कुछ ऐसा विनम्र प्रभाव है अनुपमजी का

यूं ही एक मित्र की राय पर घूमते-घूमते गांधी शांति प्रतिष्ठान जाना हुआ था। दरअसल एक स्टोरी के चक्कर में जलयोद्धा राजेंद्र सिंह की तलाश थी। मित्र ने कहा अनुपम जी से मिल लो तुम्हारी परेशानी दूर हो जाएगी। परिसर के एक तरफ मौजूद साधारण से कमरे में फाइलों, किताबों के बेतरतीब ढेर के बीच वो बैठे थे। पहली ही वाणी ने मन के पोर-पोर को एक नई ऊर्जा दी थी। ब्लूलाइन बस के कंडक्टरों की लठ्ठमार हरियाणवी सुनते सुनाते उनके दरवाजे पर पहुंचा था। यहां इतनी मधुर वाणी और उतना ही सौम्य व्यवहार देखकर हैरत भरी खुशी महसूस हुई थी। बातों ही बातों में उनका प्रभाव मन पर छाने लगा था। उनका बृहद व्यक्तित्व उनके विनम्र आचरण से खुद ब खुद स्थापित होने लगा। अब तक उनके बारे में मेरा व्यक्तिगत ज्ञान काफी कम था। बातचीत के सिलसिले के बीच ही उन्होंने अपनी लिखी एक पुस्तक “आज भी खरे हैं तालाब” भेंट की। इतनी सरल भाषा में इतनी विश्लेषणात्मक, रिपोर्ताज आधारित पुस्तक के दो चार पन्नों ने ऐसा लगा अपनी सारी खोज पूरी कर दी है। जिस उद्देश्य के लिए अनुपमजी के पास आया था ऐसा लगा उनसे मिलकर ही सारा उद्देश्य पूरा हो गया। ऐसा संपूर्ण गांधीवादी इस जमाने में, एक विरल अहसास था उनसे मिलना।

“आज भी खरे हैं तालाब” के बारे में एक बात बताना जरूरी है। पर्यावरण, तालाब, पानी के ऊपर इतनी गहरायी से हिंदी में शायद ही कोई पुस्तक उपलब्ध होगी। देश समाज के बारे में उनके सूक्ष्म ज्ञान की गवाही देती है ये पुस्तक। इसे कालजयी रचनाओं में शामिल किया जा चुका है। इंडिया टुडे ने देश में लिखी गई अब तक की दस सर्वश्रेष्ठ, सबसे ज्यादा छपी, बिकी और पढ़ी गई पुस्तकों में इसे शुमार किया है। इसके इतर आज कोई भी प्रकाशन संस्था, कोई भी व्यक्ति इस पुस्तक को सिर्फ साभार प्रेषित करके छपवा सकता है, बंटवा सकता है। इसके बदले में उन्हें किसी रॉयल्टी की दरकार नहीं है। उनके पास पुस्तक का कोई कॉपीराइट नहीं है। देश की लगभग सभी भाषाओं में लोगों ने इसका अनुवाद किया है। आज पानी और पर्यावरण की समस्या से जूझ रही देश और राज्य की सरकारें भी इस पुस्तक का सहारा लेती हैं। तमाम इलाकों में उनके सुझावों को लागू करके सूखे पड़े जोहड़ों-तालाबों को सदानीरा बनाने का अभियान या तो पूरा हो चुका है या फिर चल रहा है।

बहरहाल अपनी मुलाक़ात की बात करूं तो इसी तरह के किसी पर्यावरण के मुद्दे पर राजेंद्र सिंह की खोज अनुपमजी से मुलाकात की वजह बनी थी। दिमाग में आया कि अपनी स्टोरी के लिए इस भली आत्मा से बेहतर भला कौन हो सकता है। पर तुरंत झटका लगा। अनुपमजी मीडिया और कैमरे की चकाचौंध से हमेशा दूर रहते हैं। अपनी धुन में मगन इस पर्यावरणवादी को किसी तरह की प्रशंसा, नाम, यश की लालसा भी नहीं है। कुछ इस तरह के प्रभाव में उनसे पहली मुलाकात के बाद विदा हुआ मैं।

इस मुलाक़ात के कुछ ही दिनों बाद ही अपने घर जाना हुआ। रास्ता काटने और पढ़ने का कीड़ा शांत करने के लिए चलते चलते “आज भी खरे हैं तालाब” अपने पास रख लिया था। किताब पढ़ा तो अहसास हुआ कि तालाबों को पाट कर, कूंओं पर घर खड़ा कर किस विनाश को न्यौता दे रहे हैं हम। रोडवेज़ पर उतरा तो दिमाग में घूम रहा था, पहले हम कैसे सब्जी मंडी वाले कूंए की मुंडेर पर बैठकर अपने ही अक्स को पत्थर मारते रहते थे और छपाक की गूंजती हुई आवाज़ पर उछलते थे। फिर याद आयी अपने घर के पिछवाड़े वाले कूंए की जिसमें एक बार जवाहिर चाचा कि जलती हुई टॉर्च गिर गई थी। पानी की रोशनी अंदर तली से ऊपर आ रही थी। पूरा मुहल्ला रस्सी में चुंबक बांध कर ऱोशनी के आस-पास इस उम्मीद से डुबाता-निकालता रहा कि शायद टॉर्च निकल आए। पता नहीं उनकी रस्सी टॉर्च तक पहुंचती भी थी या नहीं। पर धीरे धीरे टॉर्च की रोशनी मद्धिम पड़ती हुई बंद हो गई। इतना साफ पानी था उस कूंए का। कूंए की मुंडेर से सटा हुआ चबूतरा था। जिस पर मुहल्ले के दो चार लोग रोज़ नहाते और तुलसी के पेड़ को जल चढ़ाते थे। वैसे इस कूएं का सबसे बड़ा उपयोग तब देखने को मिलता था जब किसी के घर किसी की मृत्यु के बाद दशवां यानी शुद्धिकरण होता था। कूएं के चारो ओर बाल मुंडवाए लोगों का जमघट लगता था। यहां से शुद्ध होकर लोग तेरहवीं की तैयारी करते थे।
आज जब मैं रोडवेज़ से उतर कर बाज़ार में घुसा तो याद आया सब्जी मंडी वाला कूआं पट गया है। अब उसकी मुंडेर को तोड़ दिया गया है। वहां दो-चार सब्जी वाले अपनी रेहड़ी लगा कर बैठते हैं अब। आगे बढ़ा तो सूर्यबली के तिराहे के पास वाला कूआं याद आया इस पर उन्ही सूर्यबली के छोटे भाई ने अपनी दोमंज़िला बिल्डिंग खड़ी कर ली है। आगे बढ़ा तो चौराहे पर आ पहुंचा। जहां खेलकर हम लोग जवान हुए हैं। इस कूएं को भी लोगों ने पाट दिया। तर्क ये था कि अगर पाटा नहीं गया तो ज़हरीली ग़ैस निकल सकता है। वैसे भी अब कौन कूएं का पानी पीता है। वहां से सामने ही अपना घर था पर निगाह मवेशी खाना जाने वाली सड़क की ओर चली गई। महाजनी टोला के दोनों कूओं में से एक पर बर्नवाल परिवार ने ये कह कर मिट्टी डलवा दी कि बच्चों के गिरने का ख़तरा हैं, दूसरे पर जायसवालजी ने चेयरमैन से सांठगांठ कर अपनी दुकान खड़ी कर ली। आज बाज़ार के सारे कूएं पट गए हैं कुछ पर बिल्डिंगे खड़ी हो गई हैं, कुछ पर रेहड़ी पटरी वालों ने कब्जा कर लिया है। तर्क ये दिया जाता हैं कि इसमें टाउन एरिया का ही फायदा है, तहबाजारी जो वसूल होती है।

“आज भी खरे हैं तालाब” अपने पास थी। पर समझ नहीं आ रहा था कि इसे किसे देकर समझाया जाय। किसे पढ़ाया जाय। दो-तीन दिन ही बीते थे घर पर कि सुबह-सुबह बगल की सेठानी चाची रोते हुए अपने घर आयी। माताजी से जाने क्या बात की और उन्हें लेकर अपने घर चली गईं। थोड़ी देर बाद बाहर से तेज़ तेज़ आवाज़े आने लगी। बाहर गए तो देखा मेरे पिताजी गुस्से में सेठानी चाची के पति यानी हमारे लालजी चाचा को समझा रहे थे। थोड़ी देर में माजरा कुछ यूं समझ में आया कि चाचाजी अपने पुराने घर को तुड़वा कर उसका मलबा घर के पीछे वाले कूएं में फिंकवा रहे थे। सुबह से ही मजदूर इस काम में लगे हुए थे। इस बात से खुद उनकी पत्नी जी भी नाराज़ थी। वो आज भी हर दिन तुलसी चौरे पर जल चढ़ाती हैं। पर वो उनकी सुनने को तैयार नहीं थे। इसीलिए वो रोते हुए हमारे घर आयी थीं। अब पापाजी और चाचाजी में तर्क-वितर्क हो रहा था। बहरहाल दोनों लोगों को शांत करके मैंने सबसे पहले उन मजदूरों को रोका जो लगातार मलबा कूएं में फेंक रहे थे। फिर एकदम से लगा कि “आज भी खरे हैं तालाब” सार्थक हो जाएगी। सबके बीच मैंने वो किताब चाचाजी को दी। कुछ पन्ने जल्दी-जल्दी में पढ़ कर उन्हें सुनाए। बात उनकी समझ में आने लगी थी। तभी पापाजी ने धर्म की दुहाई दी किसी को पानी पिला नहीं सकते तो किसी का पानी छीनों भी मत। लोगों ने तो जाने क्या-क्या पूण्य करके कूएं बनवाए। इसे पाटकर पाप का बागीदार क्यों बन रहे हो?

बहरहाल “आज भी खरे हैं तालाब” के खरेपन पर अंदर से अभिमान हुआ और बाहर से ये संतोष की कूआं पटने से बच गया। कुछ इस तरह का विनम्र प्रभाव है अनुपमजी का। अब कूएं की साफ-सफाई और उसमें कूड़ा करकट ना पड़े इसके लिए जाली लगाने का प्रबंध मुहल्ले के लोग कर रहे हैं।

अतुल चौरसिया

Advertisements

2 टिप्पणियाँ

Filed under Uncategorized

2 responses to “कुछ ऐसा विनम्र प्रभाव है अनुपमजी का

  1. bahut khoob..
    kabhi mauka mila to main bhi padhna chahunga..

  2. वाह, यह तो बहुत अच्छा हुआ। कभी किसी पुस्तक का किसी पर इतनी जल्दी इतना अच्छा प्रभाव पड़ते नहीं देखा सुना।
    घुघूती बासूती

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s