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बजरंगियो न जाओ नाजियों की राह

क्या कुछ लोग आतंकवाद के खिलाफ काउंटर आतंकवाद की डगर पर चल पड़े हैं। हिंसा के खिलाफ प्रतिहिंसा की समाधिस्थ जड़ें कहीं न कहीं अंकुरित होकर स्फुटित भी होने लगी हैं। सवाल ये नहीं है कि पानी सर के ऊपर से बहने लगा है या नहीं, बल्कि सवाल ये है कि इसकी अनदेखी ठीक होगी या नहीं। पूर्वोत्तर, कश्मीर, नक्सलवाद तमाम ऐसे उदाहरण पड़े हैं जिनके बारे में विश्वास से ये कहा जा सकता है कि दिल्ली की नींद तब खुली जब पानी सर के ऊपर हो गया था। तो कहीं इस बार भी मामला ऐसा ही तो नहीं हो जाएगा?

बीती शनिवार की रात कानपुर के हॉस्टल में हुए एक धमाके ने कई सवाल जेहन में पैदा किए हैं। उम्मीद है कि सारे लोग इस सवाल पर सवाल और जवाब की शुरुआत करेंगे। अब तक सामने आई ख़बर में कहा जा रहा है कि घटना में मरने वाले दोनों युवकों का संबंध बजरंग दल से था। उनके हॉस्टल से बड़ी मात्रा में बरामद अमोनियम नाइट्रेट, जिलेटिन रॉड्स, हैंडग्रेनेड और कुछ कहें न कहें इतना तो बता ही रहे हैं कि उनकी योजना का दायरा काफी व्यापक और बड़े पैमाने पर तबाही मचाने का था। अब बजरंगी किसको निशाना बनाते हैं ये बताने की जरूरत नहीं। पर इस एक घटना के खुलासे ने एक साथ इतने सवाल पैदा कर दिए हैं कि सबको सहेजने में परेशानी हो रही है।

क्या देश में एक दूसरे से निपटने के लिए अब हिंसा ही आखिर रास्ता बचा है? विचारों की सहमति असहमति तो हो सकती है। देश में आतंकवाद का ख़तरा कई गुना बढ़ा है। इस बात में भी कोई शक नहीं कि इसमें काफी हद तक आतंकियों का साथ स्थानीय लोगों ने दिया है। इस्लामी आतंक का ख़तरा पूरी दुनिया पर मंडरा रहा है। पर एक सुर से ये कहना कि सारे मुसलमान इसमें शामिल हैं या इन आतंकियों को दुनिया भर के मुसलमानों का समर्थन हासिल है, ज्यादती होगी।

आखिर आतंकवादी हमलों के बाद हमारे ताकत का संबल क्या होता है? यही ना कि अपने अंधकट्टरता के नाम पर निर्दोषों को निशाना बनाना कहां की बहादुरी है। जो आतंकवादी अपने धर्म की दुहाई देकर निर्दोष नागरिकों की हत्या पर हत्या किए जा रहे हैं उन्हें इस बात का इल्म नहीं हैं कि दुनिया की नज़रों में वो अपने धर्म को कितना नीचे पहुंचा रहे हैं। अपने धर्म को कितना अपमानित कर रहे हैं। धर्म की मूल भावना को लीलने की कोशिश कर रहे हैं। धर्म के मूल उपदेशों से परे एक नई परिभाषा खड़ी कर रहे हैं।

तो क्या बजरंग दल के लोग भी निर्दोष लोगों की हत्या की साजिश में कॉलर खड़ा कर रहे हैं? देश का क़ानून, खुफिया तंत्र अगर धमाकों के गुनहगारों तक नहीं पहुंच रहा है तो इसके लिए कौन दोषी है? तो क्या बजरंगियों ने एक सिरे से किसी एक संप्रदाय पर निशान साध लिया है? फिलहाल के संकेत तो यही कहानी बयान कर रहे है। कानपुर के सूत्र कहां तक जाते हैं इस बात की गंभीरता से पड़ताल होनी ही चाहिए। वरना अनदेखी और टल-मटोल की नीति देश में एक और नक्सली, एक और कश्मीर, एक और पूर्वोत्तर की समस्या खड़ी कर सकती है।

सनातन धर्म ने जिस एकरसता से दुनिया भर की धार्मिक धाराओं को अपनी मुख्य धारा में समाहित किया उससे मुंह मोड़कर शायद बजरंगी एक नई धारा शुरू करना चाहते हैं। खुद को ये देश का सबसे बड़ा भक्त, रक्षक कहते नहीं आघाते हैं। अगर उन्होंने इस तरह का कोई हिंसक रास्ता अपनाया तो इससे देश का क्या भला होगा, कौन सी देशभक्ति साबित करने की फिराक में हैं ये? जिस देश ने कभी अस्त न होने वाले दुनिया के विशालतम साम्राज्य से बिना लाठी-डंडा चलाए आज़ादी हासिल की है, दुनिया का सबसे वृहद व्यक्तित्व वाला नेता महात्मा गांधी जिस देश में पैदा हुआ उसके साधक-आराध्य-आदर्श हिटलरी सिद्धांत बने हैं तो ये इस देश का दुर्भाग्य है, इस देश के लिए शर्मनाक है। हथियार का जवाब हथियार होता तो हिटलर आज दुनिया का सबसे सफलतम नेता होता। पर उसने जर्मनी को क्या दियालाखों की मौत, खंडहर देश, अपंग नागरिक, सालों-साल बाद फूटते गोले-बारूद, भूखमरी, जर्जर अर्थव्यवस्था और तबाही।

फैसला उन्ही बजरंगियों को करना है जो देशभक्ति का गलाफाड़ प्रदर्शन करने में अपनी शान समझते हैं, पार्कों से लेकर बस अड्डों तक पर्दादारी का ठेका उठाए फिरते हैं। धमाके के बदले एक और धमाका करने से क्या देश की समस्याएं कम हो जाएंगी। और इसका अंत क्या है? क्या ऐसा देश बनाने का ख्वाब देख रहे हैं जहां 100 करोड़ लोग बाकी 15 करोड़ अल्पसंख्यकों को मारकर रामराज लाएंगे? नाजीवादियों की तरह सोचकर क्या हासिल होगा? मेरे ख्याल से एक ऐसा देश जो गृहयुद्ध के दलदल में फंसा तड़प रहा होगा। जिसकी सांस तो टूटेगी पर हद दर्जे की तड़पन, चुभन, किरच और दरद के बाद। और गृहयुद्ध भी ऐसा जिसके नागरिक ही एक दूसरे के खून और मांस के लीथड़ों से सने होंगे। सत्ता दूर बैठी तमाशबीन बनी रहेगी।

अतुल चौरसिया

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राजदीप सरदेसाई : “ख़बर हर कीमत पर” !

नवंबर 2007 की वो शाम बार-बार याद आ रही है। तरुण(तेजपाल) हमारे छोटे से एडिटोरियल हॉल में तहलका की पूरी संपादकीय टीम को संबोधित कर रहे थे। उनके एक एक शब्द आज ज़ेहन में तैर जाते हैं। उन्होंने कहा, तरुन रहे न रहे तहलका उनकी आखिरी सांस तक जनहित की पत्रकारिता की आवाज़ को बुलंद करता रहेगा। व्यक्तिगत लोग आते जाते रहेंगे पर तहलका एक मिशन है जिसका मकसद है गरीबों मजलूमों की आवाज़ सत्ता के शीर्ष पर काबिज लोगों के कानों में डालना, उनसे जवाब मांगना। आज एक बार फिर से तहलका अपने उसी मिशन का अगल क़दम बढ़ाने जा रहा है। हो सकता है आने वाला वाला समय परेशानियां, मुसीबतें लेकर आए पर इसका सामना हमें करना ही होगा। ताकि जो सच्चाई हमारे सामने आई है वो जनता को पता चले और इतिहास हमें गुनाहगार न समझे।

ये वो दिन था जब तहलका ने गुजरात दंगों के आरोपियों की मुंहजुबानी परत दर परत सारी सच्चाइयां सामने रखी थी। पत्रकारिता के इतिहास की शायद गिनी चुनी ख़बरों में इसको स्थान दिया जाएगा।

फिर मेरे दिमाग में 2003 अप्रैल की वो दोपहरी घूम जाती है जब हम भागे-भागे अर्चना काम्पलेक्स स्थित एनडीटीवी के ऑफिस पहुंचे थे। वजह थी कि राजदीप सरदेसाई ने हमें मिलने का समय दिया था। एक डॉक्युमेंट्री के सिलसिले में जब हम उनसे मिलने पहुंचे थे तो हमारे दिमाग में 2002 गुजरात दंगों के दौरान हीरो बनकर उभरे राजदीप की छवि हिलोरे मार रही थी। मन में उत्साह इतना था कि मित्र संजय ने जो पहली बात उनसे कही वो हम सबकी मनोदशा का प्रतिनिधित्व करती थी। सर हम सबकी बस यही इच्छा हैं कि एक दिन हम राजदीप सरदेसाई बनें।

इस सारे आगे-पीछे का जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि भारत की लोकसभा में वोट के बदले नोट का जो शर्मनाक मंजर पूरी दुनिया ने देखा है उसके तार कहीं न कहीं देश के मान्यता प्राप्त टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई भी जुड़ते हैं। और इससे उनकी विश्वसनीयता, उनकी प्रतिष्ठा पर भयंकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

आज पांच साल बाद अपनी उस दशा पर, उस सोच, उस विचार पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है। क्या जिस राजदीप जैसा हम बनने की सोच रहे थे वो वास्तव में अनुसरण के लायक था? या फिर हम ग़लत सोच रहे थे? राजदीप भी उस भीड़ का हिस्सा मात्र ही थे जिनके लिए पत्रकारिता की परिभाषा जनता का हित नहीं बल्कि व्यावसायिक और कॉर्पोरेट हितों की रक्षा करना भर है।

राजदीप जिन्होंने गुजरात की आग की परवाह नहीं करते हुए महीनों दंगो में झुलस रही गलियों कूचों की खाक छानी थी वो इतने बड़े नेता कम दलाल को रंगे हाथ पकड़ने के बाद हिम्मत खो बैठे। उस पर बचाव में राजदीप के जो तर्क हैं वो कितने लचर हैं इसका अंदाज़ा आप खुद लगा सकते हैं। उनका कहना है कि संसदीय विशेषाधिकारों का हनन न होने पाए इस वजह से नोट फॉर वोट के टेप प्रसारित नहीं किए गए बल्कि लोकसभा अध्यक्ष को दे दिए गए।

ये तर्क कितने खोखले हैं, जिस संसद के 11 सदस्यों का सवाल के बदले नोट लेने की ख़बर मीडिया प्रसारित कर चुका है, जिस संसद के 7 सदस्यों को सांसद निधि से पैसा खाने की रंगे हाथ तस्वीरें मीडिया प्रसारित कर चुका है उसी संसद के एक सदस्य द्वारा अपने घर में करोड़ो रूपए के नगद लेन देन के विजुअल दिखाने में राजदीप को विशेषाधिकार नजर आने लगे। लोकसभा से दूर अपने घर में कैसा विशेषाधिकार और वो भी जनहित से ऊपर कैसा विशेषाधिकार?

बुधवार को सीएनएन-आईबीएन ने इस पर अपनी सफाई में एक और तर्क दिया है कि वो स्टिंग के टेप का क्रॉस चेक किए बिना प्रसारण नहीं कर सकते थे। और उसी स्पष्टीकरण में आईबीएन ने ये भी कहा है कि उनकी खोजी टीम एक हफ्ते से इस ख़बर पर लगी हुई थी। तो फिर एक हफ्ते के दौरान चैनल ने टेप की क्रॉस चेकिंग क्यों नहीं की औऱ उससे भी ऊपर लाख टके का सवाल ये है कि अपने ही टेप पर चैनल को भरोसा नहीं था जो टेप के क्रॉस चेकिंग की दुहाई दी जा रही है।

एक तर्क और दिया है चैनल ने। बिना स्टिंग पूरा किए हम उसका प्रसारण नहीं कर सकते थे। विश्वासमत का खेल खत्म होने के बाद वो जनता को क्या दिखाते जब सारे कारनामें का दुष्परिणाम-सुपरिणाम सामने आ जाता। ख़बर की कीमत ही तभी थी जब वो उसे समय रहते देश के सामने ले आते। आखिर उन्हीं का हिंदी चैनल ये दावा करता है ना कि ख़बर हर कीमत पर  

फिर मीडिया जनहित की बात कैसे कर सकता है जब उसके प्रतिनिधियों की काली करतूतें सामने लाने की कुव्बत ही नहीं है। जिस तरह से गुणा-भाग करके राजदीप ने टेप न दिखाने का फैसला किया उससे तो शुद्ध रूप से व्यावसायिक हित लाभ की वही सड़ांध आ रही है जिसके लिए बहुत से मीडिया संस्थान और मीडियाकर्मी कुख्यात हैं। जिस समय बीजेपी के तीन सांसद लोकसभा में नोटों की गड्डियां उछाल रहे थे ठीक उसी वक्त राजदीप अपने चैनल सीएनएन-आईबीएन पर नोट वाली घटना और विश्वासमत के अंतर्संबंधों का लाइव विश्लेषण कर रहे थे। उनके चेहरे पर उड़ रही हवाइयां साफ साफ चुगली कर रही थी कि सत्ताधारियों से मोल ली गई दुश्मनी के नफे नुकसान ने उन्हें अंदर ही अंदर कितना बेचैन कर रखा है।

पूरे मीडिया समुदाय में एक संदेश ये भी गया कि राजदीप वो साहस वो हिम्मत नहीं दिखा पाए जिसकी उम्मीद उनके जैसे पत्रकारों से लोग करते थे। मेरा व्यक्तिगत रूप से ये भी मानना है कि इस मामले में तरुण जैसा जज्बा, नैतिक साहस और हिम्मत दिखाने की जरूरत थी पर राजदीप के लिए शायद व्यावसायिक हित-लाभ ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए।

चौतरफा हो रही निंदा से बचने के लिए भले ही उन्होंने अपने बचाव के कुछ तर्क गढ़ लिए हों पर ये तर्क कुतर्क ही हो सकते हैं। एक बात जो सीधी सपाट है वो ये कि इस मामले में राजदीप में उस हिम्मत, उस इच्छाशक्ति का सर्वथा अभाव दिखा जिसकी उम्मीद एक भ्रष्ट शासन तंत्र का मुकाबला करने के लिए ईमानदार मीडिया तंत्र से की जाती है।

इसी मीडिया समुदाय में जोड़ तोड़, दलाली करके राज्यसभा के रास्ते सत्ता की मलाई काटने वालों की भी कमी नहीं है। तो क्या राजदीप भी इसी तरह के किसी लोभ के शिकार हो गए। तो फिर उनमें और बाकियों में अंतर क्या रह गया। जिस राजदीप से एनडीटीवी के जमाने में नेता बात करने से पहले चार बार तैयारी करते थे वो राजदीप सीएनएन-आईबीएन के जमाने में उसकी परछाई भी नहीं लगता ऐसा क्यों है। क्या अतिशय महत्वाकांक्षाओं ने राजदीप को लील लिया। निश्चित रूप से जहां लाखो-करोड़ो रूपए दांव पर लगे हों वहां बहुत सी चीजों को तिलांजलि देनी पड़ती है। विनोद दुआ का एक इंटरव्यू याद आ रहा है जिसे वरिष्ठ पत्रकार जफ़र आगा ले रहे थे। अपना चैनल खोलने के सवाल पर विनोद दुआ ने कहा कि मुझे एक शर्ट पहननी है अब इसके दो रास्ते हैं, पहला कि मैं बाज़ार में जाऊं दुकानदार से कपड़ा खरीदूं उसे पैसा चुकाऊं और साथ में गारंटी भी हासिल कर लूं कि कुछ गड़बड़ी होगी तो तुम्हारे सिर पर ला पटकूंगा। दूसरा तरीका है कि इसके लिए मैं एक कपड़ा बनाने की फैक्ट्री लगाऊं, उसके लाइसेंस की व्यवस्था करूं, लोगों को घूस खिलाऊं, फैक्ट्री चलाने के लिए समझौते करूं और फिर कपड़ा पहनूं।

ये जिक्र यहां इसलिए कर रहा हूं क्योंकि राजदीप ने कपड़ा पहनने के लिए यहां दूसरा रास्ता चुना। तो शायद समझौतो में पुराना राजदीप कहीं खो गया।

मीडिया का पहला धर्म शायद यही है कि जनता के हित में क्या है इसकी बारीक परख होनी चाहिए। जनता के प्रतिनिधि अगर खुलेआम उनके वोट की खिल्लियां उड़ा रहे थे, उन्हें संसद में पहुंचाने के बदले सांसद करोड़ो रूपए में अपनी मर्यादा नीलाम कर रहे थे तो फिर इसमें संसदीय विशेषाधिकार का सवाल कहां से पैदा हो जाता है। जनता पहले है या विशेषाधिकार।

उनके पास क्या था क्या नहीं ये तो वही जाने पर अगर उनके पास लोकसभा स्पीकर को दिखाने के लिए कुछ था तो उसे देखने का हक़ देश की जनता को भी था। भले ही वो इसे डिसक्लेमर के साथ चलाते। उसमें कुछ स्पष्ट था, नहीं था, वैध था, अवैध था इसका फैसला फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं करती। गुप्त सूत्रों से मिली जानकारी, नाम न छापने की शर्त जैसे जुमलों के साथ हज़ारों खबरों को वैधानिकता प्रदान करने वाला मीडिया एक टेप को इस तरह से छुपा कर न तो अपने पेशे से न्याय कर रहा है न ही देश की जनता से।

अगर ऑपरेशन वेस्ट एंड, गुजरात का सच जैसी सच्चाईयों का खुलासा करने की हिम्मत नहीं है तो फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस वाली पत्रकारिता करते रहिए किसी का भला हो न हो आपकी कॉर्पोरेट कंपनी खूब फलेगी फूलेगी।

अतुल चौरसिया

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अब पुल की क्या जरूरत?

अपना काम निकलते ही भगवान राम ने रामसेतु तोड़ दिया था। बनाने का मकसद माता सीता को पापी, खलकामी रावण के चंगुल से मुक्त कराना। वो महान कार्य संपन्न हुआ तो फिर पुल की क्या जरूरत। रावण को परास्त करने के बाद ज्ञानी, गुणीजनों की सभा में भगवान राम को एक सुर से शायद यही राय दी गई थी। माता सीता को वापस पाने के बाद भालुनरेश, वानरराज और तमाम विद्वानों की सभा में अयोध्या वापसी का महत्वपूर्ण मुद्दा किनारे करके पहले पुल पर बहसी बहसा शुरू हो गई थी और अंतत: निष्कर्ष ये निकला कि पुल को तोड़ दिया जाय और ये शुभ कार्य भगवान श्रीराम स्वयं अपने हाथों अंजाम दें।

वैसे भी राक्षसों की धरती का पवित्र आर्यावर्त की माटी से जुड़ना भविष्य के लिहाज से कोई अच्छी बात नहीं हैं। सतयुग का काल था। सब के सब दूरदर्शी हो लिए थे। सभा के गुणीजनों का एक मत से फैसला था राक्षसों की धरती लंका अगर सूर्यवंश की धरती से जुड़ा रहा तो भविष्य में आर्य कन्याओं पर हमेशा खतरा बना रहेगा। इन राक्षसों का क्या भरोसा। उनका कोई ईमान धर्म तो है नहीं, बार बार हमारी पावनी कन्याओं को ही उड़ा ले जाएंगे। कौन बार बार इनसे लड़ाई लड़ेगा। इतनी दूर कौन आएगा? इसलिए पुल तोड़ना ज्यादा बेहतर रहेगा।

रही बात पुष्पक विमान की तो इसे भगवान श्री राम चंद्र अपने साथ अयोध्या लेकर चले जाएंगे। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। कोई राक्षस लाख चाहकर भी पाताल लोक से इधर नहीं आ पाएगा। मुसीबत आने की तीसरी राह जलमार्ग हो सकती है पर भारतीय उपमहाद्वीप में इसकी संभावना नगण्य है क्योंकि हिदू शास्त्रों के मुताबिक सागर की यात्रा महापाप है। जिसको धर्म, करम, ईमान से जाना हो वो समुद्र में उतरेऐसी मान्यता है। सागर यात्रा के नाम पर बस थोड़ी सी छूट है गंगा सागर यात्रा की वो भी बस एक बारसारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार।

तो इस तरह से तमाम मुसीबतें हल हो जाएंगी किसी तरह की विदेश नीति का संकट भी नहीं खड़ा होगा। तो कुल मिला कर निष्कर्ष यही निकला कि पुल का मकसद पूर्ण हुआ, अब अगर ये रहेगा तो भविष्य में, कलियुग में दोनों देशों के बीच मुसीबत ही पैदा करेगा। तब इतने शुद्ध समझदार लोग तो होंगे नहीं। लिहाजा सभा ने ध्वनिमत से फैसला दिया कि पुल को भगवान श्रीराम के कर कमलों से तोड़ दिया जाए।

पर जाने कहां भगवान से भी चूक हो गई। पुल तोड़ने की बात कम्बन रामायण, स्कंद पुराण में दी गई पर पुल का अस्तित्व फिर भी कायम है।

ये सारी बातें कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर भगवान राम के आस्तित्व को नकार चुकी यूपीए सरकार ने एक नए शपथपत्र में कही है। इसलिए अगर उपरोक्त किसी बात से आपको आपत्ति हो तो बरास्ता सर्वोच्च न्यायलय आप सरकार से पूछताछ कर सकते हैं। अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं है। आपकी सुविधा के लिए सूचना के अधिकार का क़ानून भी है।

अतुल चौरसिया

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कुछ अन्यमनस्क हो रहा हूं…

बहुत छोटे थे हम जब शाहबानों मामले में कांग्रेस ने अपना धर्म निरपेक्ष चोला उतार फेंका था। उस ग़लती के एहसास ने राजीव गांधी को अयोध्या का रास्ता दिखा दिया। जिस भाड़ को आडवाणी आज तक झोक रहे हैं उसकी चिंगारी इन्हीं राजीवजी ने सुलगाई थी। फिर एक मौका आया जब सत्तावर्ग खुद को देश की सबसे मजबूत और सर्वसमाज की पार्टी के रूप में स्थापित कर सकती थी लेकिन मुफ्ती जी की बिटिया पूरे हिंदुस्तानी राजवर्ग पर भारी पड़ गई। और यहां से सिंचित हुई कश्मीर घाटी में अलगाववाद की बयार आज काफी हद तक वटवृक्ष तक का सफर तय कर चुकी है। काफी हद तक आतंकियों को 1999 की गोघूलि की बेला और नई सहस्त्राब्दि की शुरुआत में गांधार योजना की प्रेरणास्रोत मुफ्ती साहब की बिटिया ही थी जिनके बारे में बाद में सुना गया कि उन्हीं आतंकियों में से किसी के साथ घर बसा लिया।

 

अब उन्हीं की एक बिटिया पीडीपी के नाम से कश्मीर की सियासत संभाल रही हैं। पर भाषा उनकी पूरी की पूरी हुर्रियत वालों से होड़ लेती है। सियासत की अपनी मजबूरी है। पर अपनी निजी फायदे के आगे जिस बड़े हित को इन नेताओं ने दांव पर लगाया है उसकी कीमत बहुत महंगी अदा करनी होगी। हिंदुस्तान सिर्फ कश्मीर नहीं है और गंगा जमुनी तहजीब सिर्फ घाटी में नहीं बसती। पर आगे जब पुलिस अपने फर्जी मुठभेड़ों में किसी कश्मीरी को निशाना बनाएगी तो हमेशा से इसके विरोध में उठने वाली पुरज़ोर आवाज़ अमरनाथ यात्रा की तपिश के चलते कमज़ोर पड़ जाएगी। तब शायद उन क्रूर हत्याओं को भी देश का लंबा-चौड़ा तबका अपनी मौन स्वीकृति दे देगा। जिस तरह की भाषा पिछले दिनों कश्मीर में देखने को मिली वो काफी विदारक है। देश के लिए ये भावनाएं कहीं से स्वास्थ्यकर नहीं है। मानसिकता के रास्ते दिलों तक उतरती स्थितियां दिनों दिन मजबूत होंगी। पीडीपी के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि हमने समझौता किया है अपना ईमान गिरवी नहीं रखा है। नेशनल कांफ्रेंस वाले श्राइन बोर्ड को दी गई ज़मीन के मसले पर हुर्रियत से भी कड़ी भाषा में गरिया रहे हैं। और इन सबके बीच एक बार फिर कांग्रेस शाह बानों  के बाद उसी तरह की ऐतिहासिक ग़लती कर गया है।

इस देश में हर राज्य, हर ज़िले में हज कमेटी के लिए ज़मीने दी गई है, उन पर अब जब कोई हिंदूवादी आंखे तरेरेगा तो उसका खुलकर सामना किस मुंह से लोग करेंगे। इस देश ने मुसलमानों को अपना पर्सनल लॉ बोर्ड चलाने की अनुमति दे रखी है। किसी पश्चिमी लोकतंत्र में ऐसी इजाजत किसी को नहीं है। सबके लिए सिर्फ और सिर्फ एक क़ानून होता है। ये हिंदुस्तान है जहां सबको अपने अपने हिसाब से रहने की छूट है इसमें पर्सनल लॉ तक वाजिब है। इस पर रोक की बात होते ही एक आवाज़ उठती है हमारे धार्मिक मामलो में सियासी हस्तक्षेप हो रहा है। अब कश्मीर में क्या हुआ? जब हिंदू कट्टरपंथी कहेंगे कि कश्मीर में हमारे धार्मिक मामलों को श्राइन बोर्ड से छीन कर राजनीति के हवाले क्यों किया गया तो किस मुंह से देश का धर्म निरपेक्ष तबका उनका सामना कर पाएगा?

 

कुतर्क की सीमाएं असीमित हैं। अगर 40 हेक्टेयर ज़मीन से कश्मीर में मुसलमान अल्पसंख्यक हो जाते हैं (जैसा गिलानी ने अपनी रैली में कहा), राज्य का मुस्लिम बहुल चेहरा बिगाड़ने की साजिश है (जैसा मुफ्ती के सिपहसालारों ने और उनकी बेटी ने कहा) तो फिर देश में इतने सारे हज मंज़िलों, मस्जिदों, मदरसों से हिंदू कट्टरपंथियों को भी अल्पसंख्यक होने का ख़तरा पैदा हो सकता है, देश का हिंदू बहुल स्वरूप बिगड़ने का ख़तरा पैदा हो सकता है। फिर किस मुंह से लोग मुस्लिमों का बचाव करेंगे।

 

समस्या की जड़ दरअसल कश्मीर में ही है। यहां का सियासी तबका घाटी की सीमाओं को ही सारे वोटर का गढ़ मानने की भूल में है। उसकी दूरगामी सोच कही से देश की दीर्घकालिक हितों से जुड़ती नहीं दिख रही है। और न ही उसे इसके आसन्न खतरे नज़र आ रहे हैं जो आने वाले समय में देश में जटिल धार्मिक स्थितियां पैदा करने की ताकत रखता हैं। जम्मू, दिल्ली में विहिप, बजरंग दल, शिवसेना की विरोध रैलियों से इसका आभास भी होने लगा है। कांग्रेस तो खैर ऐतिहासिक गलतियों का मकड़जाल बुनने में व्यस्त है और देश की दूसरी बड़ी पार्टी भाजपा इस मकड़जाल की उलझन से पैदा हुए शून्य में अपना सियासी भविष्य देख रही है। तो फिर ये देश किससे उम्मीद करे।

अलगाववाद के जो कश्मीरी तर्क हैं उनके आधार पर तो इस देश के पचास टुकड़े कर दिए जाएं तो भी अलगाववाद की लड़ाई कभी नहीं रुकेगी। पर ये एक अलग मसला है इस पर भी लंबी चर्चा की जा सकती है। फिलहाल राजनीतिक इच्छाशक्ति इस देश और कश्मीर के सत्ता प्रतिष्ठान के लिए सबसे अहम सवाल है। पर इसका अभाव कश्मीर से लेकर महाराष्ट्र तक साफ दिख रहा है।

 

अतुल चौरसिया     

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बाबूजी ज़रा धीरे

11.2 के पलायन वेग (पलायन वेग=मुद्रास्फीति) से जब मंहगाई सरपट भाग रही हो तो कोई चुनाव की कैसे सोच सकता है। वो भी समय से पहले। न्यूक्लियर डील का पंगा भले ही मनमोहनी नौका को डगमगा रहा है पर सारे समीकरण यही कह रहे हैं कि चुनाव फिलहाल नहीं हो सकते और न ही इस सरकार के कार्यकाल में न्यूक्लियर डील की संभावना है। अपनी-अपनी मजबूरी के चलते दोनों तलवारे तो भांजेगे पर इतना घातक वार नहीं करेंगे कि सरकार की मौत हो जाय। पर इस धमाचौकड़ी के खेल ने इंतज़ार में बैठे प्रधानमंत्री जी (आडवाणी) को कुछ इस क़दर अधीर कर दिया है कि अभी से उन्होंने लोकसभा की शतरंजी बिसात पर अपने मोहरे फिट करने शुरू कर दिए हैं। इतनी जल्दी क्या है?

 

बीएसपी के हाथ खींचने के बाद आज की तारीख में लेफ्ट के समर्थन खींचने की दशा में मुलायम सिंह भी मनमोहन की नैया अकेले दम पर पार नहीं लगा सकते। लोकसभा का गणित ही ऐसा है। तो फिर कांग्रेस कैसे न्यूक्लियर डील पर आगे बढ़ सकती है। मंहगाई की दर ऐसी है कि खुद वित्तमंत्री ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। तो फिर ऐसे में सरकार को संकट में डालकर न्यूक्लियर डील के लिए आप को क्या लगता है कांग्रेसी मनमोहन सिंह को आगे बढ़ने देंगे। पार्टी, सरकार और प्रधानमंत्रीजी के पीछे खड़ा रहने या कहें कि खड़ा दिखाने की मजबूरी न हो तो कांग्रेस के भीतर ही अच्छी खासी तादात ऐसे लोगों की है जो कतई नहीं चाहते कि साल भर पहले ही सत्ता की मलाई से वंचित हुआ जाय। वो भी तब जब दूर-दूर तक साउथ ब्लॉक और 7 आरसीआर में वापसी की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही हो।

 

तो फिर आडवाणीजी जो इस खेल के इतने पुराने खिलाड़ी हैं उन्हें कहां से इस बात की भनक लग गई है कि वो चुनावी मूड में आ चुके हैं। हमेशा दूर की सोचकर चाल चलने वाले आडवाणीजी की बेसब्री का सबब क्या है? अटलजी की फिर से वापसी की बची खुची संभावना को ज़मीदोज़ करने की कोशिश भी हो सकती है। वरना कहीं ऐसा न हो कि अंतिम समय में चुनावी नैया पार करवाने का बहाना लेकर अटलजी को फिर से खड़ा कर दिया जाय या फिर पार्टी के ही उनके विरोधी या अटलजी के चाटु शिरोमणि उनके पर कतरने के लिए अटल तराना छेड़ दें।

 

साठ सालों में आडवाणीजी पृथ्वीराज रोड तक का ही सफर तय कर पाए हैं पर यहां से 7 आरसीआर की छोटी सी यात्रा कितनी दुर्गम है उन्हें भी समझ आ गया है। उनकी बेसब्री का मजमून चाहे जो भी हो पर साल भर पहले से ही उम्मीदवारों की घोषणा से एक बात साफ दिखती है कि वो इस बार वहां पहुंचने के लिए कितने बेताब हैं। शायद इस बेसब्री की एक वजह ये भी है कि उन्हें इस बात का अहसास है कि ये उनके लिए भी आखिरी मौका है। इस बार चूके तो न उमर साथ रहेगी न शरीर साथ देगा। बहरहाल अपन तो यही चाहेंगे कि बाबूजी ज़रा धीरे चलो इस भदेस लोकतंत्र में जो दिखता है दरअसल वैसा होता नहीं। वरना इंडिया शाइनिंग के जमाने की याद भला किसे नहीं होगी। इस बात को आडवाणीजी से ज्यादा भला कौन समझेगा। तब तो सभी एक सुर से उन्हें ही सत्ता में वापसी का राजकुमार मान रहे थे। पर जनता ने संसद की कुंजी सोनियाजी को थमा दी। आडवाणीजी अधीर न होइए सिर्फ कोशिश करिए बाकी जनता के मन में क्या है न आप जानते हैं न हम। इतनी पक्की मत मान कर चलिए। 7 आरसीआर की राह बड़ी रपटीली है।

 

अतुल चौरसिया  

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कुछ ऐसा विनम्र प्रभाव है अनुपमजी का

यूं ही एक मित्र की राय पर घूमते-घूमते गांधी शांति प्रतिष्ठान जाना हुआ था। दरअसल एक स्टोरी के चक्कर में जलयोद्धा राजेंद्र सिंह की तलाश थी। मित्र ने कहा अनुपम जी से मिल लो तुम्हारी परेशानी दूर हो जाएगी। परिसर के एक तरफ मौजूद साधारण से कमरे में फाइलों, किताबों के बेतरतीब ढेर के बीच वो बैठे थे। पहली ही वाणी ने मन के पोर-पोर को एक नई ऊर्जा दी थी। ब्लूलाइन बस के कंडक्टरों की लठ्ठमार हरियाणवी सुनते सुनाते उनके दरवाजे पर पहुंचा था। यहां इतनी मधुर वाणी और उतना ही सौम्य व्यवहार देखकर हैरत भरी खुशी महसूस हुई थी। बातों ही बातों में उनका प्रभाव मन पर छाने लगा था। उनका बृहद व्यक्तित्व उनके विनम्र आचरण से खुद ब खुद स्थापित होने लगा। अब तक उनके बारे में मेरा व्यक्तिगत ज्ञान काफी कम था। बातचीत के सिलसिले के बीच ही उन्होंने अपनी लिखी एक पुस्तक “आज भी खरे हैं तालाब” भेंट की। इतनी सरल भाषा में इतनी विश्लेषणात्मक, रिपोर्ताज आधारित पुस्तक के दो चार पन्नों ने ऐसा लगा अपनी सारी खोज पूरी कर दी है। जिस उद्देश्य के लिए अनुपमजी के पास आया था ऐसा लगा उनसे मिलकर ही सारा उद्देश्य पूरा हो गया। ऐसा संपूर्ण गांधीवादी इस जमाने में, एक विरल अहसास था उनसे मिलना।

“आज भी खरे हैं तालाब” के बारे में एक बात बताना जरूरी है। पर्यावरण, तालाब, पानी के ऊपर इतनी गहरायी से हिंदी में शायद ही कोई पुस्तक उपलब्ध होगी। देश समाज के बारे में उनके सूक्ष्म ज्ञान की गवाही देती है ये पुस्तक। इसे कालजयी रचनाओं में शामिल किया जा चुका है। इंडिया टुडे ने देश में लिखी गई अब तक की दस सर्वश्रेष्ठ, सबसे ज्यादा छपी, बिकी और पढ़ी गई पुस्तकों में इसे शुमार किया है। इसके इतर आज कोई भी प्रकाशन संस्था, कोई भी व्यक्ति इस पुस्तक को सिर्फ साभार प्रेषित करके छपवा सकता है, बंटवा सकता है। इसके बदले में उन्हें किसी रॉयल्टी की दरकार नहीं है। उनके पास पुस्तक का कोई कॉपीराइट नहीं है। देश की लगभग सभी भाषाओं में लोगों ने इसका अनुवाद किया है। आज पानी और पर्यावरण की समस्या से जूझ रही देश और राज्य की सरकारें भी इस पुस्तक का सहारा लेती हैं। तमाम इलाकों में उनके सुझावों को लागू करके सूखे पड़े जोहड़ों-तालाबों को सदानीरा बनाने का अभियान या तो पूरा हो चुका है या फिर चल रहा है।

बहरहाल अपनी मुलाक़ात की बात करूं तो इसी तरह के किसी पर्यावरण के मुद्दे पर राजेंद्र सिंह की खोज अनुपमजी से मुलाकात की वजह बनी थी। दिमाग में आया कि अपनी स्टोरी के लिए इस भली आत्मा से बेहतर भला कौन हो सकता है। पर तुरंत झटका लगा। अनुपमजी मीडिया और कैमरे की चकाचौंध से हमेशा दूर रहते हैं। अपनी धुन में मगन इस पर्यावरणवादी को किसी तरह की प्रशंसा, नाम, यश की लालसा भी नहीं है। कुछ इस तरह के प्रभाव में उनसे पहली मुलाकात के बाद विदा हुआ मैं।

इस मुलाक़ात के कुछ ही दिनों बाद ही अपने घर जाना हुआ। रास्ता काटने और पढ़ने का कीड़ा शांत करने के लिए चलते चलते “आज भी खरे हैं तालाब” अपने पास रख लिया था। किताब पढ़ा तो अहसास हुआ कि तालाबों को पाट कर, कूंओं पर घर खड़ा कर किस विनाश को न्यौता दे रहे हैं हम। रोडवेज़ पर उतरा तो दिमाग में घूम रहा था, पहले हम कैसे सब्जी मंडी वाले कूंए की मुंडेर पर बैठकर अपने ही अक्स को पत्थर मारते रहते थे और छपाक की गूंजती हुई आवाज़ पर उछलते थे। फिर याद आयी अपने घर के पिछवाड़े वाले कूंए की जिसमें एक बार जवाहिर चाचा कि जलती हुई टॉर्च गिर गई थी। पानी की रोशनी अंदर तली से ऊपर आ रही थी। पूरा मुहल्ला रस्सी में चुंबक बांध कर ऱोशनी के आस-पास इस उम्मीद से डुबाता-निकालता रहा कि शायद टॉर्च निकल आए। पता नहीं उनकी रस्सी टॉर्च तक पहुंचती भी थी या नहीं। पर धीरे धीरे टॉर्च की रोशनी मद्धिम पड़ती हुई बंद हो गई। इतना साफ पानी था उस कूंए का। कूंए की मुंडेर से सटा हुआ चबूतरा था। जिस पर मुहल्ले के दो चार लोग रोज़ नहाते और तुलसी के पेड़ को जल चढ़ाते थे। वैसे इस कूएं का सबसे बड़ा उपयोग तब देखने को मिलता था जब किसी के घर किसी की मृत्यु के बाद दशवां यानी शुद्धिकरण होता था। कूएं के चारो ओर बाल मुंडवाए लोगों का जमघट लगता था। यहां से शुद्ध होकर लोग तेरहवीं की तैयारी करते थे।
आज जब मैं रोडवेज़ से उतर कर बाज़ार में घुसा तो याद आया सब्जी मंडी वाला कूआं पट गया है। अब उसकी मुंडेर को तोड़ दिया गया है। वहां दो-चार सब्जी वाले अपनी रेहड़ी लगा कर बैठते हैं अब। आगे बढ़ा तो सूर्यबली के तिराहे के पास वाला कूआं याद आया इस पर उन्ही सूर्यबली के छोटे भाई ने अपनी दोमंज़िला बिल्डिंग खड़ी कर ली है। आगे बढ़ा तो चौराहे पर आ पहुंचा। जहां खेलकर हम लोग जवान हुए हैं। इस कूएं को भी लोगों ने पाट दिया। तर्क ये था कि अगर पाटा नहीं गया तो ज़हरीली ग़ैस निकल सकता है। वैसे भी अब कौन कूएं का पानी पीता है। वहां से सामने ही अपना घर था पर निगाह मवेशी खाना जाने वाली सड़क की ओर चली गई। महाजनी टोला के दोनों कूओं में से एक पर बर्नवाल परिवार ने ये कह कर मिट्टी डलवा दी कि बच्चों के गिरने का ख़तरा हैं, दूसरे पर जायसवालजी ने चेयरमैन से सांठगांठ कर अपनी दुकान खड़ी कर ली। आज बाज़ार के सारे कूएं पट गए हैं कुछ पर बिल्डिंगे खड़ी हो गई हैं, कुछ पर रेहड़ी पटरी वालों ने कब्जा कर लिया है। तर्क ये दिया जाता हैं कि इसमें टाउन एरिया का ही फायदा है, तहबाजारी जो वसूल होती है।

“आज भी खरे हैं तालाब” अपने पास थी। पर समझ नहीं आ रहा था कि इसे किसे देकर समझाया जाय। किसे पढ़ाया जाय। दो-तीन दिन ही बीते थे घर पर कि सुबह-सुबह बगल की सेठानी चाची रोते हुए अपने घर आयी। माताजी से जाने क्या बात की और उन्हें लेकर अपने घर चली गईं। थोड़ी देर बाद बाहर से तेज़ तेज़ आवाज़े आने लगी। बाहर गए तो देखा मेरे पिताजी गुस्से में सेठानी चाची के पति यानी हमारे लालजी चाचा को समझा रहे थे। थोड़ी देर में माजरा कुछ यूं समझ में आया कि चाचाजी अपने पुराने घर को तुड़वा कर उसका मलबा घर के पीछे वाले कूएं में फिंकवा रहे थे। सुबह से ही मजदूर इस काम में लगे हुए थे। इस बात से खुद उनकी पत्नी जी भी नाराज़ थी। वो आज भी हर दिन तुलसी चौरे पर जल चढ़ाती हैं। पर वो उनकी सुनने को तैयार नहीं थे। इसीलिए वो रोते हुए हमारे घर आयी थीं। अब पापाजी और चाचाजी में तर्क-वितर्क हो रहा था। बहरहाल दोनों लोगों को शांत करके मैंने सबसे पहले उन मजदूरों को रोका जो लगातार मलबा कूएं में फेंक रहे थे। फिर एकदम से लगा कि “आज भी खरे हैं तालाब” सार्थक हो जाएगी। सबके बीच मैंने वो किताब चाचाजी को दी। कुछ पन्ने जल्दी-जल्दी में पढ़ कर उन्हें सुनाए। बात उनकी समझ में आने लगी थी। तभी पापाजी ने धर्म की दुहाई दी किसी को पानी पिला नहीं सकते तो किसी का पानी छीनों भी मत। लोगों ने तो जाने क्या-क्या पूण्य करके कूएं बनवाए। इसे पाटकर पाप का बागीदार क्यों बन रहे हो?

बहरहाल “आज भी खरे हैं तालाब” के खरेपन पर अंदर से अभिमान हुआ और बाहर से ये संतोष की कूआं पटने से बच गया। कुछ इस तरह का विनम्र प्रभाव है अनुपमजी का। अब कूएं की साफ-सफाई और उसमें कूड़ा करकट ना पड़े इसके लिए जाली लगाने का प्रबंध मुहल्ले के लोग कर रहे हैं।

अतुल चौरसिया

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ये मन से जुड़ने का सवाल है

“भइया तोहार साली” यही फिल्म का नाम था जिसने पिछले हफ्ते भर से शिवम टाकीज़ की हमेशा शांत रहने वाली टिकट खिड़की पर खिचखिच मचा रखी थी। टिकट के लिए मारामारी देखकर ऐसा लगता था कि 70 के दशक की कोई अमिताभ बच्चन की फिल्म रिलीज़ हुई हो। लोगों से बातचीत में पता चला कि फिल्म तो पिछले एक हफ्ते से लगी थी लेकिन हर रोज़ इवनिंग और नाइट शो में इसी तरह की मारामारी मचती है। अब जिज्ञासा और बढ़ गई। सिर्फ इसी फिल्म के लिए या फिर हर फिल्म के लिए टिकट खिड़की पर मारामरी मचती है। तो पता चला कि अरे हर फिल्म के लिए कहां भीड़ आती है, ये तो भोजपुरी फिल्म है इसलिए ये हाल है।

भोजपुरी फिल्मों के लिए हाल के कुछ सालों में पैदा हुआ प्यार अचानक कहां से आया है, ये विचार का विषय है। पहले तो भोजपुरी फिल्मों का बाज़ार इतना व्यापक नहीं था। भोजपुरी पिछड़ों, गंवारों की भाषा थी। शुद्ध रूप से मुनाफे पर आधारित फिल्मी दुनिया का अर्थशास्त्र भोजपुरी को इतनी तरजीह इससे पहले तो कभी नहीं दे रहा था। अब इसके लिए किसी मनोज तिवारी या रवि किशन को श्रेय देने की जरूरत नहीं है। इन्होंने भोजपुरी को ये मुकाम नहीं दिलाया है बल्कि भोजपुरी ने इन्हें पहचान दी है।

एक दौर में निम्न और मध्यम तबके के गुस्से और रोष को एंग्री यंग मैन ने जुबान दी थी। तो इसमे अमिताभ से ज्यादा योगदान एक ऐसे नायक का शिद्दत से इंतज़ार को जाता है जिसे सबसे पहले अमिताभ ने समय रहते दोनों हाथों से लपका था। दर्शकों को 70 के दशक में जिस नायक की दरकार थी उसे अमिताभ के रूप में एक प्रतीक मिल गया था जो अगले दो दशकों तक उनकी कुंठाओं, दबी हुई चिंगारियों को दमदार संवादों और अधकचरी विकसित स्टंट तकनीकों की बदौलत तुष्ट करता रहा। बाद में अमिताभ का जादू कुछ फीका पड़ा तो मिथुन के रूप में अगली कतार में बैठे दर्शकों को एक नया तारणहार मिल गया। आधी फिल्म पूरी होने तक घर बार से रुखसत, ज्यादातर अनाथ ये हीरो जब बदला लेता था तो सीटियों, तालियों के साथ लोगों को अपना गुबार को शांत करने के लिए गालियां निकालते हुए भी सुना जा सकता था। एक ही तर्ज पर लगातार फिल्में करने के बावजूद मिथुन सिनेमा के गंवई बाज़ार के बादशाह बने रहे। पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार के सिनेमा हॉल्स में इनकी फिल्में खूब तालियां बटोरती। लेकिन ये दौर भी जाना था सो चला गया।

अब 90 का दौर हैं। यहां शाहरुख, सलमान जैसे चॉकलेटी सितारे हैं जो स्विटज़रलैंड की खूबसूरत वादियों में 0 डिग्री तापमान पर झीनी साड़ी में लिपटी हिरोइनों के साथ कमर हिलाते हैं। ये शानदार महलनुमा घरों में रहते हैं। 70-80 का चालों, गांव की झोपड़ियों में रहने वाला हीरो पर्दे से लुप्त हो गया है। 90 के उत्तरार्ध के दशक के हिंदी सिनेमा ने तो अपना चेहरा बिल्कुल ही बदल डाला। अब यहां सिर्फ मल्टीप्लेक्स, ओवरसीज़ के लिए फिल्में बनने लगी हैं। ऊप्स जैसी ऊटपटांग फिल्मों के लिए तो इंडस्ट्री में पैसा है पर गांव-समाज को फिल्मों में दिखाना शान के खिलाफ है। कुल मिलाकर हिंदी सिनेमा काफी लकदक हो गया है और हां इसके साथ ही हिंदी सिनेमा की भाषा भी अब हिंदी न रहकर हिंगलिश हो गई है।
पर अफसोस ये सारा बदलाव एकतरफा था। अमिताभ, मिथुन, गोविंदा की फिल्मों को हिट कराने वाला ग़ैरशहरी, गांवो, कस्बों में रहने वाला तबका अभी भी मौजूद है। पर अब उसके लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने फिल्में बनाना बंद कर दिया है। इंडस्ट्री ने एकतरफा फैसला कर लिया कि जितने एडवांस फिल्मवाले हो गए हैं उतना ही विकसित उनका दर्शक वर्ग भी हो गया है। वो कहते हैं न कि फिल्मी दुनिया हकीकत से परे सपनों की दुनिया है। इसी तरह हिंदी फिल्म वाले भी सपनो में जीने लगे हैं। आज 10 में 9 फिल्में पिट जाती हैं फिर भी उस तबके के लिए फिल्में बनाने को कोई राजी नहीं है जो अमिताभ के लिए पहले दिन का पहला शो देखने के लिए सुबह आठ बजे से खिड़की पर जम जाता था। मिथुन के लिए भरी दुपहरी में लाइन लगाने वाले दर्शक के लिए कोई फिल्म अब नहीं बन रही। उसकी भाषा में जबर्दस्ती अंग्रेज़ी को घुसा कर उसे जबर्दस्ती घोंटने के लिए मजबूर किया जाता है।

तब उसकी नज़र अपनी भाषा में बनने वाली भोजपुरी फिल्मों की ओर गई। यहां उसकी अपनी कहानी मौजूद थी। अपना गांव-देहात मौजूद था। यहां का नायक उनकी जुबान बोलता था। गरीब हीरो अमीर लड़की और खलनायक बाप का मजबूत गठजोड़ उसे भोजपुरी फिल्मों में देखने को मिला। शहरी लड़की गंवई छोरे पर मिटी तो आगे की सीट पर बैठा दर्शक इसे अपनी जीत समझ कर उछाल मारता था। इसलिए भोजपुरी फिल्म आज हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए हॉट मार्केट बन गया है। हिंदी की बिसात पर अपना उल्लू सीधा करने में लगे फिल्मवाले, 10 में से 9 शब्द अंग्रेजी में बोलने वाले फिल्मवाले आज भोजपुरी का गुणगान करते नज़र आते हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां आसानी से खूब पैसा बनया जा सकता है।

जब बड़े-बड़े सितारों की फिल्में पिटती हैं तो अदने से कलाकारों और बजट वाली भोजपुरी फिल्म पूर्वी यूपी में बॉक्स ऑफिस तोड़ रही होती है। इसलिए “भइया तोहार साली” के लिए लाइल लगती है तो टशन, सांवरिया पानी नहीं मांगती। ये मन से मन के जुड़ने का सवाल है। मन से जुड़ो तो पैसा खुद बन जाएगा।

अतुल चौरसिया

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चचा सैम और अधनंगे फकीरों-सपेरों की भूख…

खा-खा के मुटियाए अमेरिकियों पर उनकी नज़र नहीं जाती। दस में नौ सर्वे चिल्लाते रहते हैं कि अमेरिकी मोटापे से बेजार हैं। वजह भी सबको पता है। लेकिन अपने बारे में इस तरह की ख़बरें उन्हें परेशान नहीं करती बल्कि उनका सीना और चौड़ा हो जाता है। पैसे के अगाध स्रोत में अंधराए अमेरिकियों के पास करने को कम है इसलिए खाना उनकी उच्च प्राथमिकता में आता है। सर्वे तो ये भी बताते हैं कि मन भर खाने के बाद जितना जूठा खाना अमेरिकी नदी नालों में बहा देते हैं उतने में दरिद्रई के शिकार छोटे मोटे अफ्रीकी देशों की पूरी जनसंख्या का पेट भर जाय और “जुग-जुग जियो” का आशीर्वाद मुफ्त में मिले। पर ये बाते न तो राष्ट्रपति महोदय को नज़र आती हैं न ही उनकी विदेशमंत्री कोंडलिज़ा ख़ातून को।

हफ्ते भर पहले खातून ने हिंदुस्तानियों को ज्यादा खाने-पीने के लिए जिम्मेदार ठहराया था, और इसे ही दुनिया में खाद्यान की समस्या का कारण बताया था। अब हफ्ते भर बाद चचा सैम ने भी हिंदुस्तानियों के खान-पान की लानत-मलानत की है। उनके मुताबिक भारत का मध्य वर्ग जब से पैसे वाला हुआ है उनकी खान-पान की जरूरत बढ़ गई हैं। यहां के 35 करोड़ मध्यवर्गियों ने मिलकर पूरी दुनिया की नाक में दम कर दिया है। दुनिया को खाने की मोहताजगी हो गई है। पैसा आने के बाद भी किसी सर्वे में ये तो नहीं कहा गया कि हिंदुस्तानी खाना बर्बाद करते हैं। यहां अमेरिकियों की तरह खाने, मुटियाने की बात तो कोई नहीं कहता। तो फिर अपने गिरेबान में झाकने में तकलीफ क्यों है?

चचा सैम चाहते हैं कि हिंदुस्तानी हमेशा भूखे ही रहें। अधनंगे फकीरों, सपेरों का देश तो फिरंगियों ने पहले ही घोषित कर दिया था। लगता है चचा अभी भी उसी चश्मे से गाफिल हैं। दुनिया के ईंधन का चालीस फीसदी हिस्सा अकेले ढकारते वक्त उन्हें नहीं सूझता कि हम कुछ ज्यादा माल उड़ा रहे हैं। कुल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन का अस्सी फीसदी हिस्सा अकेले उगलते समय उन्हें दुनिया पर मंडराते ख़तरे का अंदाज़ा नहीं होता। तब तो उन्हें इसकी फिकर भी नहीं होती कि उनके कुकर्मों की सज़ा पूरी मानवजाति, समाज, पर्यावरण, जलवायु, जल, जंगल, ज़मीन, नदी, पहाड़, सागर को भुगतनी पड़ रही है। और आगे ये खटकरम दुनिया के सिर पर और भारी पड़ने वाला है। बेशर्मी की हद में इराक से लेकर ईरान तक तेल-तेल की हाय-हाय करते समय इन्हें दुनिया पर संकट नज़र नहीं आता। पर कुछ दशक पहले के भूखे भारतीयों का भरपेट खाना इनकी आंखों में गड़ रहा है। इतने महत्वपूर्ण काम को छोड़कर पूरा अमेरिकी सियासी कुनबा हिंदुस्तानियों के खान-पान पर निगाह रखने के अतिमहत्वपूर्ण काम में लग गया है। कितनी रोटी, कितना चावल, कितनी दाल मिलेगी इसका भी फैसला अब आठ हज़ार किलोमीटर दूर बैठे चचा ही करेंगे। हम तो यही कहेंगे कि भूखे पेट की हाय बहुत भारी पड़ती है। इसलिए मुंह का निवाला छीनने की कोशिश मत करो वरना बुरे फंसोगे।

अतुल चौरसिया

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हमारा नेता चौड़े से…

कई दिनों से लिखने का शगुन नहीं बन रहा था, या कहें कि कुछ मजेदार लिखने को सूझ नहीं रहा था। आप इसे अपन का तंग हाथ कह सकते हैं, तो सोचा कि एकाध इलाहाबादी दिनों का संस्मरण लिखा जाय। विश्वविद्यालय की घनी पेड़ों की छांव में पढ़ाई लिखाई संबंधित क्रिया-कलापों के अलावा बाकी सब कुछ होता था। बम बनाने के गुर यहां के कुछ मठाधीश बुजुर्गवार (बाइज्जत सीनियर) बाकायदा नवांगतुकों को सिखाते रहते थे। बहरहाल इसके अलावा भी इस विद्यालय की एक ख़ास पहचान हैं-यहां के छात्र नेता। परिसर में छात्र कम कड़ियल झक सफेद खद्दरधारी छात्र नेता ज्यादा नज़र आते थे। यहां का मशहूर जुमला है विश्वविद्यालय परिसर राजनीति की पहली पाठशाला है। गणेश शंकर विद्यार्थी भवन का लतियाया-जुतियाया सीधे संसद भवन पहुंचता है।

बहरहाल यहां अपनी चर्चा का विषय कक्षा के वो छात्र है जिनके अंदर नेतागिरी का कीड़ा तो कुलबुलाता रहता था पर प्रतिभा की कमी या उससे भी ज्यादा पैसे की कमी की वजह से परिसर में उनका झंडा बुलंद नहीं हो पाता था। हर कक्षा में इस तरह के कीड़े से ग्रस्त दो चार प्राणी जरूर मिल जाते थे। और मज़े की बात ये थी कि क्लास में जी-10 भी हुआ करता था। ये ऐसे छात्रों का समूह था जिनकी राजनैतिक प्रतिबद्धताएं सुबह चाय-ब्रेड-बटर और शाम को चाट- समोसे के साथ बदल जातीं थीं। खासियत ये थी कि ये अपना शिकार भांपने के बाद पूरी ईमानदारी से उनके पीछे खड़ा होता था। नेतागिरी के कीड़े की कुलबुलाहट से परेशान नेता को इस बात का भान करवा दिया जाता था कि उनके पास अच्छा खासा छात्रों का समर्थन है। जी-10 के पास छात्रहित से जुड़े मुद्दों का रेडीमेड भंडार होता था। जिसके सहारे वो नेताजी को परिसर में धरना-हड़ताल-प्रदर्शन के लिए तैयार करते थे। नेताजी को भी अहसास हो जाता था कि इन्हीं खटकरमों से गुजर कर विश्वविद्यालय की गद्दी हथियायी जाती है। हर दिन परिसर में नेता जी का जुलूस निकलता। जी-10 उनके पीछे खड़ा रहता। नारे लगते हमारा नेता चौड़े से—बाकी नेता (सेंसरर्ड) से। क्यों पड़े हो चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में। मजे की बात ये थी कि छात्रों के स्कॉलरशिप से लेकर छात्रावास दिलाने तक हर मुद्दे की मांग में नारे यही लगा करते थे। स्कॉलरशिप, छात्रावास का जिक्र भी कानों में नहीं पड़ता था। इन तमाम चकल्लस के साथ जी-10 के नाश्ते-पानी का जुगाड़ एक सत्र के लिए हो जाता था।। नेताजी गद्दी पाने के सपने में चंपुओं से घिरे रहते लेकिन उन्हें इसका अहसास नहीं होता था या कि होने ही नहीं दिया जाता था। मजे की बात तो ये थी कि इन्हीं के बीच से जलूस के दौरान पत्थर फेंका जाता था। लेकिन जब सामने से घुड़सवार पुलिस का मुगलई काफिला लट्ठ पटकता हुआ पहुंचता था तो नेता जी भरे मैदान में अकेले नज़र आते। इसके बाद उन्हें अपने रंगरूटों का दुबारा से दर्शन अगली सुबह सीधे स्वरूपरानी हॉस्पिटल के बेड पर पड़े-पड़े ही हो जाता था। नेताजी को होश हवास में आने के बाद उन्हें फिर से इस बात का अहसास करा दिया जाता था कि बिना पुलिसिया लट्ठ खाए कोई नेता हो सकता है भला। पुलिस की लाठी खा कर ज़मीन पर गिरा नेता ही आगे चलकर ज़मीनी कहलाता है।

नेता जी चुनावी चक्कर में इस क़दर फंसते थे कि परीक्षा में फेल हो जाते। जी-10 अगले शिकार की खोज शुरू कर देता क्योंकि फेल नेता दुबारा से चुनाव नहीं लड़ सकता। गांव में मां-बाप खेती-किसानी से जुड़े थे। यहां लड़के को नेतागिरी की धुन सवार हो गई। जी टेन ने उन्हें संसद तक का सपना दिखाया था आज तक कोई अपन को यहां नज़र नहीं आया। यहां आया तो पता चला अब दिल्ली सिर्फ धर्मेद्र सिंह यादव, राहुल, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य, जितिन प्रसाद जैसे पहुंचते हैं। अब खेती किसानी वाला बाप मुलायम सिंह यादव की बराबरी तो कर नहीं सकता ना। अब गुस्से में भले ही कोई कह दे– इलाहाबाद में लाठी खाने के लिए हमारा बेटा और दिल्ली में मलाई काटने के लिए मुलायम का बेटा, पर कर भी क्या सकते हैं?

नतीजा, गए थे पढ़ लिख कर साहब बनने वापस आकर खेती किसानी में हाथ गंदे करने पड़ गए। बाप भी कितने दिन जवान बेटे को बैठाकर खिलाता। नेतागिरी का कीड़ा फिर भी रह-रहकर कुलांचे मारता लिहाजा गांव के परधानी के चुनाव में हाथ आजमाने से खुद को रोक न सके। लेकिन यहां भी किस्मत साथ नहीं दे सकी। यहां ठाकुर पंडित मिल गए, अहीरों का वोट कम पड़ गया ऊपर से हरिजन बस्ती ने भी आखिरी समय में हाथ खींच लिया। अब ये कोई विश्वविद्यालय का चुनाव तो है नहीं। यहां तो एक एक वोट जाति बिरादरी के तराजू पर तौल कर और रिश्तेदारी-पट्टीदारी की भट्टी में तपाकर दिए जाते हैं। लिहाजा बेचारे नेताजी को यहां भी हार से दो चार होना पड़ा। इधर अपन को इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संसद पहुंचने वाले नेता का अभी भी इंतज़ार है।
अतुल चौरसिया

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रेल का लालूकरण या बिहारीकरण या फिर बिहार का रेलीकरण

अपना देसी रेल हैबात शुरू करने से पहले दो बातें डिस्क्लेमर के तौर पर लिख दूं कि अपन को बिहार से रत्ती भर भी परहेज, घृणा या उस तरह की कोई परेशानी नहीं है जिस तरह का पर्याय “बिहारी” शब्द देश के अलग-अलग हिस्सों में बन गया है। विषय हाल ही में मेरी रेल यात्रा और उसके यात्रियों की बातचीत, सुविधा-असुविधा पर आधारित है जिसमें उपरोक्त शब्द (लालूकरण, बिहारीकरण, रेलीकरण) बार-बार लोगों की जुबान पर आए। इसे अन्यथा न लें…

चर्चा का बिंदु ये है कि जब से लालूजी ने रेलमंत्रालय संभाला है उनका दावा है कि रेल के यात्री किराए में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गई है। ये अलग बात है कि इसके बावजूद रेल को अपने जन्म के बाद से पहली बार मुनाफे का शगुन इन्हीं के कार्यकाल में देखने को मिला। लालू के इस दावे से कम से कम अपन इत्तेफाक नहीं रखते। उनकी बाजीगरी ये रही कि ज्यादातर ट्रेनों को उन्होंने एक्सप्रेस की श्रेणी में डाला और एक्सप्रेस श्रेणी का किराया अपने आप दूरी के परिमाण में बढ़ाने का प्रावधान किया। अब उन्होंने कोई ऐसी ट्रेन छोड़ी ही नहीं जिसे एक्सप्रेस की श्रेणी में न डाला गया हो। इस तरह से सबके किराए अपने आप ही बढ़ गए। शायद जनरल के किराए इससे अछूते रह गए हों।

ऊपर जो रेल के लालूकरण या बिहारीकरण की बात कही गई है वो साथ में यात्रा कर रहे दो बंधुओं की आपसी बातचीत से निकली। पूरे के पूरे कोच में कहने को तो ये शयनयान श्रेणी थी लेकिन गलियारे और बर्थों के बीच के स्थान पर भी पैर रखने की जगह नहीं थी। यानी पूरी बोगी खचाखच भरी थी। ऐसा नहीं था कि किसी के पास टिकट न रहा हो, लेकिन सबका टिकट वेटिंग का था। कुछ समय पहले तक हर ट्रेन की वेटिंग लिस्ट की एक सीमा होती थी। पर ऐसा लगता है कि अब ये सीमा रेलमंत्री महोदय ने खत्म कर दी है। पांच सौ से छह सौ तक वेटिंग का टिकट भी जारी करने में अब रेलवे को दिक्कत नहीं होती। तो फिर जनरल और शयनयान या फिर एसी में इस नीति के बाद क्या अंतर रहा। इसी बहस में भाइयों ने कहा रेल का भी लालूकरण कर दिया लालू ने। जिस तरह उन्होंने दस सालों में बिहार का बेड़ा गर्क किया था।

अब बात रेल के तत्काल दर्जे की कर ली जाय। पहले तत्काल सेवा का मतलब ही ये हुआ करता था कि जिस दिन रेल को रवाना होना है उसी दिन अगर उसमें कुछ बर्थ खाली रह गई हो तो उन्हें तत्काल के जरिए भर दिया जाय। तत्काल का मतलब ही था उपलब्ध होगा तो मिलेगा नहीं तो नहीं। आज क्या हो रहा है– तत्काल के अंतर्गत आप पांच दिन पहले टिकट ले सकते हैं (अब इस सीमा को और बढ़ाने का एलान भी हो गया है) ये कैसा तत्काल है। जहां दस दिन पहले ही आदमी को तत्काल का पता रहता है। और सुनिए अब तत्काल के लिए बाकायदा एक नई बोगी लगती है। तो फिर ये तत्काल का कॉन्सेप्ट क्या है भाई? करेले का नीमाभियान भी देखिए तत्काल सेवा में भी लालू की कृपा से वेटिंग का चक्कर चल रहा है। और दो चार नहीं दो सौ से ढाई सौ की वेटिंग लिस्ट तत्काल सेवा में जारी होती है। ये कैसा तत्काल है भाई! लालू से कोई पूछना। इस तरह से कुल मिलाकर लालू ने रेल का लालूकरण कर दिया। फायदे में रेल है या कोई मरीचिका इसका पता तो उनके मंत्रालय से हटने के बाद चलेगा लेकिन सुविधाओं का जो स्तर लालू ने रेल का किया है उसमें कोई शक नहीं कि अव्यवस्थ और भदेस से उनका पुराना नाता है। लाठी रैला जैसा विचित्र प्रयोग किए बिना उनकी क्षुधापूर्ति नहीं होती।

अपने एक भाई हैं पत्रकारिता के पेशे में, नाम है यशवंत देशमुख। कोई चार-पांच साल पहले की बात है, एक मुलाकात में उन्होंने लालू को सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा अगुवा करार दे दिया। महफिल में चक्रवात आ गया। सब के सब एक सुर से बिहार की दुर्दशा के लिए लालू को कोस रहे थे फिर ये उलटी बात यशवंत भाई ने कैसे कर दी। उन्होंने स्पष्टीकरण दिया बिहार के सामाजिक ताने बाने में बहुत ऊंच-नीच था। दस फीसदी लोग संपन्न थे, नब्बे फीसद फटेहाल थे जिनके शरीर का कपड़ा तार-तार हो चुका था। दस सालों में लालू ने क्या किया बाकी बचे दस लोगों को भी नंगा कर दिया। इस तरह से उन्होंने एक नई तरह की सामाजिक समरसता फैलाई बिहार में। सबको एकाकार कर दिया।

उस दिन ट्रेन में दो अनजान बंधु भी यशवंत भाई की याद दिला रहे थे। अंजाने में ये कैसा संयोग था। उधर ट्रेन के एक और यात्री ने कहा सा….. इस देश में सिर्फ बिहार का ही रेलीकरण हुआ है। ये बात काफी हद तक विचारणीय है। हर साल रेल बजट की कसरत में भी ये परंपरा नज़र आती है। बिहार से आने वाले हमारे नेताओं में रेल का चस्का कुछ ज्यादा ही दिखाई देता है। नितीश, रामविलास के बाद लालू उस समृद्ध परंपरा के अगले ध्वजवाहकमात्र हैं।

कुल मिलाकर यशवंत भाई की छह साल पहले वाली बात के हिसाब से क्या लालू ने रेल का बिहारीकरण कर दिया या फिर सिर्फ उसका लालूकरण किया है या फिर सब मिलकर सिर्फ बिहार का रेलीकरण कर रहे हैं। है ना सब कुछ गड्डमड्ड। अपन को भी नहीं समझ आती क्या किसमें घुस गया है। यही लालू की सियासत है जहां सब कुछ गड्डमड्ड है। इस बार लालू बिहार की बजाय रेल की सामाजिक समरसता बढ़ा रहे हैं।

अतुल चौरसिया

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