पूत के पांव गर्भ में…

जब बात अपनी गिरेबान में झांकने की हो तो बेशर्मी की चादर ओढ़ना कोई इनसे सीखे। दिल्ली से दरभंगा तक समाज सुधार की दुहाई देनी हो, नैतिककता के हर तकाजे की चिंता में मरे जा रहे टीवी मीडिया की बात कर रहा हूं। हालांकि मीडिया पर लिखने पर आज ये आरोप लगाना आसान हो गया है कि ये कुंठा निकालने का जरिया है। पर कहने वाले कहते हैं लिखने वाले लिखते हैं।

आज से 50 साल बाद जब पत्रकारिता के स्कूलों में टीवी मीडिया का इतिहास पढ़ाया जाएगा तो एक हल्लेदार बात जरूर पड़ाई जाएगी। ख़बरिया चैनलों के शुरुआती दिनों में एक ऐसा चैनल हुआ करता था जिसे दो महीनों के लिए प्रसारण से प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसकी वजह थी एक रिपोर्टर की आपराधिक महत्वाकांक्षा और एक मीडिया हाउस द्वारा सतही, ग़ैर जिम्मेदार तरीके से प्रसारित की गई एक रिपोर्ट। कर्ता धर्ता थे प्रकाश सिंह नाम के एक महाशय जिन्हें पत्रकारिता के ऊंचे मानको न सही उसे शर्मसार करने के लिए जरूर याद किया जाएगा।

अपना तो अपना ही होता है। तो फिर अपने लाल को टीवी वाले ऐसे कैसे छोड़ देते। पुरानी कहावत है उंगली में जख़्म हो तो उंगली काट कर नहीं निकाल देते। इसी कहावत को गांठ मार लिया है टीवी वालों ने। बिल्कुल नेताओं की तरह बीती ताहि बिसार के आगे की सुधि लेहु।

गुड़िया की सारे देश के सामने पंचायत लगवाने वाला मीडिया, आरुषी हत्या के मामले में 8 दिनों में 88 संभावनाएं पेश कर चुका टीवी मीडिया पत्रकारिता के इतिहास के कुछेक दुर्लभतम कारनामों में से एक को अंजाम देने वाले प्रकाश सिंह को साल भर से भी कम समय में क्षमादान दे चुका है।

जब मुंशी का डंडा सूचना प्रसारण मंत्रालय से निकलता है तो सब के सब एक सुर से घिंघियाते हैं– ये प्रेस की आज़ादी पर हमला है, अपने ऊपर रोक-रपट मीडिया खुद ही लगाएगा। किसी सरकारी फरमान की जरूरत नहीं है। क्या दिखेगा, क्या लिखेगा और क्या नहीं इसका फैसला मीडिया अपने आप करेगा तो लोकतंत्र, राजनीति, समाज सब सुरक्षित रहेगा।
ऊपर से ये चिकनी बातें कितनी अच्छी लगती है। पर दिखता क्या है– ख़बर के नाम भूत प्रेत, नाग नागिनों से पीछा छूटा तो अब महादेव शंकर के दर्शन से साईं बाबा और तो और रावण के विमानपत्तन तक पहुंचने का दम सब के सब कर रहे हैं। इसी रेलमपेल में टीआरपी देवता प्रसन्न हैं और चैनल एक नंबरी-दो नंबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसी को सेल्फ रेगुलेशन कहते हैं। खबरों पर आत्म नियंत्रण का ये कैसा चेहरा है? सब छुट्टा सांड़ों की तरह ख़बरों के नाम पर पत्रकारिता को रौंद रहे हैं।

बुजुर्गों ने कहा था कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं यहां तो गर्भ में ही दिख रहे हैं। वॉयस ऑफ इंडिया नाम का नया ख़बरिया चैलन भीड़ में शामिल होने की कशमकश में लगा है। चैनल अभी प्रसारित भी नहीं हुआ है इन्होंने प्रकाश सिंह महोदय को बतौर अपना कर्मचारी नियुक्त किया है। ख़बर है ये त्रिवेणी वाले उनसे फिर से पत्रकारिता करवाएंगे। यही है मीडिया का सेल्फ रेगुलेशन। इतनी मोटी सी बात भी घुटनाग्रस्त दिमाग में नहीं आती तो कोई क्या करे?

अतुल चौरसिया।

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