इलाहाबाद विश्वविद्यालय का शोध उलटबयानी करता है

एक शोध के मुताबिक स्कूल कॉलेजों में लड़कियों की मौजूदगी से पढ़ाई का माहौल बेहतर बनता है। लड़कों की उद्दंडई काबू में रहती है। शिक्षकों और शिक्षार्थियों के बीच रिश्ते मजबूत और आत्मिक बनते हैं। भरी कक्षा में चाक-चिकोटी से लड़के परहेज करते हैं। लड़कियां कक्षा में सकारात्मक माहौल बनाती हैं। अब शोध किन पैमानों के आधार पर किया गया है, किस उम्र वर्ग के छात्रों के बीच किया गया है ये सवाल अपन से न पूछे, और ना ही अपना पाला कभी इन चीज़ो से पड़ा। पांचवी तक को एजुकेशन में पढ़े तब तक इन चीजों की समझ ही नहीं थी। इसके बाद बारहवीं तक की पढ़ाई एकलिंगी शिक्षा व्यवस्था के तहत हुई, यानी सिर्फ लड़कों के स्कूल में।

इसके बाद एक बार फिर से को-एड का सिलसिला शुरू हुआ इलाहाबाद विश्वविद्यालय में। यहां का अपना अनुभव शोध की रपट के बिल्कुल उलट कहानी कहता है। तकरीबन 80 से 90 फीसदी युवा छात्र ऊपर वर्णित हालातों से गुजर कर ही इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की दहलीज में प्रवेश करते हैं। यानी ज्यादातर गंवई पृष्ठभूमि वाले छात्र। यहां की को-एड क्लासेज़ में पहुंचने के शुरुआती दौर में ज्यादातर छात्र बौराने के मुहाने पर पहुंच जाते हैं। सब नहीं तो एक बड़ा तबका इस राह से दो-चार होता ही है।

कुछ एकतरफा प्यार की पींगे बढ़ाने लगते हैं। कोई फर्जी ही अपना चक्कर किसी से उछालता रहता है। दोस्तों के बीच में शुरआती साल दो साल इन्हीं सपनों के महल बनाने– बिगाड़ने और फिर से बनाने में गुजर जाते हैं। अक्सर इनका दुष्परिणाम भी कइयों को भुगतना पड़ता है। कुछ का इस उठा-पटक में किसी से प्यार व्यार हो भी जाता है। यहां आगे बढ़ने से पहले एक बात बतानी जरूरी है कि इस विश्वविद्यालय का चलन है कि अगर हॉस्टल में रहने वाले किसी लड़के का किसी दूसरे लड़के से पंगा हो गया तो ये मामला उस पूरे हॉस्टल की इज्जत से जुड़ा माना जाता है। और इसकी सज़ा उस छात्र को संबंधित हॉस्टल के सभी छात्र सरेआम विश्वविद्यालय परिसर में पिटाई करके देते है।

इस तरह से पहले और दूसरे साल के छात्रों की ख्याली प्यार मुहब्बत से जुड़ी लड़ाइयों का गवाह परिसर अमूमन हर रोज़ बनता है। कभी कभी तो कहानी इतनी हास्यास्पद हो जाती है कि वाकए का जिक्र करना लाजिमी हो जाता है। जैसे अपने ही एक मित्र थे, बेचारे अक्सर कहा करते थे फला लड़की हमेशा क्लास में उन्हें निहारती रहती है। पार्क बैठकर अक्सर उसी की चर्चा छेड़ देते थे। एक दिन विश्वविद्यालय से वापस घर पहुंचे तो आंख सूजी हुई और मुंह से खून निकल रहा था। पूछने पर पता चला कि एएन झा (हॉस्टल) के लड़कों ने पीटा है। कारण वो खुद भी नहीं बता सके। अगले दिन भाई साब तो नहीं पहुंचे पर अपन लोग फिर से क्लास में दाखिल हुए। कहानी क्या थी ये जानने का कीड़ा सबके मन में कुलबुला रहा था।

जैसे ही क्लास खत्म हुई सब एक दूसरे की थाह लेने लगे। बात बात में खुलासा कुछ यूं हुआ कि भाई साब जिस लड़की को अपने प्यार के पाश में बंधा समझ रहे थे वो दरअसल अपनी ही क्लास के एक दूसरे छात्र- जो ए एन झा का प्रवासी था- के प्यार में चूर थी। हर दिन जिसे वो प्यार की निगाह समझते रहे वो दरअसल नफरत की नज़र थी। बात की आखिरी परत कुछ यूं खुली कि इसी नज़र और प्यार के धोखे में उन्होंने एक कागज का टुकड़ा चलती क्लास में लड़की की तरफ उछाल दिया था। और ये कागज का टुकड़ा उनके लिए ताबूत की आखिरी कील बन गया। लड़की के प्रेमी ने अपने छात्रावासी सहयोगियों के साथ भाई साब की दुर्गति की थी। 

बहरहाल व्यक्तिगत वाकए का जिक्र कहानी को मुद्दे से भटका रहा है पर इसका जिक्र भी जरूरी था। यहां आधे से ज्यादा लड़ाईयां प्यार मोहब्बत की इसी तरह की फर्जी कहानियों पर होती हैं। जो बड़बोलेपन में शुरू होती है और दुखद अंत को पहुंचती है। कोई ऐसा दिन नहीं जाता जब इस तरह की छोटी-मोटी लड़ाईयां क्लास के अंदर या बाहर न होती हों। कभी पिटने वाले को पता नहीं चलता कि उसका कसूर क्या है तो कभी पीटने वाला खुद बिना मतलब के फटे में टांग अड़ा रहा होता है। यानी बिना मतलब सिर्फ लड़की पर इंप्रेशन झाड़ने के चक्कर में।

बहरहाल ये शोध रपट तो तेल अवीव की है। अब दुनिया के संदर्भ में ये कितनी कारगर है अपन को नहीं पता। पर इलाहाबद के मामले में ये बात पक्की है कि मामला इसके उलट है। यहां लड़कियां ही आधी लड़ाई की जड़ में होती हैं। वो भी ऐसी लड़कियां जिन बेचारियों को खुद नहीं पता होता कि जूतम-पैजार उनकी वजह से हो रही है।

अतुल चौरसिया

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5 टिप्पणियाँ

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5 responses to “इलाहाबाद विश्वविद्यालय का शोध उलटबयानी करता है

  1. जी बिल्कुल सही कहा आपने, ये बाहर के शोध और हमारे यहाँ के यथार्थ में तो हमेशा फर्क रहता है, और अगर बात सामाजिक हो तो फर्क तो आना ही है. जैसे … येल विश्वविद्यालय में सेक्स सप्ताह होता है… अजी छोडिये वो क्या शोध करेंगे 😛

  2. अरे यानी सब जगह यही हाल है…..

  3. bahut sahi sodh hai ji.. 🙂
    mujhe ek news yaad aa raha hai patna ka.. kisi larke ki hatya ho gayi thi.. bad me pata chala ki kisi larki ke chakkar me hui hai.. aur uske bad pata chala ki jab Police larki se puchh-taachh karne gayi tab jakar larki ko pata chala ki kisi ki hatya uske karan hui hai..
    ab ise kya kahiyega??

  4. anand tripathi

    बात सही है जी हमने भी देखी है इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ये बात बी काम सेकेनद इयर मे लगभग।

  5. dr.pranav d shrotriya

    उदारीकरण ने शोध कार्यो को नई दिशा दे दी है .सारे कालेजो मै हालत एक जेसे है .
    डॉ. प्रणव देवेन्द्र श्रोत्रिय
    इंदौर पिन 452002 [भारत]

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