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अब पुल की क्या जरूरत?

अपना काम निकलते ही भगवान राम ने रामसेतु तोड़ दिया था। बनाने का मकसद माता सीता को पापी, खलकामी रावण के चंगुल से मुक्त कराना। वो महान कार्य संपन्न हुआ तो फिर पुल की क्या जरूरत। रावण को परास्त करने के बाद ज्ञानी, गुणीजनों की सभा में भगवान राम को एक सुर से शायद यही राय दी गई थी। माता सीता को वापस पाने के बाद भालुनरेश, वानरराज और तमाम विद्वानों की सभा में अयोध्या वापसी का महत्वपूर्ण मुद्दा किनारे करके पहले पुल पर बहसी बहसा शुरू हो गई थी और अंतत: निष्कर्ष ये निकला कि पुल को तोड़ दिया जाय और ये शुभ कार्य भगवान श्रीराम स्वयं अपने हाथों अंजाम दें।

वैसे भी राक्षसों की धरती का पवित्र आर्यावर्त की माटी से जुड़ना भविष्य के लिहाज से कोई अच्छी बात नहीं हैं। सतयुग का काल था। सब के सब दूरदर्शी हो लिए थे। सभा के गुणीजनों का एक मत से फैसला था राक्षसों की धरती लंका अगर सूर्यवंश की धरती से जुड़ा रहा तो भविष्य में आर्य कन्याओं पर हमेशा खतरा बना रहेगा। इन राक्षसों का क्या भरोसा। उनका कोई ईमान धर्म तो है नहीं, बार बार हमारी पावनी कन्याओं को ही उड़ा ले जाएंगे। कौन बार बार इनसे लड़ाई लड़ेगा। इतनी दूर कौन आएगा? इसलिए पुल तोड़ना ज्यादा बेहतर रहेगा।

रही बात पुष्पक विमान की तो इसे भगवान श्री राम चंद्र अपने साथ अयोध्या लेकर चले जाएंगे। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। कोई राक्षस लाख चाहकर भी पाताल लोक से इधर नहीं आ पाएगा। मुसीबत आने की तीसरी राह जलमार्ग हो सकती है पर भारतीय उपमहाद्वीप में इसकी संभावना नगण्य है क्योंकि हिदू शास्त्रों के मुताबिक सागर की यात्रा महापाप है। जिसको धर्म, करम, ईमान से जाना हो वो समुद्र में उतरेऐसी मान्यता है। सागर यात्रा के नाम पर बस थोड़ी सी छूट है गंगा सागर यात्रा की वो भी बस एक बारसारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार।

तो इस तरह से तमाम मुसीबतें हल हो जाएंगी किसी तरह की विदेश नीति का संकट भी नहीं खड़ा होगा। तो कुल मिला कर निष्कर्ष यही निकला कि पुल का मकसद पूर्ण हुआ, अब अगर ये रहेगा तो भविष्य में, कलियुग में दोनों देशों के बीच मुसीबत ही पैदा करेगा। तब इतने शुद्ध समझदार लोग तो होंगे नहीं। लिहाजा सभा ने ध्वनिमत से फैसला दिया कि पुल को भगवान श्रीराम के कर कमलों से तोड़ दिया जाए।

पर जाने कहां भगवान से भी चूक हो गई। पुल तोड़ने की बात कम्बन रामायण, स्कंद पुराण में दी गई पर पुल का अस्तित्व फिर भी कायम है।

ये सारी बातें कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर भगवान राम के आस्तित्व को नकार चुकी यूपीए सरकार ने एक नए शपथपत्र में कही है। इसलिए अगर उपरोक्त किसी बात से आपको आपत्ति हो तो बरास्ता सर्वोच्च न्यायलय आप सरकार से पूछताछ कर सकते हैं। अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं है। आपकी सुविधा के लिए सूचना के अधिकार का क़ानून भी है।

अतुल चौरसिया

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कबूतर महंगा पड़ जाएगा…

सबेरे-सबेरे ही मुहल्ले में फिर से कोहराम मचा हुआ था। आज फिर समय से पहले ही कच्ची नींद से उठना पड़ा था। बगल के कमरे में सोई हुई गांव की दादी ने पूछ ही लिया देखो तो बाहर क्या गड़बड़ हो गई। बहुत देर से हो-हल्ला मचा हुआ है। दादी को छोड़ घर में सबको बाहर चल रही नौटंकी की पटकथा का अंदाज़ा था। बाहर से आ रही आवाज़ें भी जानी पहचानी थी। चमेली चाची पानी पी-पी कर पड़ोसी चतुरी चाचा को कोस रही थी। और चतुरी चाचा भी चाची के हर वार का जबर्दस्त प्रतिकार कर रहे थे। फिल्म के क्लाइमेक्स की तरह जब मामला अंत की ओर बढ़ने लगा, हिंदी फिल्मों की तर्ज पर दोनों पक्ष की आवाज़ें निर्धारित सीमा को पार करने लगी, बैकग्राउंड संगीत अपने चरम को पहुंचने लगा तब एक समझदार जिम्मेदार पड़ोसी के नाते बाहर जाना जरूरी लगने लगा।

 

माजरा काफी कुछ जाना समझा था। बस इस बार तरीका कुछ बदल गया था इसलिए लड़ाई का ये नया एपीसोड शुरू हुआ था। चमेली चाची और चतुरी चाचा की लड़ाई की पृष्ठभूमि बहुत पुरानी है और काफी हद तक ये मुंहजुबानी पैंतरेबाजी तक ही सीमित रहती है। चाची की पोती और चाचा का सबसे छोटे बेटे का प्यार मुहब्बत का रिश्ता है। पर पुराने विचारों की चाची को ये प्यार-व्यार का तरीका बिल्कुल पसंद नहीं। पहले वो चतुरी चाचा के दूध वाले को गरियाती फिरती थी। पूछने पर कहती कि मरजाद चतुरी चाचा का दूध उनके दरवाजे अड़ा जाता है हर रोज। मुहल्ले वालों से पूछा तो बात कुछ और ही निकली। दरअसल मरजाद दूधवाला प्रेमी जोड़े के बीच संदेशवाहक का काम करता था। चाची ने दूध वाले को रंगेहाथ पकड़ लिया था। पर लोकलाज के डर से उसे दूध अड़ाने के बहाने गरियाती रहती थी। बाद के दिनों में चाचा के छोटे लड़के ने अख़बार वाले को संदेशवाहक बना लिया था। पटा पटी के इस दौर में कुछ दिन शांति रही फिर ये भेद भी सामने आ गया और एक बार फिर से चमेली चाची और चतुरी चाचा आमने-सामने आ हो गए थे।

 

बहरहाल ताज़ा वाकए का मजमून भी काफी कुछ सबको पता था। पर फिर भी एक बार बात को करीने से समझने की गरज से पड़ोसियों से मगजमारी करने लगा। इस बार चाची मोबाइल फोन की थुक्का फजीहत कर रही थी। नाश हो इस मोबाइल का… इसीलिए दिलाया था… मुहल्ले में औरतों लड़कियों की इज्जत तो जैसे नीलाम हो गई है… आदि आदि…।

 

 

चाची हाथ में पांच छह सिमकार्ड लिए सबको दिखा-दिखा कर चतुरी चाचा पर लांछन लगा रही थी। और चाचा उनके हर वार को अपने तर्कास्त्र से ध्वस्त करने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे।

चाचा और सिम के इस रिश्ते का मजमून समझने में कुछ वक्त लग गया। चमेली चाची को घर की छत से, घर में इधर-उधर से ये सिम कार्ड पिछले हफ्ते-पंद्रह दिनों में मिले थे। बकौल चाची ये सिमकार्ड चाचा के कुलदीपक ने उनकी पोती को सप्रेम उपहार दिए है। और इस बात को लेकर ये सारा हंगामा बरपा है सुबह-सुबह।

 

 

एयरटेल की पचास रूपए के सिमकार्ड में 150 रूपए के टाक टाइम वाली स्कीम ने प्रेमी जोड़े को आपस में जुड़ने का बढ़िया और ज्यादा कारगर तरीका सुझा दिया था। पचास के सिम कार्ड पर डेढ़ सौ की बात और फिर नया सिमकार्ड। चमेली चाची उस दिन को कोसते हुए घर के अंदर चली गई जब उन्होंने पोती के हाथ में मोबाइल देखा था। जाते जाते फुसफुसाती रहीअब मैं जानू शहर भर के छोरे-छोरियां मोबाइल कान में क्यूं सटाए घूमते हैं। उस दिन तो बड़े मजे से गांव में रिश्तेदारों से बात की थी। आज इस अधम मोबाइल के हाथों सब लुटता दिख रहा है चाची को।

 

प्यार की नई गुटरगूं को विज्ञापन दर विज्ञापन मोबाइल वाले बढ़ावा देने पर उतारू हैं। एयरटेल ने प्यार की शुरुआत से बरास्ता शादी होते हुए पहले बच्चे तक का सफर तय कर लिया है बॉलीवुड के सुंदर सितारों माधवन और विद्या बालन के जरिए। विरोधी रिलायंस ने भी प्रेमी को ‘लायर’ कहती प्रेमिका का विज्ञापन बड़े करीने से पेश किया है। अब चमेली चाची को कौन बताए दिन भर में डेढ़ सौ चैनलों पर डेढ़ हज़ार बार दिखने वाले ये विज्ञापन छोरे-छोरियों को दिमाग में इस क़दर घुस गए है कि चाची की नेक नियामतें इन्हें समझ ही नहीं आती।

 

कबूतर महंगा पड़ जाएगा वाला बयान इनके दिलोदिमाग पर हावी है इसलिए कबूतर से पीछा छुड़ाकर गांवशहर का नया खून सिम-सिम मुहब्बत का पहाड़ा पढ़ रहा है। कागज काले करने की दिन भी बीत गए अब…

   

अतुल चौरसिया   

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