हाथ बांधकर नदी पार करने की कवायद

साल

की शुरुआत है पर देश में इसके स्वागत की कुछ ज्यादा उत्सुकता नजर नहीं रही. वजह भी बड़ी जायज है मुंबई में हुए बर्बर आतंकवादी हमले ने पूरे देश को एक सामूहिक नैराश्य की वजह दी है. और इसी गाढे़ वक्त में मीडिया के समक्ष विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के समक्ष एक और विकट चुनौती पेश गई है. सरकार ने मुंबई हमलों के प्रसारण में मीडिया द्वारा बरती गई तथाकथित लापरवाही से निपटने के लिए नियम कानूनों का हंटर चलाने की घोषणा कर दी. चहुओर हल्ला मच गया. आखिर ऐसा क्या कर दिया मीडिया ने जिसे लेकर सरकार इतनी बेरुखाई पर उतारू हो गई?

 

यद्दपि
अपने ही बीच के कुछ लोगों की भुताई ओझाई और नागनागिन नर्तन ने भारत के वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की समझ उसकी तथ्यपरकता, उसकी स्थिरचित्तता पर कई सवाल भी खड़े किए हैं. पर 8-9 वर्षों की शैशवावस्था को ध्यान में रखते हुए इसमें कुछ ढिलाई की उम्मीद तो मीडिया कर ही सकता है. वैसे भी कुछेक लोगों से अनजाने में हुई भूल के आधार पर पूरे मीडिया के अनगिनत बड़े कार्यों को कोई सरकार, सत्ता कैसे नजरअंदाज कर सकती है. आखिर मीडिया पर एक बार लगाम लगाने के बाद उन लोगों पर निगाह कौन रखेगा जो जो अपने घृणित कारनामों की वजह से आए दिन बेशर्मी की इबारतें लिखते रहते हैं. और फिर एक बार को अगर इन कानूनों को वाजिब मान लिया भी जाए तो इसको लागू करने का अधिकार किसके हाथों में होगा. कौन होगा नैतिकता का लंबरदार जिसे पूरे देश की कार्यपालिका, विधायिका, कार्यपालिका के साथ-साथ अम जनता का भी विश्वास हासिल हो. लालू यादव, मुलायम सिंह या फिर मायावती जैसे नेता जिनकी अपनी विश्वसनीयता ही हमेशा निम्नतम धरातल पर पड़ी रसातल को जाने को तत्पर रहती है. कोई चारा घोटाले में जेल जा चुका है तो कोई राजनीतिक दुश्मनी साधने के लिए दूसरी पार्टी के विधायक को देशद्रोह के लिए बने कानून पोटा के तहत गिरफ्तार कर चुकीं हैं या फिर जिनके परिवार की अथाह संपत्ति का अंदाजा लगाने में देश की सर्वोच्च जांच संस्था सीबीआई को भी पसीने गए हैं. वो फिर वो लोग जो अपने घरों में 10,000 साड़ियों और 3000 चप्पलों का जखीरा लगा कर रखते हैं.

 

 

कदम
कदम पर ओछी हरकतों से लोकतंत्र को शर्मसार करने वाले नेता ही अगर मीडिया को हांकेंगे तो लोकतंत्र का क्या होगा. कभी सीनेमावालियों से अश्लील बातचीत की सीडी को लेकर तो कभी संसद भवन में करोड़ो रूपए का लेनदेन करने वाले ही सबसे ज्यादा मीडिया पर अंकुथ की बात करते हैं, उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं. अजीब विडंबना है कि अपने दामन में झांकने की कभी कोशिश करने वाले काफी हद तक स्वच्छ, जिम्मेदार और लोकतंत्र के अहम स्तंभ को पाठ पढ़ाने की जुर्रत करने से बाज नहीं आते.

 

विचारधारा
चाहे कोई भी हो सत्ता का चरित्र एक जैसा ही होता है चाहे गुजरात हो, 1984 के सिख विरोधी दंगे हों या फिर हाल के सिंगूर और नंदाग्राम. लेकिन ये अलगअलग विचारधाराएं भी मीडिया पर कोड़ा बरसाने की बात से गाहेबगाहें मूक सहमति जताती चली रही थी. हालांकि इस बार वाम और दक्षिणपंथियों ने सरकारी सुर से सुर मिलाने से परहेज किया है पर कब तक इसका भरोसा किसी को नही हैं.

 

अक्सर
सत्ताधारी मीडिया के बीच प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक की दीवार खींचने की भी सतही-उथली कोशिशें करते नजर आए. मसलन इसी बार के एजेंडे में देख लीजिए, उनका साफ कहना है कि हम इस रेगुलेशन से प्रिंट मीडिया को बाहर रखना चाहते हैं. तो क्या प्रिंट मीडिया अपने ही सहोदर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर थोपे जा रहे एक अनैतिक बंधन को आंख बंद करके स्वीकार कर ले? मसला किसी के ऊपर थोपे जा रहे प्रतिबंधों से परे सही और गलत के बीच अंतर करने का है. और अगर एक बार इस तरह की कोई परंपरा पड़ जाती है तो इसका अंत क्या होगा? कल को जब सत्ताधारी इसकी आड़ में प्रिंट मीडिया पर इसी तरह के बंधन थोपने की कोशिश करेगा तब किस मुंह से प्रिंट वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से सहायता मांगेगें और क्योंकर वो प्रिंट वालों की सहायता करेंगे?

 

इस
लिहाज से तो इस बंधन को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता. वैसे भी मीडिया ने चाहे वो प्रिंट हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक सबने अपने नियम कायदे बनाएं है और अपने लिए एक आचार संहिता स्वयं ही खींची है. प्रधानमंत्री का प्रस्ताविक नियामक कानून पर रोक लगाने का फैसला न्यायोचित से भी ज्यादा उचित कहा जा सकता है. और उन्हें इस मजमून को कूड़े के ढेर में फेंकना होगा, लेकिन लगे हाथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी अपनी शैशवावस्था से किशोरवास्था की ओर कदम बढ़ाने का अहसास सरकार, समाज सबको करवाना होगा.

 

अतुल
चौरसिया 
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