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राजनीति का दोगलापन या दोगलेपन की राजनीति

ये बात समझने की कोशिश में सिर खपा कर भी कुछ ख़ास समझ नहीं आया। लिहाजा थके हारे ये निष्कर्ष निकाला कि राजनीति महाठगिन हम जानी। कब कहां ये अपना रंग किस माहौल के हिसाब से ढाल लेगी किसी को ख़बर नहीं लगेगी।
जिस दिन जामिया नगर के एल-18 में पुलिस ने एनकाउंटर किया था और अपने एक सिपाही एमसी शर्मा को खोया था उस दिन की राजनीति की मांग थी कि सियासतदान उनके घर जाएं, उनके परिवार के साथ संवेदना जताएं हो सके तो कुछ रुपया पैसा दान करें। आखिर जिस आतंकवाद की चोट से झुंझला झुंझला कर देशवासी दो चार हो रहे थे, उसका सफाया करते समय अगर कोई मारा गया तो उसे तो नायक का दर्जा मिलना ही था।
बस सियासत इस बात का जोड़-घटाना कर रही थी कि इसमें वोट का कितना गणित है। सारी गुणा गणित यही कहती है कि इस देश में शहीद का दर्जा अमूमन सभी नायकों से ऊंचा होता है। लिहाजा उनके पक्ष में खड़ा होना सियासतदानों के लिए फायदे का ही सौदा है। हुआ भी वहीं। तमाम लोगों में अपने अमर सिंह भी शामिल थे। उन्होंने दस लाख रूपए का चेक भी शहीद के परिजनों को दिया था। ये बात अलग है कि चेक भुनाने लायक ही नहीं पाया गया। पर कहते हैं न कि सियासत समय का मिजाज देखकर रंग बदल लेती है। यहां भी वैसा ही हुआ। अपने जामिया के उप कुलपति मुशीरुल साहब ने पहले ही अपना रुख साफ कर दिया था कि वो अभियुक्तों को क़ानूनी सहायता मुहैया करवाने जा रहे हैं। संवैधानिक नज़रिए से और उनकी जिम्मेदारियों को देखते हुए इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है। पर नैतिकता के तकाजे में ऐसी तमाम बातें खड़ी होती हैं जो उनके रुख पर सवाल उठाती हैं। 

अगर कल को आरोपी दोषी साबित हो जाते हैं तो मुशीरुल साहब क्या सफाई देंगे। उससे भी अहम बात जो मुशीरुल साहब ने कही कि जामिया को बदनाम किया जा रहा है यहां कोई भी कट्टरपंथी नहीं है और मुझे अपनी उदारता और देशभक्ति का प्रमाण देने की जरूरत नहीं है। पर क्या ये सच्चाई नहीं है कि सलमान रश्दी की 

सैटनिक वर्सेज़ को लेकर उसी जामिया में तीन सालों तक उनका घुसना मुहाल किया जा चुका है। क्या करके वो दोबारा से जामिया में प्रवेश पा सके ये तो वही जानें। अपना सवाल ये है कि जब उन्हें खुद इस तरह के कट्टरपंथ का सामना करना पड़ चुका है तो फिर वो कैसे पूरे जामिया के पाक-साफ होने की जिम्मेदारी अपने माथे ले सकते हैं? आखिर उन्हें जामिया से धकियाने वाले कोई उदारपंथी, देशभक्त मुसलमान तो नहीं रहे होंगे। तो फिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि दो चार लोगो इस तरह की उल्टी सीधी गतिविधियों में लिप्त हों असमाजिकता का प्रभाव तो देश के अमूमन हर विश्वविद्यालय में ही है। इलाहाबाद से लेकर बनारस और अलीगढ़ तक छात्रों के बीच खूनी संघर्षों की एक लंबी चौड़ी दास्तान सुनाई जा सकती है। तो इसका ये मतलब तो नहीं कि हर जगह के वाइस चांसलर अपराधियों के पक्ष में खुलेआम बयान देना शुरू कर दें, उन्हें क़ानूनी संरक्षण की दुहाई देना शुरू कर दें।अपना मकसद यहां मुशीरुल साहब को ग़लत ठहराना नहीं है। हो सकता है उन्होंने काफी साफ मन से ऐसा करने का फैसला किया हो। पर ज्यादा संभावना इस बात की भी है कि शायद उन्हें जामिया में मौजूद प्रभावी कट्टरपंथी समूहों के सामने खुद के टिके रहने का आधार खोजेना ज्यादा जरूरी लगा हो। वरना शायद एक बार फिर से उनका स्पष्ट उदार रवैया उन्हें सैटनिक वर्सेज़ की हालत में पहुंचा सकता था। इसकी संभावना कहीं ज्यादा थी।
इन दिनों अमर सिंह भी खूब बोलने लगे हैं। वरना तो यूपी में माया और दिल्ली में यूपीए के आने के बाद कोई उन्हें दो के भाव नहीं पूछ रहा था। बहरहाल दलाली की महिमा अपरंपार। अमर सिंह भी सांत्वना देने वालों में शामिल थे। अब राजनीति का दोगलापन देखिए एक तरफ वो शहीद के परिजनों को दस लाख का चेक देते हैं। और बमुश्किल बीस दिन के भीतर ही एनकाउंटर को फर्जी करार देने में उन्हें कोई शर्म नही आती। अब इनसे भला बिना पेंदी का लोटा नहीं है जो पकड़े रहने पर कम से कम एक लोटा पानी तो सहेज ही सकता है। मुस्लिम वोटो की गाड़ी पर अपनी सियासत चलानें में क्या बुराई है। खूब करिए। पर शहर-गांव की राजनीति और देशव्यापी मुद्दों में भी अगर आपको हित-लाभ का अलगाव करने की तमीज नहीं है तो खुद को राजनेता कहने में खुद ही शर्म आनी चाहिए। किस मुंह से चेक दिया और फिर किस मुंह से कह रहे हैं कि शर्मा अपनी पोस्टिंग के लिए भागा-भागा फिर रहा था।
आपने भी धमाकों के आरोपियों को क़ानूनी सहायता अपने पैसे पर मुहैया करवाने का ऐलान किया है। यहां मामला मुशीरुल साहब से थोड़ा अलग है, इसलिए इसकी चीरफाड़ जरूरी है। आजतक किसी राजनीतिक पार्टी ने कम से कम देश के खिलाफ की गई किसी साजिश के आरोपियों को इस तरह से खुलेआम सहायता देने का ऐलान नहीं किया है। तो दिनों दिन पतित हो रही भारतीय राजनीति का ये एक नया चेहरा दिख रहा है। अमर सिंह का मामला इसलिए भी अलग है क्योंकि उन्होंने क़ानूनी सहायता देने का तो ऐलान कर दिया पर आरोप सिद्ध होने की सूरत में वो क्या करेंगे इसकी घोषणा भी उन्हें करनी होगी, एकतरफा चाल से कमा नहीं चलेगा। आखिर आप खुद को सार्वजनिक जीवन में होने का दावा करते हैं। तो फिर देश-समाज के हित से ऊपर अगर संगीन आरोपों के आरोपियों के हित हैं आपकी नज़र में, तो फिर आरोप साबित होने की सूरत में आपको ये ऐलान भी करना चाहिए था कि मैंने एक आतंकी का बचाव किया इसके लिए मैं शर्मिंदा हूं, सियासत से सन्यास ले रहा हूं। दोनों हाथों में लड्डू लेकर दोगलेपन की राजनीति को जनता भी समझती है। जिस वोट के लिए ये सारी कसरत कर रहे हैं उसका सच समझ में आता है जनता को। इस देश की लोकतांत्रिक परंपरा बहुत निराली है। जब एनडीए हवा में उड़ रही थी तो बिना इशारा किए जनता ने जमीन पर ला पटका था। और आपसे ज्यादा इसकी चोट भला किसे महसूस होगी जिसे साल भर पहले जनता ने यूपी में मुंह के बल दे मारा था। तो संभल के चलिए जनता हिसाब मांगेगी। कोर्ट को अपना काम करने दीजिए।
आखिर में दो लाइने, धमाकों पर धमाके, सैंकड़ों लोगों के चीथड़े, उनके परिजनों की मार्मिक चीत्कारें, बर्बादी के नज़ारे तो आपके दिलों में करुणा नहीं भर सके पर चंद आरोपियों के मानवाधिकारों के लिए आपकी सारी इंसानियत गले से टपकने को बेताब है। कोर्ट को अपना काम करने दीजिए सारा सच सामने आ जाएगा। आखिर आप भी तो न्यायालय का झंडा ही उठा रखे हैं तो फिर इतनी चिल्लाहट क्यों 
अतुल चौरसिया

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लालूजी का हिंदी अंग्रेज़ी पॉपकॉर्न

फोटो साठ??र-चेन्नई टीवीकुछ दिनों पहले जब अमिताभ बच्चन ने अपना ब्लॉग लिखना शुरू किया था तब ये ख़बर सुर्खियां बन गई थी। बाद में आमिर खान से लेकर अनुराग कश्यप तक तमाम लोगों के नाम सामने आए जो या तो ब्लॉग लिख रहे थे या हाल फिलहाल उन्होंने लिखना शुरू किया था। अमिताभ, आमिर जैसे सेलिब्रेटी सितारों के ब्लॉग लेखन की ख़बर उड़ते ही बड़ी शिद्दत से ये चर्चा भी छिड़ी थी कि क्या इन सितारों के पास लिखने के लिए फुर्सत है? मिनट-मिनट की कमाई का हिसाब लाखों में दिखाने वाले सितारों के ब्लॉग प्रेम पर चर्चा छिड़नी लाजिमी था। क्या नाम को भुनाने के लिए हर हथकंडे अपनाने वाले ये सितारे ब्लॉग का भी स्वहिताय उपयोग करेंगे? लिखेगा कोई और छापेगा कोई और नाम होगा अपना। आखिर किसको पता चलता है जैसी तमाम बातें हुई।

 

हाल ही में एक और नेता कम अभिनेता ने भी अपना ब्लॉग शुरू किया है। रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव के पॉपकार्न डॉट कॉम की चर्चा ब्लॉग जगत में है। दातून से लेकर दूध दूहने तक को मीडिया में बेचने का हुनर जानने वाले लालू के ब्लॉग पर चर्चा छिड़ना उतना ही जायज था जितना संसद में उनके द्वारा पेश किए गए रेलबजट पर जिरह जरूरी होती है। बड़ी चर्चा के बीच किसी मित्र ने बताया कि लालू का ब्लॉग तो क्या रेल शिकायत निवारण फोरम है। लोग उनके लेख से सरोकार कम रखते हैं रेल से जुड़ी अपनी शिकायतें वहां टिप्पणियों के रूप में जरूर दर्ज करवा देते हैं। बहरहाल देश के इतने बड़े नेता ने ब्लॉग शुरू किया था तो उस पर एक नज़र डालना भी जरूरी था। एक पत्रकार के नज़रिए से, एक ब्लॉगर के नज़रिए से और सबसे ऊपर एक आम नागरिक के नज़रिए से।

 

किसी वेबसाइट ने ख़बर छापी थी कि अपने ब्लॉग में लालूजी ने शाहरुख ख़ान के साथ फिल्म में काम करने की हसरत का इजहार किया है लगे हाथ वो हेमा से अपने पुराने प्रेम का इजहार करना भी नहीं भूले। उनकी दलीले भी लाजवाब हैं, जब फिलम वाले नेतागिरी में आ सकते हैं तो नेता लोग फिलम में क्यों नहीं जा सकते। यानी कि दोस्ती यारी की गंगा दोनों तरफ से बराबर बहनी चाहिए। बहुत राज कर लिया फिल्म वालों ने एकतरफा। राजनीति क्या कोई पार्ट टाइम धंधा है कि पूरी ज़िंदगी फिल्म में बिताई और बुढ़ापा सुख से काटने के लिए यहां आ गए। अब ऐसा नहीं चलेगा। लालू जी बिल्कुल तैयार हैं। फिल्मों को पार्ट टाइम धंधा बना कर छोड़ेंगे।

 

बहरहाल अपना मुद्दा कुछ और था। मैंने भी लालूजी का पॉपकॉर्न देखा। मन में वही शंका थी कि क्या लालूजी खुद इन ब्लॉग्स को लिखते होंगे। अब सीधे सीधे आरोप तो नहीं लगाया जा सकता लेकिन मन ये मानने को तैयार नहीं कि लालू ने इस तरह की भाषा में लिखा होगा। मेरी आंशंका के दृढ़ होने की वजह है। लालूजी का ब्लॉग हिंदी और अंग्रेज़ी दोनो भाषाओं में उपलब्ध है। पहले अपन ने उनकी अंग्रेजी वाला तर्जुमा पढ़ा (पता नहीं हिंदी से इंगलिश में तर्जुमा है या इंगलिश से हिंदी में)। वहीं से दिमाग में खुजली होने लगी। लालूजी की इतनी बेहतरीन इंगलिश देखकर विश्वास ही नहीं हुआ। दिमाग में तीन महीने पहले उनका लाइव इंटरव्यू घूम गया जिसे वो एनडीटीवी 24 सेवेन के मुखिया प्रनय रॉय को दे रहे थे। लालूजी की अंग्रेजी जिस अटकाव और भटकाव के दौर से गुजर रही थी उससे ये विश्वास करना मुश्किल हो गया कि ये लालूजी का ब्लॉग है। तीन महीने में इतना जबर्दस्त सुधार हजम नहीं हुआ। अपन लोग भी उसी परिवेश से आए हैं लिहाजा अनुमान लगा सकते हैं। इसके बाद दिमाग में आया कि अंग्रेजी तो छोड़ो चलो हिंदी वाली देख ली जाय। यहां मामला नागनाथ से छूटे तो सांपनाथ गले पड़ गए वाला हो गया। इतने फूहड़ अंदाज़ में हिंदी लिखी देखकर दिमाग चकरा गया। पिछला वाक्य कहां खत्म होगा और अगला कहां से शुरू होगा इसी का तारतम्य बिठाने में लेख समाप्ति की घोषणा हो गई।

 

अब हिंदी हृदय प्रदेश से आने वाले लालूजी की हिंदी इतनी खराब होगी ये बात भला किसके गले उतरेगी। कुल मिलाकर समझ में आया कि लालूजी की बोलचाला की नकल करने के चक्कर में लिखने वाले ने सारा बंटाधार कर दिया। होना उलट चाहिए था कि उनकी हिंदी अच्छी होती और अंग्रेज़ी गड़बड़। तो बात गले से उतर जाती। अगर किसी को विश्वास न हो तो नीचे लालूजी के एक लेख का हिंदी और अंग्रेज़ी तर्जुमें का लिंक दे रहा हूं ग़ौर फरमाइएगा…

 

http://www.mypopkorn.com/blogs/celebrityblog.html?blogid=MTA=&hindi=1

http://www.mypopkorn.com/blogs/celebrityblog.html?blogid=MTA=

 

अपन तो यही कहेंगे लालूजी कि लगे रहिए मगर खुद लगिए तो ज्यादा मज़ा आएगा। आख़िर आपकी मौलिक अदा के ही तो भारतीय दीवाने हैं। दूसरों के जरिए इसे कैसे बरकरार रख पाएंगे।

 

अतुल चौरसिया

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ये दुनिया का दर्द है

हॉलीवुड की मशहूर तारिका हैं शैरोन स्टोन। दुनिया भर में इनके प्रशंसक इनकी फिल्मों के दीवाने हैं। लेकिन इतनी मशहूर फनकार होते हुए भी उनसे इतनी बचकानी नासमझी की उम्मीद किसी को नहीं रही होगी। कॉन फिल्म समारोह के दौरान बातों ही बातों में शेरोन ने कह डाला, चीन में भूकंप और तबाही उसकी करनी का नतीजा हैं। उनके मुताबिक दूसरों के साथ बुरा करने वाले का हश्र भी बुरा ही होता है। शेरोन का निशाना चीन की तिब्बत नीति पर था। तिब्बतियों से उनका अनुराग तो समझ में आता है पर लाखों निरीह चीनियों के प्रति उनका संवेदनशील मन इतना कठोर कैसे हो सकता है? या फिर ये संवेदनशीलता तथाकथित है।

हॉलीवुड की चमक-दमक में चुंधियाए सेलिब्रेटीज़ का ज़मीन से दो इंच ऊपर चलना कोई बड़ी बात नहीं है। कुछ गंभीर विचार भी यहां से निकले हैं लेकिन ज्यादातर सांसारिक मामलों में हॉलीवुड की सोच सतही ही रहती है। अब चीन सत्ता प्रतिष्ठान से विरोध की बात समझी जा सकती है, नीतियों से दुराव हो सकता है, विचारधारा की कटु आलोचना मुनासिब है लेकिन प्राकृतिक आपदा के लिए नीतियां कैसे जिम्मेदार हो सकती हैं। तिब्बत में मानवाधिकारों के हनन से तो सबको सहानुभूति है। लेकिन अगर आम चीनी मर रहा है तो इससे तिब्बत खुश कैसे हो सकता है। इससे तो शेरोन जैसी सतही सोच ही खुश हो सकती है।

एक बार को अगर ये मान भी लिया जाय तो कुतर्क के कई रास्ते हो सकते हैं। क्या शेरोन कभी ये कहने की हिम्मत दिखा सकती हैं कि अमेरिकी में जब केटरीना और रीटा ने तबाही मचाई थी उसके लिए अमेरिका द्वारा इराक में किए गए कुकर्म जिम्मेदार थे। केरोलीना जब उजड़ रहा था तब उसके पीछे अमेरिकी के अफगानिस्तान, सोमालिया से लेकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में किए गए दुष्कर्म अपनी भूमिका निभा रहे थे। बहरहाल ये तो कुतर्क हैं इनका कोई अंत नहीं। पर एक छोटी समझ की आशा तो इतनी बड़ी हस्ती से की ही जा सकती है कि अमेरिकी मानवता, तिब्बति मनुष्यता या फिर चीनी इंसानियत में कोई फर्क नहीं होता। पूरी दुनिया की मानवता का एक ही दर्द है, जब प्रकृति अपना कोप बरसाती है तो वो अमेरिका-चीन में भेद नहीं करती। विरोध विचारधारा से, संस्थान से होता है व्यक्ति से नहीं।

अतुल चौरसिया

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