कूंए के मेंढक और रंगे हुए सियारों !

bhusanda1.jpgपहले तो माफी चाहूंगा कि चौराहा का मकसद गली, नुक्कड़, चौराहों से जुड़ी देसी विरासत के लगातार विलोप को सामने लाना था लेकिन आज इस परंपरा को थोड़ा सा तोड़ने का जी हो रहा था। बात ही कुछ ऐसी थी कि भड़ास या कहें की कुंठा ने मजबूरी में कलम का हाथ थामा है। मुंबई में अमर सिंह घुसे तो कयामत समझो। यहां हमारा नज़रिया चाहे अमर हों या फिर राज सबके लिए एक आम आदमी का रहेगा। राज ठाकरे कहते हैं अब बहुत हो गया मुंबई या महाराष्ट्र में रहना है तो जय मराठा कहना होगा। सियासत में हाशिए पर चल रहे एक नेता की ज़मीन तलाशने की छटपटाहट समझी जा सकती है। लेकिन रंगे हुए अमर सिंह या फिर मुलायम सिंह जैसे सियारों को भी उत्तर प्रदेश दिवस मनाने के लिए मुंबई ही क्यों सूझा, शायद आम आदमी इतना सयाना तो है ही।
राज ठाकरे, अमर सिंह को कूंए का मेंढक कहते हैं। अब हमारी औकात तो इतनी है नहीं कि उनसे पूछ लें कि कभी मुंबई या मराठवाड़ा की सीमा से बाहर निकल कर हिंदुस्तान की बहुरंगी संस्कृति देखी है। कूंएं का मेंढ़क कौन है इसका फैसला फिर भी हम नहीं करेंगे। खुद को करोड़ो मराठियों का नेता कहने वाले राज या उसी धारा की सियासत करने वाली उनकी जनक शिवसेना का योगदान देश के निर्माण में शून्य ही दिखाई देगा। उन्होंने दिया क्या है- हिंदू-मुस्लिम के बीच की खाई, 1992 में अल्पसंख्यकों की मारकाट- ये कुछ ऐसी गौरवगाथाएं हैं जो राज-शिवसेना के लिहाफ का पैबंद हैं। इसके अलावा कुछ भी उजला नहीं है उनके अतीत में। फर्जी मराठी अस्मिता के नाम पर उत्तरभारतीयों के खिलाफ ज़हर उगल रहे राज को शायद ये भी पता नहीं हिंदुस्तान में लोकतंत्र है। कोई कहीं भी रह सकता है, बस सकता है। संविधान से ऊपर खुद को समझने की ग़लती उनके चाचा जी भी कर चुके हैं, क़ानून के चंगुल में हैं। और जनता ने तो तब से दो बार फैसला भी दे दिया है।
सत्ता से बाहर चल रही शिवसेना अपने परिवार को एक नहीं रख सकी। राज, नेता बनने की चाह लिए मक्खी की तरह फेंक दिए गए लेकिन दावा करोडो़ मराठियों के रहनुमा होने का करते हैं। खुद को हिंदू कहने वालों पहले हिंदू धर्म की मूल आत्मा अपने भीतर पैदा करो। एकीकृत-संयुक्त हिंदू परिवार की अंतरात्मा घर में नहीं संभलती दावा पूरे मराठवाड़ा पर है।
गुंडागर्दी के सहारे गरीब मजलूम टैक्सी और रेहड़ी वाले को पीटकर सीना मत तानो राज। दूसरों को मेंढ़क कहने से पहले खुद मुंबई की बंद खिड़की के दरवाजे खोलकर बाहर निकलो हिंदुस्तान बहुत बड़ा है। खुद को देश का नेता, मार्गदर्शक कहने वालों जाति, धर्म, समाज से बाहर नहीं निकल सके समाज को क्या रास्ता दिखाओंगे। खुद को एक हिंदुस्तानी कैसे कहोगे? वैसे भी हिंदुस्तान को हिंदुस्तान की शक्ल देने में अगर उत्तर भारतीयों के बलिदान, त्याग, योगदान को गिनना शुरू करोगे तो उंगलियों के पोरों से दर्द की धारा बह निकलेगी। और एक बार अपने यहां से गिनना, गिनती शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगी। एक बात और याद रखो जिस मुंबई, जिस महाराष्ट्र की बात करते हो वो किसी के बाप की बपौती नहीं है। पूरे हिंदुस्तान ने मिलकर उसे ये रंग दिया। उसमें अमिताभ का रंग है, शाहरुख की हवा है, जाने कितने मनोज वाजपेयी, इरफान ख़ान का पसीना है, शेखर सुमन की मस्खरी है, अंबानियों का उद्यम है, टाटा का इतिहास है, बिरला, गोदरेज की विरासत है, पारसियों का विज़न है, बजाज की गति है, इसाइयों का ज्ञान है। तुम्हे क्या लगता है सिर्फ मराठों ने ये सब खड़ा किया है? और अगर किया भी है तो इसमें तुम्हारा क्या? तू कौन मैं खाम खां!
बिना उत्तर भारत के क्या करोगे? ऐसा सर्वगुण संपन्न तो महाराष्ट्र है भी नहीं कि पूरे देश से अलग उलटबांसी चलाओंगे। और अगर पूरे उत्तर भारत ने मराठियों के खिलाफ यही रुख अख्तियार कर लिया तो क्या करोगे? अपनी जानकारी जहां तक है तो कम से कम पूर्वांचल के हर कस्बे गांव में सुनारी के पेशे से जुड़े दो-चार मराठी परिवार रहते हैं। उत्तर भारत ने मोर्चा खोल दिया तो तुम्हारे नेता देश की सर्वोच्च पंचायत में बैठने को तरस जाएंगे।
और शर्म तो उन बेशर्मों को देखकर आती है जो इनका झंडा लेकर दिल्ली से लेकर पटना तक जय ठा… जय मरा… करते रहते हैं। गोयल, गोपाल से लेकर कृपाशंकरों की अस्मिता मर चुकी है। जिस हिंदुस्तान को इतने जतन से लोगों ने ये रूप दिया है उसे संवार नहीं सकते तो बिगाड़ने का हक़ तुम्हें किसने दिया। इसे देश के अंदर बलूचिस्तान, सिंध, अफगान तो मत बनाओ।
नेतागिरी चमकाने के लिए मुंबई पहुंचे अमर-मुलायम जब शान से गले में मालाएं डलवा रहे थे वहां की सड़कों पर भारतीय पिट रहे थे। उनकी रेहड़ी लगवाने कोई अमर-आजमी नहीं पहुंचा। अरे इतना ही हितैषी थे तो बाद में उनकी सुध लेने पहुंच गए होते।
कूएं के मेंढ़कों और रंगे हुए सियारों की जमात में छिड़ी लड़ाई का अंत होना अभी बाकी है। अफसोस बेचारे रेहड़ी और पिटे टैक्सी ड्राइवर को देखकर होता है जिसकी पटाई तो हुई, रोजी भी गई। क्या-क्या रंग दिखाओंगे रंगे हुए सियारों। गुंडई की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती मुंबई के मेंढ़कों।

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3 टिप्पणियाँ

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3 responses to “कूंए के मेंढक और रंगे हुए सियारों !

  1. जो समाज की हालत है उससे यह स्पष्ट है कि यह केवल राजनीति है, और कुछ नहीं। जब तक हमारी जनता जागरूक और पढ़ी लिखी नहीं होगी ऐसा होता रहेगा।

  2. jame raho atul, hina rang lati hai ghis jaane ke bad.

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