भीड़तंत्र की बल्ले-बल्ले

इस देश का अपना अलग शास्त्र है। इसमें विचित्रता है, एकरसता है, बहुत कुछ है। यहां गणेशजी दूध पीते हैं तो पूरे देश में एक साथ पीना शुरू कर देते हैं। साईं बाबा की माला बढ़ती है देश में चहुओंर बढ़ने लगती है। अंधविश्वासों से इतर वास्तविक घटनाओं का भी एक अलग शास्त्र है। एक सिख युवक का केश किसी ने काट लिया तो अगले हफ्ते तक इस तरह की दो-चार घटनाएं जरूर हो जाती हैं। जैसे उचक्के इसी के इंतज़ार में उस्तरे थामे बैठे थे। या फिर देश के अलग अलग हिस्सों में जैसे उनके बीच कोई तार-बेतार संपर्क हो।

 

कुछ घटनाएं घटना चक्र के रूप में चलती हैं। अब देखिए साल भर पहले गुर्जर विवाद हुआ उसे थामते थामते डेरा–सिख समर्थक भिड़ गए। साल भर बाद बिल्कुल अलग ज़मीन पर एक बार फिर इन दोनों विरोधियों ने देश के सामने जैसे पुरानी घटनाओं का रिप्ले पेश कर दिया हो। गुर्जरों ने पुरानी ज़मीन राजस्थान पर बवाल शुरू किया तो इसके शांत होते होते मुंबई में सिख-डेरा समर्थक फिर से आमने सामने हो गए। ये आग मुंबई से चलकर सुदूर पंजाब तक पहुंच गई। यानी एक के बाद दूसरी घटनाओं का ऐसा तारतम्य होता है कि कड़ी टूटने नहीं पाती। सड़क पर उतर कर अपनी अहमियत जताने का जैसा चलन इस देश में विगत कुछ सालों से चल पड़ा है उसे समझना मुश्किल है।

 

महीनों चला डेरा सिख विवाद, उससे पहले पैदा हुआ गुर्जरों का हिंसक आंदोलन, इसके जवाब में शुरू हुआ मीणा संघर्ष, मुंबई में राज ठाकरे का उत्तर भारतीय विरोधी हिंसात्मक अभियान, मुंबई में ख़बरिया चैनल के दफ्तर पर भगवा ब्रिगेड का हमला, जबलपुर में कॉलेज परिसर में प्रोफेसर की मौत, पत्रकार कुमार केतकर के घर पर एनसीपी का हमला, असम में हिंदी भाषियों की चुनचुनकर हत्या, कश्मीर में अमरनाथ यात्रा को लेकर हिंसक विरोध, इसके जवाब में पूरे देश में भगवा ब्रिगेड का हिंसक बंद, दार्जिलिंग में गोरखालैंड का लट्ठमार अभियान, बिहार में भीड़ का न्यायतंत्र और इन सबसे बची खुची कसर पूरी करते हैं देश के 25 फीसदी हिस्से में शासन चला रहे नक्सलीये सभी घटनाएं बीते एक साल के दौरान हुई है।

 

इन घटनाओं ने लगातार देश की राजनीति से लेकर समाजनीति को गरमाए रखा है। किसी स्थिर, मजबूत लोकतंत्र की ये स्वस्थ निशानी कही जा सकती है? शायद ही किसी को विश्वास हो। लोकतंत्र की परिभाषा देने वाले पश्चिम के समाज में इस तरह की भदेस चाल दिखनी दुर्लभ है। मेरा भारत महान का दम भरने वाले इतने भी सहिष्णु नहीं हैं कि देश के न्यायतंत्र का रुख कर सकें। हर आदमी के भीतर खुद ही फैसला करने की अजब धुन इस देश में सवार है।

 

दुनियावालों इस ओर मत देखो, विश्वशक्ति के ख्वाब देख रहा दुनिया का विशालतम लोकतंत्र फिलहाल भीड़तंत्र की चपेट में हैं।

 

अतुल चौरसिया

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1 टिप्पणी

Filed under Desh-Samaj

One response to “भीड़तंत्र की बल्ले-बल्ले

  1. बहुत अच्छा ! आपका निरीक्षण बहुत सही है।

    पर इसका कारण क्या है? ये सब बढ़ता ही क्यों जा रहा है? कहाँ कमी है? इसका कुछ निदान तो सुझाइये!

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