लाल आंखे तरेरता ड्रैगन

pix.jpgएक बार फिर से क्रूर कम्युनिस्म आपना दिखावटी चोला उतारने को कसमसा रहा है। सारी दुनिया बेबसी से निर्दोष तिब्बतियों पर तनी बंदूके सुरक्षित दूरी से खड़ी होकर देख रही है। चीन को संयम बरतने की सलाह दी जा रही है। लेकिन ड्रैगन आखिर कब तक अपने खूनी जबड़े को शांत रख सकता है। चूहें की दांतों में होने वाली निरंतर बढो़त्तरी उसे ज्यादा देर तक कुतरने से नहीं रोक सकती। उसकी मजबूरी है कुतरना इसी तरह से लाल ड्रैगन की मजबूरी है खून। ज्यादा देर तक खून देखे बिना उसे रहा नहीं जाता। आज सोमवार को किसी भी समय उनकी दी गई समय सीमा खत्म हो जाएगी। फिर शायद एक और थ्येन आन मन का नज़ारा देखने को मिलेगा।
तिब्बत की राजधानी लाल सेना को कब्जे में है। अपने अधिकारों के लिए पचास सालों से संघर्ष कर रहे लोगों के सब्र का बांध अगर पचास सालों में एक बार हिंसक हुआ है तो इसके लिए जिम्मेदारी कौन है? लोगों के विरोध को दबाने के लिए सेना की तैनाती देखकर पूरी दुनिया में किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। क्योकि ये उस विचारधारा का मूल है जिसमें हथियारों से ही सत्ता हाथ आती है और हथियारों से ही सत्ता चलती है। अफसोस अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रियाओं को देख कर हो रहा है।
जैवीय हथियारों की झूठी कहानी को आधार बनाकर इराक को मटियामेट करने वाला अमेरिका तिब्बत के मामले में चीन को सिर्फ संयम की सलाह दे रहा है। इरान की हर पल ऐसी तैसी करने वाला विश्व चौधरी भिक्षु की भूमिका में है। हर देश के अंदरूनी मामलों में छोटी मोटी उठापटक होते ही अपना सातवां बेड़ा सागर में उतारने को उद्धत रहने वाला देश भीगी बिल्ली की तरह सिर्फ संयम की सलाह दे रहा है। संयुक्त राष्ट्र को अपने पैरों की दासी बना कर रखना जिसकी आदत है वो तिब्बत के मामले में यूएन से कुछ नहीं कह पा रहा। भारत की तो खैर बात ही छोड़ दीजिए। उसकी तो कभी इतनी औकात ही नहीं रही कि वो चीन से अपने हिस्से की ज़मीन भी अधिकार और सम्मान से मांग ले। साठ सालों में उसके हिम्मत की सिर्फ एक ही मिसाल है दलाई लामा को धर्मशाला में शरण।
और तो और शीत युद्ध में सिर्फ नाक की लड़ाई लड़ने वाले रूस और अमेरिका ने उस दौर में ओलंपिक जैसे खेल आयोजन के पीछे पूरी दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया था। एक बार आधी दुनिया ने अमेरिका के समर्थन में रूस में हुए ओलंपिक से बॉयकॉट किया तो अगली बार आधी दुनिया रूस के समर्थन में खेलों के इस महाकुंभ से दूर रही। कहने का अर्थ है कि सिर्फ नाक की लड़ाई में इस दुनिया ने बड़ी से बड़ी लड़ाईयां देखी है। बड़ी से बड़ी बर्बादी देखी है। लेकिन पचास-साठ सालों से दमित मर्दित तिब्बतियों के जायज हक में अमेरिका और अगड़ी दुनिया के देश सिर्फ सलाहकार की भूमिका निभा रहे हैं। छोटे-मोटे देशों को अपनी आंखों की पुतलियां तरेर कर दाएं-बांए करने वाले ड्रैगन के हाहाकारी जबड़े की ताकत बेबसी से महसूस कर रहे हैं। लेकिन इस रवैये से उनका दुनिया में लोकतंत्र के पहरुआ होने का दावा कमज़ोर हो गया है। दुनिया के दामन पर आज किसी भी समय लाल सेना के अत्याचार के छींटे पड़ सकते हैं। थ्येन आन मन की भयावह यादें ताज़ा हो रही हैं। देखना है दुनिया भर में लोकतंत्र का झंडा बुलंद करने वाले हमेशा से जनतंत्र को अंगूठा दिखाने वाले ड्रैगन के साथ क्या समझौता करते हैं। इस बार की हार कहीं न कहीं ड्रैगन के सामने उस लोकतंत्र की भी हार होगी जिसके बारे में कहा जाता है कि यही तंत्र दुनिया को आगे ले जा सकता है, उसे ज़िंदा रख सकता है।
अतुल चौरसिया

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2 टिप्पणियाँ

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2 responses to “लाल आंखे तरेरता ड्रैगन

  1. anonymous

    Bharat ki sarkar ki baat kar rahe ho, are khud ko dekho aur bharat ke logon ko dekho, vo kitna in Tibbati logon ke andolan mein saath de rahe hain. Ek bhi agey nahin aa raha, Agey aney ki baat to door Police ki kryavahi karyavahi ka virdoh tak nahin kar raha.

  2. Ghost Buster

    सही कहा आपने.

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