Monthly Archives: फ़रवरी 2009

पिंक चड्ढी अभियान और महिलाओं की पहली जीत

sriramsena1विरोध का का अनोखा तरीका अपनाने वाली महिलाओं की कोशिश रंग लाई है. पिंक चड्ढी अभियान के जरिए प्रमोद मुतालिक और उनकी श्रीराम सेना का विरोघ करने की मुहिम रंग लाई. ख़बर है कि देश भर की महिलाओं और पुरुषों की तरफ से मिल रही चड्ढियों आजिज आकर और अगले एक-दो दिन में मिलने वाली चड्ढियों की मार से बचने के लिए प्रमोद मुतालिक ने अपने ऑफिस का पता बदल दिया है। अब वो अपने पुराने पते वाले कार्यालय को बंद कर रहे हैं. पर अभियान की सदस्य निशा सूज़न के मुताबिक लोग अपनी चड्ढियां उनके ब्लॉग पर दिए गए पतों, फोन नंबरो और चड्ढी कलेक्शन सेंटर पर जमा कर सकते हैं. यहां से उनके विरोध की प्रतीक चड्ढियां प्रमोद मुतालिक को भेज दी जाएंगी. विरोध के इस गांधीवादी तरीके ने छोटी ही सही पर पहली कामयाबी तो हासिल कर ही ली है. और मुतालिक का डर ये साबित कर रहा है कि उन्हें भी कहीं न कहीं इस बात का अहसास हो गया है कि वो बहुमत की नुमाइंदगी नहीं करते हैं.

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सुरेश चिपलूनकर की पिंक चड्डी से चिढ़न और जवाब

सुरेशजी आपने निशा के अभियान के चपेटे में तहलका को भी ले लिया है. इसलिए तहलका का एक पत्रकार होने के नाते आपकी कुछ बातों का जवाब देना बहुत जरूरी हो जाता है.
आपने तहलका का जिक्र किया है और लगे हाथ उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं. सिर्फ इस आधार पर कि निशा ने तहलका का पता दिया है. निशा तहलका की पत्रकार हैं और एक पता देने की जरूरत ने ऐसा करवाया. इसके अतिरिक्त तहलका का इस अभियान से किसी तरह का वास्ता नहीं है. और जिस तहलका की विश्वसनीयता को आप संदेहास्पद मानते हैं उसे आप जैसे किसी व्यक्ति के प्रमाण की दरकार नहीं हैं. आज तक तहलका ने जो किया है उसकी सत्यता पर किसी तरह की उंगली नहीं उठी है, देश के सर्वोच्च न्यायालय ने तहलका को प्रमाण दिया है. देश के करोड़ो लोग तहलका पर विश्वास करते हैं. लिहाजा अपना संदेह अपने पास रखें.
– रही बात एक एक मामले में निशा की हिस्सेदारी की तो आपको पता होना चाहिए कि देश में लाखों की संख्या में पत्रकार हैं और संभव नहीं कि हर विवाद में हर पत्रकार शिरकत करे ही करे. और तहलका को आपने खींचा है तो आपको पता होना चाहिए कि अकेले तहलका ने स्कारलेट बलात्कार-हत्याकांड को अपनी कवर स्टोरी बनाया है (29 मार्च 2008 अंक, गोइंग गोइंग गोवा)
– आपने पूछा है कि पिंक चड्डी भेजने से महिलाओं को नैतिक बल मिलेगा. अगर अबला, असहाय स्त्री को सरेआम पीटने से संस्कृति की रक्षा होती है तो पिंक चड्डी भेजने से नैतिक बल क्यों नहीं मिल सकता?
– दिल्ली की पत्रकार के बलात्कार की कितनी जानकारी निशा को है इसकी जानकारी तो आपको उनसे बात करके ही पता चलेगी. हो सकता है उनकी जानकारी आपको बगले झांकने पर मजबूर कर दे.
– तस्लीमा नसरीन के जरिए तहलका को घेरने की कोशिश भी की है आपने. आपकी जानकारी पर तरस आता है अकेले तहलका ऐसा संस्थान है जिसने दो-दो कवर स्टोरी तस्लीमा को देश से निकाले जाने के बाद की थी. इसके अलावा छोटी-मोटी खबरों की गिनती नहीं है. मुसलमानों को गरियाने वाली तस्लीमा की फिक्र है आपको पर एमएफ हुसैन की परवाह नहीं. ये दोगलापन क्यों?
आखिरी एक लाइन में श्रीराम सेना से अपना गला छुड़ा कर पोलिटिकली करेक्ट होना भी दोगलेपन की निशानी है. हिंदी में कहावत है गुण खाओ और गुलगुले से परहेज. इस भड़ास की वजह सिर्फ ये है कि आपने बिना जाच-पड़ताल किए जबरिया एक व्यक्तिगत अभियान में तहलका को घसीट लिया हैं. कोई और शंका हो तो संपर्क कर सकते हैं.
दो बातें और साफ कर दूं. शायद निशा के अभियान को आप ठीक से समझ नहीं सके हैं. उसने पहले ही साफ कर दिया था कि वैलेंटाइन डे से उसका कोई लेना-देना नहीं है, न ही वो उसकी समर्थक या बैरी है. उसका विरोध सिर्फ श्रीराम सेना के तरीके, उनकी स्वयंभू ठेकेदारी, दूसरों की व्यक्तिगत आजादी का फैसला कोई तीसरा करे जैसे कुछ बेहद मूल मसलों से है.

एक बेहद मौजू सवाल है कभी शांति से दो मिनट मिले तो विचार कीजिएगा. यदि अपकी पुत्री, पत्नी या बहन भरे बाजार इन मतिहीनों का शिकार हो जाने के बाद भी आपकी प्रतिक्रिया क्या यही रहेगी? किसी को भी किसी महिला से ज्यादती करने का अधिकार सिर्फ संस्कृति रक्षा के आडंबर तले दिया जा सकता है क्या?  उत्तर शायद नकारात्मक आए.

अतुल चौरसिया

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पिंक चड्ढी अभियान से जुड़े-बदलाव की शुरुआत करें

sriramsenaअगर हर दिन की लट्ठमार से ऊबे हुए हैं, जबर्दस्ती थोपे जा रहे संस्कारों से घुटन महसूस कर रहे हैं, कानून की परवाह न करने वालों से परेशान हैं, अपनी मनमानी करके खुद को सबका भाग्यविधाता समझने वालों से परेशान हैं, स्त्री को माता का दर्जा देने वाले उन्हें सरेआम पीटते हैं, अगर इससे परेशान हैं, गुंडई को अपना पौरुष समझने वालों की नादानी से पीड़ित हैं, तालिबानीकरण के दुष्प्रभावों से चिंतित हैं, मध्यकालीन पुरापाषाण काल में देश को धकेलने पर उतारू लोगों से त्रस्त हैं, दूसरों की आजादी का सम्मान न करने वालों से परेशान हैं, तो फिर एक आम हिंदुस्तानी के अभियान से जुड़िए और एक ऐसा आंदोलन खड़ा कीजिए कि ऐसा करने वाला दोबारा ऐसा करने की शर्मनाक जुर्रत ही न कर सके. अपना आंदोलन खड़ा कीजिए, निशा के अभियान में एक और हाथ जोड़िए. शायद नए भारत की शुरुआत यहीं से हो. पिंक चड्ढी अभियान इसी तरह कई अर्थों में अनोखा है. अभियान से जुड़ने संबंधी सारी जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें या पते पर भेजें.

http://www.thepinkchaddicampaign.blogspot.com/

Pramod Muthali,
Sri Rama Sene Office # 11, Behind new bus stand,
Gokhul road, Lakshmi park, Hubli – Karnataka

Contact persons:
Nithin (9886081269)
Nisha ( 9811893733)

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मुंबई टू मैंगलोर वाया अपनी अपनी सुविधा से

पहले मुंबई में राज समर्थकों की गुंडई पर जमकर सियासत हुई, अब मैंगलोर में वही कहानी दोहराई जा रही है. कांग्रेस जमकर हल्ला बोल रही है कि मुतालिक के रिश्ते भाजपा से हैं, उसे कर्नाटक की भाजपा सरकार का संरक्षण प्राप्त है. ये काफी कुछ मुंबई में मनसे के गुंडो द्वारा की गई गुंडई के रिप्ले जैसा ही है, बस मंगलोर में करने वाले मुंबई में कांग्रेस सरकार पर हमलावर मुद्रा में थे तो मुंबई में करने वाले मंगलोर में हमलावर बन गए हैं. मनसे की खुलेआम-बेलगाम गुंडई पर मूकदर्शक बने पुलिस और प्रशासन की भूमिका से ये बात समझते देर न लगी कि सत्तासीन कांग्रेस सरकार मनसे को शह देकर शिवसेना-भाजपा गठबंधन की गांठ में दरार डालना चाहती थी. ले देकर उसे इस बात का पूरा यकीन था कि मनसे वोटो का जितना काटापीटी करेगी वो शिवसेना-भाजपा के पाले से ही आएगा. और हर्र लगे न फिटकरी कांग्रेस की तूती महाराष्ट्र में बोलती रहेगी.
अब काफी कुछ ऐसा ही मंगलोर हादसे के बाद देखने को मिल रहा है. बस यहां पर मुंबई में कांग्रेस को घेरने वाली शिवसेना-बीजेपी यहां बचाव की मुद्रा में है तो मुंबई में रक्षात्मक रही कांग्रेस यहां हमलावर बन गई है. पर कुल मिलाकर निष्कर्ष यही है कि विचारधारा कोई भी हो राजनीति का रंग एक लगे है, इसका ढंग एक लगे है इसकी मोटी चमड़ी पर जल्दी शिकन-सिलवटें नहीं पड़ती.
टाइम्स नाउ पर कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी चिल्ला-चिल्ला कर लोकतांत्रिक मूल्यों के हनन की दलील दे रहे थे पर मुंबई की बात पर वो बेहयाई की हद तक बात को गोल मोल कर देते है. काफी कुछ ऐसा ही स्मिता ईरानी भाजपाई कुनबे की ओर से कर रही थी. पर पुरानी और सौ फीसदी खरी बात है- किसी के पास जितना कम सच होता है वो उतना ही ज्यादा हल्ला मचाता है.

दरअसल समस्या हमारी उस जड़ से जुड़ी है जिसे हमने किसी दौर में अपनी अस्मिता, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम के नाम पर दबे-छुपे ही गर्व के साथ स्वीकार किया था. 80-90 के दशक में जब पाकिस्तान के विरोध के नाम पर शिवसेना के गुंडे वानखेड़े से लेकर फिरोजशाह कोटला तक की पिचें खोद रहे थे तब हमने अंदर ही अंदर तहेदिल से इसका स्वागत किया था. कहीं न कहीं शिवसेना की ये फासीवादी हरकतें हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान की प्रतीक सी बन गई थी. वो हमारे दबे मनोभावों का प्रतिनिधित्व कर रही थीं. और उस अंध आवेग में हमने देश में पड़ रही एक विकृत परंपरा की विषबेल की अनदेखी ही नहीं की बल्कि उसे पनपाने में भी पूरी मदद की. लोकतांत्रिक देश में लाठी के जोर पर अपनी मनमानी करवाने की उस शुरुआती चरण को हमने पूरा समर्थन दिया, कहीं से भी सरकारों ने उसे ग़ैरकानूनी मानकर कार्रवाई की जहमत नहीं उठाई. ऐसा इसलिए भी था क्योंकि फासीवाद का ये चेहरा राष्ट्रवाद के मुखौटे में छिपकर हमसे रूबरू हो रहा था. दूसरे उसका निशाना हमारे मानस गहरे तक बैठ चुका स्थाई दुश्मन पाकिस्तान था इसलिए भी शायद दबे-छुपे ही सही सबने उसका स्वागत किया था. 1965 औऱ 71 के दौर की यादें अभी पूरी तरह से ओझल नहीं हुई थी, मन में कड़वाहट लिए ये पीढ़ी उस दौर की गुंडई पर मन ही मन मुस्करा रही थी. किसी ने भी अंदर ही अंदर फैलते उस भस्मासुर पर नजर नहीं डाली जो आज पूरी हिंदुस्तानी व्यवस्था का सर्वनाश करने पर उतारू है. गांधी के देश में लाठी के जोर से सबकुछ हासिल कर लेने की जो विनाशक लहर चल रही है इसका खामियाजा गृहयुद्ध से लेकर देश के एक और बंटवारे तक कुछ भी हो सकता है.हर पैमाने पर हम पीछे की ओर बढ़ रहे हैं. मध्ययुगीन परंपराओं के प्रति हिंदुस्तानियों का प्रेम बढ़ता जा रहा है. भारत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सहिष्णुता खत्म होती जा रही है. महिला पूजनीय होती है पर सरेआम उसकी पिटाई करने में हमें कतई शर्म नहीं आती है. माता स्वरूपा को निर्वस्त्र करने में 30-40 लफंगों का समूह बड़ी शान समझता है. और सत्ता के ऊपरी पायदान पर विराजमान लोग वहीं से इन मोहरों को मौन सहमति देते रहते हैं. अपने घर के भीतर जिनकी नहीं चलती वो लोग पूरे समाज को अपने इशारों पर चलाने की हवा-हवाई कल्पनाएं पाले जंगलराज फैला रहे हैं. समाज के सबसे बड़े हितैषी बनने का दावा कर रहे ये लोग एक बार अपने घरों में भी पूछ लें कि उनके इस कुकर्म से किस हद तक उनकी माताएं-बहने सहमत हैं. पर ऐसा नहीं होगा क्योंकि फासीवाद तर्क-वितर्क में विश्वास नहीं करता. उसे सिर्फ बंदूक की भाषा आती है उसी पर विश्वास करता है. एक औऱ तालिबान हिंदुस्तान में भी तेजी से पैर पसार रहा है कहना बहुत छोटी बात होगी.

विडंबना की बात है जिस देश ने अभी-अभी 26/11 देखा है, जिसके सामने विदेश से आयातित कट्टरपंथी आतंकवाद एक विकराल समस्या बन गया है वो खुद ही उन्हीं कट्टरपंथियों की राह पर चल रहा है, गाहे-बगाहे उन्हीं की भाषा बोल रहा है. जिन्हें 26 नवंबर को हम एक सुर से गरियाते फिरते हैं अगले दिन उन्हीं की राह अपनाने में हमें कोई शर्म नहीं आती है. एक बात और जो मन को बार-बार झिंझोड़ती है- पिताजी बचपन में सिखाते थे पढ़ लिख लो वरना कसाई टोले वालों की तरह मोटर मैकेनिक बन कर रह जाओगे. थोड़ा और बड़े हुए थे तो पिताजी समझाते थे पढ़ोगे लिखोगे नहीं तो क्या कश्मीर-पंजाब वालों की तरह हथियार लेकर लोगों की हत्या करोगे. बाद में जब घर से बाहर निकले तो पिताजी परेशान हो गए ये क्या हो रहा है पड़ोस में तालिबान का उदय हो रहा है. ये लोग औरतों महलाओं को पढ़ने-लिखने तक नहीं देते, उन्हें बाहर तक नहीं निकलने देते. पिताजी के विचार चाहे जो रहे हों, भले ही किसी तरह का भेदभाव रहा हो, भले ही किसी विशेष वर्ग के लिए कुंठा रही हो पर एक बात तो साफ थी ही कि उन्हें इस बात पर गर्व था कि इस देश का बहुसंख्यक समझदार, पढ़ा लिखा होता है, जाहिल नहीं होता. हमें इसी बात पर गर्व होता है कि हिंदुस्तानी कूप-मंडूक नहीं है. तालिबानियों की तरह हम किसी पर जंगली कानून नहीं थोपते, सभ्य समाज की भूमिका पर विश्वास करते हैं. पर क्या आज ये बातें किसी लिहाज से सच लगती हैं?
अतुल चौरसिया

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