कुछ अन्यमनस्क हो रहा हूं…

बहुत छोटे थे हम जब शाहबानों मामले में कांग्रेस ने अपना धर्म निरपेक्ष चोला उतार फेंका था। उस ग़लती के एहसास ने राजीव गांधी को अयोध्या का रास्ता दिखा दिया। जिस भाड़ को आडवाणी आज तक झोक रहे हैं उसकी चिंगारी इन्हीं राजीवजी ने सुलगाई थी। फिर एक मौका आया जब सत्तावर्ग खुद को देश की सबसे मजबूत और सर्वसमाज की पार्टी के रूप में स्थापित कर सकती थी लेकिन मुफ्ती जी की बिटिया पूरे हिंदुस्तानी राजवर्ग पर भारी पड़ गई। और यहां से सिंचित हुई कश्मीर घाटी में अलगाववाद की बयार आज काफी हद तक वटवृक्ष तक का सफर तय कर चुकी है। काफी हद तक आतंकियों को 1999 की गोघूलि की बेला और नई सहस्त्राब्दि की शुरुआत में गांधार योजना की प्रेरणास्रोत मुफ्ती साहब की बिटिया ही थी जिनके बारे में बाद में सुना गया कि उन्हीं आतंकियों में से किसी के साथ घर बसा लिया।

 

अब उन्हीं की एक बिटिया पीडीपी के नाम से कश्मीर की सियासत संभाल रही हैं। पर भाषा उनकी पूरी की पूरी हुर्रियत वालों से होड़ लेती है। सियासत की अपनी मजबूरी है। पर अपनी निजी फायदे के आगे जिस बड़े हित को इन नेताओं ने दांव पर लगाया है उसकी कीमत बहुत महंगी अदा करनी होगी। हिंदुस्तान सिर्फ कश्मीर नहीं है और गंगा जमुनी तहजीब सिर्फ घाटी में नहीं बसती। पर आगे जब पुलिस अपने फर्जी मुठभेड़ों में किसी कश्मीरी को निशाना बनाएगी तो हमेशा से इसके विरोध में उठने वाली पुरज़ोर आवाज़ अमरनाथ यात्रा की तपिश के चलते कमज़ोर पड़ जाएगी। तब शायद उन क्रूर हत्याओं को भी देश का लंबा-चौड़ा तबका अपनी मौन स्वीकृति दे देगा। जिस तरह की भाषा पिछले दिनों कश्मीर में देखने को मिली वो काफी विदारक है। देश के लिए ये भावनाएं कहीं से स्वास्थ्यकर नहीं है। मानसिकता के रास्ते दिलों तक उतरती स्थितियां दिनों दिन मजबूत होंगी। पीडीपी के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि हमने समझौता किया है अपना ईमान गिरवी नहीं रखा है। नेशनल कांफ्रेंस वाले श्राइन बोर्ड को दी गई ज़मीन के मसले पर हुर्रियत से भी कड़ी भाषा में गरिया रहे हैं। और इन सबके बीच एक बार फिर कांग्रेस शाह बानों  के बाद उसी तरह की ऐतिहासिक ग़लती कर गया है।

इस देश में हर राज्य, हर ज़िले में हज कमेटी के लिए ज़मीने दी गई है, उन पर अब जब कोई हिंदूवादी आंखे तरेरेगा तो उसका खुलकर सामना किस मुंह से लोग करेंगे। इस देश ने मुसलमानों को अपना पर्सनल लॉ बोर्ड चलाने की अनुमति दे रखी है। किसी पश्चिमी लोकतंत्र में ऐसी इजाजत किसी को नहीं है। सबके लिए सिर्फ और सिर्फ एक क़ानून होता है। ये हिंदुस्तान है जहां सबको अपने अपने हिसाब से रहने की छूट है इसमें पर्सनल लॉ तक वाजिब है। इस पर रोक की बात होते ही एक आवाज़ उठती है हमारे धार्मिक मामलो में सियासी हस्तक्षेप हो रहा है। अब कश्मीर में क्या हुआ? जब हिंदू कट्टरपंथी कहेंगे कि कश्मीर में हमारे धार्मिक मामलों को श्राइन बोर्ड से छीन कर राजनीति के हवाले क्यों किया गया तो किस मुंह से देश का धर्म निरपेक्ष तबका उनका सामना कर पाएगा?

 

कुतर्क की सीमाएं असीमित हैं। अगर 40 हेक्टेयर ज़मीन से कश्मीर में मुसलमान अल्पसंख्यक हो जाते हैं (जैसा गिलानी ने अपनी रैली में कहा), राज्य का मुस्लिम बहुल चेहरा बिगाड़ने की साजिश है (जैसा मुफ्ती के सिपहसालारों ने और उनकी बेटी ने कहा) तो फिर देश में इतने सारे हज मंज़िलों, मस्जिदों, मदरसों से हिंदू कट्टरपंथियों को भी अल्पसंख्यक होने का ख़तरा पैदा हो सकता है, देश का हिंदू बहुल स्वरूप बिगड़ने का ख़तरा पैदा हो सकता है। फिर किस मुंह से लोग मुस्लिमों का बचाव करेंगे।

 

समस्या की जड़ दरअसल कश्मीर में ही है। यहां का सियासी तबका घाटी की सीमाओं को ही सारे वोटर का गढ़ मानने की भूल में है। उसकी दूरगामी सोच कही से देश की दीर्घकालिक हितों से जुड़ती नहीं दिख रही है। और न ही उसे इसके आसन्न खतरे नज़र आ रहे हैं जो आने वाले समय में देश में जटिल धार्मिक स्थितियां पैदा करने की ताकत रखता हैं। जम्मू, दिल्ली में विहिप, बजरंग दल, शिवसेना की विरोध रैलियों से इसका आभास भी होने लगा है। कांग्रेस तो खैर ऐतिहासिक गलतियों का मकड़जाल बुनने में व्यस्त है और देश की दूसरी बड़ी पार्टी भाजपा इस मकड़जाल की उलझन से पैदा हुए शून्य में अपना सियासी भविष्य देख रही है। तो फिर ये देश किससे उम्मीद करे।

अलगाववाद के जो कश्मीरी तर्क हैं उनके आधार पर तो इस देश के पचास टुकड़े कर दिए जाएं तो भी अलगाववाद की लड़ाई कभी नहीं रुकेगी। पर ये एक अलग मसला है इस पर भी लंबी चर्चा की जा सकती है। फिलहाल राजनीतिक इच्छाशक्ति इस देश और कश्मीर के सत्ता प्रतिष्ठान के लिए सबसे अहम सवाल है। पर इसका अभाव कश्मीर से लेकर महाराष्ट्र तक साफ दिख रहा है।

 

अतुल चौरसिया     

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1 टिप्पणी

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One response to “कुछ अन्यमनस्क हो रहा हूं…

  1. सटीक एवं यथार्थ। बहुत ही अच्छी तरह से कलई खोली है आपने। साधुवाद।

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