“बजाते रहो” वाला “PRESS”

rajdoot.jpgबचपन में शुक्लाजी अपन लोग को किसी साहब अधिकारी से कम नहीं लगते थे। राजदूत ब्रांड फटफटिया पर तिलक लगाए शुक्लाजी चलते तो हम उन्हें अचरज से देखते। आगे की नंबर प्लेट से नंबर गायब उसकी जगह बड़े अक्षरों में हिंदी में “प्रेस” शब्द चस्पा होता। पीछे की नंबर प्लेट में भी जुगत-जुगाड़ से अंग्रेज़ी में “PRESS” का हिसाब बना लिया गया था। ज्यादा कुछ तो समझ नहीं आता था पर दिमाग में कहीं न कहीं ये बात थी की शुक्लाजी की इस मेहमानपुर्सी का संबंध इसी शब्द से जुड़ा है।
स्कूल में पढ़ाई जारी थी, धीरे-धीरे अपन लोग भी बड़े हो रहे थे। पर शुक्लाजी का जलवा तकरीबन बरकरार ही रहा। थाने में कोई मामला हो शुक्लाजी को ले चलो, मुहल्ले में सिरफुटौव्वल हुई शुक्लाजी से बात करो। शुक्लाजी की साहबियत वाली छवि, ज्यादातर पुलिसिया मामलो में उनकी दखल के चलते ही हमारे मन में बनी थी। कभी कभार चौराहे पर खड़े सिपाही भी उन्हें नमस्कार करते दिखे थे। अब जिस खाकी वर्दी वाले को देखने के बाद इलास्टिक वाली हाफ पैंट के अंदर बैठा तंत्र पनाला बहाने के लिए तैयार रहता था उसे शुक्लाजी को नमस्कार करते देख सम्मान तो पैदा होना ही थी। बाद मे थोड़े और समझदार हुए तो पता चला कि शुक्लाजी पत्रकार थे। थाने, कचहरी में उनकी अच्छी ‘चलती’ थी। मुहल्ले आस पड़ोस के मामले वो ऐसे ही निपटवा देते थे। मैंने सोचा ये तो बड़े काम का काम है “पत्रकार”। उस समय क्या पता था कि किस्मत इसी राह ले जाएगी। ज्यादा पढे़ लिखे तो शुक्लाजी भी नहीं थे लेकिन जर-जुगाड़ के मामलो में बड़े-बूढ़ों की राय थी कि शुक्लाजी माहिर थे। हां “प्रेस” शब्द की महिमा उन्होंने खूब बनायी थी। उसके साथ कोई खिच-खिच मज़ाक उन्हें नामंज़ूर था। फटफटिया पर वो शब्द देखकर अपना भी मस्तक सम्मान के साथ नतमस्तक रहने लगा। प्रेस की जो महिमा शुक्ली जी ने बनायी थी वहीं दिमाग में अक्सर घुमड़ती रहती।
बाद में आज़मगढ़ टू दिल्ली वाया इलाहाबाद की अपनी यात्रा में जहां भी इस शब्द से सामना होता मन में वही सम्मान पैदा होता था। कहीं से सुना था कि ये हमारे महान लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है भले ही स्वघोषित हो। लिहाजा सम्मान नतमस्तक से साष्टांग दंडवत में बदल जाता था। यहां एक बात साफ कर दूं कि दिल्ली तो अपन विशेष रूप से प्रेस से नाता जोड़ने के लिए ही आए थे। लेकिन हां इलाहाबाद तक दिमाग में ऐसा कोई फितूर नहीं था। तब तक सपने कुछ दूसरे हुआ करते थे।
बाद में टीवी पत्रकारिता का असर बढ़ा तो प्रेस की महिमा भी बढ़ी। चारो तरफ सुनाई पड़ने लगा कि मीडिया बहुत शक्तिशाली हो गया है। हर जगह उसकी निगाह रहती है। सरकारें, नेता, संस्थाएं मनमाना नहीं कर सकती। इस दौर तक अपन भी टीवी पत्रकारिता से जुड़ चुके थे। बड़ा सुकून मिलता था सुनकर। टीवी पत्रकारिता अनुभव के लिहाज से शैशवावस्था में ही थी की उसका पतन भी शुरू हो गया। जिस प्रेस का मनोहारी रूप लेकर बड़े हुए थे वो क्षीण होने लगा। पूत के पांव पालने में तो दिखते हैं लेकिन यहां तो उल्टा हो गया। जिस पूत की इतनी चर्चा हुई थी उसका ऐसा चरितपतन, नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त था। जिसे देखो वहीं “PRESS” लिखवाएं सड़कों पर घूमता है। और लोगों के मन में उनके प्रति उस तरह का भाव भी नहीं पैदा होता जैसा हमारे मन में शुक्लाजी को देखकर होता था। भूत-प्रेत दिखाओगे तो क्या होगा। अमिताभ को सर्दी, राखी सावंत का अपने यार से लफड़ा यहां राष्ट्रीय महत्व की सुर्खियां हैं। जाने क्या हो गया इस नए सपूत “PRESS” को।
और तो और अब तो इस शहर में “बजाते रहो” वाले भी अपनी गाड़ियों पर “PRESS” लिखवा कर घूमते मिल जाते हैं। मेरी तो समझ में नहीं आया कि ये चौथे स्तंभ में कहां फिट होते हैं। दिन भर द्विअर्थी संवादों में लपर-चपर करके गाने बजाने वाली “बजाते रहो” की बजनिया टोली “PRESS”  में क्या योगदान दे रही है इस पर गंभीर विमर्श आज नहीं तो कल होगा, जरूर।
शहर (दिल्ली) की सड़कों पर कुकुरमुत्तो से भी ज्यादा तेज़ी से फलती फूलती प्रजाति नजर आती है “PRESS” की। कहते हैं पत्रकार बड़ा ही कड़ियल जीव होता है। हर चीज़ में कानाखोदी उसकी आदत होती है। जहां कोई चीज ज़िंदा नहीं रह सकती वहां पत्रकार ज़िंदा रहता है। बचपन में डार्विन को पढ़ा था प्रजातियां मौसम के अनुकूलन के हिसाब से पैदा होती हैं। यहां की आबोहवा में और कुछ तो पनपने से रहा एक यही “PRESS” प्रजाति है जो धुआंधार पनप रही है। दलाली शब्द इन दिनों पत्रकारिता में काफी मशहूर हो गया है। जो जितना बड़ा दलाल उतना ही बड़ा…। पता नहीं शुक्लाजी जो जर-जुगाड़ करते थे वो क्या था, लेकिन एक बात तो साफ है कि “प्रेस” शब्द की अस्मिता को लेकर वो जितना सजग थे उसकी वजह से ही वो सम्मान अपन के मन में पनपा था। देखो कब दूसरे शुक्लीजी दिल्ली में आते हैं। फिर से चौथे स्तंभ की अस्मिता स्थापित होने का इंतज़ार रहेगा जहां “बजाते रहो” वालों के लिए कोई जगह नहीं होगी, ना ही राखी का अपने यार से लफड़ा सुर्खियां बनेगा।
अतुल चौरसिया

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4 टिप्पणियाँ

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4 responses to ““बजाते रहो” वाला “PRESS”

  1. तो भाई जान आप भी आजमगढ़ से हैं, आजमगढ़ में कहां से है आप। और हां प्रेस वाली बात से याद आया कि कभी कभी जब छोटे नगर में किसी से मैं यह कहता हूं कि मैं प्रेस से हूं तो वो लोग कहते हैं कि क्‍या आप अखबार बांटते हैं,

  2. प्रेस वाले शुक्ला जी का हमें भी इंतजार है, बजाते रहो की टोली ‘प्रेस’ का बिल्ला लगा कर घूम रही है मालूम नहीं था, बताने का शुक्रिया

  3. बजाते रहो वाले बदलेंगे ऐसा होगा, चौरसिया बाबू? नवका-नवका पइसा देख हिंदी में सब ससुर आत्‍ममुग्‍ध हैं, हमको तो इस होवे में मजरली डाऊट है?

  4. ये बजाते रहने वाले किस तरह प्रेस की श्रेणी में आते हैं? इन्हें तो खुद को पत्रकार कहने पर भी शर्म आनी चाहिये। चपर-चपर करके फालतू की बातें करना और लोगों का सिर चाटना। फिल्मी कलाकारों की चमचागीरी करना यही तो काम है इनका और तुर्रा यह कि जनाब या मोहतरमा पत्रकार हैं। लानत है।

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