वसुधा भव कुटुंबकम वाया आईपीएल

ब्रेट ली ने कैफ को आउट किया किसी को कष्ट नहीं हुआ। साइमंड ने इशांत को चौका मारा टेंशन नहीं हुआ। माइक हसी ने हिंदुस्तानी गेंदबाज़ों की धज्जी उड़ा दी लोग मजे से तालियां बजा रहे थे। रिकी पोंटिंग ने दो कैच पकड़े लोग खुशी से झूम रहे थे।

ये कुछ झलकियां हैं क्रिकेट के अफलातून संस्करण टी-20 की और अगले महीने भर इसी तरह की तमाम हैरानी भरी घटनाओं का गवाह बन सकती है दुनिया। दो महीने पहले ऑस्ट्रेलिया दौरे पर सिडनी में भारत और ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटरों के बीच जिस दर्जे की कड़वाहट दिखी थी उसके बाद क्या कोई कल्पना कर सकता था कि पोंटिंग और गांगुली, द्रविड़ का विकेट लेकर आपस में गले मिलेंगे? साइमंड और लक्ष्मण विरोधी गेंदबाज़ी को तहस-नहस करने की जुगाड़पंथी में व्यस्त नज़र आएंगे। बहरहाल आईपीएल ने ये सब न सिर्फ कर दिखाया बल्कि इतने बड़े पैमाने पर कर दिखाया है कि एक बार को इस आयोजन को लेकर नाक भौं सिकोड़ रहे इंग्लैंड जैसे रूढ़िवादी क्रिकेट वाले देश भी अपनी राय बदलने को मजबूर हुए हैं।

रही बात क्रिकेट के असल संस्करण की मिट्टी पलीद होने की तो इस बात में शायद कोई खास दम नहीं है। एक तो क्रिकेट की नियामक संस्था इसे हर हाल में ज़िंदा रखने की कोशिश कर सकती है और करेगी। दूसरी बात इस तरह की बेबुनियाद बातें एकदिवसीय क्रिकेट के आने के बाद भी हुई थी लेकिन वो समय के साथ ग़लत साबित हो गईं। आज एक तबका टी-20 को लेकर भी इसी तरह के विधवा विलाप कर रहा है। क्रिकेट को मनोरंजन बना दिया गया…, टेस्ट को मार दिया गया…, नाच गाने का मंच बना दिया गया… आदि… आदि…।

अब इस विलाप पर क्या कहा जाय। दुनिया में कोई भी खेल हो, सदियों पुरानी परंपरा रही है, मानव सभ्यता के विकास के बाद से लेकर आज तक मनुष्य ने खेलों का ईज़ाद ही मनोरंजन के लिए किया है। खेल कोई सामाजिक क्रांति लाने के लिए नहीं खेले जाते। कालांतर में भले ही ये दो देशों के बीच सम्मान के मुद्दे पर खेले जाने लगे हों पर हमेशा गेम स्पिरिट की बात ही कही जाती है। इस लिहाज से आईपीएल ने खेलों की मूल भावना को एक क़दम और आगे भर बढाया है। आखिर क्रिकेट भी फुटबॉल की तरह नौ देशों से 109 देशों का खेल क्यों नहीं बनना चाहिए?

आईपीएल ने इसकी शुरुआत कर दी है और इतने सकारात्मक तरीके से की है कि ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, भारत, पाकिस्तान, वेस्टइंडीज, श्रीलंका, न्यूजीलैंड सब के सब एकाकार हो गए हैं। फिर चिंता काहे की। “वसुधा ही एक कुटुंब” की भारतीय शाश्वत परंपरा को भी भारत एक बार फिर से दुनिया के सामने पेश कर रहा है। परेशानी किसे है?

अतुल चौरसिया

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2 टिप्पणियाँ

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2 responses to “वसुधा भव कुटुंबकम वाया आईपीएल

  1. उन किसानों को भी नहीं है जो बी सी सी आई वाले पवार जी के कार्यकाल में कृषि करते हुए आत्म हत्या जैसे अपराध से कलंकित हुए..

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