, जिस शहर में एक साथ पचास साठ लोगों का अंतिम संस्कार करना पड़ा क्या उसमें सत्ता, सरकार, व्यवस्था, नेता, प्रशासन से विरोध दर्ज करने के लिए दस पांच हजार लोग भी शामिल नहीं हो सकते थे। डेढ़ करोड़ की आबादी वाले शहर में डेढ़ लाख लोग भी अगर श्मशान घाट पर लोगों की लाश के साथ बैठकर सत्ता प्रतिष्ठान से विरोध दर्ज कराते, गांधी समाधि तक मार्च करते तो शायद साउथ ब्लाक की बहरी अंधी स्नायुओं में खतरे की बू आती, चूलें हिलती नज़र आती। 

 

अतुल चौरसिया

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बजरंगियो न जाओ नाजियों की राह

क्या कुछ लोग आतंकवाद के खिलाफ काउंटर आतंकवाद की डगर पर चल पड़े हैं। हिंसा के खिलाफ प्रतिहिंसा की समाधिस्थ जड़ें कहीं न कहीं अंकुरित होकर स्फुटित भी होने लगी हैं। सवाल ये नहीं है कि पानी सर के ऊपर से बहने लगा है या नहीं, बल्कि सवाल ये है कि इसकी अनदेखी ठीक होगी या नहीं। पूर्वोत्तर, कश्मीर, नक्सलवाद तमाम ऐसे उदाहरण पड़े हैं जिनके बारे में विश्वास से ये कहा जा सकता है कि दिल्ली की नींद तब खुली जब पानी सर के ऊपर हो गया था। तो कहीं इस बार भी मामला ऐसा ही तो नहीं हो जाएगा?

बीती शनिवार की रात कानपुर के हॉस्टल में हुए एक धमाके ने कई सवाल जेहन में पैदा किए हैं। उम्मीद है कि सारे लोग इस सवाल पर सवाल और जवाब की शुरुआत करेंगे। अब तक सामने आई ख़बर में कहा जा रहा है कि घटना में मरने वाले दोनों युवकों का संबंध बजरंग दल से था। उनके हॉस्टल से बड़ी मात्रा में बरामद अमोनियम नाइट्रेट, जिलेटिन रॉड्स, हैंडग्रेनेड और कुछ कहें न कहें इतना तो बता ही रहे हैं कि उनकी योजना का दायरा काफी व्यापक और बड़े पैमाने पर तबाही मचाने का था। अब बजरंगी किसको निशाना बनाते हैं ये बताने की जरूरत नहीं। पर इस एक घटना के खुलासे ने एक साथ इतने सवाल पैदा कर दिए हैं कि सबको सहेजने में परेशानी हो रही है।

क्या देश में एक दूसरे से निपटने के लिए अब हिंसा ही आखिर रास्ता बचा है? विचारों की सहमति असहमति तो हो सकती है। देश में आतंकवाद का ख़तरा कई गुना बढ़ा है। इस बात में भी कोई शक नहीं कि इसमें काफी हद तक आतंकियों का साथ स्थानीय लोगों ने दिया है। इस्लामी आतंक का ख़तरा पूरी दुनिया पर मंडरा रहा है। पर एक सुर से ये कहना कि सारे मुसलमान इसमें शामिल हैं या इन आतंकियों को दुनिया भर के मुसलमानों का समर्थन हासिल है, ज्यादती होगी।

आखिर आतंकवादी हमलों के बाद हमारे ताकत का संबल क्या होता है? यही ना कि अपने अंधकट्टरता के नाम पर निर्दोषों को निशाना बनाना कहां की बहादुरी है। जो आतंकवादी अपने धर्म की दुहाई देकर निर्दोष नागरिकों की हत्या पर हत्या किए जा रहे हैं उन्हें इस बात का इल्म नहीं हैं कि दुनिया की नज़रों में वो अपने धर्म को कितना नीचे पहुंचा रहे हैं। अपने धर्म को कितना अपमानित कर रहे हैं। धर्म की मूल भावना को लीलने की कोशिश कर रहे हैं। धर्म के मूल उपदेशों से परे एक नई परिभाषा खड़ी कर रहे हैं।

तो क्या बजरंग दल के लोग भी निर्दोष लोगों की हत्या की साजिश में कॉलर खड़ा कर रहे हैं? देश का क़ानून, खुफिया तंत्र अगर धमाकों के गुनहगारों तक नहीं पहुंच रहा है तो इसके लिए कौन दोषी है? तो क्या बजरंगियों ने एक सिरे से किसी एक संप्रदाय पर निशान साध लिया है? फिलहाल के संकेत तो यही कहानी बयान कर रहे है। कानपुर के सूत्र कहां तक जाते हैं इस बात की गंभीरता से पड़ताल होनी ही चाहिए। वरना अनदेखी और टल-मटोल की नीति देश में एक और नक्सली, एक और कश्मीर, एक और पूर्वोत्तर की समस्या खड़ी कर सकती है।

सनातन धर्म ने जिस एकरसता से दुनिया भर की धार्मिक धाराओं को अपनी मुख्य धारा में समाहित किया उससे मुंह मोड़कर शायद बजरंगी एक नई धारा शुरू करना चाहते हैं। खुद को ये देश का सबसे बड़ा भक्त, रक्षक कहते नहीं आघाते हैं। अगर उन्होंने इस तरह का कोई हिंसक रास्ता अपनाया तो इससे देश का क्या भला होगा, कौन सी देशभक्ति साबित करने की फिराक में हैं ये? जिस देश ने कभी अस्त न होने वाले दुनिया के विशालतम साम्राज्य से बिना लाठी-डंडा चलाए आज़ादी हासिल की है, दुनिया का सबसे वृहद व्यक्तित्व वाला नेता महात्मा गांधी जिस देश में पैदा हुआ उसके साधक-आराध्य-आदर्श हिटलरी सिद्धांत बने हैं तो ये इस देश का दुर्भाग्य है, इस देश के लिए शर्मनाक है। हथियार का जवाब हथियार होता तो हिटलर आज दुनिया का सबसे सफलतम नेता होता। पर उसने जर्मनी को क्या दियालाखों की मौत, खंडहर देश, अपंग नागरिक, सालों-साल बाद फूटते गोले-बारूद, भूखमरी, जर्जर अर्थव्यवस्था और तबाही।

फैसला उन्ही बजरंगियों को करना है जो देशभक्ति का गलाफाड़ प्रदर्शन करने में अपनी शान समझते हैं, पार्कों से लेकर बस अड्डों तक पर्दादारी का ठेका उठाए फिरते हैं। धमाके के बदले एक और धमाका करने से क्या देश की समस्याएं कम हो जाएंगी। और इसका अंत क्या है? क्या ऐसा देश बनाने का ख्वाब देख रहे हैं जहां 100 करोड़ लोग बाकी 15 करोड़ अल्पसंख्यकों को मारकर रामराज लाएंगे? नाजीवादियों की तरह सोचकर क्या हासिल होगा? मेरे ख्याल से एक ऐसा देश जो गृहयुद्ध के दलदल में फंसा तड़प रहा होगा। जिसकी सांस तो टूटेगी पर हद दर्जे की तड़पन, चुभन, किरच और दरद के बाद। और गृहयुद्ध भी ऐसा जिसके नागरिक ही एक दूसरे के खून और मांस के लीथड़ों से सने होंगे। सत्ता दूर बैठी तमाशबीन बनी रहेगी।

अतुल चौरसिया

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अमर सिंह की लरज़ती जुबान और बेशर्म राजनीति

रविवार को अरुण जेटली की प्रेस कांफ्रेंस की जानकारी मिलते ही दिमाग में एक साथ कई सवाल कौंध गए। पहली बात तो रविवार को विशेष परिस्थितियों में ही पार्टियां मीडिया को याद करती हैं अन्यथा 24 घंटे कैमरों की पीछा करती नज़र से बचने के लिए ये दिन नेताओं के लिए सबसे मुफीद रहता है। एक बात तो दिमाग में साफ हो गई अरुण जेटली उमा के फर्जी सीडी कांड पर अपना पक्ष रखेंगे और साथ ही संसद में कैश फॉर वोट कांड से जुड़े कुछ खुलासे भी कर सकते हैं। पर जिस तर्ज पर जेटली ने शुरुआत की और एक एक करके जिस तरह से उन्होंने अमर सिंह, संजीव सक्सेना, उनके आपसी संबंध, समाजवादी पार्टी, अहमद पटेल का कच्चा चिट्ठा खोलना शुरू किया उससे अपना ही अनुमान एकाएक गलत साबित होने लगा। जिस तरह के प्रमाणों के साथ अरुण जेटली प्रेस कान्फ्रेस में चौके-छक्के मार रहे थे उसमें उनका पारखी वकालती नज़रिया साथ साफ-साफ झलक रहा था। सुप्रीम कोर्ट का ये वकील अपने दामन पर एक दिन पूर्व अपनी पूर्व सहयोगिनी उमा भारती द्वारा उछाले गए कीचड़ पर एक भी शब्द नहीं बोला। लेकिन जिस तरह के दस्तावेजी सबूत उन्होंने पेश किए ऐसा अगर वो 22 जुलाई को सीएनएन-आईबीएन को समझा देते तो शायद आज राजदीप की जो थुक्का फजीहत हो रही है वो न होती। बहरहाल उमा पर वार न करने की वजह उन्होंने बाद में बताई कि उमा उनके हिसाब से टिप्पणी के लायक ही नहीं हैं वो तो खुद अमर सिंह के हाथों मोहरा बन गईं हैं।

गौरतलब है कि इस सीडी के जारी होने के बमुश्किल दो या तीन दिन पहले उमा, अमर सिंह से मिलने उनके घर भी गई थी। और पत्रकारों के पूछने पर उन्होंने जवाब दिया था कि महिला आरक्षण के संबंध में चर्चा करने के लिए आई थी। दो दिन बाद उमा द्वारा जारी सीडी का मजमून समझने के लिए इतना ही इशारा काफी है।   

इतनी उठा पटक के बीच अमर सिंह का पक्ष जानना भी जरूरी था। पर उन्होंने अपने दरवाजे पर आए पत्रकारों को ये कह कर टाल दिया कि मैं कल जवाब दूंगा। यानी अमर सिंह को कही न कहीं अहसास हो गया था कि एक और उल्टा-सीधा बयान उनके लिए मुसीबत बन सकता है। पर राजनीति की कढाई इतनी जल्दी आग से नहीं उतरती। अगले दिन अमर सिंह अपने सरगना मुलायम सिंह के साथ दो और सिपहसालारों का जुगाड़ करके एक नई सीडी लेकर हाजिर हो गए। ये नए सिपहसालार थे लालू यादव और रामविलास पासवान जिन्होंने इसी सरकार में मंत्री रहते हुए एक समय आपसी लड़ाई को एक दूसरे के आंगन और बेडरूम तक पहुंचा दिया था। बहरहाल थोड़ी सी भी समझ रखने वाले व्यक्ति को इस सारी चकल्लस की सच्चाई का अंदाज़ा हो जाएगा। सीडी पर सीडी और स्टिंग पर स्टिंग और सबमें संजीव सक्सेना मुख्य अभिनेता, फिर भी संजीव सक्सेना गायब है। यानी उसका अमर सिंह से कितना गहरा रिश्ता है इसे समझना मुश्किल नहीं है।

बहरहाल अपना मकसद दूसरा है। सीडी पर सीडी जारी करने इस खेल में कहीं ये पार्टियां अपनी शातिर चालों से इतने संगीन मामले को हल्का करने की कोशिश तो नहीं कर रहीं हैं। जिस तरह के तथ्य अरुण जेटली ने पेश किए थे उसका कोई जवाब दिए बेगैर सीडी का एक नया शो दिखाकर सारे मीडिया को चाय-नाश्ता कराने का मंसूबा क्या हो सकता है? आखिर अमर सिंह अपने साथ लालू जैसे नेताओं को लाकर क्या दिखाना चाहते थे कि हमारे पास सत्ता, ताकत और सहयोग सब है इसलिए हमसे ना टकराना। ये बात जानते हुए भी कि संपादित सीडी या विजुअल किसी तरह का सबूत नहीं बन सकते ये नौटंकी करने का क्या मकसद हो सकता है? जिस खिलंदड़ अंदाज़ में लालू यादव तीनों सांसदों का नार्को टेस्ट करवाने की बात कर रहे थे वही लालू संजीव सक्सेना का नार्को टेस्ट करवाने की बात क्यों नहीं करते, आखिर वो देश के प्रतिष्ठित राजनेता और जो कलंक संसद के माथे पर लगा है उसे साफ करने की जिम्मेदारी उनकी भी बनती है। और इस सबसे ऊपर अगर आपके पास संजीव सक्सेना का स्टिंग करने के लिए उसका निवास-पता मालूम है तो फिर इतने बड़े शर्म को सामने लाने के लिए उसे सामने लाने की बात क्यों नहीं की लालूजी ने। पर शायद सबने मिलकर इसे हल्के में उड़ाने का मंसूबा बना लिया है।

पत्रकारों ने जब जेटली के प्रमाणों के आधार पर अमर सिंह से जवाब मांगे तो उनकी लरजती जुबान-अटकती हिंदी ये चुगली कर रही थी कि कर्कश वाणी के फर्राटेदार महारथी बोलने से पहले मुसीबतों के सागर में गोते लगा रहे थे। तीन बार में उन्होंने संजीव सक्सेना अपने यहां से निकालने की तीन तारिखें बताई। पहले उन्होंन कहा कि उसे 19 जुलाई को काम से हटा दिया गया। फिर कहा कि 20 की शाम को वो आफिस आया था। फिर बताया कि 21 को उसने मिलने की कोशिश की थी। और उसे निकले जाने की वजह बता पाने में एक बार फिर उनकी जुबान दगा दे गई। अंतत: जब कुछ समझ नहीं आया तो अपने ऑफिस के एक कर्मचारी के ऊपर सारी जवाबदेही डालकर वहां निकलने में अपनी भलाई समझी। गौरतलब है कि इसी तीन दिन के बीच संजीव सक्सेना ने अमर सिंह के उस बहुप्रचारित प्रेस कान्फ्रेंस के एसएमएस तमाम पत्रकारों को भेजे थे जिसमें उन्होंने बड़े गर्व से एक सांसद का दलबदल करवाया था।

अच्छा तो ये होता कि जितना बढ़ चढ़कर अरुण जेटली दावा कर रहे थे उसके बाद सीएनएन-आईबीएन टेप को प्रसारित करता। आखिर उसी का हवाला तो वो दे रहे हैं। तो ये भी साफ हो जाता कि अरुण और भाजपा कितने दूध के धुले हैं। दूसरी ओर हर दिन एक नया स्टिंग दिखाकर सत्ताधारी कुनबे ने तो अपनी विश्वसनीयता खो ही दी है। तो उम्मीद मीडिया से ही की जा सकती है। पर ऐसा भी नहीं हो रहा है। उधर नेता एक दूसरे की लंगोट खींचने में मशगूल हैं।

अतुल चौरसिया

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राजदीप सरदेसाई : “ख़बर हर कीमत पर” !

नवंबर 2007 की वो शाम बार-बार याद आ रही है। तरुण(तेजपाल) हमारे छोटे से एडिटोरियल हॉल में तहलका की पूरी संपादकीय टीम को संबोधित कर रहे थे। उनके एक एक शब्द आज ज़ेहन में तैर जाते हैं। उन्होंने कहा, तरुन रहे न रहे तहलका उनकी आखिरी सांस तक जनहित की पत्रकारिता की आवाज़ को बुलंद करता रहेगा। व्यक्तिगत लोग आते जाते रहेंगे पर तहलका एक मिशन है जिसका मकसद है गरीबों मजलूमों की आवाज़ सत्ता के शीर्ष पर काबिज लोगों के कानों में डालना, उनसे जवाब मांगना। आज एक बार फिर से तहलका अपने उसी मिशन का अगल क़दम बढ़ाने जा रहा है। हो सकता है आने वाला वाला समय परेशानियां, मुसीबतें लेकर आए पर इसका सामना हमें करना ही होगा। ताकि जो सच्चाई हमारे सामने आई है वो जनता को पता चले और इतिहास हमें गुनाहगार न समझे।

ये वो दिन था जब तहलका ने गुजरात दंगों के आरोपियों की मुंहजुबानी परत दर परत सारी सच्चाइयां सामने रखी थी। पत्रकारिता के इतिहास की शायद गिनी चुनी ख़बरों में इसको स्थान दिया जाएगा।

फिर मेरे दिमाग में 2003 अप्रैल की वो दोपहरी घूम जाती है जब हम भागे-भागे अर्चना काम्पलेक्स स्थित एनडीटीवी के ऑफिस पहुंचे थे। वजह थी कि राजदीप सरदेसाई ने हमें मिलने का समय दिया था। एक डॉक्युमेंट्री के सिलसिले में जब हम उनसे मिलने पहुंचे थे तो हमारे दिमाग में 2002 गुजरात दंगों के दौरान हीरो बनकर उभरे राजदीप की छवि हिलोरे मार रही थी। मन में उत्साह इतना था कि मित्र संजय ने जो पहली बात उनसे कही वो हम सबकी मनोदशा का प्रतिनिधित्व करती थी। सर हम सबकी बस यही इच्छा हैं कि एक दिन हम राजदीप सरदेसाई बनें।

इस सारे आगे-पीछे का जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि भारत की लोकसभा में वोट के बदले नोट का जो शर्मनाक मंजर पूरी दुनिया ने देखा है उसके तार कहीं न कहीं देश के मान्यता प्राप्त टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई भी जुड़ते हैं। और इससे उनकी विश्वसनीयता, उनकी प्रतिष्ठा पर भयंकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

आज पांच साल बाद अपनी उस दशा पर, उस सोच, उस विचार पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है। क्या जिस राजदीप जैसा हम बनने की सोच रहे थे वो वास्तव में अनुसरण के लायक था? या फिर हम ग़लत सोच रहे थे? राजदीप भी उस भीड़ का हिस्सा मात्र ही थे जिनके लिए पत्रकारिता की परिभाषा जनता का हित नहीं बल्कि व्यावसायिक और कॉर्पोरेट हितों की रक्षा करना भर है।

राजदीप जिन्होंने गुजरात की आग की परवाह नहीं करते हुए महीनों दंगो में झुलस रही गलियों कूचों की खाक छानी थी वो इतने बड़े नेता कम दलाल को रंगे हाथ पकड़ने के बाद हिम्मत खो बैठे। उस पर बचाव में राजदीप के जो तर्क हैं वो कितने लचर हैं इसका अंदाज़ा आप खुद लगा सकते हैं। उनका कहना है कि संसदीय विशेषाधिकारों का हनन न होने पाए इस वजह से नोट फॉर वोट के टेप प्रसारित नहीं किए गए बल्कि लोकसभा अध्यक्ष को दे दिए गए।

ये तर्क कितने खोखले हैं, जिस संसद के 11 सदस्यों का सवाल के बदले नोट लेने की ख़बर मीडिया प्रसारित कर चुका है, जिस संसद के 7 सदस्यों को सांसद निधि से पैसा खाने की रंगे हाथ तस्वीरें मीडिया प्रसारित कर चुका है उसी संसद के एक सदस्य द्वारा अपने घर में करोड़ो रूपए के नगद लेन देन के विजुअल दिखाने में राजदीप को विशेषाधिकार नजर आने लगे। लोकसभा से दूर अपने घर में कैसा विशेषाधिकार और वो भी जनहित से ऊपर कैसा विशेषाधिकार?

बुधवार को सीएनएन-आईबीएन ने इस पर अपनी सफाई में एक और तर्क दिया है कि वो स्टिंग के टेप का क्रॉस चेक किए बिना प्रसारण नहीं कर सकते थे। और उसी स्पष्टीकरण में आईबीएन ने ये भी कहा है कि उनकी खोजी टीम एक हफ्ते से इस ख़बर पर लगी हुई थी। तो फिर एक हफ्ते के दौरान चैनल ने टेप की क्रॉस चेकिंग क्यों नहीं की औऱ उससे भी ऊपर लाख टके का सवाल ये है कि अपने ही टेप पर चैनल को भरोसा नहीं था जो टेप के क्रॉस चेकिंग की दुहाई दी जा रही है।

एक तर्क और दिया है चैनल ने। बिना स्टिंग पूरा किए हम उसका प्रसारण नहीं कर सकते थे। विश्वासमत का खेल खत्म होने के बाद वो जनता को क्या दिखाते जब सारे कारनामें का दुष्परिणाम-सुपरिणाम सामने आ जाता। ख़बर की कीमत ही तभी थी जब वो उसे समय रहते देश के सामने ले आते। आखिर उन्हीं का हिंदी चैनल ये दावा करता है ना कि ख़बर हर कीमत पर  

फिर मीडिया जनहित की बात कैसे कर सकता है जब उसके प्रतिनिधियों की काली करतूतें सामने लाने की कुव्बत ही नहीं है। जिस तरह से गुणा-भाग करके राजदीप ने टेप न दिखाने का फैसला किया उससे तो शुद्ध रूप से व्यावसायिक हित लाभ की वही सड़ांध आ रही है जिसके लिए बहुत से मीडिया संस्थान और मीडियाकर्मी कुख्यात हैं। जिस समय बीजेपी के तीन सांसद लोकसभा में नोटों की गड्डियां उछाल रहे थे ठीक उसी वक्त राजदीप अपने चैनल सीएनएन-आईबीएन पर नोट वाली घटना और विश्वासमत के अंतर्संबंधों का लाइव विश्लेषण कर रहे थे। उनके चेहरे पर उड़ रही हवाइयां साफ साफ चुगली कर रही थी कि सत्ताधारियों से मोल ली गई दुश्मनी के नफे नुकसान ने उन्हें अंदर ही अंदर कितना बेचैन कर रखा है।

पूरे मीडिया समुदाय में एक संदेश ये भी गया कि राजदीप वो साहस वो हिम्मत नहीं दिखा पाए जिसकी उम्मीद उनके जैसे पत्रकारों से लोग करते थे। मेरा व्यक्तिगत रूप से ये भी मानना है कि इस मामले में तरुण जैसा जज्बा, नैतिक साहस और हिम्मत दिखाने की जरूरत थी पर राजदीप के लिए शायद व्यावसायिक हित-लाभ ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए।

चौतरफा हो रही निंदा से बचने के लिए भले ही उन्होंने अपने बचाव के कुछ तर्क गढ़ लिए हों पर ये तर्क कुतर्क ही हो सकते हैं। एक बात जो सीधी सपाट है वो ये कि इस मामले में राजदीप में उस हिम्मत, उस इच्छाशक्ति का सर्वथा अभाव दिखा जिसकी उम्मीद एक भ्रष्ट शासन तंत्र का मुकाबला करने के लिए ईमानदार मीडिया तंत्र से की जाती है।

इसी मीडिया समुदाय में जोड़ तोड़, दलाली करके राज्यसभा के रास्ते सत्ता की मलाई काटने वालों की भी कमी नहीं है। तो क्या राजदीप भी इसी तरह के किसी लोभ के शिकार हो गए। तो फिर उनमें और बाकियों में अंतर क्या रह गया। जिस राजदीप से एनडीटीवी के जमाने में नेता बात करने से पहले चार बार तैयारी करते थे वो राजदीप सीएनएन-आईबीएन के जमाने में उसकी परछाई भी नहीं लगता ऐसा क्यों है। क्या अतिशय महत्वाकांक्षाओं ने राजदीप को लील लिया। निश्चित रूप से जहां लाखो-करोड़ो रूपए दांव पर लगे हों वहां बहुत सी चीजों को तिलांजलि देनी पड़ती है। विनोद दुआ का एक इंटरव्यू याद आ रहा है जिसे वरिष्ठ पत्रकार जफ़र आगा ले रहे थे। अपना चैनल खोलने के सवाल पर विनोद दुआ ने कहा कि मुझे एक शर्ट पहननी है अब इसके दो रास्ते हैं, पहला कि मैं बाज़ार में जाऊं दुकानदार से कपड़ा खरीदूं उसे पैसा चुकाऊं और साथ में गारंटी भी हासिल कर लूं कि कुछ गड़बड़ी होगी तो तुम्हारे सिर पर ला पटकूंगा। दूसरा तरीका है कि इसके लिए मैं एक कपड़ा बनाने की फैक्ट्री लगाऊं, उसके लाइसेंस की व्यवस्था करूं, लोगों को घूस खिलाऊं, फैक्ट्री चलाने के लिए समझौते करूं और फिर कपड़ा पहनूं।

ये जिक्र यहां इसलिए कर रहा हूं क्योंकि राजदीप ने कपड़ा पहनने के लिए यहां दूसरा रास्ता चुना। तो शायद समझौतो में पुराना राजदीप कहीं खो गया।

मीडिया का पहला धर्म शायद यही है कि जनता के हित में क्या है इसकी बारीक परख होनी चाहिए। जनता के प्रतिनिधि अगर खुलेआम उनके वोट की खिल्लियां उड़ा रहे थे, उन्हें संसद में पहुंचाने के बदले सांसद करोड़ो रूपए में अपनी मर्यादा नीलाम कर रहे थे तो फिर इसमें संसदीय विशेषाधिकार का सवाल कहां से पैदा हो जाता है। जनता पहले है या विशेषाधिकार।

उनके पास क्या था क्या नहीं ये तो वही जाने पर अगर उनके पास लोकसभा स्पीकर को दिखाने के लिए कुछ था तो उसे देखने का हक़ देश की जनता को भी था। भले ही वो इसे डिसक्लेमर के साथ चलाते। उसमें कुछ स्पष्ट था, नहीं था, वैध था, अवैध था इसका फैसला फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं करती। गुप्त सूत्रों से मिली जानकारी, नाम न छापने की शर्त जैसे जुमलों के साथ हज़ारों खबरों को वैधानिकता प्रदान करने वाला मीडिया एक टेप को इस तरह से छुपा कर न तो अपने पेशे से न्याय कर रहा है न ही देश की जनता से।

अगर ऑपरेशन वेस्ट एंड, गुजरात का सच जैसी सच्चाईयों का खुलासा करने की हिम्मत नहीं है तो फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस वाली पत्रकारिता करते रहिए किसी का भला हो न हो आपकी कॉर्पोरेट कंपनी खूब फलेगी फूलेगी।

अतुल चौरसिया

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सीरियल धमाकों का सिलसिलेवार सीरियल

सिलसिलेवार धमाके, सीरियल ब्लास्ट ये शब्द आम हिंदुस्तानियों के लिए उतने ही आम हो चले हैं जितना मोगादिशू, दारफुर की गलियों में बारह साल के बच्चे के हाथ में एके 47, क्लाशिनिकोव। मन में धमाका करने का निश्चय करके निकले आतंकवादी को पकड़ना खुफिया विभाग, पुलिस तो क्या ब्रह्मा के वश की भी बात नहीं है। जिस तरह के जटिलताओं से भरे इस देश की सामाजिक संरचना हैं उसमें शत-प्रतिशत सुरक्षा की गारंटी मुश्किल है। उस पर से तुष्टिप्रधान राजनीति। मुंबई की लोकल रेल में धमाके होंगे तो मनमोहन सिंह देश के नाम संदेश देने की घड़ी में पीएमओ से ये संदेश देना ज्यादा पसंद करते हैं कि सुरक्षा एजेंसियां फला वर्ग को निशाना न बनाएं। देश का गृहमंत्री कोई बयान देने से पहले 10 जनपथ की ओर से हरी झंडी मांगता है।

तो फिर इस सिलसिले का अंत क्या है? क्या सारा तंत्र सिर्फ इस बात की नुमाइंदगी में लगा हुआ है कि ये विस्फोट हमारी नियति बन चुके हैं। हमें इसी के बीच जीने की आदत डालनी होगी। जो बदकिस्मत रहे वो धमाकों में मारे गए जो खुशकिस्मत हैं वो थोड़ी देर और ज़िंदा रहने का लुत्फ उठा लें।

संयम की अपील, मरने वालों को लाख दो लाख का झुनझुना, पाकिस्तानी हाथ, विदेशी षडयंत्र, वैमनस्य फैलाने का मकसद जैसे रटे-रटाए जुमलों से निकट संबंधियों को खोने वालों के दिलों की आग को ठंडा रखने की नाकाम कोशिश कब तक होती रहेगी?

बड़े की छींक से भी सिंहासन हिलते हैं। 11 सितंबर वो तारीख है जो दुनिया के नक्शे पर आतंकवाद को ग्लोबलाइज़ करने के लिए जानी जाती है। इससे पहले पश्चिमी दुनिया की सोच थी कि ये बीमारी भारतीय उपमहाद्वीप, मध्यपूर्व और नंग दरिद्र अफ्रीका की है। पश्चिमी समाज खुद को इस दावानल की पहुंच से बहुत दूर समझता था। लेकिन 11 सिंतबर को दुनिया का चौधरी भी इस दावानल की दहक से झुलस गया।

प्रगतिशील समाजों की ख़ासियत है वो अपने अतीत के हर अच्छे-बुरे अनुभवों को सहेज कर रखता है। ऑसवित्ज़ में हुए हिटलरशाही अत्याचारो की निशानियों को जर्मनी ने आज भी जस का तस सहेज कर रखा है। दुनिया भरे के लोग इसे देखने आते हैं, इसकी क्रूरता का अहसास करते हैं, और फिर उसके परिणामों के भय से ऐसे कारनामों से दूर रहने की शपथ लेते हैं।

9/11 को आतंक की हत्यारी बांहें अमेरिका ने अपने गिरेबान पर महसूस की और आगे के लिए सीख भी ली। आज तक अमेरिका में दूसरा आतंकी हमला तो क्या कोई आतंकवादी दिवाली के पटाखे तक नहीं छोड़ सका है। अमेरिकियों ने WTC शहीद स्थल पर ग्राउंड ज़ीरो के नाम से स्मारक बनाया। हर साल 9/11 की बरसी के मौके पर लाखो अमेरिकी मारे गए लोगों की याद में मौन रखते हैं, उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। ये न भूलने की वो ताकत है जो फिर से किसी हमले की आशंका को खत्म करती है। ब्रिटेन की ट्यूब ट्रेनों में हुए धमाकों के बाद आज तक ब्रिटेन में कोई हमला नहीं हो सका है तो इसकी वजह न भूलने की और गलतियों से सीख लेने की ताकत ही है। इंसान और जानवर के बीच फर्क ही यहीं पैदा होता है कि इंसान अपनी गलतियों को परिमार्जित करता है और भविष्य में किसी और ग़लती से बचता है। जानवर ऐसा नहीं कर पाते।

तो फिर भारतीय व्यवस्था क्या जानवरों से भी बदतर हो चली है। हैदराबाद, मालेगांव, वाराणसी, बाराबंकी, लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, फैजाबाद, बंगलोर, जयपुर, अहमदाबाद। हर बार वही ग़लती, हर बार वही चूक। अपराधी को अपराध करने के लिए क्या चाहिएउसके पहले अपराध के बाद कोई दंड न मिलना। हौसले बढ़ने के बाद पॉकेटमार उचक्का भी दिन दहाड़े लूट हत्याओं को अंजाम देने लगता है। मुंबई लोकल ट्रेन में आज तक किसी की गिरफ्तारी हुई, हैदराबाद मामले में किसी की गिरफ्तारी हुई, जयपुर मामले में कोई निष्कर्ष निकला। आखिर क्यों? अरबों रूपए डकार रहा खुफिया विभाग, सुरक्षा एजेंसियां, पुलिस घटना के पहले पता लगाने में नाकाम क्यों हैं, घटना होने के बाद अंधेरे में तीर क्यों मार रही हैं? एक भी मामले को अंतिम परिणति तक क्यों नहीं पहुंचाया जा सका?

तो फिर आतंकवादियों को और क्या चाहिए। जूते खाओ और बेशर्मो की तरह भूल जाओ। खुद ज़ेड प्लस की सुरक्षा में चैन की नींद और आम आदमी के सिर पर मौत का साया। एक नहीं दो नहीं दस औऱ गिनती चालू है। रोम जल रहा है और सारे नीरो बांसुरी बजाने में व्यस्त हैं।

इतने हादसों के बाद सिर्फ एक ही कला हमने सीखी हैभूलने की। पाकिस्तान के धोखे पर विश्वास किया कारगिल का ईनाम मिला। हम फिर भूल गए। हर दिन धमाके और अगले दिन की सुर्खियां, मुंबई की ज़िंदादिली को सलाम। यानी भूल जाओ। ख़बरिया टीवी वाले दिल्ली का जज्बाके नाम पर गला फाड़ देते हैं यानी सब भूल जाओ। और जाने अनजाने ये उन नीरो का काम ही आसान कर रहे हैं जिनकी जवाबदेही इन घटनाओं के बाद बनती थी। वो चाहते ही यही हैं कि लोग भूल जाएं। वरना 12 मार्च 1993 के बाद मुंबई दोबारा निशाना नहीं बनती।

मुंबई में 1993 के 400 मृतकों के लिए कोई दो मिनट का मौन रखता है? हमने उनकी याद में कोई स्मारक बनाया। कोई ग्राउंड ज़ीरो मुंबई में क्यों नहीं है? हम भूल गए। हम याद ही नहीं रखना चाहते। भूल कर खुश रहते हैं औऱ अगली बार के आसान शिकार बनते हैं। नीरो भी यही चाहता है।

पूरे सरकारी तंत्र का फोकस जनहित के मुद्दों से हट कर कही और केंद्रित हो गया है। प्रधानमंत्री का सारा अमला अपनी सरकार बचाने के जोड़ तोड़ में व्यस्त है, सांसदों की खरीद फरोख्त से लेकर, अंबानी के घरेलू झगड़े निपटाने का ध्यान तो सरकार को हैं पर आमहित के मुद्दों पर सोचने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। सरकार हवाई अड्डे का नाम बदलने को प्राथमिकता देती है, सोरेन जैसे दागियों को मंत्री बनाने को प्राथमिकता देती है पर जनता के दर्द के मुद्दे के लिए किसी के पास वक्त ही नहीं है।

एक अराजनीतिक व्यक्ति अपने निर्दोष चेहरे का कितना फायदा उठा रहा है ये भी अब किसी से छिपा नहीं रहा। नरसिंह राव की सरकार पर ये बयान देकर कि, सीज़र की पत्नी सभी संदेहों से परे होनी चाहिए राजनीति के हमाम में पाक शफ्फाक चोला पहनने वाले मनमोहन सिंह अपनी बारी आते ही हमाम के बाकी नंगों में शामिल हो गए। तो फिर आंतकवाद जैसे बेमतलब के मुद्दे के लिए फुर्सत ही कहां बचती है।

अतुल चौरसिया  

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अब पुल की क्या जरूरत?

अपना काम निकलते ही भगवान राम ने रामसेतु तोड़ दिया था। बनाने का मकसद माता सीता को पापी, खलकामी रावण के चंगुल से मुक्त कराना। वो महान कार्य संपन्न हुआ तो फिर पुल की क्या जरूरत। रावण को परास्त करने के बाद ज्ञानी, गुणीजनों की सभा में भगवान राम को एक सुर से शायद यही राय दी गई थी। माता सीता को वापस पाने के बाद भालुनरेश, वानरराज और तमाम विद्वानों की सभा में अयोध्या वापसी का महत्वपूर्ण मुद्दा किनारे करके पहले पुल पर बहसी बहसा शुरू हो गई थी और अंतत: निष्कर्ष ये निकला कि पुल को तोड़ दिया जाय और ये शुभ कार्य भगवान श्रीराम स्वयं अपने हाथों अंजाम दें।

वैसे भी राक्षसों की धरती का पवित्र आर्यावर्त की माटी से जुड़ना भविष्य के लिहाज से कोई अच्छी बात नहीं हैं। सतयुग का काल था। सब के सब दूरदर्शी हो लिए थे। सभा के गुणीजनों का एक मत से फैसला था राक्षसों की धरती लंका अगर सूर्यवंश की धरती से जुड़ा रहा तो भविष्य में आर्य कन्याओं पर हमेशा खतरा बना रहेगा। इन राक्षसों का क्या भरोसा। उनका कोई ईमान धर्म तो है नहीं, बार बार हमारी पावनी कन्याओं को ही उड़ा ले जाएंगे। कौन बार बार इनसे लड़ाई लड़ेगा। इतनी दूर कौन आएगा? इसलिए पुल तोड़ना ज्यादा बेहतर रहेगा।

रही बात पुष्पक विमान की तो इसे भगवान श्री राम चंद्र अपने साथ अयोध्या लेकर चले जाएंगे। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। कोई राक्षस लाख चाहकर भी पाताल लोक से इधर नहीं आ पाएगा। मुसीबत आने की तीसरी राह जलमार्ग हो सकती है पर भारतीय उपमहाद्वीप में इसकी संभावना नगण्य है क्योंकि हिदू शास्त्रों के मुताबिक सागर की यात्रा महापाप है। जिसको धर्म, करम, ईमान से जाना हो वो समुद्र में उतरेऐसी मान्यता है। सागर यात्रा के नाम पर बस थोड़ी सी छूट है गंगा सागर यात्रा की वो भी बस एक बारसारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार।

तो इस तरह से तमाम मुसीबतें हल हो जाएंगी किसी तरह की विदेश नीति का संकट भी नहीं खड़ा होगा। तो कुल मिला कर निष्कर्ष यही निकला कि पुल का मकसद पूर्ण हुआ, अब अगर ये रहेगा तो भविष्य में, कलियुग में दोनों देशों के बीच मुसीबत ही पैदा करेगा। तब इतने शुद्ध समझदार लोग तो होंगे नहीं। लिहाजा सभा ने ध्वनिमत से फैसला दिया कि पुल को भगवान श्रीराम के कर कमलों से तोड़ दिया जाए।

पर जाने कहां भगवान से भी चूक हो गई। पुल तोड़ने की बात कम्बन रामायण, स्कंद पुराण में दी गई पर पुल का अस्तित्व फिर भी कायम है।

ये सारी बातें कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर भगवान राम के आस्तित्व को नकार चुकी यूपीए सरकार ने एक नए शपथपत्र में कही है। इसलिए अगर उपरोक्त किसी बात से आपको आपत्ति हो तो बरास्ता सर्वोच्च न्यायलय आप सरकार से पूछताछ कर सकते हैं। अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं है। आपकी सुविधा के लिए सूचना के अधिकार का क़ानून भी है।

अतुल चौरसिया

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