बाबूजी ज़रा धीरे

11.2 के पलायन वेग (पलायन वेग=मुद्रास्फीति) से जब मंहगाई सरपट भाग रही हो तो कोई चुनाव की कैसे सोच सकता है। वो भी समय से पहले। न्यूक्लियर डील का पंगा भले ही मनमोहनी नौका को डगमगा रहा है पर सारे समीकरण यही कह रहे हैं कि चुनाव फिलहाल नहीं हो सकते और न ही इस सरकार के कार्यकाल में न्यूक्लियर डील की संभावना है। अपनी-अपनी मजबूरी के चलते दोनों तलवारे तो भांजेगे पर इतना घातक वार नहीं करेंगे कि सरकार की मौत हो जाय। पर इस धमाचौकड़ी के खेल ने इंतज़ार में बैठे प्रधानमंत्री जी (आडवाणी) को कुछ इस क़दर अधीर कर दिया है कि अभी से उन्होंने लोकसभा की शतरंजी बिसात पर अपने मोहरे फिट करने शुरू कर दिए हैं। इतनी जल्दी क्या है?

 

बीएसपी के हाथ खींचने के बाद आज की तारीख में लेफ्ट के समर्थन खींचने की दशा में मुलायम सिंह भी मनमोहन की नैया अकेले दम पर पार नहीं लगा सकते। लोकसभा का गणित ही ऐसा है। तो फिर कांग्रेस कैसे न्यूक्लियर डील पर आगे बढ़ सकती है। मंहगाई की दर ऐसी है कि खुद वित्तमंत्री ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। तो फिर ऐसे में सरकार को संकट में डालकर न्यूक्लियर डील के लिए आप को क्या लगता है कांग्रेसी मनमोहन सिंह को आगे बढ़ने देंगे। पार्टी, सरकार और प्रधानमंत्रीजी के पीछे खड़ा रहने या कहें कि खड़ा दिखाने की मजबूरी न हो तो कांग्रेस के भीतर ही अच्छी खासी तादात ऐसे लोगों की है जो कतई नहीं चाहते कि साल भर पहले ही सत्ता की मलाई से वंचित हुआ जाय। वो भी तब जब दूर-दूर तक साउथ ब्लॉक और 7 आरसीआर में वापसी की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही हो।

 

तो फिर आडवाणीजी जो इस खेल के इतने पुराने खिलाड़ी हैं उन्हें कहां से इस बात की भनक लग गई है कि वो चुनावी मूड में आ चुके हैं। हमेशा दूर की सोचकर चाल चलने वाले आडवाणीजी की बेसब्री का सबब क्या है? अटलजी की फिर से वापसी की बची खुची संभावना को ज़मीदोज़ करने की कोशिश भी हो सकती है। वरना कहीं ऐसा न हो कि अंतिम समय में चुनावी नैया पार करवाने का बहाना लेकर अटलजी को फिर से खड़ा कर दिया जाय या फिर पार्टी के ही उनके विरोधी या अटलजी के चाटु शिरोमणि उनके पर कतरने के लिए अटल तराना छेड़ दें।

 

साठ सालों में आडवाणीजी पृथ्वीराज रोड तक का ही सफर तय कर पाए हैं पर यहां से 7 आरसीआर की छोटी सी यात्रा कितनी दुर्गम है उन्हें भी समझ आ गया है। उनकी बेसब्री का मजमून चाहे जो भी हो पर साल भर पहले से ही उम्मीदवारों की घोषणा से एक बात साफ दिखती है कि वो इस बार वहां पहुंचने के लिए कितने बेताब हैं। शायद इस बेसब्री की एक वजह ये भी है कि उन्हें इस बात का अहसास है कि ये उनके लिए भी आखिरी मौका है। इस बार चूके तो न उमर साथ रहेगी न शरीर साथ देगा। बहरहाल अपन तो यही चाहेंगे कि बाबूजी ज़रा धीरे चलो इस भदेस लोकतंत्र में जो दिखता है दरअसल वैसा होता नहीं। वरना इंडिया शाइनिंग के जमाने की याद भला किसे नहीं होगी। इस बात को आडवाणीजी से ज्यादा भला कौन समझेगा। तब तो सभी एक सुर से उन्हें ही सत्ता में वापसी का राजकुमार मान रहे थे। पर जनता ने संसद की कुंजी सोनियाजी को थमा दी। आडवाणीजी अधीर न होइए सिर्फ कोशिश करिए बाकी जनता के मन में क्या है न आप जानते हैं न हम। इतनी पक्की मत मान कर चलिए। 7 आरसीआर की राह बड़ी रपटीली है।

 

अतुल चौरसिया  

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