गोरे रहें या काले हमें फ़र्क क्या !

टेलीविज़न के सामने बैठे थे कि अचानक स्क्रीन पर बॉलीवुड का सबसे बड़ा सितारा हाथ में फेयर एंड सेक्सी क्रीम की जादू की डिबिया हाथ में लिए नज़र आया। और देखते ही देखते कल तक पीछा छुड़ा रही लड़की 30 सेकेंड के अंदर ही उसकी बाहों में समा गई क्योंकि सांवला लड़का गोरेपन में अंग्रेज़ों को मात देने लगा था। विज्ञापन खत्म हुआ नहीं कि दिमाग में कक्षा 6 में पढ़ाया भूगोल के गुरू जी का पाठ याद आ गया। वो हमें दुनिया भर की प्रमुख जातियों, उनके रंग रूप का आधार समझा रहे थे। दुनिया में इंसानों की 4 प्रमुख जातियां हैं- गोरी, नीग्रो, मंगोलियन और भारतीय उपमहाद्वीप की गेंहुआं प्रजाति यानी न ज्यादा गोरे ना ही पूरे काले। दरअसल दुनिया के जिस हिस्से में दक्षिण एशिया पड़ता है उसका अक्षांश-देशांतर से गुणा भाग कुछ इस तरह के जेनेटिक गुण पैदा करता है की सभी की सूरत यहां सांवली सलोनी हो जाती है। लेकिन चिर-सुंदर दिखने की

आज अकेले हिंदुस्तान में काली चमड़ी को चकाचक गोरा करने का कारोबार 750 करोड़ रूपए को पार कर चुका है। आश्चर्य ! दाल रोटी की जुगाड़ में परेशान देश में गोरे होने की इतनी लालसा।  

इंसानी चाह को पढ़ने में बाज़ार ने देरी नहीं लगाई। आज इस क़ुदरती फ़ैसले को मात देने का दावा करने वाली कंपनियां और उनके उत्पाद बाज़ार के अखाड़े में ख़म ठोक रहे हैं और दावों का एक युद्ध चल रहा है कि फेयर एंड सेक्सी, लवली एंड ब्यूटी से ज्यादा रंग निखारती है या फलां, फलां से फलां फीसदी ज्यादा गोरा बना देती है।

बहरहाल बाज़ार की इस लड़ाई में जहां आर्थिक पहलू लगातार मजबूत हो रहे हैं वहीं सामाजिक पहलू निरंतर कमज़ोर। आज अकेले हिंदुस्तान में काली चमड़ी को चकाचक गोरा करने का कारोबार 750 करोड़ रूपए को पार कर चुका है। आश्चर्य ! दाल रोटी की जुगाड़ में परेशान देश में गोरे होने की इतनी लालसा। पर अफसोस रंग बदलने का कोई पुख्ता प्रमाण अभी तक नहीं मिला। गोरी चमड़ी का दावा करने वाली एक एमएनसी के बड़े अधिकारी का बयान पढ़ा, कहते हैं हम तो सिर्फ मांग की पूर्ति कर रहे हैं। लोग जो मांगते हैं उसे देना हमारी जिम्मेदारी है। मगर उन्होंने ये नहीं बताया कि किस ‘अखिल भारतीय सांवली-सांवरिया संघ’ ने इनके दरवाजे पर क्रीम के लिए धरना प्रदर्शन किया था। और अगर उन्होंने धरना देकर इनका गला वास्तव में दबाया था तो फिर करोड़ो रूपए का टीवी, रेडियो और अख़बारी अभियान क्यों? सुपर फिल्मी सितारों की गलाफाड़ नौटंकी क्यों?

बात सितारों की भी होनी चाहिए। लोगों ने इतना प्यार दुलार देकर आसमान पर बिठाया, “बादशाह” बनाया। मगर ये बादशाहत जिन्होंने दी अब उन्हीं को बरगलाने के लिए इस्तेमाल हो रही है। जबर्दस्ती गोरेपन का सब्जबाग क्यों? लोग आपकी एक-एक अदा पे कुर्बान और आप उन्हें इतना बड़ा धोखा दें। ये क्या बात हुई कि गोदौलिया चौराहे के लालाजी के नौकर की तरह हर माल बीस रूपए की रट में सुबह शाम एक किए हुए हैं। हमने सुना था कि आदमी बड़ा बनता है तो उसकी जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं। 

टीवी पर दिखा कि लड़की की शादी नहीं हो रही है, मां-बाप परेशान, डांस कंपटीशन में अव्वल आने का मामला, लड़की परेशान पर क्रीम बीच में आई नहीं कि सब मामला फिट। जैसे चूना, खड़िया, रसायन से बनी क्रीम न हुई कोई पंडित बिरजू महाराज टाइप

लड़की की शादी नहीं हो रही है, मां-बाप परेशान, डांस कंपटीशन में अव्वल आने का मामला, लड़की परेशान पर क्रीम बीच में आई नहीं कि सब मामला फिट। जैसे चूना, खड़िया, रसायन से बनी क्रीम न हुई कोई पंडित बिरजू महाराज टाइप क्लासिकल डांस की गुरू हो गई।

क्लासिकल डांस की गुरू हो गई। फिर इसका किसी के कॉन्फिडेंस से क्या वास्ता? 750 करोड़ के कारोबार को दिमाग में लेकर चलने वाली कंपनियां देश की आधी आबादी के कच्चे-पक्के मन में जो नकारात्मक सोच पैदा कर रही हैं उसका क्या? बार-बार टीवी पर आने वाले एड ने सांवलेपन को एक रोग के अहसास में बदल दिया है जिसकी दवा है फेयर एंड सेक्सी क्रीम। उन लाखों-करोड़ो मां-बाप का क्या जिनके मुंह का स्वाद लड़की नाम से ही कसैला हो जाता है, ऊपर से सांवली। लड़कों को लेकर तो समाज फिर भी उदारमना है- देशी घी का लड्डू टेढ़ा ही सही (गोरापन फॉर मेन्स क्रीम भी बाज़ार में है)। पर सांवली लड़की- मिट्टी के पात्र में अमृत भी स्वीकार्य नहीं।

अपने को तो गुरूजी का कक्षा 6 में पढ़ाया पाठ याद रहा लिहाजा इससे ज्यादा गोरे होने का ख्याल कभी मन में आया नहीं। रही बात गोरापन बेचने वाली कंपनियों की तो 750 करोड़ कम नहीं होते और लालाजी की दुकान चमकाने के लिए न जाने कितने बादशाह लाइन लगाकर अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं- मुझे मौका दीजिए फेयर एंड सेक्सी को बाज़ार से उखाड़ कर लवली एंड ब्यूटी का झंडा गाड़ दूंगा। पर आप तो सबसे समझदार हैं। कुदरत का फैसला न बदला है न बदलेगा। अपन दाल रोटी में जूझ रहे लोग माइकल जैक्सन तो हैं नहीं कि करोड़ों रूपए चेहरे-मोहरे पर न्यौछावर कर दें, न ही अपना माइकल जैक्सन टाइप धंधा है कि गोरे न हुए तो काम ठप हो जाएगा। अभी समझ गए तो ठीक वर्ना फिल्म ट्रैफिक सिग्नल के सांवले बच्चे की तरह कनॉट प्लेस में खड़े होकर फेयर एंड सेक्सी के बोर्ड पर पत्थर मारना पड़े तो क्या फायदा। तब तक तो मेहनत का पैसा लाला के घर पहुंच चुका होगा और गोरा होने का सपना दिल में दम तोड़ चुका होगा।

अतुल चौरसिया

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2 टिप्पणियाँ

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2 responses to “गोरे रहें या काले हमें फ़र्क क्या !

  1. mehek

    aaj ki sachai,gora ban ne ki chahat,beautifuly written post.

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