बेशरम मुखिया और ग़ैरजिम्मेदार नागरिक

धमाके होने पर भी अगर देश के गृहमंत्री को तीन घंटे में तीन बार कपड़े बदलने की चिंता ज्यादा हो तो ये सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है कि नाकारा लोगों की फौज के सिर पर जरूर किसी न किसी माई-बाप का वरदहस्त है। दिल्ली के रिसते जख्मों के दो दिन बीतते-बीतते जब ये अटकलें लागई जा रही थी कि शायद अब बहुत हो चुका, इस बार बांसुरीवादव नीरो को उसकी बेपरवाह छवि के लिए बख्शा नहीं जाएगा तभी अचानक उसने ये खुलासा करके उस आशंका को सही साबित कर दिया कि उसके सिर पर महामाता सोनिया का आशिर्वाद पूरी दृढ़ता से विराजमान है।

 

निर्दोष खून से इनकी आत्मा नहीं पिघलती, जितेंद्र स्टाइल में नख-शिख श्रृंगार करने की अदा आम लोगों की सुरक्षा पर भारी पड़ रही है। पर पाटिल नाम्ना बेशर्मी की चादर ओढ़े ये बयान देते हुए नहीं सकुचाता कि उसे सोनिया गांधी का पूरा समर्थन हासिल है यानि उसकी कुर्सी को कोई छू नहीं सकता। तो क्या निकम्मों को बनाए रखने का सारा जिम्मा सोनिया ने उठा रखा है? जनता के दरबार में जिस पाटिल को 2004 के चुनाव में सिरे से नकार दिया गया था उसे अगले ही दिन मंत्रिमंडल में शामिल करके सोनिया ने जता दिया कि जनता कोई देश की मालिक थोड़े ही है। वो तो भेड़ बकरियों की जमात है, उसे जो कहना था कह दिया अब किसे क्या देना है ये फैसला तो देश की महारानी को करना है। सो उन्होंने नख-शिख श्रृंगारप्रेमी को गृहमंत्रालय जैसा महत्पूर्ण पदभार सौंप दिया। तुरंत ही ये संदेश दिमाग में घूमा कि यहां उसी को परम पद मिलेगा जो रीढविहीन, आंख-नाक-कान बंद रखने की कला और 24 घंटे साष्टांग दंडवत योग की माया में निपुण होगा। जिसकी जी-हुजूरी जितनी तेज़ सुनाई पड़ेगी उसे उतना ही उच्चफल प्राप्त होगा। जी-हुजूरी से कन्नी काटे अर्जुन की बुढापे में दुर्दशा भला किसी से छिपी है। बहरहाल ये कुनबे की बात है उनकी सिरफुटौव्वल वो ही जाने। अपना सरोकार सिर्फ ये है कि कब तक लोग खून के आंसू रोएंगे और हम उनकी आध्यात्मिक ओज से भरी बकवास सुनेंगे। पर वो ये न समझें कि सत्ता हमेशा महारानी के पैरों की दासी बनी रहेगी। बेगुनाहों का खून उन्हें भी एक दिन सड़क पर ला खड़ा करेगा। पड़ोस की आग से आंख मूंद कर बैठे लोग यूं ही नहीं सो सकते वो आग कब उनके अपने घरों को दबोच लेगी किसी को इसका अंदाज़ा भी नहीं लगेगा। ज्यादा दूर नहीं हैं उनकी गिरेबान भी।

 

एक दो कौड़ी का इंडियन मुजाहिदीन इतने विशाल विकराल भारतीय गणराज्य के साथ आंख मिचौली का खेल खेल रहा है, खुलेआम चुनौती दे रहा है। लाखों का अमला, करोड़ों-अरबों रूपए का बजट डकारने के बाद भी पूरी तरह से क्लूलेस है। एक के बाद एक धमाके हो रहे हैं और किसी भी एक मामले को उसके अंजाम तक पहुंचाने में सरकारी अमला अक्षम है। 

 

 

धमाकों के बाद आम जनता को जो तकलीफें होती हैं, जो जख्म मिलते हैं, जिनके अपने बिछड़ जाते हैं उनका दर्द तो दूसरा कोई नहीं समझ सकता। पर एक सुर से पुलिस प्रशासन से लेकर सरकार को कोसने का सिलसिला जरूर शुरू हो जाता है। आम आदमी के इस बर्ताव में उसकी बेचारगी, उसकी मजबूरी और उसका दर्द छिपा होता है। और फिर वही आम आदमी आतंकवादियों से मुकाबले के लिए क्या कर रहा है? दिन भर हॉक्स कॉल, बम रखने की अफवाहें फैला रहा है। क्या इसी रुख से आतंकवाद का मुकाबला करेंगे लोग। दिन भर ऊंची बिल्डिंग्स से लेकर रेलवे स्टेशन तक बम रखने की खबरें देकर लोग किस तरह का आनंद उठा रहें हैं ये बात समझ से परे हैं। जब पूरा शहर, पूरा देश एक साथ सौ पचास लोगों की मौत के ग़म से उबरने की कोशिश कर रहा है, नासूर बन चुके आतताइयों से मुकाबले की हिम्मत जुटा रहा हैं, अपनो को खो कर फिर से पैरों पर खड़ा होने का सहारा ढूंढ रहा है तब हमारे बीच के ही कुछ लोगों के लिए ये मौका मौज-मस्ती का साधन बन गया है। बात-बात पर अपने नागरिक अधिकारों की दुहाई देने वालों को नागरिक कर्तव्यों, जिम्मेदारियों का अहसास क्यों नहीं है। दिन भर जिस पुलिस को धमाकों का सिरा खोजने में सिर खपाना चाहिए वो पुलिस कुछ लोगों की हुल्लड़ई के चक्कर में पसीना बहा रही है। इसके बाद भी अतंकवादियों से निपटे की उम्मीद की जा रही है। दूसरों पर बात-बात में उंगलियां उठाने वाले अपने गिरेबान में कब झाकेंगे। या फिर बगदाद, वजीरिस्तान की तरह जीने की आदत डाल लें हम सब। आने वाली पीढ़ियां एक ऐसे माहौल के बीच पनपेंगी जहां आए दिन उनके भाई बहनों का खून होता रहेगा। बचे खुचे लोग लंगड़े लूलों की शक्ल में उन हादसों के निशान लिए घूमेंगे। यही मंशा है तो फिर अफवाहें फैलाना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य होना चाहिए। जिस शहर की एक गली से एक साथ आठ अर्थियां उठी, जिस शहर में एक साथ पचास साठ लोगों का अंतिम संस्कार करना पड़ा क्या उसमें सत्ता, सरकार, व्यवस्था, नेता, प्रशासन से विरोध दर्ज करने के लिए दस पांच हजार लोग भी शामिल नहीं हो सकते थे। डेढ़ करोड़ की आबादी वाले शहर में डेढ़ लाख लोग भी अगर श्मशान घाट पर लोगों की लाश के साथ बैठकर सत्ता प्रतिष्ठान से विरोध दर्ज कराते, गांधी समाधि तक मार्च करते तो शायद साउथ ब्लाक की बहरी अंधी स्नायुओं में खतरे की बू आती, चूलें हिलती नज़र आती। 

 

अतुल चौरसिया

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1 टिप्पणी

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One response to “बेशरम मुखिया और ग़ैरजिम्मेदार नागरिक

  1. देश का दुर्भाग्य है की इस तरह के लोग भी भाग्य बिधाता बने हुए हैं।

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