बंदूक के साए में शांति की मशाल…

गाहे-बगाहे मौका मिले तो दिल्ली के दिल इंडिया गेट का नज़ारा लेने जाइएगा। इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन के बीच तकरीबन दो किलोमीटर लंबी सीधी-सपाट सड़क को किसी पिंजरे में तब्दील कर दिया गया है। राजपथ की लाल मिट्टी खाकीमय हो गई है। लोगों की आज़ादी की वकालत करने वाला देश एक ग़ैर लोकतांत्रिक देश के पैरों की दासी की तरह व्यवहार कर रहा है। इसी से नाराज़ होकर प्रथम आईपीएस महिला ने ओलंपिक मशाल रिले दौड़ में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। नैतिकता की मांग क्या है? लोगों को शांति से विरोध करने का मौका दिया जाय। और शांति के प्रतीक खेलों की मशाल को आगे बढ़ाया जाय। लेकिन इसकी सुरक्षा पर पहली बार एनएसजी की पहरेदारी लगाई गई है। मानो तिब्बती विरोधी नहीं कोई आतंकवादी हैं। सरकार की तैयारियां ऐसा लगती हैं जैसे संसद पर किसी दूसरे हमले से निपटने की तैयारी हैं। सरकार का रवैया पूरी तरह से इस बात पर केंद्रित हो गया है कि चीन नाराज़ न हो, बाकी दुनिया से क्या लेना देना। लेकिन ये बाड़बंदी, ये शार्पशूटर, तीन किलोमीटर की यात्रा में तीस हजार सुरक्षाकर्मी भारत को एक जिम्मेदार देश के रूप में पेश नहीं कर रहे हैं, बल्कि भारत दुनिया के सामने एक ऐसे दब्बू देश के रूप में उभरा है जो अपने विकराल पड़ोसी की जम्हुआई से कांप गया है। कूटनीति भी किसी देश को इतना झुक कर चलने के लिए मजबूर नहीं करती। इसकी भी कुछ सीमाएं हैं। आखिर फ्रांस में भी तो मशाल का विरोध हुआ तो क्या फ्रांस दुनिया के सामने ग़ैरजिम्मेदार देश हो गया? क्या फ्रांस को पूरी दुनिया गाली देने लगी। लंदन में भी तो विरोध हुआ तो क्या वो शांति के विरोधी साबित हो गए? दरअसल ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि इन घटनाओं से उनकी छवि ऐसे जिम्मेदार देश के रूप में और मुखर हुई है जो लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हैं। जहां हर किसी को अपनी आवाज़ बुलंद करने की आज़ादी है। विरोध अपनी जगह है और ओलंपिक मशाल यात्रा अपनी जगह है। विरोध भी होगा और खेल भी होंगे। लेकिन भारत सरकार ने बंदूक के साए में शांति की मशाल दौड़ाने की जो प्रथा इस बार डाली है वो कहीं से भी जायज नहीं ठहरायी जा सकती। बीस से दो किलोमीटर और दो किलोमीटर से दो सौ मीटर तक ओलंपिक यात्रा का सिमटना ये बताता है कि सरकार चीन से कम तिब्बत के सच से ज्यादा घबरायी हुई है। अतुल चौरसिया  

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