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वही परम पद पाएगा

2006091606061201बीजेपी ये दिखाने की कोशिश में काफी शांत है कि कल्याण के जाने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा है. सियासत की अपनी मजबूरियां हैं. कल्याण को भी इस बात का अहसास है. पहले भी एक बार पार्टी से नाता तोड़ कर अपनी दिग्गजई की अंदाजा लगा चुके हैं. पर बाद में लौट के उसी कुनबे में आए थे. अब एक बार फिर से वही राग छेड़ा है. दोनों की अपनी अपनी मजबूरियां हैं पर कल्याण भी ज्यादा लंबे पैंतरे न चल कर कहीं न कहीं मैान मनौव्वल की संभावना को जिंदा रखे हुए हैं. मसलन वो न तो किसी पार्टी में जाएंगे न ही कोई पार्टी बनाएंगे. अपनी जिद पर अड़कर अपनी खास सहयोगी कुसुम राय को राज्यसाभा भेज चुके हैं खुद भी एटा से लोकसभा का टिकट झोली में डाल चुके थे. पर पुत्रमोह ने सरा टंटा खड़ा कर दिया. अशोक प्रधान को बुलंदशहर की सीट देना उन्हें नागवार गुजरा. अब कल के आदमी को अपने सामने तवज्जो देते देखकर कल्याण बर्दाश्त भी तो नहीं कर सकते थे.
हालांकि जो मामला ऊपर से पुत्रमोह लगता है अंदर से बात कहीं ज्यादा गहरी है. दरअसल हिंदुस्तानी लोकतंत्र के साथ ही पार्टी में भी अपनी हैसियत अपने समर्थक विधायको सांसदों की संख्या तय करती है. इस लिहाज से एक समय उत्तर प्रदेश भाजपा की तकदीर का मालिक रह चुका 76 वर्षीय नेता आज पार्टी के भीतर अपनी जमीन तलाश रहा था. पर मंदिर आंदोलन का सारा पानी कब का बह चुका है. उनके सामने सियासत में कूदे राजनाथ आज पार्टी के अध्यक्ष हैं. तो फिर चारा क्या था? अंदर ही अंदर दबाव बना रहे थे. पर पार्टी ने भी इस दफा ज्यादा न झुकने का मन लगता है बना लिया है.
हालांकि कल्याण फिलहाल राज्य में कोई बड़ी ताकत भले ही न हों मगर एक इलाके में अभी भी वो काफी अंतर पैदा कर सकते हैं. यानी बचपन में बच्चों के बीच होने वाली लड़ाई ‘न खेलूंगा न खेलने दूंगा पर खेल बिगाड़ुंगा’ की भूमिका कल्याण बखूबी निभा सकते हैं. ये चिंता बीजेपी को अंदर ही अंदर परेशान कर रही होगी भले ही ऊपर से वो इसे दिखा न रहे हों. अजित सिंह की आरएलडी से समझौता करके पार्टी इस नुकसान की भरपाई की कोशिश कर सकती है. पर इस राह में भी रोड़े तमाम हैं. मसलन अजित सिंह की अपनी विश्वसनीयता का पैमाना बेहद निचले पायदान पर है और कल्याण की नाराजगी की एक वजह ये अवसरवादी गठबंधन भी माना जा रहा है.
भाजपा द्वारा कल्याण को नजरअंदाज करने की एक वजह और भी ज्यादा स्पष्ट है, पार्टी की हालत प्रदेश में पहले से ही खस्ताहाल है. पिछले लोकसभा चुनाव में उसे मात्र 10 सीटें मिली थी. इस लिहाज भाजपा की स्थित उत्तर प्रदेश में कम से कम ऐसी हो गई है कि उसके पास खोने को कुछ ज्यादा है नहीं. इसलिए किसी लंगड़े घोड़े की मान-मनौव्वल में अपनी ऊर्जा बर्बाद करने की बजाए आरएलडी टाइप खच्चरों को पटाना भाजपा को ज्यादा फायदेमंद लग रहा होगा.
कल्याण सिंह ने किसी पार्टी में न जाने का या फिर कोई पार्टी न बनाने का फैसला करके कहीं न कहीं अपनी इज्जत भी खुद ही बचाई है. इसकी एक वजह तो उनका पिछला अनुभव है जो हर लिहाज से उन्हें मंहगा पड़ चुका है हालांकि वो उतना ही महंगा भाजपा को भी पड़ा था. प्रदेश में भाजपा और कल्याण की राजनीतिक हैसियत का अंदाजा होने की वजह से मुलायम सिंह ने भी 2000 की तरह एकदम से कल्याण सिंह को गले लगाने की भूल नहीं की है. दूसरे जिस तरह से कल्याण ने उन्हें बीच मंझधार में छोड़ कर दोबारा से भाजपा का दामन थामा था उस दर्द की कसक भी कहीं न कहीं मुलायम को रही होगी. पर कहते हैं न कि सियासत में दोस्ती या दुश्मनी स्थाई नहीं होती. तो मुलायम ने भी थोड़ा सा चारा तो फेंका ही है ताकि भविष्य के लिए सारे दरवाजे एकसाथ बंद न हो जाए. उन्होंने कल्याण के पुत्र राजवीर को लोकसभा टिकट इच्छा के आधार पर देने की घोषणा कर दी है.
एक बार फिर से लोकसभा की नई पारी की संभावना में संसद के पिछवाड़े सियासती पहलवानों की आपसी गुत्थम-गुत्था तेज हो गई है. आखिर जो जितनी ज्यादा मजबूती से आज ताल ठोंक लेगा वहीं अगले पांच सालों तक परम पद पाएगा.
आतुल चौरसिया

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हाथ बांधकर नदी पार करने की कवायद

साल

की शुरुआत है पर देश में इसके स्वागत की कुछ ज्यादा उत्सुकता नजर नहीं रही. वजह भी बड़ी जायज है मुंबई में हुए बर्बर आतंकवादी हमले ने पूरे देश को एक सामूहिक नैराश्य की वजह दी है. और इसी गाढे़ वक्त में मीडिया के समक्ष विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के समक्ष एक और विकट चुनौती पेश गई है. सरकार ने मुंबई हमलों के प्रसारण में मीडिया द्वारा बरती गई तथाकथित लापरवाही से निपटने के लिए नियम कानूनों का हंटर चलाने की घोषणा कर दी. चहुओर हल्ला मच गया. आखिर ऐसा क्या कर दिया मीडिया ने जिसे लेकर सरकार इतनी बेरुखाई पर उतारू हो गई?

 

यद्दपि
अपने ही बीच के कुछ लोगों की भुताई ओझाई और नागनागिन नर्तन ने भारत के वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की समझ उसकी तथ्यपरकता, उसकी स्थिरचित्तता पर कई सवाल भी खड़े किए हैं. पर 8-9 वर्षों की शैशवावस्था को ध्यान में रखते हुए इसमें कुछ ढिलाई की उम्मीद तो मीडिया कर ही सकता है. वैसे भी कुछेक लोगों से अनजाने में हुई भूल के आधार पर पूरे मीडिया के अनगिनत बड़े कार्यों को कोई सरकार, सत्ता कैसे नजरअंदाज कर सकती है. आखिर मीडिया पर एक बार लगाम लगाने के बाद उन लोगों पर निगाह कौन रखेगा जो जो अपने घृणित कारनामों की वजह से आए दिन बेशर्मी की इबारतें लिखते रहते हैं. और फिर एक बार को अगर इन कानूनों को वाजिब मान लिया भी जाए तो इसको लागू करने का अधिकार किसके हाथों में होगा. कौन होगा नैतिकता का लंबरदार जिसे पूरे देश की कार्यपालिका, विधायिका, कार्यपालिका के साथ-साथ अम जनता का भी विश्वास हासिल हो. लालू यादव, मुलायम सिंह या फिर मायावती जैसे नेता जिनकी अपनी विश्वसनीयता ही हमेशा निम्नतम धरातल पर पड़ी रसातल को जाने को तत्पर रहती है. कोई चारा घोटाले में जेल जा चुका है तो कोई राजनीतिक दुश्मनी साधने के लिए दूसरी पार्टी के विधायक को देशद्रोह के लिए बने कानून पोटा के तहत गिरफ्तार कर चुकीं हैं या फिर जिनके परिवार की अथाह संपत्ति का अंदाजा लगाने में देश की सर्वोच्च जांच संस्था सीबीआई को भी पसीने गए हैं. वो फिर वो लोग जो अपने घरों में 10,000 साड़ियों और 3000 चप्पलों का जखीरा लगा कर रखते हैं.

 

 

कदम
कदम पर ओछी हरकतों से लोकतंत्र को शर्मसार करने वाले नेता ही अगर मीडिया को हांकेंगे तो लोकतंत्र का क्या होगा. कभी सीनेमावालियों से अश्लील बातचीत की सीडी को लेकर तो कभी संसद भवन में करोड़ो रूपए का लेनदेन करने वाले ही सबसे ज्यादा मीडिया पर अंकुथ की बात करते हैं, उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं. अजीब विडंबना है कि अपने दामन में झांकने की कभी कोशिश करने वाले काफी हद तक स्वच्छ, जिम्मेदार और लोकतंत्र के अहम स्तंभ को पाठ पढ़ाने की जुर्रत करने से बाज नहीं आते.

 

विचारधारा
चाहे कोई भी हो सत्ता का चरित्र एक जैसा ही होता है चाहे गुजरात हो, 1984 के सिख विरोधी दंगे हों या फिर हाल के सिंगूर और नंदाग्राम. लेकिन ये अलगअलग विचारधाराएं भी मीडिया पर कोड़ा बरसाने की बात से गाहेबगाहें मूक सहमति जताती चली रही थी. हालांकि इस बार वाम और दक्षिणपंथियों ने सरकारी सुर से सुर मिलाने से परहेज किया है पर कब तक इसका भरोसा किसी को नही हैं.

 

अक्सर
सत्ताधारी मीडिया के बीच प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक की दीवार खींचने की भी सतही-उथली कोशिशें करते नजर आए. मसलन इसी बार के एजेंडे में देख लीजिए, उनका साफ कहना है कि हम इस रेगुलेशन से प्रिंट मीडिया को बाहर रखना चाहते हैं. तो क्या प्रिंट मीडिया अपने ही सहोदर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर थोपे जा रहे एक अनैतिक बंधन को आंख बंद करके स्वीकार कर ले? मसला किसी के ऊपर थोपे जा रहे प्रतिबंधों से परे सही और गलत के बीच अंतर करने का है. और अगर एक बार इस तरह की कोई परंपरा पड़ जाती है तो इसका अंत क्या होगा? कल को जब सत्ताधारी इसकी आड़ में प्रिंट मीडिया पर इसी तरह के बंधन थोपने की कोशिश करेगा तब किस मुंह से प्रिंट वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से सहायता मांगेगें और क्योंकर वो प्रिंट वालों की सहायता करेंगे?

 

इस
लिहाज से तो इस बंधन को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता. वैसे भी मीडिया ने चाहे वो प्रिंट हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक सबने अपने नियम कायदे बनाएं है और अपने लिए एक आचार संहिता स्वयं ही खींची है. प्रधानमंत्री का प्रस्ताविक नियामक कानून पर रोक लगाने का फैसला न्यायोचित से भी ज्यादा उचित कहा जा सकता है. और उन्हें इस मजमून को कूड़े के ढेर में फेंकना होगा, लेकिन लगे हाथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी अपनी शैशवावस्था से किशोरवास्था की ओर कदम बढ़ाने का अहसास सरकार, समाज सबको करवाना होगा.

 

अतुल
चौरसिया 

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