इधर जीते-उधर सियारों में मच गई हुआं-हुआं

jackal.jpgअरे स्टार स्पोर्ट से अलग कोई हिंदी ख़बरिया चैनलों पर भी अपनी नज़रिया गड़ाए बैठा था? अपन तो बैठे थे इसलिए कि हमको अंदाज़ा था यहां जमातों में मचेगी हुआं हुआं। बहरहाल भगवान की इतनी मेहरबानी जरूर रही कि देश में इस वक्त कुछ और नहीं घट रहा है। वरना नेता ने कौन से समझौते पर दस्तखत किए, विदर्भ में क्या बजट का कोई असर किसानों की आत्महत्या की दर पर पड़ा है? सब के सब इस हुआं हुआं में दम तोड़ जाते।
तो यानी अब ऊपर वाला भी समझने लगा है कि ये नीचे वाले तो समझेंगे नहीं अपन ही अपनी पटरी थोड़ा चेंज कर लें। “ऊपरवाला” शब्द बार-बार आने की वजह आपके दिमाग में खुजली पैदा कर सकती है। तो क्या आप इस बात से राजी नहीं हैं कि यहां एक चौथाई सरकार भरोसे बाकी तीन चौथाई भगवान भरोसे चलता है। स्टेशन से लेकर पहाड़गंज बाज़ार तक कभी आपने किसी मेटल डिटेक्टर से किसी को गुजरते देखा है? सब बगल से जाते हैं। या फिर मेटल डिटेक्टर की पीं-पीं पर किसी पुलिस वाले की ऊंघ मिटते देखा है? कान पर जू भी नहीं रेंगती। सरकार का राजकुमार जिसके एक इशारे पर सारा कैबिनेट पूंछ हिलाते हुए आगे पीछे रेंगने लगता है, वही कहता है विकास के लिए गये एक रूपए का सिर्फ पांच पैसा पहुंचता है। किसी शासक को इतना मजबूर किसी देश में आपने देखा है? तो फिर इस देश में चीजें भगवान भरोसे ही तो चल रही हैं। हो सकता है लोगों को इस पर आपत्ति भी हो।
बहरहाल ऊपरवाले की दया से आज भी कुछ नहीं हुआ। वरना ख़बर हर कीमत पर, ख़बर वही जो सच दिखाए, सबसे तेज़ और आपको आगे रखने का दावा करने वाले पूरे पांच घंटे सिर्फ एक ही मुद्दे पर कांव-कांव क्यों करते?
भारत जीत गया। पूरे देश को खुशी हुई। इसमें क्या बुरा है। आप भी इस खुशी में शरीक हैं। पर ऐसा भी क्या है कि घंटे पर घंटे इसी के नाम न्यौछावर हो गए। हर चैनल वाला दावा करता है कि खेल को खेल भावना से खेलो। ऑस्ट्रेलिया खेल भावना की ऐसी तैसी कर रही है। और खुद क्या कर रहे हो। प्रोमों से लेकर एंकर, वॉयस ओवर, स्टिंग, बैंड सब कुछ इस तरह से तैयार किए जाते हैं जैसे किसी लड़ाई के मैदान में हिस्सा ले रहे हैं। वहां टीम भिड़ रही है यहां ख़बरिया ज़मीदार भिड़ रहे हैं। बैंड तो देखिए- “कुचल दिया कंगारुओ को”, “घमंड का सिर नीचा”, “दिखा दी औकात”। अब आप ही फैसला कर लीजिए कौन सी खेल भावना आगे बढ़ेगी। इसीलिए ऊपर लिखा है इधर जीते नहीं उधर मच गई हुआं-हुआं।
अतुल चौरसिया

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2 टिप्पणियाँ

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2 responses to “इधर जीते-उधर सियारों में मच गई हुआं-हुआं

  1. बहुत सही कहा, आपसे सहमत हूं…. और एक बात कहनी है जो कई दिनों से मन में तो है, पर समय की कमी के कारण या फिर जब नेट पर आता हूं तो याद नहीं रहता है उस कारण नहीं कह पाया हूं..
    मेरे उस दिन की टिप्पणी से जो आपको ठेस पहूंची थी उसके लिये मैं क्षमाप्रार्थी हूं..

  2. मनीष भदौरिया

    मजेदार पोस्ट है अतुल जी. पर जिक्र सियारों का और चित्र भेडिये का?

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