फिर याद आयी वो होली

h2k_122.jpgछह साल बाद एक बार फिर से अपन होली के मौके पर उसी चौराहे पर थे जहां पहले हर साल होली की हुल्लड़ जवान हुआ करती थी। एक दिन पहले से ही यानी होलिका की रात से ही होली खेलने वालों का जत्था चौराहे पर जमा होकर होली की मस्ती में झूम रहा था। छह साल से अपने बचपन के चौराहे की होली को मिस करते-करते अचानक इस बार मन माना नहीं। फिर उसी अंदाज में उन्मुक्त होली– जहां किसी बड़े का कोई डर नहीं, किसी छोटे से कोई खास मर्यादा नहीं (मशहूर जुमला है बुरा न मानो होली है)। बस यही एक दिन होता था जब हर कोई अपने मन की करता था। रंग का सुरूर चढ़ते चढ़ते बात कपड़ों की चित्थम चित्था तक पहुंचती थी और फिर उसी हालत में बाज़ार के बाहर मौजूद पक्के पोखरे की तरफ सबका प्रस्थान होता था। यहां लोग रंग पुते चेहरों से निजात पाकर शाम की गुलाल-अबीर वाली होली की तैयारी करते थे। छह साल बाद भी चौराहे का नज़ारा कुछ कुछ वैसा ही था। हां कुछ चीज़ें थोड़ा व्यवस्थित जरूर हो गई थी। पहले होलिका की रात लड़को का हुजूम जुम्मन बैंड वाले या फिर किसी डेक की तेज़ धुन पर पूरी रात मस्ती करता था जिसमें होली के हिट फिल्मी गाने चलते थे। इस बार यहां खूब बड़ा सा डीजे लगा हुआ था। बातचीत में पता चला कि पिछले तीन साल से यहां डीजे ही आता है। इसकी धमक से पूरा मुहल्ला हिल रहा था। डीजे के स्टेज पर गुलाल उड़ रही थी। और रंग की जगह स्प्रे कलर छिड़के जा रहे थे। क्योंकि पानी का इस्तेमाल यहां वर्जित था। लेकिन अल्हड़ई का अंदाज़ वहीं था। मस्ती का सुरूर उसी तरह से लोगों के ऊपर छाया था जैसे अपन पहले खेला करते थे। इस बार जब छह साल बाद अपन चौराहे पर पहुंचे तो भगवान की दया ऐसी रही कि बचपन के तमाम साथी संगाती भी दूर-देस से यहां इकट्ठा हुए थे। फिर क्या रंग तो चढ़ना ही था। शाम को ही दोस्तों ने ठंडई का इंतज़ाम पक्का कर लिया था। पर भांग की व्यवस्था वैकल्पिक थी। यानी जिसे जरूरत हो ले या न ले। इसका भी एक अलग गुणा गणित है। कइयों की अब शादियां हो चुकी हैं। कुछ के अपने बाल बच्चे भी समझदार होने लगे हैं। ऐसे में बीवी की नाराज़गी लेने से बेहतर है कि दोस्तों के सामने खिल्ली उड़वा ली जाय। वरना इस चूतियापे वाले नशे की भेंट चढ़कर दो दिनों तक कौन अपनी भद्द पिटवाए। बच्चे हंस हंस के पागल हों और बीवी कुढ कुढ़ के। वो दिन तो रहे नहीं कि दो दिन बाद तक होली का असर चढ़ा रहता था तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था। यहां तो सबको अगले दिन नौकरी संभालने की टेंशन है। शहरों की ओर भागना है। लड़के भी शहरी माहौल के हैं उन्हें क्या पता पिताजी ऐसी उलट-सुलट हरकत क्यों कर रहे हैं। बहरहाल अगले दिन होली भी खूब जवान हुई। बाल्टी के बाल्टी रंग से लोगों को सराबोर करना और लोगों द्वारा खुद सराबोर होना। अपन भी छह सालों से दिल्ली की सूखी होली खेलकर उकता गए थे। जैसे जैसे समय आगे बढ़ा एक दूसरे की कपड़ा खिंचाई भी शुरू हो गई। कुछ साहब-सुबहा टाइप बंधु शुरू में थोड़ा इससे झिझकते रहे, लेकिन जल्द ही कूंए की भांग की तरह सब एक रस हो गए। हां एक बात और, अब पोखरे की तरफ जाने का रिवाज खत्म हो चला है। वहां पानी कम रहता है और साफ सफाई भी नहीं रहती लोगों ने बताया। बहरहाल उसी हालत में सब अपने घरों की तरफ निकल लिए। और शाम को फिर से बैठक जमी तो पुराने होली के मजेदार किस्सों से महफिल रंगीन हो उठी। सबके मन में इस बात की संतुष्टि थी कि बहुत दिनों बाद फिर से वही पुरानी होली खेली है। वरना तो ज्यादातर मित्र मंडली तितर बितर हो चुकी है। जो बचे खुचे हैं वो भी अकेलेपन की वजह से सुबह रंग के समय घर के अंदर ही रहना पसंद करते हैं। बातचीत में कई बार इस बात का जिक्र आया कि फिर पता नहीं कब सब के सब होली के मौके पर एक साथ मिलें। कुछ इस अंदाज में मस्ती भरी होली जाते-जाते अजीब सा दर्द भी दे गई। अतुल चौरसिया

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One response to “फिर याद आयी वो होली

  1. बढिया लिखा है.. पर जाते-जाते उदास कर गये..

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