राजदीप सरदेसाई : “ख़बर हर कीमत पर” !

नवंबर 2007 की वो शाम बार-बार याद आ रही है। तरुण(तेजपाल) हमारे छोटे से एडिटोरियल हॉल में तहलका की पूरी संपादकीय टीम को संबोधित कर रहे थे। उनके एक एक शब्द आज ज़ेहन में तैर जाते हैं। उन्होंने कहा, तरुन रहे न रहे तहलका उनकी आखिरी सांस तक जनहित की पत्रकारिता की आवाज़ को बुलंद करता रहेगा। व्यक्तिगत लोग आते जाते रहेंगे पर तहलका एक मिशन है जिसका मकसद है गरीबों मजलूमों की आवाज़ सत्ता के शीर्ष पर काबिज लोगों के कानों में डालना, उनसे जवाब मांगना। आज एक बार फिर से तहलका अपने उसी मिशन का अगल क़दम बढ़ाने जा रहा है। हो सकता है आने वाला वाला समय परेशानियां, मुसीबतें लेकर आए पर इसका सामना हमें करना ही होगा। ताकि जो सच्चाई हमारे सामने आई है वो जनता को पता चले और इतिहास हमें गुनाहगार न समझे।

ये वो दिन था जब तहलका ने गुजरात दंगों के आरोपियों की मुंहजुबानी परत दर परत सारी सच्चाइयां सामने रखी थी। पत्रकारिता के इतिहास की शायद गिनी चुनी ख़बरों में इसको स्थान दिया जाएगा।

फिर मेरे दिमाग में 2003 अप्रैल की वो दोपहरी घूम जाती है जब हम भागे-भागे अर्चना काम्पलेक्स स्थित एनडीटीवी के ऑफिस पहुंचे थे। वजह थी कि राजदीप सरदेसाई ने हमें मिलने का समय दिया था। एक डॉक्युमेंट्री के सिलसिले में जब हम उनसे मिलने पहुंचे थे तो हमारे दिमाग में 2002 गुजरात दंगों के दौरान हीरो बनकर उभरे राजदीप की छवि हिलोरे मार रही थी। मन में उत्साह इतना था कि मित्र संजय ने जो पहली बात उनसे कही वो हम सबकी मनोदशा का प्रतिनिधित्व करती थी। सर हम सबकी बस यही इच्छा हैं कि एक दिन हम राजदीप सरदेसाई बनें।

इस सारे आगे-पीछे का जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि भारत की लोकसभा में वोट के बदले नोट का जो शर्मनाक मंजर पूरी दुनिया ने देखा है उसके तार कहीं न कहीं देश के मान्यता प्राप्त टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई भी जुड़ते हैं। और इससे उनकी विश्वसनीयता, उनकी प्रतिष्ठा पर भयंकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

आज पांच साल बाद अपनी उस दशा पर, उस सोच, उस विचार पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है। क्या जिस राजदीप जैसा हम बनने की सोच रहे थे वो वास्तव में अनुसरण के लायक था? या फिर हम ग़लत सोच रहे थे? राजदीप भी उस भीड़ का हिस्सा मात्र ही थे जिनके लिए पत्रकारिता की परिभाषा जनता का हित नहीं बल्कि व्यावसायिक और कॉर्पोरेट हितों की रक्षा करना भर है।

राजदीप जिन्होंने गुजरात की आग की परवाह नहीं करते हुए महीनों दंगो में झुलस रही गलियों कूचों की खाक छानी थी वो इतने बड़े नेता कम दलाल को रंगे हाथ पकड़ने के बाद हिम्मत खो बैठे। उस पर बचाव में राजदीप के जो तर्क हैं वो कितने लचर हैं इसका अंदाज़ा आप खुद लगा सकते हैं। उनका कहना है कि संसदीय विशेषाधिकारों का हनन न होने पाए इस वजह से नोट फॉर वोट के टेप प्रसारित नहीं किए गए बल्कि लोकसभा अध्यक्ष को दे दिए गए।

ये तर्क कितने खोखले हैं, जिस संसद के 11 सदस्यों का सवाल के बदले नोट लेने की ख़बर मीडिया प्रसारित कर चुका है, जिस संसद के 7 सदस्यों को सांसद निधि से पैसा खाने की रंगे हाथ तस्वीरें मीडिया प्रसारित कर चुका है उसी संसद के एक सदस्य द्वारा अपने घर में करोड़ो रूपए के नगद लेन देन के विजुअल दिखाने में राजदीप को विशेषाधिकार नजर आने लगे। लोकसभा से दूर अपने घर में कैसा विशेषाधिकार और वो भी जनहित से ऊपर कैसा विशेषाधिकार?

बुधवार को सीएनएन-आईबीएन ने इस पर अपनी सफाई में एक और तर्क दिया है कि वो स्टिंग के टेप का क्रॉस चेक किए बिना प्रसारण नहीं कर सकते थे। और उसी स्पष्टीकरण में आईबीएन ने ये भी कहा है कि उनकी खोजी टीम एक हफ्ते से इस ख़बर पर लगी हुई थी। तो फिर एक हफ्ते के दौरान चैनल ने टेप की क्रॉस चेकिंग क्यों नहीं की औऱ उससे भी ऊपर लाख टके का सवाल ये है कि अपने ही टेप पर चैनल को भरोसा नहीं था जो टेप के क्रॉस चेकिंग की दुहाई दी जा रही है।

एक तर्क और दिया है चैनल ने। बिना स्टिंग पूरा किए हम उसका प्रसारण नहीं कर सकते थे। विश्वासमत का खेल खत्म होने के बाद वो जनता को क्या दिखाते जब सारे कारनामें का दुष्परिणाम-सुपरिणाम सामने आ जाता। ख़बर की कीमत ही तभी थी जब वो उसे समय रहते देश के सामने ले आते। आखिर उन्हीं का हिंदी चैनल ये दावा करता है ना कि ख़बर हर कीमत पर  

फिर मीडिया जनहित की बात कैसे कर सकता है जब उसके प्रतिनिधियों की काली करतूतें सामने लाने की कुव्बत ही नहीं है। जिस तरह से गुणा-भाग करके राजदीप ने टेप न दिखाने का फैसला किया उससे तो शुद्ध रूप से व्यावसायिक हित लाभ की वही सड़ांध आ रही है जिसके लिए बहुत से मीडिया संस्थान और मीडियाकर्मी कुख्यात हैं। जिस समय बीजेपी के तीन सांसद लोकसभा में नोटों की गड्डियां उछाल रहे थे ठीक उसी वक्त राजदीप अपने चैनल सीएनएन-आईबीएन पर नोट वाली घटना और विश्वासमत के अंतर्संबंधों का लाइव विश्लेषण कर रहे थे। उनके चेहरे पर उड़ रही हवाइयां साफ साफ चुगली कर रही थी कि सत्ताधारियों से मोल ली गई दुश्मनी के नफे नुकसान ने उन्हें अंदर ही अंदर कितना बेचैन कर रखा है।

पूरे मीडिया समुदाय में एक संदेश ये भी गया कि राजदीप वो साहस वो हिम्मत नहीं दिखा पाए जिसकी उम्मीद उनके जैसे पत्रकारों से लोग करते थे। मेरा व्यक्तिगत रूप से ये भी मानना है कि इस मामले में तरुण जैसा जज्बा, नैतिक साहस और हिम्मत दिखाने की जरूरत थी पर राजदीप के लिए शायद व्यावसायिक हित-लाभ ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए।

चौतरफा हो रही निंदा से बचने के लिए भले ही उन्होंने अपने बचाव के कुछ तर्क गढ़ लिए हों पर ये तर्क कुतर्क ही हो सकते हैं। एक बात जो सीधी सपाट है वो ये कि इस मामले में राजदीप में उस हिम्मत, उस इच्छाशक्ति का सर्वथा अभाव दिखा जिसकी उम्मीद एक भ्रष्ट शासन तंत्र का मुकाबला करने के लिए ईमानदार मीडिया तंत्र से की जाती है।

इसी मीडिया समुदाय में जोड़ तोड़, दलाली करके राज्यसभा के रास्ते सत्ता की मलाई काटने वालों की भी कमी नहीं है। तो क्या राजदीप भी इसी तरह के किसी लोभ के शिकार हो गए। तो फिर उनमें और बाकियों में अंतर क्या रह गया। जिस राजदीप से एनडीटीवी के जमाने में नेता बात करने से पहले चार बार तैयारी करते थे वो राजदीप सीएनएन-आईबीएन के जमाने में उसकी परछाई भी नहीं लगता ऐसा क्यों है। क्या अतिशय महत्वाकांक्षाओं ने राजदीप को लील लिया। निश्चित रूप से जहां लाखो-करोड़ो रूपए दांव पर लगे हों वहां बहुत सी चीजों को तिलांजलि देनी पड़ती है। विनोद दुआ का एक इंटरव्यू याद आ रहा है जिसे वरिष्ठ पत्रकार जफ़र आगा ले रहे थे। अपना चैनल खोलने के सवाल पर विनोद दुआ ने कहा कि मुझे एक शर्ट पहननी है अब इसके दो रास्ते हैं, पहला कि मैं बाज़ार में जाऊं दुकानदार से कपड़ा खरीदूं उसे पैसा चुकाऊं और साथ में गारंटी भी हासिल कर लूं कि कुछ गड़बड़ी होगी तो तुम्हारे सिर पर ला पटकूंगा। दूसरा तरीका है कि इसके लिए मैं एक कपड़ा बनाने की फैक्ट्री लगाऊं, उसके लाइसेंस की व्यवस्था करूं, लोगों को घूस खिलाऊं, फैक्ट्री चलाने के लिए समझौते करूं और फिर कपड़ा पहनूं।

ये जिक्र यहां इसलिए कर रहा हूं क्योंकि राजदीप ने कपड़ा पहनने के लिए यहां दूसरा रास्ता चुना। तो शायद समझौतो में पुराना राजदीप कहीं खो गया।

मीडिया का पहला धर्म शायद यही है कि जनता के हित में क्या है इसकी बारीक परख होनी चाहिए। जनता के प्रतिनिधि अगर खुलेआम उनके वोट की खिल्लियां उड़ा रहे थे, उन्हें संसद में पहुंचाने के बदले सांसद करोड़ो रूपए में अपनी मर्यादा नीलाम कर रहे थे तो फिर इसमें संसदीय विशेषाधिकार का सवाल कहां से पैदा हो जाता है। जनता पहले है या विशेषाधिकार।

उनके पास क्या था क्या नहीं ये तो वही जाने पर अगर उनके पास लोकसभा स्पीकर को दिखाने के लिए कुछ था तो उसे देखने का हक़ देश की जनता को भी था। भले ही वो इसे डिसक्लेमर के साथ चलाते। उसमें कुछ स्पष्ट था, नहीं था, वैध था, अवैध था इसका फैसला फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं करती। गुप्त सूत्रों से मिली जानकारी, नाम न छापने की शर्त जैसे जुमलों के साथ हज़ारों खबरों को वैधानिकता प्रदान करने वाला मीडिया एक टेप को इस तरह से छुपा कर न तो अपने पेशे से न्याय कर रहा है न ही देश की जनता से।

अगर ऑपरेशन वेस्ट एंड, गुजरात का सच जैसी सच्चाईयों का खुलासा करने की हिम्मत नहीं है तो फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस वाली पत्रकारिता करते रहिए किसी का भला हो न हो आपकी कॉर्पोरेट कंपनी खूब फलेगी फूलेगी।

अतुल चौरसिया

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15 टिप्पणियाँ

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15 responses to “राजदीप सरदेसाई : “ख़बर हर कीमत पर” !

  1. devendra

    “राजदीप ने कपड़ा पहनने के लिए यहां दूसरा रास्ता चुना। तो शायद समझौतो में पुराना राजदीप कहीं खो गया। ”
    राजदीप ने कपड़ा पहनने के लिये रास्ता नहीं चुना बल्कि अपने नाम और ईनाम के लिये अपना ईमान बेच कर सारे कपड़े उतार दिये हैं
    इस घटना के बाद राजदीप ने अपनी सारी विश्वसनीयता खो दी है.

    हमने बहुत सारे ईमानदारों को बिककर बेईमान बनते देखा है. हर एक की प्राइजटैग होती है. बुरा लगता है, लेकिन राजदीप की भी एक प्राइज टैग निकली.

  2. kuch dino pehle docter Naamwar singh yanhaa aaye the.press club me unhone budhijeewiyon ,patrakaaron ko sambodhit karte hue kaha tha,jo khud ko nishpaksh kehta hai wo bikaau hota hai

  3. सही फरमा रहे हैं आप, इसी वजह से मीडिया से आज आम आदमी का भरोसा उठने लगा है. एक समय था जब मीडिया के जानिब से आई खबरों को लोग ब्रह्म वाक्य समझते थे.

  4. ना सच , ना अंतर आत्मा , ना पब्लिक बडी, ना मिडिया,
    सोने जैसा सच है भईया , सब से बडा रुपैया

  5. बहुत शानदार लेख लिखा है आपने। मैं भी राजदीप का बड़ा प्रशंसक हूं लेकिन, अभी कुछ घटनाओं ने थोड़ा विचलित तो किया है।

  6. jeetbhargava

    You are right sir, Patarkarita ke naam pe ye badnumaa daag hai.

  7. अतुल भाई, आपको बहुत बहुत बधाई। एक शानदार हस्‍तक्षेप करने के लिए। दरअसल बहुत सारी चीज़ों को हम जैसे पत्रकार समझ ही नहीं पा रहे थे। आपने एक स्‍टैंड दिया। शुक्रिया सर।

  8. rajnish

    खरा-खरा अौर सच िलखा है अापने. बहुत बढिया. इसके पहले अमर िसंह के टेप पऱकरण को लेकर क्या हुअा था? अंितम समय में इसे पऱसािरत नहीं िकया गया. इस िवषय पर अागे बहस होनी चािहए.

  9. हरि प्रकाश गर्ग

    जब आपने राजदीप सरदेसाई को अपना हीरो माना था तब भी वह कांग्रेस के लिये काम कर रहा था और आज भी कांग्रेस के लिये काम कर रहा है। आप ही न समझ पाए तो उसका क्या दोष।

  10. बहुत बढिया…अतुल भाई, आपको बहुत बहुत बधाई।

  11. नीरज दीवान

    मोटी बात तो यह है कि दो-तीन लाख माहवारी कमाने वाले कैसे करोड़ों का चैनल खोल लेते हैं. कौन होते हैं वे जो इन्हें करोड़ों देकर चैनल खुलवा लेते हैं.
    हर कोई बिका करता है यहां.. शर्त ये है कि मोल चुपके से बताया जाए…

  12. mohan bhatt

    sir ji,
    ye khabar itni saaf saaf blog ke madhyam se hi padne ko mil sakti thi aap ne hakeekat ko sabdo main dhal diya hai .
    acchi baat ye hai ki, logo ke samne sansad ka sach hi nahi, balki media ka sach bhi samne ane laga hai …
    shubkamnao shahit
    mohan

  13. चौरिसया जी,
    आपके लेख को पढ़ कर लगा कि, अभी कहीं न कहीं सच्चाई व इमानदारी जिंदा है । कई बार रिपोटॆरों की खबरों को इस लिए प्रकाशित नहीं किया जाता, क्योंकि बाजारवाद हावी हो गया है । मैं कभी-कभी अपने-आप को लाला के दुकान का सैल्स मैन समझता हूं । जैसे लाला के इशारों पर सैल्स मैन को काम करना होता है । नित-प्रतिदिन खुलते न्यूज चैनल इस बाजारवाद की कड़ी हैं, उन्हें देश की गरीब जनता से कोई हमददी नहीं है । उन्हें कलावती से कोई लगाव नहीं है, राहुल गांधी कलावती का नाम लिया और चैनल वाले टीआरपी की जुगाड़ में बहुत कुछ दिखा डाला । आपकी खरी बात हमें बहुत अच्छी लगी । हम बाजारवाद का हिस्सा बनते जा रहे हैं, किस लिए….चंद सिक्के या कुछ और के लिए…..
    शेष फिर कभी …

  14. Sunjay Banerjee

    Well said .This is a right time to stand & say no to peoples like Rajdeep. It is possible that people like him can be a good polititician & may be god knows that some day he will be a Rajaya sabha M.P as a gift to save the goverment.

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