बजरंगियो न जाओ नाजियों की राह

क्या कुछ लोग आतंकवाद के खिलाफ काउंटर आतंकवाद की डगर पर चल पड़े हैं। हिंसा के खिलाफ प्रतिहिंसा की समाधिस्थ जड़ें कहीं न कहीं अंकुरित होकर स्फुटित भी होने लगी हैं। सवाल ये नहीं है कि पानी सर के ऊपर से बहने लगा है या नहीं, बल्कि सवाल ये है कि इसकी अनदेखी ठीक होगी या नहीं। पूर्वोत्तर, कश्मीर, नक्सलवाद तमाम ऐसे उदाहरण पड़े हैं जिनके बारे में विश्वास से ये कहा जा सकता है कि दिल्ली की नींद तब खुली जब पानी सर के ऊपर हो गया था। तो कहीं इस बार भी मामला ऐसा ही तो नहीं हो जाएगा?

बीती शनिवार की रात कानपुर के हॉस्टल में हुए एक धमाके ने कई सवाल जेहन में पैदा किए हैं। उम्मीद है कि सारे लोग इस सवाल पर सवाल और जवाब की शुरुआत करेंगे। अब तक सामने आई ख़बर में कहा जा रहा है कि घटना में मरने वाले दोनों युवकों का संबंध बजरंग दल से था। उनके हॉस्टल से बड़ी मात्रा में बरामद अमोनियम नाइट्रेट, जिलेटिन रॉड्स, हैंडग्रेनेड और कुछ कहें न कहें इतना तो बता ही रहे हैं कि उनकी योजना का दायरा काफी व्यापक और बड़े पैमाने पर तबाही मचाने का था। अब बजरंगी किसको निशाना बनाते हैं ये बताने की जरूरत नहीं। पर इस एक घटना के खुलासे ने एक साथ इतने सवाल पैदा कर दिए हैं कि सबको सहेजने में परेशानी हो रही है।

क्या देश में एक दूसरे से निपटने के लिए अब हिंसा ही आखिर रास्ता बचा है? विचारों की सहमति असहमति तो हो सकती है। देश में आतंकवाद का ख़तरा कई गुना बढ़ा है। इस बात में भी कोई शक नहीं कि इसमें काफी हद तक आतंकियों का साथ स्थानीय लोगों ने दिया है। इस्लामी आतंक का ख़तरा पूरी दुनिया पर मंडरा रहा है। पर एक सुर से ये कहना कि सारे मुसलमान इसमें शामिल हैं या इन आतंकियों को दुनिया भर के मुसलमानों का समर्थन हासिल है, ज्यादती होगी।

आखिर आतंकवादी हमलों के बाद हमारे ताकत का संबल क्या होता है? यही ना कि अपने अंधकट्टरता के नाम पर निर्दोषों को निशाना बनाना कहां की बहादुरी है। जो आतंकवादी अपने धर्म की दुहाई देकर निर्दोष नागरिकों की हत्या पर हत्या किए जा रहे हैं उन्हें इस बात का इल्म नहीं हैं कि दुनिया की नज़रों में वो अपने धर्म को कितना नीचे पहुंचा रहे हैं। अपने धर्म को कितना अपमानित कर रहे हैं। धर्म की मूल भावना को लीलने की कोशिश कर रहे हैं। धर्म के मूल उपदेशों से परे एक नई परिभाषा खड़ी कर रहे हैं।

तो क्या बजरंग दल के लोग भी निर्दोष लोगों की हत्या की साजिश में कॉलर खड़ा कर रहे हैं? देश का क़ानून, खुफिया तंत्र अगर धमाकों के गुनहगारों तक नहीं पहुंच रहा है तो इसके लिए कौन दोषी है? तो क्या बजरंगियों ने एक सिरे से किसी एक संप्रदाय पर निशान साध लिया है? फिलहाल के संकेत तो यही कहानी बयान कर रहे है। कानपुर के सूत्र कहां तक जाते हैं इस बात की गंभीरता से पड़ताल होनी ही चाहिए। वरना अनदेखी और टल-मटोल की नीति देश में एक और नक्सली, एक और कश्मीर, एक और पूर्वोत्तर की समस्या खड़ी कर सकती है।

सनातन धर्म ने जिस एकरसता से दुनिया भर की धार्मिक धाराओं को अपनी मुख्य धारा में समाहित किया उससे मुंह मोड़कर शायद बजरंगी एक नई धारा शुरू करना चाहते हैं। खुद को ये देश का सबसे बड़ा भक्त, रक्षक कहते नहीं आघाते हैं। अगर उन्होंने इस तरह का कोई हिंसक रास्ता अपनाया तो इससे देश का क्या भला होगा, कौन सी देशभक्ति साबित करने की फिराक में हैं ये? जिस देश ने कभी अस्त न होने वाले दुनिया के विशालतम साम्राज्य से बिना लाठी-डंडा चलाए आज़ादी हासिल की है, दुनिया का सबसे वृहद व्यक्तित्व वाला नेता महात्मा गांधी जिस देश में पैदा हुआ उसके साधक-आराध्य-आदर्श हिटलरी सिद्धांत बने हैं तो ये इस देश का दुर्भाग्य है, इस देश के लिए शर्मनाक है। हथियार का जवाब हथियार होता तो हिटलर आज दुनिया का सबसे सफलतम नेता होता। पर उसने जर्मनी को क्या दियालाखों की मौत, खंडहर देश, अपंग नागरिक, सालों-साल बाद फूटते गोले-बारूद, भूखमरी, जर्जर अर्थव्यवस्था और तबाही।

फैसला उन्ही बजरंगियों को करना है जो देशभक्ति का गलाफाड़ प्रदर्शन करने में अपनी शान समझते हैं, पार्कों से लेकर बस अड्डों तक पर्दादारी का ठेका उठाए फिरते हैं। धमाके के बदले एक और धमाका करने से क्या देश की समस्याएं कम हो जाएंगी। और इसका अंत क्या है? क्या ऐसा देश बनाने का ख्वाब देख रहे हैं जहां 100 करोड़ लोग बाकी 15 करोड़ अल्पसंख्यकों को मारकर रामराज लाएंगे? नाजीवादियों की तरह सोचकर क्या हासिल होगा? मेरे ख्याल से एक ऐसा देश जो गृहयुद्ध के दलदल में फंसा तड़प रहा होगा। जिसकी सांस तो टूटेगी पर हद दर्जे की तड़पन, चुभन, किरच और दरद के बाद। और गृहयुद्ध भी ऐसा जिसके नागरिक ही एक दूसरे के खून और मांस के लीथड़ों से सने होंगे। सत्ता दूर बैठी तमाशबीन बनी रहेगी।

अतुल चौरसिया

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