गली में कन्फ्यूज़न

छोटे शहरों, गांवो से निकले लोगों का तेज़ रफ्तार दिल्ली में क़दम रखते ही जिस चीज़ पहला सामना होता है वो हैं यहां का बेलगाम ट्रैफिक। कहां गांव, बाज़ार से दूर जाती राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 63 और उन पर जब तब आने वाली बसों, ट्रकों के हॉर्न की आवाज़ और कहां हर सड़क हर गली राष्ट्रीय राजमार्ग से ज्यादा व्यस्त। बहरहाल यहां हम अपने मुद्दे की बात करेंगे। अपन भी जब पहली बार दिल्ली की ओर मुखातिब हुए (चमकदमक भरे बेहतरीन करियर की आस में) तो अम्मा और पापा के मन में तमाम आशंकाएं, बेचैनियां घुमड़ रही थी। क्या करना, क्या नहीं करना जैसी तमाम पितृजनित चेतावनियां दो दिन पहले से ही जारी होने लगी थी। अमूमन देश के सुदूर गंवई हिस्सों, बाज़ारों से निकलने वाले हमारी तरह के युवाओं का इस तरह के पुत्रमोह से सामना होना आम बात है। वैसे भी बेटेबेटियां कितने ही बड़े, कितने ही सफल हो जाएं मांबाप बच्चों को अनाड़ी, नासमझ ही मानते हैं। ये गुण शायद भारतीयों की चिर सांस्कृतिक विरासत है।

शायद हम मुद्दे से भटक रहे हैं। लेकिन पहले इसी तरह के प्यार मुहब्बत की एक अजीब सी कहानी जो हमारे परम मित्र की है की चर्चा मुनासिब होगा। हुआ ये कि जब पहली बार मेरे मित्र उत्तरांचल के एक पहाड़ी गांव से निकल कर दिल्ली की ओर चले तो देहरादून रेलवे स्टेशन तक उनके पिता जी उन्हें छोड़ने आए। विदाई से पहले एक पिता की राय पर ग़ौर फरमाइए, दिल्ली में ट्रेन से उतरते वक्त प्लेटफॉर्म पर पैर ध्यान से रखना। ऐसा न हो कि प्लेटफॉर्म और ट्रेन के बीच बची हुई जगह में गिर पड़ो। एक चिंतातुर पिता ने अपने 22 साल के स्नातक बेटे को ये राय दी थी। लेकिन ये चिंता शायद उनकी इसी तरह के किसी बुरे अनुभव से उपजी हो जिससे हर दिल्लीवासी हर दिन दोचार होता है। भीड़ ही ऐसी है। शहर की सड़के तो क्या गलियां भी चलने के लिए महफूज हैं या नहीं कहना मुश्किल है। इस विश्वास की वजह भी है। जिस कॉलोनी में रहता हूं वहां हर रोज़ यही हालात देखता हूं। भूमिका शायद लंबी हो गई पर वाकया इतना दुखद है कि बनानी पड़ी।

कहां तो कभी कभार दिखने वाली भीड़ कहां अपने ही एक और अजीज़ मित्र की दो लाइने हैंइस सड़क, उस सड़क इस गली, उस गली बस जाम ही जामऐसा लगता है कि दिल्ली मयख़ाना हो गई

बात बीती दिवाली की है जिसने नाचीज को लिखने के लिए मजबूर कर दिया या कहें कि भला हो ब्लॉग का जिसने भड़ास निकालने का मौका दे दिया है। हुआ यूं कि कॉलोनी की मार्केट दिवाली की चहल पहल से सराबोर थी, नाश हो इस ट्रैफिक जाम का। वैसे तो पूरा इलाका रिहाइशी है। लेकिन पास ही बाज़ार भी है। और गाड़ियों की कतारें देख कर लगता है जितने आदमी नहीं होंगे उससे ज्यादा कारें हैं यहां। चार पहिया नहीं तो दो चक्के से ही इच्छाएं तुष्ट होती हैं यहां। रखने की जगह नहीं है लेकिन कॉलोनी की सरकारी सड़कें किसी के बाप की तो हैं नहीं। लिहाजा अच्छी ख़ासी 10 मीटर चौड़ी सड़क पांच फुट की गली में तब्दील हो गई है। उस दिन हुआ यूं की कॉलोनी की जो सड़क बाज़ार से मिलती है वो एक तिराहे की तरह हैं। कॉलोनी से एक साहब दिवाली के जोश में कार लेकर निकले (साहब को याद रखिएगा)। कार में दो हट्टेकट्टे मित्र भी थे। इधर एक तरफ से बेचारा ऑटो रिक्शेवाला 85 रूपए की सवारी लेकर आ पहुंचा। सवारी ने 100 रूपए की नोट पकड़ा दी। बेचारे के पास वापस करने के लिए 15 रूपए नहीं। सवारी मरजाद उसी तिराहे पर उतने की जिद करने लगी। बेचारा छुट्टे की तलाश में फिरने लगा। नहीं मिला तो सवारी को ही नोट थमा कर 85 रूपए का इंतज़ार करने लगा। इस पांच मिनट के दौरान ही तीनो तरफ से कारों, मोटर साइकिलों, रिक्शे वालों का हुजूम न जाने कहां से उमड़ पड़ा। ऊपर से त्यौहारी ख़रीददारों की रेलमपेल। देखते ही देखते भरी दुपहरी में ख़ामोश रहने वाला तिराहा गुलाबी सर्द 10 बजे की रात पानीपत के कोलाहल से भर उठा। कोई हॉर्न में मस्त, कोई मुंहफाड़ में व्यस्त।

अगले पांच मिनट कहानी को दुखद अंत की ओर ले गए। अचानक कार में बैठे साहब बाहर निकले और ऑटोवाले के गाल पर तीन चार झन्नाटेदार तमाचे जड़ दिए। गरीबअमीर के बीच चिर शाश्वत वैमनस्य शतप्रतिशत चरितार्थ हो रहा था। मामला बिगड़ता देख अपना पत्रकारी जीव जगा तो सोचा बीच बचाव करते हैं। लेकिन जैसे ही पास पहुंचा तो साहब के बाकी दो मित्र भी कार से उतर कर मोर्चा संभाल चुके थे। उनके मुंह से निकल रही मदिरा की गंध नाक को तर कर रही थी लिहाजा अपनी इज्जत अपने हाथ का फंडा अपनाते हुए अपन बीचबिचवई से कन्नी काट गए। इधर ऑटो ड्राइवर के चेहरे पर चिर दरिद्रता का बेचारगी भरा भाव उभर आया था। अमीरगरीब के बीच चिर शाश्वत वैमनस्यता की बात साफ कर दूं। भीड़ में तमाम नव धनपतियों के लाल भी अपनी मोटर साइकिलों के आड़े तिरछे करतबों से जाम को परवान चढ़ा रहे थे पर किसी ने उन पर हाथ नहीं उठाया। कम से कम तीनों रास्तों पर दसदस कारों का काफिला अपने लिए रास्ते की वाजिब हक़ की मांग में निरंतर हॉर्न बुलंद कर रहा था। लेकिन किसी ने उन्हें दो गरम झिड़कियां भी नहीं दी। ट्रैफिक हटाने का मोर्चा स्थानीय लोगों ने वालंटियर के तौर पर संभाल लिया था। किसी तरह से भीड़ आगेपीछे हुई। उधर बड़े भाई का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था। एक किनारे अपनी कार खड़ी करके आए और ड्राइवर के गाल पर दो और तमाचे जड़ दिए। अब उसके मुंह से खून भी आने लगा था। इस गुस्से की वजह किसी को समझ नहीं आई। आपको लगेगा कि ऑटो वाला खड़े-खड़े कर क्या रहा था। तो भाई 85 रूपए की सवारी छुट्टा के बहाने भीड़ में गुम हो गई थी। और उसके मोह में उसकी हालत जाएं तो जाएं कहां वाली हो गई थी। बहरहाल सवारी थोड़ी देर में नज़र आई और उसने पैसे चुकाए। तमाम दुख के बाद उसके साथ ये पहली सुखद बात हुई थी।

शुरुआत में मित्र के पिता जी के साथ वार्तालाप का जिक्र करने की वजह यही थी। शायद इसी तरह के किसी धुर शहरी वाकए से उनका सामना हुआ हो जिससे शहर की हर चीज़ के प्रति उनकी निगाहें संशयात्मक हो गई थी। वैसे भी एक बात मान लीजिए जिस शहर की गलियों में इतना कनफ्यूज़न हैं वहां की सड़कों पर कितना पागलपन होगा। पैसे की चमक में भले ही कारों की कतारें खड़ी हो गई हों लेकिन इंसानियत पहिए तले कुचल रही है। नया शिगूफा रोड रेज़ का है। पर शायद इस शहर की नसों से स्थिरता, शांति, सब्र खत्म हो गया है। दिल्ली भाग रही है लेकिन मजलूमों को कुचल कर। इसीलिए तो गली में कनफ्यूज़न है। भाषा में शायद भावनाओं का गुबार न हो, लिखने का तरीका भी हल्का लग सकता है। लेकिन यकीन मानिए कहानी सौ फीसदी सही है।

अतुल चौरसिया

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