पिंक चड्ढी अभियान और महिलाओं की पहली जीत

sriramsena1विरोध का का अनोखा तरीका अपनाने वाली महिलाओं की कोशिश रंग लाई है. पिंक चड्ढी अभियान के जरिए प्रमोद मुतालिक और उनकी श्रीराम सेना का विरोघ करने की मुहिम रंग लाई. ख़बर है कि देश भर की महिलाओं और पुरुषों की तरफ से मिल रही चड्ढियों आजिज आकर और अगले एक-दो दिन में मिलने वाली चड्ढियों की मार से बचने के लिए प्रमोद मुतालिक ने अपने ऑफिस का पता बदल दिया है। अब वो अपने पुराने पते वाले कार्यालय को बंद कर रहे हैं. पर अभियान की सदस्य निशा सूज़न के मुताबिक लोग अपनी चड्ढियां उनके ब्लॉग पर दिए गए पतों, फोन नंबरो और चड्ढी कलेक्शन सेंटर पर जमा कर सकते हैं. यहां से उनके विरोध की प्रतीक चड्ढियां प्रमोद मुतालिक को भेज दी जाएंगी. विरोध के इस गांधीवादी तरीके ने छोटी ही सही पर पहली कामयाबी तो हासिल कर ही ली है. और मुतालिक का डर ये साबित कर रहा है कि उन्हें भी कहीं न कहीं इस बात का अहसास हो गया है कि वो बहुमत की नुमाइंदगी नहीं करते हैं.

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सुरेश चिपलूनकर की पिंक चड्डी से चिढ़न और जवाब

सुरेशजी आपने निशा के अभियान के चपेटे में तहलका को भी ले लिया है. इसलिए तहलका का एक पत्रकार होने के नाते आपकी कुछ बातों का जवाब देना बहुत जरूरी हो जाता है.
आपने तहलका का जिक्र किया है और लगे हाथ उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं. सिर्फ इस आधार पर कि निशा ने तहलका का पता दिया है. निशा तहलका की पत्रकार हैं और एक पता देने की जरूरत ने ऐसा करवाया. इसके अतिरिक्त तहलका का इस अभियान से किसी तरह का वास्ता नहीं है. और जिस तहलका की विश्वसनीयता को आप संदेहास्पद मानते हैं उसे आप जैसे किसी व्यक्ति के प्रमाण की दरकार नहीं हैं. आज तक तहलका ने जो किया है उसकी सत्यता पर किसी तरह की उंगली नहीं उठी है, देश के सर्वोच्च न्यायालय ने तहलका को प्रमाण दिया है. देश के करोड़ो लोग तहलका पर विश्वास करते हैं. लिहाजा अपना संदेह अपने पास रखें.
– रही बात एक एक मामले में निशा की हिस्सेदारी की तो आपको पता होना चाहिए कि देश में लाखों की संख्या में पत्रकार हैं और संभव नहीं कि हर विवाद में हर पत्रकार शिरकत करे ही करे. और तहलका को आपने खींचा है तो आपको पता होना चाहिए कि अकेले तहलका ने स्कारलेट बलात्कार-हत्याकांड को अपनी कवर स्टोरी बनाया है (29 मार्च 2008 अंक, गोइंग गोइंग गोवा)
– आपने पूछा है कि पिंक चड्डी भेजने से महिलाओं को नैतिक बल मिलेगा. अगर अबला, असहाय स्त्री को सरेआम पीटने से संस्कृति की रक्षा होती है तो पिंक चड्डी भेजने से नैतिक बल क्यों नहीं मिल सकता?
– दिल्ली की पत्रकार के बलात्कार की कितनी जानकारी निशा को है इसकी जानकारी तो आपको उनसे बात करके ही पता चलेगी. हो सकता है उनकी जानकारी आपको बगले झांकने पर मजबूर कर दे.
– तस्लीमा नसरीन के जरिए तहलका को घेरने की कोशिश भी की है आपने. आपकी जानकारी पर तरस आता है अकेले तहलका ऐसा संस्थान है जिसने दो-दो कवर स्टोरी तस्लीमा को देश से निकाले जाने के बाद की थी. इसके अलावा छोटी-मोटी खबरों की गिनती नहीं है. मुसलमानों को गरियाने वाली तस्लीमा की फिक्र है आपको पर एमएफ हुसैन की परवाह नहीं. ये दोगलापन क्यों?
आखिरी एक लाइन में श्रीराम सेना से अपना गला छुड़ा कर पोलिटिकली करेक्ट होना भी दोगलेपन की निशानी है. हिंदी में कहावत है गुण खाओ और गुलगुले से परहेज. इस भड़ास की वजह सिर्फ ये है कि आपने बिना जाच-पड़ताल किए जबरिया एक व्यक्तिगत अभियान में तहलका को घसीट लिया हैं. कोई और शंका हो तो संपर्क कर सकते हैं.
दो बातें और साफ कर दूं. शायद निशा के अभियान को आप ठीक से समझ नहीं सके हैं. उसने पहले ही साफ कर दिया था कि वैलेंटाइन डे से उसका कोई लेना-देना नहीं है, न ही वो उसकी समर्थक या बैरी है. उसका विरोध सिर्फ श्रीराम सेना के तरीके, उनकी स्वयंभू ठेकेदारी, दूसरों की व्यक्तिगत आजादी का फैसला कोई तीसरा करे जैसे कुछ बेहद मूल मसलों से है.

एक बेहद मौजू सवाल है कभी शांति से दो मिनट मिले तो विचार कीजिएगा. यदि अपकी पुत्री, पत्नी या बहन भरे बाजार इन मतिहीनों का शिकार हो जाने के बाद भी आपकी प्रतिक्रिया क्या यही रहेगी? किसी को भी किसी महिला से ज्यादती करने का अधिकार सिर्फ संस्कृति रक्षा के आडंबर तले दिया जा सकता है क्या?  उत्तर शायद नकारात्मक आए.

अतुल चौरसिया

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पिंक चड्ढी अभियान से जुड़े-बदलाव की शुरुआत करें

sriramsenaअगर हर दिन की लट्ठमार से ऊबे हुए हैं, जबर्दस्ती थोपे जा रहे संस्कारों से घुटन महसूस कर रहे हैं, कानून की परवाह न करने वालों से परेशान हैं, अपनी मनमानी करके खुद को सबका भाग्यविधाता समझने वालों से परेशान हैं, स्त्री को माता का दर्जा देने वाले उन्हें सरेआम पीटते हैं, अगर इससे परेशान हैं, गुंडई को अपना पौरुष समझने वालों की नादानी से पीड़ित हैं, तालिबानीकरण के दुष्प्रभावों से चिंतित हैं, मध्यकालीन पुरापाषाण काल में देश को धकेलने पर उतारू लोगों से त्रस्त हैं, दूसरों की आजादी का सम्मान न करने वालों से परेशान हैं, तो फिर एक आम हिंदुस्तानी के अभियान से जुड़िए और एक ऐसा आंदोलन खड़ा कीजिए कि ऐसा करने वाला दोबारा ऐसा करने की शर्मनाक जुर्रत ही न कर सके. अपना आंदोलन खड़ा कीजिए, निशा के अभियान में एक और हाथ जोड़िए. शायद नए भारत की शुरुआत यहीं से हो. पिंक चड्ढी अभियान इसी तरह कई अर्थों में अनोखा है. अभियान से जुड़ने संबंधी सारी जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें या पते पर भेजें.

http://www.thepinkchaddicampaign.blogspot.com/

Pramod Muthali,
Sri Rama Sene Office # 11, Behind new bus stand,
Gokhul road, Lakshmi park, Hubli – Karnataka

Contact persons:
Nithin (9886081269)
Nisha ( 9811893733)

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मुंबई टू मैंगलोर वाया अपनी अपनी सुविधा से

पहले मुंबई में राज समर्थकों की गुंडई पर जमकर सियासत हुई, अब मैंगलोर में वही कहानी दोहराई जा रही है. कांग्रेस जमकर हल्ला बोल रही है कि मुतालिक के रिश्ते भाजपा से हैं, उसे कर्नाटक की भाजपा सरकार का संरक्षण प्राप्त है. ये काफी कुछ मुंबई में मनसे के गुंडो द्वारा की गई गुंडई के रिप्ले जैसा ही है, बस मंगलोर में करने वाले मुंबई में कांग्रेस सरकार पर हमलावर मुद्रा में थे तो मुंबई में करने वाले मंगलोर में हमलावर बन गए हैं. मनसे की खुलेआम-बेलगाम गुंडई पर मूकदर्शक बने पुलिस और प्रशासन की भूमिका से ये बात समझते देर न लगी कि सत्तासीन कांग्रेस सरकार मनसे को शह देकर शिवसेना-भाजपा गठबंधन की गांठ में दरार डालना चाहती थी. ले देकर उसे इस बात का पूरा यकीन था कि मनसे वोटो का जितना काटापीटी करेगी वो शिवसेना-भाजपा के पाले से ही आएगा. और हर्र लगे न फिटकरी कांग्रेस की तूती महाराष्ट्र में बोलती रहेगी.
अब काफी कुछ ऐसा ही मंगलोर हादसे के बाद देखने को मिल रहा है. बस यहां पर मुंबई में कांग्रेस को घेरने वाली शिवसेना-बीजेपी यहां बचाव की मुद्रा में है तो मुंबई में रक्षात्मक रही कांग्रेस यहां हमलावर बन गई है. पर कुल मिलाकर निष्कर्ष यही है कि विचारधारा कोई भी हो राजनीति का रंग एक लगे है, इसका ढंग एक लगे है इसकी मोटी चमड़ी पर जल्दी शिकन-सिलवटें नहीं पड़ती.
टाइम्स नाउ पर कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी चिल्ला-चिल्ला कर लोकतांत्रिक मूल्यों के हनन की दलील दे रहे थे पर मुंबई की बात पर वो बेहयाई की हद तक बात को गोल मोल कर देते है. काफी कुछ ऐसा ही स्मिता ईरानी भाजपाई कुनबे की ओर से कर रही थी. पर पुरानी और सौ फीसदी खरी बात है- किसी के पास जितना कम सच होता है वो उतना ही ज्यादा हल्ला मचाता है.

दरअसल समस्या हमारी उस जड़ से जुड़ी है जिसे हमने किसी दौर में अपनी अस्मिता, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम के नाम पर दबे-छुपे ही गर्व के साथ स्वीकार किया था. 80-90 के दशक में जब पाकिस्तान के विरोध के नाम पर शिवसेना के गुंडे वानखेड़े से लेकर फिरोजशाह कोटला तक की पिचें खोद रहे थे तब हमने अंदर ही अंदर तहेदिल से इसका स्वागत किया था. कहीं न कहीं शिवसेना की ये फासीवादी हरकतें हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान की प्रतीक सी बन गई थी. वो हमारे दबे मनोभावों का प्रतिनिधित्व कर रही थीं. और उस अंध आवेग में हमने देश में पड़ रही एक विकृत परंपरा की विषबेल की अनदेखी ही नहीं की बल्कि उसे पनपाने में भी पूरी मदद की. लोकतांत्रिक देश में लाठी के जोर पर अपनी मनमानी करवाने की उस शुरुआती चरण को हमने पूरा समर्थन दिया, कहीं से भी सरकारों ने उसे ग़ैरकानूनी मानकर कार्रवाई की जहमत नहीं उठाई. ऐसा इसलिए भी था क्योंकि फासीवाद का ये चेहरा राष्ट्रवाद के मुखौटे में छिपकर हमसे रूबरू हो रहा था. दूसरे उसका निशाना हमारे मानस गहरे तक बैठ चुका स्थाई दुश्मन पाकिस्तान था इसलिए भी शायद दबे-छुपे ही सही सबने उसका स्वागत किया था. 1965 औऱ 71 के दौर की यादें अभी पूरी तरह से ओझल नहीं हुई थी, मन में कड़वाहट लिए ये पीढ़ी उस दौर की गुंडई पर मन ही मन मुस्करा रही थी. किसी ने भी अंदर ही अंदर फैलते उस भस्मासुर पर नजर नहीं डाली जो आज पूरी हिंदुस्तानी व्यवस्था का सर्वनाश करने पर उतारू है. गांधी के देश में लाठी के जोर से सबकुछ हासिल कर लेने की जो विनाशक लहर चल रही है इसका खामियाजा गृहयुद्ध से लेकर देश के एक और बंटवारे तक कुछ भी हो सकता है.हर पैमाने पर हम पीछे की ओर बढ़ रहे हैं. मध्ययुगीन परंपराओं के प्रति हिंदुस्तानियों का प्रेम बढ़ता जा रहा है. भारत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सहिष्णुता खत्म होती जा रही है. महिला पूजनीय होती है पर सरेआम उसकी पिटाई करने में हमें कतई शर्म नहीं आती है. माता स्वरूपा को निर्वस्त्र करने में 30-40 लफंगों का समूह बड़ी शान समझता है. और सत्ता के ऊपरी पायदान पर विराजमान लोग वहीं से इन मोहरों को मौन सहमति देते रहते हैं. अपने घर के भीतर जिनकी नहीं चलती वो लोग पूरे समाज को अपने इशारों पर चलाने की हवा-हवाई कल्पनाएं पाले जंगलराज फैला रहे हैं. समाज के सबसे बड़े हितैषी बनने का दावा कर रहे ये लोग एक बार अपने घरों में भी पूछ लें कि उनके इस कुकर्म से किस हद तक उनकी माताएं-बहने सहमत हैं. पर ऐसा नहीं होगा क्योंकि फासीवाद तर्क-वितर्क में विश्वास नहीं करता. उसे सिर्फ बंदूक की भाषा आती है उसी पर विश्वास करता है. एक औऱ तालिबान हिंदुस्तान में भी तेजी से पैर पसार रहा है कहना बहुत छोटी बात होगी.

विडंबना की बात है जिस देश ने अभी-अभी 26/11 देखा है, जिसके सामने विदेश से आयातित कट्टरपंथी आतंकवाद एक विकराल समस्या बन गया है वो खुद ही उन्हीं कट्टरपंथियों की राह पर चल रहा है, गाहे-बगाहे उन्हीं की भाषा बोल रहा है. जिन्हें 26 नवंबर को हम एक सुर से गरियाते फिरते हैं अगले दिन उन्हीं की राह अपनाने में हमें कोई शर्म नहीं आती है. एक बात और जो मन को बार-बार झिंझोड़ती है- पिताजी बचपन में सिखाते थे पढ़ लिख लो वरना कसाई टोले वालों की तरह मोटर मैकेनिक बन कर रह जाओगे. थोड़ा और बड़े हुए थे तो पिताजी समझाते थे पढ़ोगे लिखोगे नहीं तो क्या कश्मीर-पंजाब वालों की तरह हथियार लेकर लोगों की हत्या करोगे. बाद में जब घर से बाहर निकले तो पिताजी परेशान हो गए ये क्या हो रहा है पड़ोस में तालिबान का उदय हो रहा है. ये लोग औरतों महलाओं को पढ़ने-लिखने तक नहीं देते, उन्हें बाहर तक नहीं निकलने देते. पिताजी के विचार चाहे जो रहे हों, भले ही किसी तरह का भेदभाव रहा हो, भले ही किसी विशेष वर्ग के लिए कुंठा रही हो पर एक बात तो साफ थी ही कि उन्हें इस बात पर गर्व था कि इस देश का बहुसंख्यक समझदार, पढ़ा लिखा होता है, जाहिल नहीं होता. हमें इसी बात पर गर्व होता है कि हिंदुस्तानी कूप-मंडूक नहीं है. तालिबानियों की तरह हम किसी पर जंगली कानून नहीं थोपते, सभ्य समाज की भूमिका पर विश्वास करते हैं. पर क्या आज ये बातें किसी लिहाज से सच लगती हैं?
अतुल चौरसिया

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वही परम पद पाएगा

2006091606061201बीजेपी ये दिखाने की कोशिश में काफी शांत है कि कल्याण के जाने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा है. सियासत की अपनी मजबूरियां हैं. कल्याण को भी इस बात का अहसास है. पहले भी एक बार पार्टी से नाता तोड़ कर अपनी दिग्गजई की अंदाजा लगा चुके हैं. पर बाद में लौट के उसी कुनबे में आए थे. अब एक बार फिर से वही राग छेड़ा है. दोनों की अपनी अपनी मजबूरियां हैं पर कल्याण भी ज्यादा लंबे पैंतरे न चल कर कहीं न कहीं मैान मनौव्वल की संभावना को जिंदा रखे हुए हैं. मसलन वो न तो किसी पार्टी में जाएंगे न ही कोई पार्टी बनाएंगे. अपनी जिद पर अड़कर अपनी खास सहयोगी कुसुम राय को राज्यसाभा भेज चुके हैं खुद भी एटा से लोकसभा का टिकट झोली में डाल चुके थे. पर पुत्रमोह ने सरा टंटा खड़ा कर दिया. अशोक प्रधान को बुलंदशहर की सीट देना उन्हें नागवार गुजरा. अब कल के आदमी को अपने सामने तवज्जो देते देखकर कल्याण बर्दाश्त भी तो नहीं कर सकते थे.
हालांकि जो मामला ऊपर से पुत्रमोह लगता है अंदर से बात कहीं ज्यादा गहरी है. दरअसल हिंदुस्तानी लोकतंत्र के साथ ही पार्टी में भी अपनी हैसियत अपने समर्थक विधायको सांसदों की संख्या तय करती है. इस लिहाज से एक समय उत्तर प्रदेश भाजपा की तकदीर का मालिक रह चुका 76 वर्षीय नेता आज पार्टी के भीतर अपनी जमीन तलाश रहा था. पर मंदिर आंदोलन का सारा पानी कब का बह चुका है. उनके सामने सियासत में कूदे राजनाथ आज पार्टी के अध्यक्ष हैं. तो फिर चारा क्या था? अंदर ही अंदर दबाव बना रहे थे. पर पार्टी ने भी इस दफा ज्यादा न झुकने का मन लगता है बना लिया है.
हालांकि कल्याण फिलहाल राज्य में कोई बड़ी ताकत भले ही न हों मगर एक इलाके में अभी भी वो काफी अंतर पैदा कर सकते हैं. यानी बचपन में बच्चों के बीच होने वाली लड़ाई ‘न खेलूंगा न खेलने दूंगा पर खेल बिगाड़ुंगा’ की भूमिका कल्याण बखूबी निभा सकते हैं. ये चिंता बीजेपी को अंदर ही अंदर परेशान कर रही होगी भले ही ऊपर से वो इसे दिखा न रहे हों. अजित सिंह की आरएलडी से समझौता करके पार्टी इस नुकसान की भरपाई की कोशिश कर सकती है. पर इस राह में भी रोड़े तमाम हैं. मसलन अजित सिंह की अपनी विश्वसनीयता का पैमाना बेहद निचले पायदान पर है और कल्याण की नाराजगी की एक वजह ये अवसरवादी गठबंधन भी माना जा रहा है.
भाजपा द्वारा कल्याण को नजरअंदाज करने की एक वजह और भी ज्यादा स्पष्ट है, पार्टी की हालत प्रदेश में पहले से ही खस्ताहाल है. पिछले लोकसभा चुनाव में उसे मात्र 10 सीटें मिली थी. इस लिहाज भाजपा की स्थित उत्तर प्रदेश में कम से कम ऐसी हो गई है कि उसके पास खोने को कुछ ज्यादा है नहीं. इसलिए किसी लंगड़े घोड़े की मान-मनौव्वल में अपनी ऊर्जा बर्बाद करने की बजाए आरएलडी टाइप खच्चरों को पटाना भाजपा को ज्यादा फायदेमंद लग रहा होगा.
कल्याण सिंह ने किसी पार्टी में न जाने का या फिर कोई पार्टी न बनाने का फैसला करके कहीं न कहीं अपनी इज्जत भी खुद ही बचाई है. इसकी एक वजह तो उनका पिछला अनुभव है जो हर लिहाज से उन्हें मंहगा पड़ चुका है हालांकि वो उतना ही महंगा भाजपा को भी पड़ा था. प्रदेश में भाजपा और कल्याण की राजनीतिक हैसियत का अंदाजा होने की वजह से मुलायम सिंह ने भी 2000 की तरह एकदम से कल्याण सिंह को गले लगाने की भूल नहीं की है. दूसरे जिस तरह से कल्याण ने उन्हें बीच मंझधार में छोड़ कर दोबारा से भाजपा का दामन थामा था उस दर्द की कसक भी कहीं न कहीं मुलायम को रही होगी. पर कहते हैं न कि सियासत में दोस्ती या दुश्मनी स्थाई नहीं होती. तो मुलायम ने भी थोड़ा सा चारा तो फेंका ही है ताकि भविष्य के लिए सारे दरवाजे एकसाथ बंद न हो जाए. उन्होंने कल्याण के पुत्र राजवीर को लोकसभा टिकट इच्छा के आधार पर देने की घोषणा कर दी है.
एक बार फिर से लोकसभा की नई पारी की संभावना में संसद के पिछवाड़े सियासती पहलवानों की आपसी गुत्थम-गुत्था तेज हो गई है. आखिर जो जितनी ज्यादा मजबूती से आज ताल ठोंक लेगा वहीं अगले पांच सालों तक परम पद पाएगा.
आतुल चौरसिया

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हाथ बांधकर नदी पार करने की कवायद

साल

की शुरुआत है पर देश में इसके स्वागत की कुछ ज्यादा उत्सुकता नजर नहीं रही. वजह भी बड़ी जायज है मुंबई में हुए बर्बर आतंकवादी हमले ने पूरे देश को एक सामूहिक नैराश्य की वजह दी है. और इसी गाढे़ वक्त में मीडिया के समक्ष विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के समक्ष एक और विकट चुनौती पेश गई है. सरकार ने मुंबई हमलों के प्रसारण में मीडिया द्वारा बरती गई तथाकथित लापरवाही से निपटने के लिए नियम कानूनों का हंटर चलाने की घोषणा कर दी. चहुओर हल्ला मच गया. आखिर ऐसा क्या कर दिया मीडिया ने जिसे लेकर सरकार इतनी बेरुखाई पर उतारू हो गई?

 

यद्दपि
अपने ही बीच के कुछ लोगों की भुताई ओझाई और नागनागिन नर्तन ने भारत के वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की समझ उसकी तथ्यपरकता, उसकी स्थिरचित्तता पर कई सवाल भी खड़े किए हैं. पर 8-9 वर्षों की शैशवावस्था को ध्यान में रखते हुए इसमें कुछ ढिलाई की उम्मीद तो मीडिया कर ही सकता है. वैसे भी कुछेक लोगों से अनजाने में हुई भूल के आधार पर पूरे मीडिया के अनगिनत बड़े कार्यों को कोई सरकार, सत्ता कैसे नजरअंदाज कर सकती है. आखिर मीडिया पर एक बार लगाम लगाने के बाद उन लोगों पर निगाह कौन रखेगा जो जो अपने घृणित कारनामों की वजह से आए दिन बेशर्मी की इबारतें लिखते रहते हैं. और फिर एक बार को अगर इन कानूनों को वाजिब मान लिया भी जाए तो इसको लागू करने का अधिकार किसके हाथों में होगा. कौन होगा नैतिकता का लंबरदार जिसे पूरे देश की कार्यपालिका, विधायिका, कार्यपालिका के साथ-साथ अम जनता का भी विश्वास हासिल हो. लालू यादव, मुलायम सिंह या फिर मायावती जैसे नेता जिनकी अपनी विश्वसनीयता ही हमेशा निम्नतम धरातल पर पड़ी रसातल को जाने को तत्पर रहती है. कोई चारा घोटाले में जेल जा चुका है तो कोई राजनीतिक दुश्मनी साधने के लिए दूसरी पार्टी के विधायक को देशद्रोह के लिए बने कानून पोटा के तहत गिरफ्तार कर चुकीं हैं या फिर जिनके परिवार की अथाह संपत्ति का अंदाजा लगाने में देश की सर्वोच्च जांच संस्था सीबीआई को भी पसीने गए हैं. वो फिर वो लोग जो अपने घरों में 10,000 साड़ियों और 3000 चप्पलों का जखीरा लगा कर रखते हैं.

 

 

कदम
कदम पर ओछी हरकतों से लोकतंत्र को शर्मसार करने वाले नेता ही अगर मीडिया को हांकेंगे तो लोकतंत्र का क्या होगा. कभी सीनेमावालियों से अश्लील बातचीत की सीडी को लेकर तो कभी संसद भवन में करोड़ो रूपए का लेनदेन करने वाले ही सबसे ज्यादा मीडिया पर अंकुथ की बात करते हैं, उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं. अजीब विडंबना है कि अपने दामन में झांकने की कभी कोशिश करने वाले काफी हद तक स्वच्छ, जिम्मेदार और लोकतंत्र के अहम स्तंभ को पाठ पढ़ाने की जुर्रत करने से बाज नहीं आते.

 

विचारधारा
चाहे कोई भी हो सत्ता का चरित्र एक जैसा ही होता है चाहे गुजरात हो, 1984 के सिख विरोधी दंगे हों या फिर हाल के सिंगूर और नंदाग्राम. लेकिन ये अलगअलग विचारधाराएं भी मीडिया पर कोड़ा बरसाने की बात से गाहेबगाहें मूक सहमति जताती चली रही थी. हालांकि इस बार वाम और दक्षिणपंथियों ने सरकारी सुर से सुर मिलाने से परहेज किया है पर कब तक इसका भरोसा किसी को नही हैं.

 

अक्सर
सत्ताधारी मीडिया के बीच प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक की दीवार खींचने की भी सतही-उथली कोशिशें करते नजर आए. मसलन इसी बार के एजेंडे में देख लीजिए, उनका साफ कहना है कि हम इस रेगुलेशन से प्रिंट मीडिया को बाहर रखना चाहते हैं. तो क्या प्रिंट मीडिया अपने ही सहोदर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर थोपे जा रहे एक अनैतिक बंधन को आंख बंद करके स्वीकार कर ले? मसला किसी के ऊपर थोपे जा रहे प्रतिबंधों से परे सही और गलत के बीच अंतर करने का है. और अगर एक बार इस तरह की कोई परंपरा पड़ जाती है तो इसका अंत क्या होगा? कल को जब सत्ताधारी इसकी आड़ में प्रिंट मीडिया पर इसी तरह के बंधन थोपने की कोशिश करेगा तब किस मुंह से प्रिंट वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से सहायता मांगेगें और क्योंकर वो प्रिंट वालों की सहायता करेंगे?

 

इस
लिहाज से तो इस बंधन को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता. वैसे भी मीडिया ने चाहे वो प्रिंट हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक सबने अपने नियम कायदे बनाएं है और अपने लिए एक आचार संहिता स्वयं ही खींची है. प्रधानमंत्री का प्रस्ताविक नियामक कानून पर रोक लगाने का फैसला न्यायोचित से भी ज्यादा उचित कहा जा सकता है. और उन्हें इस मजमून को कूड़े के ढेर में फेंकना होगा, लेकिन लगे हाथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी अपनी शैशवावस्था से किशोरवास्था की ओर कदम बढ़ाने का अहसास सरकार, समाज सबको करवाना होगा.

 

अतुल
चौरसिया 

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राजनीति का दोगलापन या दोगलेपन की राजनीति

ये बात समझने की कोशिश में सिर खपा कर भी कुछ ख़ास समझ नहीं आया। लिहाजा थके हारे ये निष्कर्ष निकाला कि राजनीति महाठगिन हम जानी। कब कहां ये अपना रंग किस माहौल के हिसाब से ढाल लेगी किसी को ख़बर नहीं लगेगी।
जिस दिन जामिया नगर के एल-18 में पुलिस ने एनकाउंटर किया था और अपने एक सिपाही एमसी शर्मा को खोया था उस दिन की राजनीति की मांग थी कि सियासतदान उनके घर जाएं, उनके परिवार के साथ संवेदना जताएं हो सके तो कुछ रुपया पैसा दान करें। आखिर जिस आतंकवाद की चोट से झुंझला झुंझला कर देशवासी दो चार हो रहे थे, उसका सफाया करते समय अगर कोई मारा गया तो उसे तो नायक का दर्जा मिलना ही था।
बस सियासत इस बात का जोड़-घटाना कर रही थी कि इसमें वोट का कितना गणित है। सारी गुणा गणित यही कहती है कि इस देश में शहीद का दर्जा अमूमन सभी नायकों से ऊंचा होता है। लिहाजा उनके पक्ष में खड़ा होना सियासतदानों के लिए फायदे का ही सौदा है। हुआ भी वहीं। तमाम लोगों में अपने अमर सिंह भी शामिल थे। उन्होंने दस लाख रूपए का चेक भी शहीद के परिजनों को दिया था। ये बात अलग है कि चेक भुनाने लायक ही नहीं पाया गया। पर कहते हैं न कि सियासत समय का मिजाज देखकर रंग बदल लेती है। यहां भी वैसा ही हुआ। अपने जामिया के उप कुलपति मुशीरुल साहब ने पहले ही अपना रुख साफ कर दिया था कि वो अभियुक्तों को क़ानूनी सहायता मुहैया करवाने जा रहे हैं। संवैधानिक नज़रिए से और उनकी जिम्मेदारियों को देखते हुए इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है। पर नैतिकता के तकाजे में ऐसी तमाम बातें खड़ी होती हैं जो उनके रुख पर सवाल उठाती हैं। 

अगर कल को आरोपी दोषी साबित हो जाते हैं तो मुशीरुल साहब क्या सफाई देंगे। उससे भी अहम बात जो मुशीरुल साहब ने कही कि जामिया को बदनाम किया जा रहा है यहां कोई भी कट्टरपंथी नहीं है और मुझे अपनी उदारता और देशभक्ति का प्रमाण देने की जरूरत नहीं है। पर क्या ये सच्चाई नहीं है कि सलमान रश्दी की 

सैटनिक वर्सेज़ को लेकर उसी जामिया में तीन सालों तक उनका घुसना मुहाल किया जा चुका है। क्या करके वो दोबारा से जामिया में प्रवेश पा सके ये तो वही जानें। अपना सवाल ये है कि जब उन्हें खुद इस तरह के कट्टरपंथ का सामना करना पड़ चुका है तो फिर वो कैसे पूरे जामिया के पाक-साफ होने की जिम्मेदारी अपने माथे ले सकते हैं? आखिर उन्हें जामिया से धकियाने वाले कोई उदारपंथी, देशभक्त मुसलमान तो नहीं रहे होंगे। तो फिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि दो चार लोगो इस तरह की उल्टी सीधी गतिविधियों में लिप्त हों असमाजिकता का प्रभाव तो देश के अमूमन हर विश्वविद्यालय में ही है। इलाहाबाद से लेकर बनारस और अलीगढ़ तक छात्रों के बीच खूनी संघर्षों की एक लंबी चौड़ी दास्तान सुनाई जा सकती है। तो इसका ये मतलब तो नहीं कि हर जगह के वाइस चांसलर अपराधियों के पक्ष में खुलेआम बयान देना शुरू कर दें, उन्हें क़ानूनी संरक्षण की दुहाई देना शुरू कर दें।अपना मकसद यहां मुशीरुल साहब को ग़लत ठहराना नहीं है। हो सकता है उन्होंने काफी साफ मन से ऐसा करने का फैसला किया हो। पर ज्यादा संभावना इस बात की भी है कि शायद उन्हें जामिया में मौजूद प्रभावी कट्टरपंथी समूहों के सामने खुद के टिके रहने का आधार खोजेना ज्यादा जरूरी लगा हो। वरना शायद एक बार फिर से उनका स्पष्ट उदार रवैया उन्हें सैटनिक वर्सेज़ की हालत में पहुंचा सकता था। इसकी संभावना कहीं ज्यादा थी।
इन दिनों अमर सिंह भी खूब बोलने लगे हैं। वरना तो यूपी में माया और दिल्ली में यूपीए के आने के बाद कोई उन्हें दो के भाव नहीं पूछ रहा था। बहरहाल दलाली की महिमा अपरंपार। अमर सिंह भी सांत्वना देने वालों में शामिल थे। अब राजनीति का दोगलापन देखिए एक तरफ वो शहीद के परिजनों को दस लाख का चेक देते हैं। और बमुश्किल बीस दिन के भीतर ही एनकाउंटर को फर्जी करार देने में उन्हें कोई शर्म नही आती। अब इनसे भला बिना पेंदी का लोटा नहीं है जो पकड़े रहने पर कम से कम एक लोटा पानी तो सहेज ही सकता है। मुस्लिम वोटो की गाड़ी पर अपनी सियासत चलानें में क्या बुराई है। खूब करिए। पर शहर-गांव की राजनीति और देशव्यापी मुद्दों में भी अगर आपको हित-लाभ का अलगाव करने की तमीज नहीं है तो खुद को राजनेता कहने में खुद ही शर्म आनी चाहिए। किस मुंह से चेक दिया और फिर किस मुंह से कह रहे हैं कि शर्मा अपनी पोस्टिंग के लिए भागा-भागा फिर रहा था।
आपने भी धमाकों के आरोपियों को क़ानूनी सहायता अपने पैसे पर मुहैया करवाने का ऐलान किया है। यहां मामला मुशीरुल साहब से थोड़ा अलग है, इसलिए इसकी चीरफाड़ जरूरी है। आजतक किसी राजनीतिक पार्टी ने कम से कम देश के खिलाफ की गई किसी साजिश के आरोपियों को इस तरह से खुलेआम सहायता देने का ऐलान नहीं किया है। तो दिनों दिन पतित हो रही भारतीय राजनीति का ये एक नया चेहरा दिख रहा है। अमर सिंह का मामला इसलिए भी अलग है क्योंकि उन्होंने क़ानूनी सहायता देने का तो ऐलान कर दिया पर आरोप सिद्ध होने की सूरत में वो क्या करेंगे इसकी घोषणा भी उन्हें करनी होगी, एकतरफा चाल से कमा नहीं चलेगा। आखिर आप खुद को सार्वजनिक जीवन में होने का दावा करते हैं। तो फिर देश-समाज के हित से ऊपर अगर संगीन आरोपों के आरोपियों के हित हैं आपकी नज़र में, तो फिर आरोप साबित होने की सूरत में आपको ये ऐलान भी करना चाहिए था कि मैंने एक आतंकी का बचाव किया इसके लिए मैं शर्मिंदा हूं, सियासत से सन्यास ले रहा हूं। दोनों हाथों में लड्डू लेकर दोगलेपन की राजनीति को जनता भी समझती है। जिस वोट के लिए ये सारी कसरत कर रहे हैं उसका सच समझ में आता है जनता को। इस देश की लोकतांत्रिक परंपरा बहुत निराली है। जब एनडीए हवा में उड़ रही थी तो बिना इशारा किए जनता ने जमीन पर ला पटका था। और आपसे ज्यादा इसकी चोट भला किसे महसूस होगी जिसे साल भर पहले जनता ने यूपी में मुंह के बल दे मारा था। तो संभल के चलिए जनता हिसाब मांगेगी। कोर्ट को अपना काम करने दीजिए।
आखिर में दो लाइने, धमाकों पर धमाके, सैंकड़ों लोगों के चीथड़े, उनके परिजनों की मार्मिक चीत्कारें, बर्बादी के नज़ारे तो आपके दिलों में करुणा नहीं भर सके पर चंद आरोपियों के मानवाधिकारों के लिए आपकी सारी इंसानियत गले से टपकने को बेताब है। कोर्ट को अपना काम करने दीजिए सारा सच सामने आ जाएगा। आखिर आप भी तो न्यायालय का झंडा ही उठा रखे हैं तो फिर इतनी चिल्लाहट क्यों 
अतुल चौरसिया

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