रेल का लालूकरण या बिहारीकरण या फिर बिहार का रेलीकरण

अपना देसी रेल हैबात शुरू करने से पहले दो बातें डिस्क्लेमर के तौर पर लिख दूं कि अपन को बिहार से रत्ती भर भी परहेज, घृणा या उस तरह की कोई परेशानी नहीं है जिस तरह का पर्याय “बिहारी” शब्द देश के अलग-अलग हिस्सों में बन गया है। विषय हाल ही में मेरी रेल यात्रा और उसके यात्रियों की बातचीत, सुविधा-असुविधा पर आधारित है जिसमें उपरोक्त शब्द (लालूकरण, बिहारीकरण, रेलीकरण) बार-बार लोगों की जुबान पर आए। इसे अन्यथा न लें…

चर्चा का बिंदु ये है कि जब से लालूजी ने रेलमंत्रालय संभाला है उनका दावा है कि रेल के यात्री किराए में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गई है। ये अलग बात है कि इसके बावजूद रेल को अपने जन्म के बाद से पहली बार मुनाफे का शगुन इन्हीं के कार्यकाल में देखने को मिला। लालू के इस दावे से कम से कम अपन इत्तेफाक नहीं रखते। उनकी बाजीगरी ये रही कि ज्यादातर ट्रेनों को उन्होंने एक्सप्रेस की श्रेणी में डाला और एक्सप्रेस श्रेणी का किराया अपने आप दूरी के परिमाण में बढ़ाने का प्रावधान किया। अब उन्होंने कोई ऐसी ट्रेन छोड़ी ही नहीं जिसे एक्सप्रेस की श्रेणी में न डाला गया हो। इस तरह से सबके किराए अपने आप ही बढ़ गए। शायद जनरल के किराए इससे अछूते रह गए हों।

ऊपर जो रेल के लालूकरण या बिहारीकरण की बात कही गई है वो साथ में यात्रा कर रहे दो बंधुओं की आपसी बातचीत से निकली। पूरे के पूरे कोच में कहने को तो ये शयनयान श्रेणी थी लेकिन गलियारे और बर्थों के बीच के स्थान पर भी पैर रखने की जगह नहीं थी। यानी पूरी बोगी खचाखच भरी थी। ऐसा नहीं था कि किसी के पास टिकट न रहा हो, लेकिन सबका टिकट वेटिंग का था। कुछ समय पहले तक हर ट्रेन की वेटिंग लिस्ट की एक सीमा होती थी। पर ऐसा लगता है कि अब ये सीमा रेलमंत्री महोदय ने खत्म कर दी है। पांच सौ से छह सौ तक वेटिंग का टिकट भी जारी करने में अब रेलवे को दिक्कत नहीं होती। तो फिर जनरल और शयनयान या फिर एसी में इस नीति के बाद क्या अंतर रहा। इसी बहस में भाइयों ने कहा रेल का भी लालूकरण कर दिया लालू ने। जिस तरह उन्होंने दस सालों में बिहार का बेड़ा गर्क किया था।

अब बात रेल के तत्काल दर्जे की कर ली जाय। पहले तत्काल सेवा का मतलब ही ये हुआ करता था कि जिस दिन रेल को रवाना होना है उसी दिन अगर उसमें कुछ बर्थ खाली रह गई हो तो उन्हें तत्काल के जरिए भर दिया जाय। तत्काल का मतलब ही था उपलब्ध होगा तो मिलेगा नहीं तो नहीं। आज क्या हो रहा है– तत्काल के अंतर्गत आप पांच दिन पहले टिकट ले सकते हैं (अब इस सीमा को और बढ़ाने का एलान भी हो गया है) ये कैसा तत्काल है। जहां दस दिन पहले ही आदमी को तत्काल का पता रहता है। और सुनिए अब तत्काल के लिए बाकायदा एक नई बोगी लगती है। तो फिर ये तत्काल का कॉन्सेप्ट क्या है भाई? करेले का नीमाभियान भी देखिए तत्काल सेवा में भी लालू की कृपा से वेटिंग का चक्कर चल रहा है। और दो चार नहीं दो सौ से ढाई सौ की वेटिंग लिस्ट तत्काल सेवा में जारी होती है। ये कैसा तत्काल है भाई! लालू से कोई पूछना। इस तरह से कुल मिलाकर लालू ने रेल का लालूकरण कर दिया। फायदे में रेल है या कोई मरीचिका इसका पता तो उनके मंत्रालय से हटने के बाद चलेगा लेकिन सुविधाओं का जो स्तर लालू ने रेल का किया है उसमें कोई शक नहीं कि अव्यवस्थ और भदेस से उनका पुराना नाता है। लाठी रैला जैसा विचित्र प्रयोग किए बिना उनकी क्षुधापूर्ति नहीं होती।

अपने एक भाई हैं पत्रकारिता के पेशे में, नाम है यशवंत देशमुख। कोई चार-पांच साल पहले की बात है, एक मुलाकात में उन्होंने लालू को सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा अगुवा करार दे दिया। महफिल में चक्रवात आ गया। सब के सब एक सुर से बिहार की दुर्दशा के लिए लालू को कोस रहे थे फिर ये उलटी बात यशवंत भाई ने कैसे कर दी। उन्होंने स्पष्टीकरण दिया बिहार के सामाजिक ताने बाने में बहुत ऊंच-नीच था। दस फीसदी लोग संपन्न थे, नब्बे फीसद फटेहाल थे जिनके शरीर का कपड़ा तार-तार हो चुका था। दस सालों में लालू ने क्या किया बाकी बचे दस लोगों को भी नंगा कर दिया। इस तरह से उन्होंने एक नई तरह की सामाजिक समरसता फैलाई बिहार में। सबको एकाकार कर दिया।

उस दिन ट्रेन में दो अनजान बंधु भी यशवंत भाई की याद दिला रहे थे। अंजाने में ये कैसा संयोग था। उधर ट्रेन के एक और यात्री ने कहा सा….. इस देश में सिर्फ बिहार का ही रेलीकरण हुआ है। ये बात काफी हद तक विचारणीय है। हर साल रेल बजट की कसरत में भी ये परंपरा नज़र आती है। बिहार से आने वाले हमारे नेताओं में रेल का चस्का कुछ ज्यादा ही दिखाई देता है। नितीश, रामविलास के बाद लालू उस समृद्ध परंपरा के अगले ध्वजवाहकमात्र हैं।

कुल मिलाकर यशवंत भाई की छह साल पहले वाली बात के हिसाब से क्या लालू ने रेल का बिहारीकरण कर दिया या फिर सिर्फ उसका लालूकरण किया है या फिर सब मिलकर सिर्फ बिहार का रेलीकरण कर रहे हैं। है ना सब कुछ गड्डमड्ड। अपन को भी नहीं समझ आती क्या किसमें घुस गया है। यही लालू की सियासत है जहां सब कुछ गड्डमड्ड है। इस बार लालू बिहार की बजाय रेल की सामाजिक समरसता बढ़ा रहे हैं।

अतुल चौरसिया

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4 टिप्पणियाँ

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4 responses to “रेल का लालूकरण या बिहारीकरण या फिर बिहार का रेलीकरण

  1. aap ki baate bilkul sahi hai.main khud bihar se hun.
    laalu ki ye sab akro ki bazigari hai.hum aap ki soch se puri trah sahmat hai.

  2. khushboo

    bhai kya bat hai….pata chal gaya aapka dafar kaisa beeta hoga…..iss bar pareshan mat hona or tension nai lene ka or bindas ten days before hi tatkal me turant ticket lene ka…..okkkkkkkkkk…….tc….

  3. khushboo sharma

    bhai maza aa gaya lekin pata chal gya apka safar kaisa raha hoga…..agli bar safar per jane se pehle tension nai lene ka….bindaaaaaas ten days before tatkal me turant ticket lene ka…..or aaram se lait laga ke jane ka……okkkkkkkkkkk…tc…

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