कुछ मुझे भी दिला दो…

इन दिनों दिल्ली की फ़िज़ाओं में पद्म पुरस्कारों की खुशबू फैल गई है। बसंत के आगमन के साथ जैसे भौरे फूलों के चारो ओर मंडराते हैं। रंगीन फूलों से दिल्ली की बगिया (ल्युटियन ज़ोन) प्रफुल्लित रहती है। उसी तरह से इस मौसम में पुरस्कारों की गुणा-भाग में मस्त रहने वाले इंसान रूपी भौंरे भी सत्ता की गलियों में मंडराने लगते हैं। खुद को ऊंची पहुंच वाला दिखाने वाले ये मोटी चमड़ी के जीव अपन जैसे आम आदमी टाइप दिखने वालों को थोड़ा कम ही भाव देते हैं। क्योंकि मौसम उनके अनुकूल चल रहा होता है। तो इस गफलत में गाफिल हो जाते हैं कि शायद ये बसंत अब जाएगा नहीं। बगिया हमेशा गुलजार रहेगी, सत्ता के गलियारों की बगिया हमेशा आबाद रहेगी।

मगर इस दिल्ली के बसंत के भी अपने निराले ढंग हैं। यहां मौसम के हिसाब से भौरे भी रंग बदलते हैं। पार्टियों के हिसाब से यहां की गलियों में भौरे नज़र आते हैं। जैसे मौजूदा समय कांग्रेस छाप भौरों का है। क्योंकि रायसीना से रेसकोर्स तक उन्हीं की बमबम है। जबकि 2004 तक इन्हीं गलियों पर भगवाधारी भौरों की आदमरफ्त हुआ करती थी, और तिंरगाधारी जवान म्यान में थे। समझदार भौरे तो मौसम के हिसाब से निकलते हैं, बाकी मसय में हाइबरनेशन (शीतनिद्रा) में रहते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि बेमौसम निकले तो दुर-दुर की हालत हो जाएगी।

पर बीता दिन अजीब सा रहा। हालांकि ये भौरा तो नहीं था बल्कि भौरों की जमात का बादशाह था। लेकिन निकल गया बेमौसम बगिया में अपनी औकात का थर्मामीटर नापने। और हल्ला मच गया कि अटल बाबा को भारत रत्न दो। हलकान बाग के मालिकों को न ये बात रास आनी थी न आई। गुरूजी को साफ कर दिया गया तुम बेवक्त खोल से बाहर निकल आए हो। अंदर चले जाओ, कुछ हासिल नहीं होगा। इंतज़ार करो देखो शायद 2009 में कुछ बात बन जाए, तब आना, बेकार में बुढ़ापे की हड्डियां दिल्ली की सर्दी में न खपाओ। इधर ये मसला उठा उधर वामपंथी जवान सीना तान अपने खलीफा के लिए मोर्चेबंदी में जुट गए। ज्योति बाबू को भी दो। अब एक बार में एक ही देने का उसूल है। दो को कैसे दें दे। तिंरगाधारी कुछ बोलते इससे पहले ही वामपंथी जवानों को गलती का अहसास हुआ कि अपनी थुक्का फजीहत क्यों करवाना। लिहाजा गर्म खून ने तड़कता भड़कता बयान दिया वामपंथी योद्धा तमगे नहीं पहनता।

लगा कि मामला खत्म हो गया तब तक अधुना लक्ष्मीबाई ने हुंकार भरी दलितों के मसीहा का भी इस मौसम में उतना ही हक़ बनता है। जीवन भर दबे कुचलों के लिए लड़ने वाले के साथ इस मामले में अन्याय नहीं सहा जाएगा। अब कुछ ही दिन पहले तिंरगाधारियों पर हत्या की सुपारी देने का आरोप लगाने के बाद इस बगिया से फूल की उम्मीद तो बेमानी ही थी। लिहाजा पूरी भी नहीं हुई। लगता है क्षेत्रीय शेरपा द्वारा एक के बाद एक देश के लिए मर मिटने वाले दिग्गजों के नाम पर भारत रत्न मांगने की शुरुआत हो चुकी है। देखों रुकती कहां है। जीते जी सात पुश्तों के राजसी ठाट-बाट का इंतज़ाम कर गए दिग्गज मरने के बाद भी अपने पुण्य प्रसूतों की दाल-रोटी का इंतज़ाम कर गए हैं।

मामला लगातार उलझता जा रहा था पर अपनी समझ में ये बात नहीं आई कि बेमौसम इसका बीजारोपण करने वाले जंग लगे लौहपुरुष के दिमाग में क्या था? आखिर इतने चतुरमना तो वो हैं ही कि बेफायदे का टंटा नहीं खड़ा करते। तभी अपनी पत्रकारिता के स्वमान्य गुरू प्रभाष जी ने राह दिखाई। तहलका मे उनका लेख था। भइया लौह पुरुष एक तीर से दो नहीं तीन शिकार कर रहे थे। अटल रूपी प्रधानमंत्री पद की राह के कांटे का समूल नाश, वामपंथियों को इससे दूर रखना और तो और खुद का भी तो शायद ये आखिरी मौका ही हो। सही सुना था ये राजनीति का झोंटा जितना उलझा होता है उतना ही मोटी चमड़ी का होता है। वरना अस्सी की उमर में ये चालबाजी। मान गए गुरू। आप के तो बहुत जर-जुगाड़ हैं। मतलब से दुनिया को दिलाते रहे हो। एक बार बेमतलब के इस बेचारे को भी कुछ दिला दो। जीवनधन्य हो जावे…

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1 टिप्पणी

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One response to “कुछ मुझे भी दिला दो…

  1. tuitionindiacom

    अरे पागल भारतीयों क्रिकेट का अफीमी नशा तुम्हारी नस्ल को खराब कर रहा है खिलाडी बोर्ड खुब पैसा बना रहे है। कभी कपिल देव तो कभी शरद पवार हीरों हो जाते है तुम्हें ये मिडिया अफीम खिला रहा है। फैक दो ये क्रिकेट विरकेट अगर चाहते हो तुम्हारी जिंदगी में तुम्हारे बच्चों की जिंदगी में बदलाव आये तो तुरंत इस अफीम को फैंक दो

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