हमारा नेता चौड़े से…

कई दिनों से लिखने का शगुन नहीं बन रहा था, या कहें कि कुछ मजेदार लिखने को सूझ नहीं रहा था। आप इसे अपन का तंग हाथ कह सकते हैं, तो सोचा कि एकाध इलाहाबादी दिनों का संस्मरण लिखा जाय। विश्वविद्यालय की घनी पेड़ों की छांव में पढ़ाई लिखाई संबंधित क्रिया-कलापों के अलावा बाकी सब कुछ होता था। बम बनाने के गुर यहां के कुछ मठाधीश बुजुर्गवार (बाइज्जत सीनियर) बाकायदा नवांगतुकों को सिखाते रहते थे। बहरहाल इसके अलावा भी इस विद्यालय की एक ख़ास पहचान हैं-यहां के छात्र नेता। परिसर में छात्र कम कड़ियल झक सफेद खद्दरधारी छात्र नेता ज्यादा नज़र आते थे। यहां का मशहूर जुमला है विश्वविद्यालय परिसर राजनीति की पहली पाठशाला है। गणेश शंकर विद्यार्थी भवन का लतियाया-जुतियाया सीधे संसद भवन पहुंचता है।

बहरहाल यहां अपनी चर्चा का विषय कक्षा के वो छात्र है जिनके अंदर नेतागिरी का कीड़ा तो कुलबुलाता रहता था पर प्रतिभा की कमी या उससे भी ज्यादा पैसे की कमी की वजह से परिसर में उनका झंडा बुलंद नहीं हो पाता था। हर कक्षा में इस तरह के कीड़े से ग्रस्त दो चार प्राणी जरूर मिल जाते थे। और मज़े की बात ये थी कि क्लास में जी-10 भी हुआ करता था। ये ऐसे छात्रों का समूह था जिनकी राजनैतिक प्रतिबद्धताएं सुबह चाय-ब्रेड-बटर और शाम को चाट- समोसे के साथ बदल जातीं थीं। खासियत ये थी कि ये अपना शिकार भांपने के बाद पूरी ईमानदारी से उनके पीछे खड़ा होता था। नेतागिरी के कीड़े की कुलबुलाहट से परेशान नेता को इस बात का भान करवा दिया जाता था कि उनके पास अच्छा खासा छात्रों का समर्थन है। जी-10 के पास छात्रहित से जुड़े मुद्दों का रेडीमेड भंडार होता था। जिसके सहारे वो नेताजी को परिसर में धरना-हड़ताल-प्रदर्शन के लिए तैयार करते थे। नेताजी को भी अहसास हो जाता था कि इन्हीं खटकरमों से गुजर कर विश्वविद्यालय की गद्दी हथियायी जाती है। हर दिन परिसर में नेता जी का जुलूस निकलता। जी-10 उनके पीछे खड़ा रहता। नारे लगते हमारा नेता चौड़े से—बाकी नेता (सेंसरर्ड) से। क्यों पड़े हो चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में। मजे की बात ये थी कि छात्रों के स्कॉलरशिप से लेकर छात्रावास दिलाने तक हर मुद्दे की मांग में नारे यही लगा करते थे। स्कॉलरशिप, छात्रावास का जिक्र भी कानों में नहीं पड़ता था। इन तमाम चकल्लस के साथ जी-10 के नाश्ते-पानी का जुगाड़ एक सत्र के लिए हो जाता था।। नेताजी गद्दी पाने के सपने में चंपुओं से घिरे रहते लेकिन उन्हें इसका अहसास नहीं होता था या कि होने ही नहीं दिया जाता था। मजे की बात तो ये थी कि इन्हीं के बीच से जलूस के दौरान पत्थर फेंका जाता था। लेकिन जब सामने से घुड़सवार पुलिस का मुगलई काफिला लट्ठ पटकता हुआ पहुंचता था तो नेता जी भरे मैदान में अकेले नज़र आते। इसके बाद उन्हें अपने रंगरूटों का दुबारा से दर्शन अगली सुबह सीधे स्वरूपरानी हॉस्पिटल के बेड पर पड़े-पड़े ही हो जाता था। नेताजी को होश हवास में आने के बाद उन्हें फिर से इस बात का अहसास करा दिया जाता था कि बिना पुलिसिया लट्ठ खाए कोई नेता हो सकता है भला। पुलिस की लाठी खा कर ज़मीन पर गिरा नेता ही आगे चलकर ज़मीनी कहलाता है।

नेता जी चुनावी चक्कर में इस क़दर फंसते थे कि परीक्षा में फेल हो जाते। जी-10 अगले शिकार की खोज शुरू कर देता क्योंकि फेल नेता दुबारा से चुनाव नहीं लड़ सकता। गांव में मां-बाप खेती-किसानी से जुड़े थे। यहां लड़के को नेतागिरी की धुन सवार हो गई। जी टेन ने उन्हें संसद तक का सपना दिखाया था आज तक कोई अपन को यहां नज़र नहीं आया। यहां आया तो पता चला अब दिल्ली सिर्फ धर्मेद्र सिंह यादव, राहुल, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य, जितिन प्रसाद जैसे पहुंचते हैं। अब खेती किसानी वाला बाप मुलायम सिंह यादव की बराबरी तो कर नहीं सकता ना। अब गुस्से में भले ही कोई कह दे– इलाहाबाद में लाठी खाने के लिए हमारा बेटा और दिल्ली में मलाई काटने के लिए मुलायम का बेटा, पर कर भी क्या सकते हैं?

नतीजा, गए थे पढ़ लिख कर साहब बनने वापस आकर खेती किसानी में हाथ गंदे करने पड़ गए। बाप भी कितने दिन जवान बेटे को बैठाकर खिलाता। नेतागिरी का कीड़ा फिर भी रह-रहकर कुलांचे मारता लिहाजा गांव के परधानी के चुनाव में हाथ आजमाने से खुद को रोक न सके। लेकिन यहां भी किस्मत साथ नहीं दे सकी। यहां ठाकुर पंडित मिल गए, अहीरों का वोट कम पड़ गया ऊपर से हरिजन बस्ती ने भी आखिरी समय में हाथ खींच लिया। अब ये कोई विश्वविद्यालय का चुनाव तो है नहीं। यहां तो एक एक वोट जाति बिरादरी के तराजू पर तौल कर और रिश्तेदारी-पट्टीदारी की भट्टी में तपाकर दिए जाते हैं। लिहाजा बेचारे नेताजी को यहां भी हार से दो चार होना पड़ा। इधर अपन को इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संसद पहुंचने वाले नेता का अभी भी इंतज़ार है।
अतुल चौरसिया

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1 टिप्पणी

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One response to “हमारा नेता चौड़े से…

  1. हां, ये तो है कि हाल-फिलहाल में तो कई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से निकला नेता संसद नहीं पहुंचा लेकिन, उम्मीद पर दुनिया कायम है..

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