ये मन से जुड़ने का सवाल है

“भइया तोहार साली” यही फिल्म का नाम था जिसने पिछले हफ्ते भर से शिवम टाकीज़ की हमेशा शांत रहने वाली टिकट खिड़की पर खिचखिच मचा रखी थी। टिकट के लिए मारामारी देखकर ऐसा लगता था कि 70 के दशक की कोई अमिताभ बच्चन की फिल्म रिलीज़ हुई हो। लोगों से बातचीत में पता चला कि फिल्म तो पिछले एक हफ्ते से लगी थी लेकिन हर रोज़ इवनिंग और नाइट शो में इसी तरह की मारामारी मचती है। अब जिज्ञासा और बढ़ गई। सिर्फ इसी फिल्म के लिए या फिर हर फिल्म के लिए टिकट खिड़की पर मारामरी मचती है। तो पता चला कि अरे हर फिल्म के लिए कहां भीड़ आती है, ये तो भोजपुरी फिल्म है इसलिए ये हाल है।

भोजपुरी फिल्मों के लिए हाल के कुछ सालों में पैदा हुआ प्यार अचानक कहां से आया है, ये विचार का विषय है। पहले तो भोजपुरी फिल्मों का बाज़ार इतना व्यापक नहीं था। भोजपुरी पिछड़ों, गंवारों की भाषा थी। शुद्ध रूप से मुनाफे पर आधारित फिल्मी दुनिया का अर्थशास्त्र भोजपुरी को इतनी तरजीह इससे पहले तो कभी नहीं दे रहा था। अब इसके लिए किसी मनोज तिवारी या रवि किशन को श्रेय देने की जरूरत नहीं है। इन्होंने भोजपुरी को ये मुकाम नहीं दिलाया है बल्कि भोजपुरी ने इन्हें पहचान दी है।

एक दौर में निम्न और मध्यम तबके के गुस्से और रोष को एंग्री यंग मैन ने जुबान दी थी। तो इसमे अमिताभ से ज्यादा योगदान एक ऐसे नायक का शिद्दत से इंतज़ार को जाता है जिसे सबसे पहले अमिताभ ने समय रहते दोनों हाथों से लपका था। दर्शकों को 70 के दशक में जिस नायक की दरकार थी उसे अमिताभ के रूप में एक प्रतीक मिल गया था जो अगले दो दशकों तक उनकी कुंठाओं, दबी हुई चिंगारियों को दमदार संवादों और अधकचरी विकसित स्टंट तकनीकों की बदौलत तुष्ट करता रहा। बाद में अमिताभ का जादू कुछ फीका पड़ा तो मिथुन के रूप में अगली कतार में बैठे दर्शकों को एक नया तारणहार मिल गया। आधी फिल्म पूरी होने तक घर बार से रुखसत, ज्यादातर अनाथ ये हीरो जब बदला लेता था तो सीटियों, तालियों के साथ लोगों को अपना गुबार को शांत करने के लिए गालियां निकालते हुए भी सुना जा सकता था। एक ही तर्ज पर लगातार फिल्में करने के बावजूद मिथुन सिनेमा के गंवई बाज़ार के बादशाह बने रहे। पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार के सिनेमा हॉल्स में इनकी फिल्में खूब तालियां बटोरती। लेकिन ये दौर भी जाना था सो चला गया।

अब 90 का दौर हैं। यहां शाहरुख, सलमान जैसे चॉकलेटी सितारे हैं जो स्विटज़रलैंड की खूबसूरत वादियों में 0 डिग्री तापमान पर झीनी साड़ी में लिपटी हिरोइनों के साथ कमर हिलाते हैं। ये शानदार महलनुमा घरों में रहते हैं। 70-80 का चालों, गांव की झोपड़ियों में रहने वाला हीरो पर्दे से लुप्त हो गया है। 90 के उत्तरार्ध के दशक के हिंदी सिनेमा ने तो अपना चेहरा बिल्कुल ही बदल डाला। अब यहां सिर्फ मल्टीप्लेक्स, ओवरसीज़ के लिए फिल्में बनने लगी हैं। ऊप्स जैसी ऊटपटांग फिल्मों के लिए तो इंडस्ट्री में पैसा है पर गांव-समाज को फिल्मों में दिखाना शान के खिलाफ है। कुल मिलाकर हिंदी सिनेमा काफी लकदक हो गया है और हां इसके साथ ही हिंदी सिनेमा की भाषा भी अब हिंदी न रहकर हिंगलिश हो गई है।
पर अफसोस ये सारा बदलाव एकतरफा था। अमिताभ, मिथुन, गोविंदा की फिल्मों को हिट कराने वाला ग़ैरशहरी, गांवो, कस्बों में रहने वाला तबका अभी भी मौजूद है। पर अब उसके लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने फिल्में बनाना बंद कर दिया है। इंडस्ट्री ने एकतरफा फैसला कर लिया कि जितने एडवांस फिल्मवाले हो गए हैं उतना ही विकसित उनका दर्शक वर्ग भी हो गया है। वो कहते हैं न कि फिल्मी दुनिया हकीकत से परे सपनों की दुनिया है। इसी तरह हिंदी फिल्म वाले भी सपनो में जीने लगे हैं। आज 10 में 9 फिल्में पिट जाती हैं फिर भी उस तबके के लिए फिल्में बनाने को कोई राजी नहीं है जो अमिताभ के लिए पहले दिन का पहला शो देखने के लिए सुबह आठ बजे से खिड़की पर जम जाता था। मिथुन के लिए भरी दुपहरी में लाइन लगाने वाले दर्शक के लिए कोई फिल्म अब नहीं बन रही। उसकी भाषा में जबर्दस्ती अंग्रेज़ी को घुसा कर उसे जबर्दस्ती घोंटने के लिए मजबूर किया जाता है।

तब उसकी नज़र अपनी भाषा में बनने वाली भोजपुरी फिल्मों की ओर गई। यहां उसकी अपनी कहानी मौजूद थी। अपना गांव-देहात मौजूद था। यहां का नायक उनकी जुबान बोलता था। गरीब हीरो अमीर लड़की और खलनायक बाप का मजबूत गठजोड़ उसे भोजपुरी फिल्मों में देखने को मिला। शहरी लड़की गंवई छोरे पर मिटी तो आगे की सीट पर बैठा दर्शक इसे अपनी जीत समझ कर उछाल मारता था। इसलिए भोजपुरी फिल्म आज हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए हॉट मार्केट बन गया है। हिंदी की बिसात पर अपना उल्लू सीधा करने में लगे फिल्मवाले, 10 में से 9 शब्द अंग्रेजी में बोलने वाले फिल्मवाले आज भोजपुरी का गुणगान करते नज़र आते हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां आसानी से खूब पैसा बनया जा सकता है।

जब बड़े-बड़े सितारों की फिल्में पिटती हैं तो अदने से कलाकारों और बजट वाली भोजपुरी फिल्म पूर्वी यूपी में बॉक्स ऑफिस तोड़ रही होती है। इसलिए “भइया तोहार साली” के लिए लाइल लगती है तो टशन, सांवरिया पानी नहीं मांगती। ये मन से मन के जुड़ने का सवाल है। मन से जुड़ो तो पैसा खुद बन जाएगा।

अतुल चौरसिया

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1 टिप्पणी

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One response to “ये मन से जुड़ने का सवाल है

  1. अति सुंदर विश्लेषण.
    आपसे सहमत हूँ.

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