“गुल्ली-डंडा” क्रिकेटम् शरणम् समर्पयामि

गुल्ली-डंडा का इतिहास तो अपन को नहीं पता लेकिन खेल से अपना जुड़ाव काफी पुराना रहा है। ज्यादा नहीं तो कम से कम एक सदी पुराना खेल होने का तो लिखित प्रमाण ही मौजूद है। दिग्गज कथाकार मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी ही उत्तर भारत में गुल्ली डंडा की समृद्ध पंरपरा को समर्पित है। बहरहाल ये बात भी पक्की है कि खेल सदियों पुराना है। मुंशी जी के अंचल से ही संबंधित होने के नाते उनकी कहानी और इस खेल दोनो से ही अपना थोड़ा अतिरिक्त लगाव भी है। अपना छुटपन भी कमोबेश मुंशीजी की कहानी में वर्णित गुल्ली-डंडा के नियमों पर ही खेल कर बीता है। गली, खेत या फिर मैदान, गुल्ली-डंडा कभी क्रिकेट की तर्ज पर स्थान की कमी के चलते रूल आउट या वन टिप आउट का शिकार नहीं हुआ था।

बढ़िया गढ़ी हुई गुल्ली, मजबूत डंडा और अपने हुनर के धनी दो योद्धा। अमूमन हर पुरवे, हर मुहल्ले का कोई न कोई दिग्गज गुल्ली-डंडा का खिलाड़ी होता था, जिसके कंधे पर पुरवे या मुहल्ले की इज्जत का दारोमदार टिका होता था। टांड़ पर टांड़ लगाने वाले ऐसे खिलाड़ी अब नहीं रहे। ज्यादा घुमा फिराकर कहने की बात तो नहीं है पर गुल्ली-डंडा के दिग्गज मुहल्लों से गायब हो चुके हैं। नया दौर है क्रिकेट का वो भी टी-20 का। जिसको देखो उसके ऊपर बल्ले या फिर गेंद की धुन सवार है।

कुछ दिन पहले ऑफिस की छुट्टियां थी लिहाजा अपन भी घर निकल गए थे। पूरे हफ्ते का मौका था। एक दिन सुबह-सुबह टहलते हुए उसी मैदान पर पहुंच गए जहां कभी गुल्ली पर डंडे की झन्नाटेदार टांड़ जमाया करते थे। मैदान काफी कुछ वैसा ही है, बस उसके अगल-बगल मौजूद छोटे-छोटे घर अब तीन-चार मंज़िला इमारतों में बदल गए हैं। तभी किसी ने बताया कि यहां हर दिन गुल्ली डंडा होता है। ये सुनकर अजीब सी आश्चर्यमिश्रित खुशी का अहसास हुआ। फैसला हुआ कि आज गुल्ली डंडे का मुकाबला देखा जाय। थोड़ी ही देर बाद वहां खिलाड़ियों का जमावड़ा लगने लगा। इसके बाद जो दिखा उसने अपनी गुल्ली डंडा की परिभाषा ही बदल दी। थोड़ी ही देर में 6-6 खिलाड़ियों की दो टीम बन गई। गुल्ली-डंडा में टीम क्या बात है! इसके बाद टॉस हुआ। बिल्कुल क्रिकेटिया तर्ज पर। पदाने वाली टीम को कहा गया कि इनकी बैटिंग है और पदने वाली टीम के बारे में बताया गया कि इनकी फील्डिंग है। अब तक अपने दिमाग के तंतु मृदंग की तरह झनझना उठे थे। लेकिन असल दुर्दशा देखना अभी बाकी था। ये कैसा गुल्ली डंडा था अभी समझ नहीं आ रहा था। तभी एक भाई बंधु पास आकर बोले यहां से हटकर बाउंड्री से बाहर खड़े हो जाइए। गुल्ली-डंडे में बाउंड्री ने चकरायमान मष्तिस्क को और भी उलझा दिया। बहरहाल अपन उस तथाकथित बाउंड्री से बाहर जाकर इस उम्मीद से खड़े हुए कि अब तो कम से कम गुल्ली-डंडे का दर्शन होगा। लेकिन गुल्ली-डंडे के इस खेल में अजूबों का सिलसिला जारी था। यहां हर टांड़ पर एक रन बन रहे थे। और जब गुल्ली उस तथाकथित बाउंड्री से बाहर चली जाती थी तो मामला चौके या छक्के का बनता था। पदाने वाला बल्लेबाज़ की भूमिका में था तो पदने वाला गेंदबाज़ बना हुआ था। और गुल्ली डंडे पर लगती तो टन की बजाय आउट का हल्ला। इस तरह से पहली टीम ने कुल 39 रन बनाए। और जवाबी कार्रवाई में दूसरी टीम 25 रन पर ढेर हो गई। एलान हुआ कि पहली टीम दूसरी टीम से 14 रनों से जीत गई।

टांड़ के खेल में हार-जीत रनों से हुई थी। पदने-पदाने की जगह बैटिंग-फील्डिंग विराजमान थी। गुल्ली-डंडे से उसकी आत्मा यानी गुच्ची ही नदारद थी। मामला अपनी भी समझ में आ गया था। गुल्ली-डंडे के इस संस्करण ने मुकाबला देखने का सारा उत्साह ठंडा कर दिया था। मन बोझिल और टीस से भर गया। स्वर्गाधिकारी मुंशीजी की आत्मा भी शायद ऊपर से कष्ट के साथ इसे निहार रही हो। ये क्रिकेट का दौर है। चहुंओर सिर्फ यही दिख रहा है, बिक रहा है। गुल्ली-डंडा तो क्रिकेटम् शरणम् समर्पयामि अतुल चौरसिया

Advertisements

3 टिप्पणियाँ

Filed under Uncategorized

3 responses to ““गुल्ली-डंडा” क्रिकेटम् शरणम् समर्पयामि

  1. आपके प्रिय खेल का ऐसा हाल देख दुख हुआ । बचपन में तीन खेलों पर पाबन्दी थी, गुल्ली डंडा, कंचे और धनुष बाण ।
    घुघूती बासूती

  2. दरअसल इन दिनों हर देशज खेल इसी तरह के पहचान के संकट से घिरता जा रहा है। लोग भी ज्यादा रुचि नहीं लेते हैं। वैसे आपकी कविताओं का नियमित पाठक हूं। एक नई ताज़गी के साथ सुमित्रानंदन जी की शैली की याद दिलाते हैं।

  3. sach much yah ek lokpriya desi shel ki dudarsha ki prakashtha hai . mujhe yaad hai jab hum virodhi team lo padate padate dusare muhalle me jab tak nahi pahunch jate the tab tak apni jeet ko adhura samajhate the.Is muhalla fatah karne ki bhavna ko baoudry se bandh diya hai!!!

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s