March 25, 2008
छह साल बाद एक बार फिर से अपन होली के मौके पर उसी चौराहे पर थे जहां पहले हर साल होली की हुल्लड़ जवान हुआ करती थी। एक दिन पहले से ही यानी होलिका की रात से ही होली खेलने वालों का जत्था चौराहे पर जमा होकर होली की मस्ती में झूम रहा था। छह साल से अपने बचपन के चौराहे की होली को मिस करते-करते अचानक इस बार मन माना नहीं। फिर उसी अंदाज में उन्मुक्त होली– जहां किसी बड़े का कोई डर नहीं, किसी छोटे से कोई खास मर्यादा नहीं (मशहूर जुमला है बुरा न मानो होली है)। बस यही एक दिन होता था जब हर कोई अपने मन की करता था। रंग का सुरूर चढ़ते चढ़ते बात कपड़ों की चित्थम चित्था तक पहुंचती थी और फिर उसी हालत में बाज़ार के बाहर मौजूद पक्के पोखरे की तरफ सबका प्रस्थान होता था। यहां लोग रंग पुते चेहरों से निजात पाकर शाम की गुलाल-अबीर वाली होली की तैयारी करते थे। छह साल बाद भी चौराहे का नज़ारा कुछ कुछ वैसा ही था। हां कुछ चीज़ें थोड़ा व्यवस्थित जरूर हो गई थी। पहले होलिका की रात लड़को का हुजूम जुम्मन बैंड वाले या फिर किसी डेक की तेज़ धुन पर पूरी रात मस्ती करता था जिसमें होली के हिट फिल्मी गाने चलते थे। इस बार यहां खूब बड़ा सा डीजे लगा हुआ था। बातचीत में पता चला कि पिछले तीन साल से यहां डीजे ही आता है। इसकी धमक से पूरा मुहल्ला हिल रहा था। डीजे के स्टेज पर गुलाल उड़ रही थी। और रंग की जगह स्प्रे कलर छिड़के जा रहे थे। क्योंकि पानी का इस्तेमाल यहां वर्जित था। लेकिन अल्हड़ई का अंदाज़ वहीं था। मस्ती का सुरूर उसी तरह से लोगों के ऊपर छाया था जैसे अपन पहले खेला करते थे। इस बार जब छह साल बाद अपन चौराहे पर पहुंचे तो भगवान की दया ऐसी रही कि बचपन के तमाम साथी संगाती भी दूर-देस से यहां इकट्ठा हुए थे। फिर क्या रंग तो चढ़ना ही था। शाम को ही दोस्तों ने ठंडई का इंतज़ाम पक्का कर लिया था। पर भांग की व्यवस्था वैकल्पिक थी। यानी जिसे जरूरत हो ले या न ले। इसका भी एक अलग गुणा गणित है। कइयों की अब शादियां हो चुकी हैं। कुछ के अपने बाल बच्चे भी समझदार होने लगे हैं। ऐसे में बीवी की नाराज़गी लेने से बेहतर है कि दोस्तों के सामने खिल्ली उड़वा ली जाय। वरना इस चूतियापे वाले नशे की भेंट चढ़कर दो दिनों तक कौन अपनी भद्द पिटवाए। बच्चे हंस हंस के पागल हों और बीवी कुढ कुढ़ के। वो दिन तो रहे नहीं कि दो दिन बाद तक होली का असर चढ़ा रहता था तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था। यहां तो सबको अगले दिन नौकरी संभालने की टेंशन है। शहरों की ओर भागना है। लड़के भी शहरी माहौल के हैं उन्हें क्या पता पिताजी ऐसी उलट-सुलट हरकत क्यों कर रहे हैं। बहरहाल अगले दिन होली भी खूब जवान हुई। बाल्टी के बाल्टी रंग से लोगों को सराबोर करना और लोगों द्वारा खुद सराबोर होना। अपन भी छह सालों से दिल्ली की सूखी होली खेलकर उकता गए थे। जैसे जैसे समय आगे बढ़ा एक दूसरे की कपड़ा खिंचाई भी शुरू हो गई। कुछ साहब-सुबहा टाइप बंधु शुरू में थोड़ा इससे झिझकते रहे, लेकिन जल्द ही कूंए की भांग की तरह सब एक रस हो गए। हां एक बात और, अब पोखरे की तरफ जाने का रिवाज खत्म हो चला है। वहां पानी कम रहता है और साफ सफाई भी नहीं रहती लोगों ने बताया। बहरहाल उसी हालत में सब अपने घरों की तरफ निकल लिए। और शाम को फिर से बैठक जमी तो पुराने होली के मजेदार किस्सों से महफिल रंगीन हो उठी। सबके मन में इस बात की संतुष्टि थी कि बहुत दिनों बाद फिर से वही पुरानी होली खेली है। वरना तो ज्यादातर मित्र मंडली तितर बितर हो चुकी है। जो बचे खुचे हैं वो भी अकेलेपन की वजह से सुबह रंग के समय घर के अंदर ही रहना पसंद करते हैं। बातचीत में कई बार इस बात का जिक्र आया कि फिर पता नहीं कब सब के सब होली के मौके पर एक साथ मिलें। कुछ इस अंदाज में मस्ती भरी होली जाते-जाते अजीब सा दर्द भी दे गई। अतुल चौरसिया
March 17, 2008
एक बार फिर से क्रूर कम्युनिस्म आपना दिखावटी चोला उतारने को कसमसा रहा है। सारी दुनिया बेबसी से निर्दोष तिब्बतियों पर तनी बंदूके सुरक्षित दूरी से खड़ी होकर देख रही है। चीन को संयम बरतने की सलाह दी जा रही है। लेकिन ड्रैगन आखिर कब तक अपने खूनी जबड़े को शांत रख सकता है। चूहें की दांतों में होने वाली निरंतर बढो़त्तरी उसे ज्यादा देर तक कुतरने से नहीं रोक सकती। उसकी मजबूरी है कुतरना इसी तरह से लाल ड्रैगन की मजबूरी है खून। ज्यादा देर तक खून देखे बिना उसे रहा नहीं जाता। आज सोमवार को किसी भी समय उनकी दी गई समय सीमा खत्म हो जाएगी। फिर शायद एक और थ्येन आन मन का नज़ारा देखने को मिलेगा।
तिब्बत की राजधानी लाल सेना को कब्जे में है। अपने अधिकारों के लिए पचास सालों से संघर्ष कर रहे लोगों के सब्र का बांध अगर पचास सालों में एक बार हिंसक हुआ है तो इसके लिए जिम्मेदारी कौन है? लोगों के विरोध को दबाने के लिए सेना की तैनाती देखकर पूरी दुनिया में किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। क्योकि ये उस विचारधारा का मूल है जिसमें हथियारों से ही सत्ता हाथ आती है और हथियारों से ही सत्ता चलती है। अफसोस अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रियाओं को देख कर हो रहा है।
जैवीय हथियारों की झूठी कहानी को आधार बनाकर इराक को मटियामेट करने वाला अमेरिका तिब्बत के मामले में चीन को सिर्फ संयम की सलाह दे रहा है। इरान की हर पल ऐसी तैसी करने वाला विश्व चौधरी भिक्षु की भूमिका में है। हर देश के अंदरूनी मामलों में छोटी मोटी उठापटक होते ही अपना सातवां बेड़ा सागर में उतारने को उद्धत रहने वाला देश भीगी बिल्ली की तरह सिर्फ संयम की सलाह दे रहा है। संयुक्त राष्ट्र को अपने पैरों की दासी बना कर रखना जिसकी आदत है वो तिब्बत के मामले में यूएन से कुछ नहीं कह पा रहा। भारत की तो खैर बात ही छोड़ दीजिए। उसकी तो कभी इतनी औकात ही नहीं रही कि वो चीन से अपने हिस्से की ज़मीन भी अधिकार और सम्मान से मांग ले। साठ सालों में उसके हिम्मत की सिर्फ एक ही मिसाल है दलाई लामा को धर्मशाला में शरण।
और तो और शीत युद्ध में सिर्फ नाक की लड़ाई लड़ने वाले रूस और अमेरिका ने उस दौर में ओलंपिक जैसे खेल आयोजन के पीछे पूरी दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया था। एक बार आधी दुनिया ने अमेरिका के समर्थन में रूस में हुए ओलंपिक से बॉयकॉट किया तो अगली बार आधी दुनिया रूस के समर्थन में खेलों के इस महाकुंभ से दूर रही। कहने का अर्थ है कि सिर्फ नाक की लड़ाई में इस दुनिया ने बड़ी से बड़ी लड़ाईयां देखी है। बड़ी से बड़ी बर्बादी देखी है। लेकिन पचास-साठ सालों से दमित मर्दित तिब्बतियों के जायज हक में अमेरिका और अगड़ी दुनिया के देश सिर्फ सलाहकार की भूमिका निभा रहे हैं। छोटे-मोटे देशों को अपनी आंखों की पुतलियां तरेर कर दाएं-बांए करने वाले ड्रैगन के हाहाकारी जबड़े की ताकत बेबसी से महसूस कर रहे हैं। लेकिन इस रवैये से उनका दुनिया में लोकतंत्र के पहरुआ होने का दावा कमज़ोर हो गया है। दुनिया के दामन पर आज किसी भी समय लाल सेना के अत्याचार के छींटे पड़ सकते हैं। थ्येन आन मन की भयावह यादें ताज़ा हो रही हैं। देखना है दुनिया भर में लोकतंत्र का झंडा बुलंद करने वाले हमेशा से जनतंत्र को अंगूठा दिखाने वाले ड्रैगन के साथ क्या समझौता करते हैं। इस बार की हार कहीं न कहीं ड्रैगन के सामने उस लोकतंत्र की भी हार होगी जिसके बारे में कहा जाता है कि यही तंत्र दुनिया को आगे ले जा सकता है, उसे ज़िंदा रख सकता है।
अतुल चौरसिया
March 13, 2008
राजकुमार भारत की खोज पर निकले हैं। उनके मुताबिक भारत को जानने के लिए उसके गांवो को जानना जरूरी है। दिल्ली से दूर उड़ीसा के जंगलों की ख़ाक छानना जरूरी है। चलो अच्छा हुआ कम से कम उन्होंने ये तो माना कि उन्हें भारत के बारे में जानना अभी बाकी है। भले ही देश की सबसे बड़ी पार्टी के वो महासचिव हैं लेकिन भारत के बारे में जानना अभी बाकी है। राजकुमार हैं, आप को तो पता ही है राजकुमारों के नखरे भी आने दो चार आने के तो होते नहीं। बार-बार वही राय बरेली, वही अमेठी उन्हें भी राजमाता के ऊपर गुस्सा आ गया होगा। उन्होंने कहा नहीं मैं भारत की खोज करूंगा। भारत तो हर जगह बसता है फिर आप मुझे हमेशा अमेठी, रायबरेली ही क्यों भेजती हैं। थोड़ा मौसम, मिजाज़ बदलना चाहिए कि नहीं। राजमाता उन्हें बहलाती- अरे ये तो तुम्हारे बाप-दादों की नगरी है। यहीं से भारत शुरू होता है यहीं भारत खत्म हो जाता है। जैसे दस जनपथ के भीतर कांग्रेस शुरू होती है और मुख्य गेट तक आते आते खत्म। इससे इतर किसी कांग्रेस का कोई वजूद नहीं हो सकता।
फिर राजकुमार ने अपने देश को खोजने में 38 साल की उमर क्यों गुजार दी? दस जनपथ को घेरे रहने वाले चंपुओं ने उनमें उनकी दादी के गुण देखे थे। जिसे बिना कुछ किए ही राजसत्ता हासिल हो जाएगी। चंपुओं ने उन्हें विश्वास दिला दिया था कि आपके मस्तक पर राज्याभिषेक की रेखाएं चमक रही हैं। इसमें कौन सी नई बात है। वो तो उस चहारदीवारी की महिमा है। लेकिन धीरे-धीरे यूपी आया गया, पंजाब, उत्तराखंड आया गया, गुजरात भी आया और चला गया राजकुमार के मस्तक की रेखाओं ने कोई जादू नहीं दिखाया। तब चंपुओं को लगा कि इस राजकुमार में न बाप वाला लच्छेदार इक्कीसवीं सदी का विज़न है और न ही दादी वाला चमत्कारी तेज़। सत्ता हिलती दिखने लगी चंपुओं को। जिस राजकुमार के भरोसे अपनी गोटियां फिट की थी वो तो कोई चमत्कार नहीं दिखा पा रहा है। कहते हैं पूत के पांव पालने में दिखते हैं, ये राजकुमार तो कोई असर ही नहीं छोड़ पा रहा है। तभी जमात के बीच से किसी ने सुर्रा छोड़ा अरे भाई राजकुमार को “भारत दर्शन” करवाओ। एक तरफ पार्टी की नैया पार लगेगी दूसरी ओर अपना भी कल्याण होगा। दीन-हीन भारतीय जब जीवन का चौथा आश्रम देखता है तो उसे मुक्ति का सिर्फ एक ही रास्ता दिखता है चारो धाम की तीरथ यात्रा। इहलोक और परलोक सुधारने का असहाय हिंदुस्तानी के पास यही एक जरिया है। दस जनपथ को घेरे बैठे चंपुओं को भी अपना कल्याण इसी में नज़र आया कि राजकुमार भारत की खोज करें और अपना इहलोक और परलोक सुधारें।
इस तरह शुरू हुई है राजकुमार की भारत खोजो यात्रा। इसी तरह से चुनावी मौसम को भांप कर जंग लगे लौहपुरुष ने भारत उदय करने का बीड़ा उठाया था। पर नतीजा सबके सामने है। राजकुमार की इस खोज का नतीजा क्या होगा भगवान जाने। लेकिन उनके सहारे अपनी नैया मंझधार से पार लगाने की फिराक में बैठे चंपुओं की इस बार ख़ैरियत नहीं होगी। जो राजकुमार की हर विफलता के बाद एक नया झुनझुना लेकर हाजिर हो जाते हैं। आखिर राजमाता को भी राजकुमार की चिंता है। आखिर कब जवान होगा ये राजकुमार, या फिर उसके बस की भी है हिंदुस्तानी राजसमाज की टेढ़ी-रपटीली राहों का सफर या सिर्फ झुनझुनों और मेरे पिताजी मेरी दादीजी के नाम पर “सड़क दिखावा” (रोड शो) करता रहेगा। राजमाता गुस्से में हैं, और राजकुमार है कि अभी तक ठीक से राजनीति की एबीसीडी भी नहीं सीख सका। कभी कहता है एक रूपए का पांच पैसा विकास में नहीं लगता तो कभी कहता है मेरी दादीजी ने पाकिस्तान को बांट दिया। अरे चंपुओं 38 की उम्र भारत और राजनीति समझने के लिए बहुत होती है और वैसे तो भारत को खोजने के लिए पूरी उमर भी कम पड़ जाएगी। उन्हें अब तक नहीं समझ आयी तो अब क्या आएगी? लेकिन तुम्हारी तो रोजी-रोटी इसी पर टिकी है। वरना भारत को खोजने के लिए 38 साल नहीं लगते।
अतुल चौरसिया
March 10, 2008
आईपीएल में खिलाड़ी की बोली लग रही है। धक्कम पेल मची है टीम में घुसने की। अब तो ये भी नहीं समझ आएगा की किसकी तारीफ करें किसको गरियाएं। एक ही टीम में अपना फेवरेट धोनी, हरभजन भी खेलेगा और उसी में परम दुश्मन साइमंड और पोंटिंग जैसे भी। फिर भी करोड़ों में उन्हें हथियाने की लहर है। अभी एक और निलामी होनी है। यानी चहुंओर “जय क्रिकेट जय क्रिकेटवान” का नारा बुलंद है। यहां फिर भी थोड़ी बहुत पारदर्शिता बची हुई है। हर साल बोर्ड के अध्यक्ष का चुनाव होता है। अध्यक्ष भी अमूमन बदलते रहे हैं। हालांकि मठाधीशी की कोशिशें डालमिया जैसे लोग करते रहे हैं। पर कुल मिलाकर क्रिकेट में बाकी खेलों जितना बपौती सिस्टम नहीं है।
अब देखिए पावर हाउस ऑफ हॉकी के देश में हॉकी की दुर्दशा को। यहां एक आदमी पिछले दशक भर से कब्जियाए बैठा हुआ है। और अस्सी सालों में पहली दफा हॉकी टीम ओलंपिक में नज़र नहीं आएगी। दुनिया आती रहे जाती रहे हॉकी इनके पैरों की वधू है। तमाम लोगों को शरम हया है। वो इस दुर्दिन के लिए छमा याचना करने को तैयार हैं। कोच ने इस्तीफा दे दिया है लेकिन ये नहीं छोड़ेंगे। रसातल में पहुंचाने के बाद भी लगता है भारतीय हॉकी को अभी इससे भी बुरा कुछ देखना है। आतंकवाद से निपटने की तर्ज हॉकी जैसे खेल पर कैसे फिट हो सकती है। क्या इतना जानने का हक किसी को नहीं हैं। इस देश में हर आदमी जवाबदेह है। आखिर राष्ट्रीय खेल की इस दुर्दशा पर पूरे खेल को अपनी पैरों की दासी बनाए रखने वाले इस शख्स से जवाबलतब क्यों नहीं हो रहा है?
चुनावी बरसात में बड़ी बड़ी टर्र टर्र करने वाले नेता किसी न किसी खेल संघ पर दशकों से कब्जा जमाए बैठे हैं। और खेलों की हालत लगातार रसातलगामी है। कोई जवाबदेह क्यों नहीं है? यहां कोई पारदर्शिता क्यों नहीं है? क्या हॉकी को मौत देकर ही मानोगे? राष्ट्रीय खेल का निशान मिटाकर ही दम लोगे? मेजर की आत्मा कराह रही है। थोड़ी शर्म बची हो तो ईमानदार कोशिश कर लो। वरना अस्सी सालों में जो नही हुआ वो अब हो रहा है और आगे इससे भी बुरा होगा।
अतुल चौरसिया
March 4, 2008
अरे स्टार स्पोर्ट से अलग कोई हिंदी ख़बरिया चैनलों पर भी अपनी नज़रिया गड़ाए बैठा था? अपन तो बैठे थे इसलिए कि हमको अंदाज़ा था यहां जमातों में मचेगी हुआं हुआं। बहरहाल भगवान की इतनी मेहरबानी जरूर रही कि देश में इस वक्त कुछ और नहीं घट रहा है। वरना नेता ने कौन से समझौते पर दस्तखत किए, विदर्भ में क्या बजट का कोई असर किसानों की आत्महत्या की दर पर पड़ा है? सब के सब इस हुआं हुआं में दम तोड़ जाते।
तो यानी अब ऊपर वाला भी समझने लगा है कि ये नीचे वाले तो समझेंगे नहीं अपन ही अपनी पटरी थोड़ा चेंज कर लें। “ऊपरवाला” शब्द बार-बार आने की वजह आपके दिमाग में खुजली पैदा कर सकती है। तो क्या आप इस बात से राजी नहीं हैं कि यहां एक चौथाई सरकार भरोसे बाकी तीन चौथाई भगवान भरोसे चलता है। स्टेशन से लेकर पहाड़गंज बाज़ार तक कभी आपने किसी मेटल डिटेक्टर से किसी को गुजरते देखा है? सब बगल से जाते हैं। या फिर मेटल डिटेक्टर की पीं-पीं पर किसी पुलिस वाले की ऊंघ मिटते देखा है? कान पर जू भी नहीं रेंगती। सरकार का राजकुमार जिसके एक इशारे पर सारा कैबिनेट पूंछ हिलाते हुए आगे पीछे रेंगने लगता है, वही कहता है विकास के लिए गये एक रूपए का सिर्फ पांच पैसा पहुंचता है। किसी शासक को इतना मजबूर किसी देश में आपने देखा है? तो फिर इस देश में चीजें भगवान भरोसे ही तो चल रही हैं। हो सकता है लोगों को इस पर आपत्ति भी हो।
बहरहाल ऊपरवाले की दया से आज भी कुछ नहीं हुआ। वरना ख़बर हर कीमत पर, ख़बर वही जो सच दिखाए, सबसे तेज़ और आपको आगे रखने का दावा करने वाले पूरे पांच घंटे सिर्फ एक ही मुद्दे पर कांव-कांव क्यों करते?
भारत जीत गया। पूरे देश को खुशी हुई। इसमें क्या बुरा है। आप भी इस खुशी में शरीक हैं। पर ऐसा भी क्या है कि घंटे पर घंटे इसी के नाम न्यौछावर हो गए। हर चैनल वाला दावा करता है कि खेल को खेल भावना से खेलो। ऑस्ट्रेलिया खेल भावना की ऐसी तैसी कर रही है। और खुद क्या कर रहे हो। प्रोमों से लेकर एंकर, वॉयस ओवर, स्टिंग, बैंड सब कुछ इस तरह से तैयार किए जाते हैं जैसे किसी लड़ाई के मैदान में हिस्सा ले रहे हैं। वहां टीम भिड़ रही है यहां ख़बरिया ज़मीदार भिड़ रहे हैं। बैंड तो देखिए- “कुचल दिया कंगारुओ को”, “घमंड का सिर नीचा”, “दिखा दी औकात”। अब आप ही फैसला कर लीजिए कौन सी खेल भावना आगे बढ़ेगी। इसीलिए ऊपर लिखा है इधर जीते नहीं उधर मच गई हुआं-हुआं।
अतुल चौरसिया
March 1, 2008
पता नहीं मुझे इस मामले में पड़ना चाहिए या नहीं पर मन नहीं मान रहा। अपना दोनों से बढ़िया नाता है। मोहल्ला भी मेरे ब्लॉग पर हाजिर है और भड़ास भी। मज़े की बात है कि दोनों ही अपन को इससे ज्यादा नहीं जानते और अपन भी दोनों को इतना ही जानते हैं। हो सकता है ये फटे में टांग अड़ाने वाली बात हो। पर जो भी हो रहा है ठीक नहीं हो रहा है। ऐसा लग रहा है कि दोनों पक्ष मिलकर इस बतंगड़ का मज़ा लूट रहे हैं। पिछले दो दिनों से इन दोनों ने मिलकर तकरीबन एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म को ही हाईजैक सा कर लिया है।
इस सारी लड़ाई के बीच जो सबसे निराशाजनक बात दिख रही है वो है भाषा का नरकीय पतन। अब तक तकरीबन सारी अनकही, टालनीय, मुंह छुपाने योग्य बातें यहां हो चुकी हैं। जिस तरह के ओछे लांछन लग रहे हैं वो अकल्पनीय हैं। जूतामार - कीचड़उछाल प्रतियोगिता में कोई भी हथियार नहीं डालना चाहता है। बीच बचाव की तो बात ही छोड़ दीजिए। हर आदमी कमर के नीचे वार कर रहा है।
क्या इस लड़ाई का कोई अंत नहीं है? शुरुआत में सबने बड़ी बड़ी बाते कही थी। ब्लॉग से हिंदी को ये होगा, हिंदी को वो होगा। सोने की चिड़िया वाला झुनझुना हिंदुस्तान की बजाय हिंदी को दिलाने का दम तो सब भर रहे थे। फिर अब क्या हो गया। ये लड़ाई किस बात की? क्या अपने अपने रास्ते जाना एक दूसरे को दरकिनार करने की समझदारी किसी में नहीं है। हर लेख में दोनों पक्ष दावा कर रहे हैं कि वो बहस को आगे बढ़ा रहे हैं। इस ओछी भाषा में बहस को आगे बढ़ाया जाता है भला। खुद को बुद्धिजीवी और पढ़ा लिखा होने का दंभ भी है लेकिन इसी ओछी भाषा में।
अरे भैया न तो वो तुम्हारे घर का चूल्हा जलाते हैं न ही तुम उनकी बिटिया की शादी करवाने जाओगे। फिर काहें की लड़ाई। सिर्फ दंभ और इगो की लड़ाई। तो फिर ये व्यक्तिगत लडा़ई किसी सार्वजनिक मंच से क्यों? Please don’t highjack the public platform. Let them move ahead BABA
जाने क्यों लगता है यहां भी हिंदी साहित्यकारों की तरह मठाधीशी का रोग लग गया है। उनकी मठाधीशी के चक्कर में पिछले पचास-साठ सालों मे हिंदी की दुर्गति तो आप सब देख ही रहे हैं। फिर एक उम्मीद की परवान चढ़ती रोशनी को धुंधला क्यों करते हो भाइयों।
अतुल चौरसिया
February 29, 2008
भड़ास कह लो, गुबार कह लो, जो चाहे समझ लो, पर होता यही है जो मैं आगे लिखने जा रहा हूं। टीवी पत्रकारिता के भी अपने निराले अंदाज़ हैं। हर आदमी खुद को बॉस समझता हैं (क्योंकि सबसे निरीह प्राणी इंटर्न छह महीने पुराने ट्रेनी को भी सर-सर पुकारता है) और हर महिला खुद को मैम।
बहरहाल भूमिका से परे बात करते हैं उस शुक्रवार की जो टीवी चैनलों की साप्ताहिक परिक्रमा है। छोटे से सफर में अपने को टीवी और प्रिंट दोनों का अनुभव हो चुका है। टीवी और प्रिंट के बीच जो सांस्कृतिक अंतर है वो ज़मीन आसमान, काले-सफेद, महिला-पुरुष के अंतर जितना ही बड़ा है। उस शुक्रवार को काफी गहमागहमी थी। बॉस के साथ मीटिंग होनी थी। आधों की फटी पड़ी थी। कुछ अखबारों के पन्ने पर पन्ने पलट कर अपना नर्वसनेस छिपा रहे थे। उधर रिपोर्टरों के गलियारे में फुसफुसाहट हुई साला कोई कायदे की ख़बर नहीं। अबे कोई आइडिया बता दे। वरना साला आज फिर से मार लेगा। शुक्रवार का दिन इसलिए अहम था क्योंकि इसी दिन हफ्ते भर की टीआरपी का लेखा जोखा लेकर एक्सक्युटिव प्रोड्यूसर तिवारी जी और उनके लेफ्टिनेंट आदित्य चंद्रकांत पेश होते थे। इसके बाद सबकी बारी बारी से धक्कमपेल होती थी। अंदरखाने की ख़बर ये थी तिवारी जी पोस्ट में भले ही चंद्रकांत जी से बड़े हों पर बॉस के सामने चंद्रकांत साहब की ही चलती थी। कुछ का कहना था कि नई-नई जिस आराधना पर आजकल तिवारीजी फिदा हैं दरअसल बॉस का दिल भी उसी पर आ गया था। इसीलिए तिवारीजी की पोजीशन कमज़ोर हो गई थी। हवा का रुख भाप गए कुछ चाटोत्तम भाई बंधु चंद्रकांत जी के पीछे लग गए थे। मस्काबाजी में थोड़ा तंगहाथ चाटुश्रेष्ठों की जमात अभी तक तिवारी जी के पीछे ही लगी थी।
रिपोर्टरों के गलियारे से आई फुसफुसहाट दरअसल हर सुबह की मगजमारी थी। इसलिए उनकी हालत चिकने घड़ों की हो चली थी। जिनके हाथ कोई बढ़िया स्टोरी होती वो पहले से ही उसे अपने लिए कंट्रोल एस कर लेता था। लड़कियां इस मामले में थोड़ी चतुर होती थी जो डेस्क वालों, रिसर्च वालों से अपना हवा-हवाई चक्कर चलाकर एकाध आइडिया हथिया ही लेती थी। मां-बहन होती थी ट्रेनी, मझोले दर्जे के रिपोर्टरों की। माध… से लेकर बहन… तक अलंकारों की अच्छी खासी श्रृंखला यहां संपादकीय कक्ष की शोभा बढ़ाती रहती है।
लेकिन शुक्रवार को तो सबकि आफत रहती थी। क्या इनपुट क्या आउटपुट क्या असाइनमेंट क्या को-ऑर्डिनेशन। हफ्ते भर के सुकर्मो कुकर्मो का बहीखाता यहीं खुल जाता था। एकाध मेजर ग़लतियां अगर ऊपरवाले (बॉस का यही नाम है यहां, जाने कब किसको लात मारके बाहर का रास्ता दिखा दे) की नज़रों से रह भी गई तो उसे चाटोत्तमों या चाटुश्रेष्ठों की जमात अपने नंबर बढ़ाने की नीयत से पेश कर देगी। और उसके बाद ग़लती करने वाले का मस्तकाभिषेक ऊपर लिखे अलंकारों से होता है। हर शुक्रवार को हिंदी सिनेमा के बॉक्स ऑफिस की तरह यहां भी कुछ फिल्में हिट होती हैं कुछ फ्लॉप। यानी किसी को बॉस की शाबासी तो किसी को गालियां। वैसे पुरुषो की जमात में एक बात पर सर्वसहमति थी कि बॉस लड़कियों की ही तारीफ करता है। हम लोगों की तो लगाने का बहाना खोजता रहता है।
बहरहाल, एक्सक्युटिव प्रोड्यूसर के साथ उनके डिप्टी तो थे ही साथ में असाइनमेंट हेड खरबंदाजी भी थे। ऊपर से तो तीनों विभागों के प्रमुखों में खूब प्यार मोहब्बत झलकता था लेकिन अंदरखाने में तीनों एक दूसरे की लेने में लगे रहते थे। मीटिंग में बॉस भी थे लिहाजा सबकी बंधी हुई थी। शुरुआत खरबंदा जी ने ही कि। उस दिन शर्लीन चोपड़ा का बॉबी डार्लिंग के साथ लफड़े वाली स्टोरी क्यों नहीं चलाई। उस दिन के बुलेटिन प्रोड्यूसर का चेहरा स्याह पड़ गया। हड़बड़ाते हुए बोला स..सर वो विजुअल अच्छे नहीं थे और बीच बीच में ग्लीच भी था। खरबंदाजी छोड़ने वालो में नहीं थे। ऐसा कैसे हो सकता है। सिमी ने उसके काउंटर लॉक करके दिए थे। तब तो सब कुछ सही था। दूसरे चैनलों ने स्टोरी को खूब ताना और तुम उस टाइम विदर्भ में किसानों की रैली पेल रहे थे। अपने सिपाही की दुर्गति देख आउटपुट हेड चंद्रकांत जी ने मैदान संभाल लिया। अरे उस समय वीटीआर में टेप में ग्लीच दिखा रहा था। अगले बुलेटिन में फिर हमने तानी तो थी उस ख़बर को। दो बड़ो के मैदान में उतरते देख बॉस ने कहा यार ध्यान दिया करो अगर सबसे पहले नहीं ठोकेंगे तो क्या होगा। पता है टीआरपी क्या है इस हफ्ते पांचवे नंबर हैं। दूरदर्शन ही बचा हुआ है हमसे नीचे। सब चुप खड़े थे।
चंद्रकांत जी कहां पीछे रहने वाले थे उन्होंने भी ठोंका। उस दिन पहले से ही असाइनमेंट और को-ऑर्डिनेशन वालों को बता दिया गया था कि चंद्र ग्रहण होने वाला है किसी चलते फिरते ज्योतिषी या बाबा को पकड़ के ले आओ क्यों नहीं आया कोई? ऊपर से एन मौके पर कह रहे थे कि ग्राफिक ठोंको। अरे जब कोई गेस्ट नहीं होगा तो ग्राफिक के दम पर अकेले एंकर कितनी देर तक बुलेटिन खींचता वो तो अच्छा हुआ कश्मीर में ब्लास्ट हो गया नहीं तो पता चल जाता। बॉस ने तिरछी निगाह असाइनमेंट वालों पर डाली। उनकी अपनी दिक्कतें हैं। स्ट्रिंगर साले एनजीओ वाली कहानियों को पब्लिक इंटरेस्ट की कहानी बनाकर पेश करते हैं। इसी चक्कर में काम की कई स्टोरी भी रह जाती हैं।
अब उसी दिन लीजिए, असाइनमेंट वालों ने पहले से ही आउटपुट वालों को यकीन दिलाया था कि इंडिया की हार पर बनारस से रिपोर्टर ने भीड़ को इकट्ठा करवाकर खूब तोड़फोड़ करवाई है। एक कार को भी आग लगा दी है। खिलाड़ियों का पुतला जलाने का भी विजुअल है। असाइनमेंट वालों का कहना था कि आधा घंटा बड़े आराम से तान सकते हो। फोन लाइने खोलकर एक घंटे भी खींच सकते हो। अब तो क्राइम से ज्यादा क्रिकेट बिकने लगा है। इसी भरोसे आउटपुट वाले बैठे रहे और अंत में असाइनमेंट ने कहलवा दिया कि रिलायंस का सर्वर डाउन है। विजुअल नहीं आ सकते। मच गई धमा चौकड़ी। किसी को कुछ समझ नहीं आया। किसी तरह से पुरानी खबरों से पांच बजे का बुलेटिन गया।
मीटिंग चल रही थी। सबकी अपनी मुश्किलें थी। अपनी मजबूरियां थी। बॉस के मन में चैनल को एक नंबर पर ले जाने का जज्बा था। जो अक्सर मीटिंग के अंत में बॉस के समापन भाषण के रूप में सामने आता था। तब तक पीछे तिवारी जी ने आवाज़ दी अबे अतुल पांच बजे के स्पेशल की क्या तैयारी है। या आज भी ऐसे ही जाएगा। अपन ने सीना फुलाकर कहा अरे सर आज तो माल तैयार है। दो सेक्स सर्वे आए हैं। एक भारत में कॉंडोम की साइज जरूरत से बड़ी है और दूसरी भारत की लड़कियों में पहली बार सेक्स करने की औसत उम्र 21 साल है जबकि दुनिया भर में ये औसत 16 साल है। इसी पर दो धांसू पैकेज तैयार करवाए हैं। मर्डर फिल्म का मल्लिका शेरावत और इमरान हाशमी का बेडसीन वाले शॉट की लूप कटवा लिया है। छूटते ही बोले अरे एंकर के साथ कोई सेक्सोलॉजिस्ट को बुलाया है कि नहीं। अपन बोले सर असाइनमेंट को बोला था (यहां जिम्मेदारियां दूसरे पर थोपने का चलन आम है, जिसने जिम्मेदारी ली उसकी ले ली जाती है)। उन्होंने फिर से ज्ञान दिया- एक काम करना तीनों फोन लाइनों को खोल कर रखना और जैसे ही कोई लड़की फोन करे उसे तान देना। अपन ने हां में सिर हिला दिया। को-ऑर्डिनेशन वाले को बोला गया अबे जल्दी से किसी सेक्सोलॉजिस्ट को सेट करो। धीरे-धीरे मीटिंग खत्म होने जा रही थी। खूब आरोप प्रत्यारोप लगे थे। अब सबका ध्यान पांच बजे के स्पेशल पर था। कुछ लोगों की शिफ्ट खत्म होने वाली थी। उन्हें घर जाने की जल्दी थी। पांच बजे का स्पेशल बुलेटिन शुरू हुआ मल्लिका इमरान के इंद्रियों को झनझना देने वाले शॉट के साथ। तिवारी जी बोले अबे ये कौन सी फिल्म है। बगल में खड़ा वीडियो एडिटर अपन से पहले ही बोल पड़ा सर- मर्डर फिल्म का है। नीचे एडिट बे पर पूरी फिल्म पड़ी है। तिवारी जी अपने से थोड़ा दूर हटकर एडिटर से बोले एक काम करना आज रात को इसकी एक सीडी राइट करके दे देना।
अतुल चौरसिया
February 26, 2008
बीते दिनों एक मित्र से अपन ने कहा कि मेरा भी एक ब्लॉग है मौका लगे तो पढ़ना। छूटते ही उन्होंने कहा अच्छा बेटा तुम्हें की-बोर्ड घसीटी की चस्का लग गया। अपने ही पेशे से ताल्लुक रखते हैं, थोड़ा उमर में भी बड़े हैं। वो जारी थे। आगे बोले- हमें फालतू लिखने का ज्यादा मौका तो है नहीं लेकिन पढ़ने का थोड़ा बहुत समय जरूर निकाल लेता हूं। मैं निर्विकार भाव में उनकी ओर निहार रहा था। वो जारी थे। बातों ही बातों में एक गजब राज खोल दिया। बोले पता है सबसे ज्यादा मस्तराम का ब्लॉग पढ़ा जाता है। अपन सिटपिटा गए- ये क्या कह रहे हो यार। उन्होंने सवाल करने शुरू कर दिए, दुनिया में इंटरनेट पर सबसे ज्यादा क्या खोजा जाता है। अपन सीना तान कर अपना जनरल नॉलेज बघार गए- सेक्स। उन्होंने पूछा इंटरनेट पर सबसे ज्यादा क्या देखा जाता है, अपन ने जवाब दिया- पर्न वीडियो। उन्होंने कहा तो तुम्हें क्या लगता है कि मस्तराम पीछे रहेगा? मस्तराम अपडेट नही होगा नई टेक्नोलॉजी से। हिंदी पढ़ने वाले क्या कम ठरकी हैं? अपनी समझ में नहीं आ रहा था। ये क्या पंगा ले लिया। अपना ब्लॉग पढ़ने के लिए कहा था ये तो पीछे ही पड़ गए।
बहरहाल वो जारी थे। बोले कितने लोग पढ़ लेते हैं तुम्हारे ब्लॉग? मैंने कहा ज्यादा तो नहीं ठीक ठाक लोग पढ़ लेते हैं। उन्होंने फिर पूछा कितने कमेंट आ जाते हैं तुम्हारे ब्लॉग्स पर? मेरी कुछ समझ में नहीं आया कहा आ जाते दो चार। ऐसे भी अपन कौन से बहुत नामी लिक्खाड़ हैं। उन्होंने कहा एक बार मस्तराम का ब्लॉग खोलना पता चल जाएगा कितने लोग पढ़ते हैं। कमेंट पढ़ने का सिलसिला शुरू होने के बाद खत्म ही नहीं होता। जाने कितने लोगों के संस्मरण मस्तराम ब्लॉग के कमेंट के सहारे सामने आ जाते है। जाने कितनी दबी छुपी इच्छाएं प्रकट हो जाती हैं। एक मस्तराम कहानी का आधा भी अगर तुम्हारे ब्लॉग को कमेंट मिल जाएं तो सफल मान लेना। भेज दूंगा लिंक मस्तराम के, देख लेना, पढ़ लेना।
अपनी खोपड़ी चकरा गई थी। ये क्या हैं। दोस्ती यारी में पढ़ने को क्या कह दिया इज्जत लेने पर उतारू हो गए। उमर में बड़े हैं लिहाज है सम्मान पर वो तो सारी सीमा ही तोड़ने पर उतारू हो गए। पर एक बात मालुम थी कि उनकी कड़वी बात होती सच है। कहीं न कहीं मन में था कि देखें क्या है मस्तराम ब्लॉग। लेकिन अपनी खिंचाई को ज़ाहिर न होने देने की गरज से उसके प्रति ज्यादा उत्सुकता भी नहीं दिखा सकते थे। पर मन अंदर ही अंदर बेचैन था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान मस्तराम की किताब के तमाम किस्से दोस्तों के बीच प्रेमचंद, शेक्सपियर, शुक्लजी, द्विवेदीजी, गोर्की के पाठ्यक्रम की कहानियों से ज्यादा लोकप्रिय थे। पर ये नहीं पता था कि ब्लॉगजगत में भी इसकी इतनी धूम है। भला हो ब्लॉगवाणी, नारद जैसों का जिन्होंने उन्हें अपने मुख्य पन्ने पर जगह नहीं दी वरना जाने क्या लंपटता मचती। मन में यही चल रहा था कि जल्द से जल्द लिंक भेजें तो देखा जाय है क्या। या इनसे पिंड छूटे तो लिंक का इंतज़ार कौन करता है। गूगल कर लेंगे। होगा तो मिल ही जाएगा।
बहरहाल मस्तराम मिला ही नहीं भैया। इतनी धूम से मिला कि ऊपरी माले के नट बोल्ट ढीले टाइट सब हो गए। पर्नसाइट का तो पता था लेकिन ब्लॉग में इतनी लोकप्रियता वो भी बिना किसी एग्रीगेटर की मदद के। समझ में नहीं आ रहा है कि सामान्य ब्लॉग पढ़ने से ज्यादा ब्लॉग पर कुंठित, झूठी, अकल्पनीय कहानियां पढ़ने वालों की पहुंच है। इस पर लंटता, फूहड़ता परोसने वालों की पहुंच है। इस पर कमेंट देने के लिए लाइन लगाने वालों का तांता है। सबको आज़ादी है पर आज़ादी का ऐसा दुरुपयोग। क्या हिंदी वाले इतने गए गुजरे हैं या फिर इंटरनेट की पहुंच कायदे की बजाय बेकायदे के लोगों तक हो गई है। पहले रोना था कि इंटरनेट की पहुंच हिंदीवालों तक नहीं है या जाने हिंदी की पहुंच इंटरनेट पर नहीं है, जाने क्या घालमेल था। और अब है तो इसका ये निराला रंग है। मस्तराम के ब्लॉग पर मिलने वाले कमेंट पाठकों का स्टैटिस्टिक रिकॉर्ड अपन को तो शर्मिंदा कर गया। लेकिन क्या है कि पत्रकार होता ही है मोटी चमड़ी का बेशर्म जीव। तो अपन तो फिर भी लगे ही रहेंगे। आपको विश्वास नहीं हो रहा है तो नीचे लिंक दिए हैं आप भी उनके आंकड़े देख लीजिए।
http://mustram-musafir.blogspot.com/
अतुल चौरसिया
February 22, 2008
इस देश में लोकतंत्र है। किसी को इस बात से कहां इनकार हो सकता है। लोकतंत्र इसलिए है क्योंकि यहां हर कोई अपने विचार रख सकता है। बिना किसी लाग-लपेट के। बस इतना सा ध्यान रहे किसी की निजता का हनन न हो। यहां कोई नेता को गाली दे सकता है। अधिकारी से सूचना के अधिकार के तहत जवाब मांग सकता है। अक्सर इन कामों में मीडिया की बड़ी भूमिका रहती है। अक्सर उसके इस अभियान में उसे न्यायपालिका का भी साथ खूब मिलता है। लेकिन बीते कुछ दिनों में ऐसी घटनाएं भी हुई हैं जिनमें यही दोनों पक्ष आपस में गुत्थम गुत्था हो गए।
इस देश में कोई न्यायपालिका पर उंगली नहीं उठा सकता। उठाने वाला न्यायालय की अवमानना का दोषी हो जाता है। ये कैसा लोकतंत्र है? आप सबसे जवाब मांग लेते हैं लेकिन आपसे जवाब मांगा जाय तो अवमानना होती है। तहसील में बैठा जज भी उलटे सीधे काम करके बच सकता है क्योंकि उसके खिलाफ कार्रवाई का हक़ सिर्फ देश के मुख्य न्यायाधीश को है। हमारे ज़ी न्यूज़ के एक पत्रकार बंधु थे उन्होंने कुछ बरस पहले देश के मुख्य न्यायधीश, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के नाम एक निचली अदालत से ग़ैर ज़मानती वारंट जारी करवा लिया था। ज़ाहिर है ये ग़लत ही रहा होगा। लेकिन न्यायपालिका को देखिए उसे जारी करने वाले जज में तो कोई ख़ामी नज़र नहीं आयी उल्टे पत्रकार के कारनामें में उन्हें न्यायपालिका का अपमान दिखने लगा। सर्वोच्च न्यायालय का फरमान आ गया कि पत्रकार ने न्यायपालिका का अपमान किया है। उन्हें माफी मांगनी होगी। गजब है हमारा लोकतंत्र।
हाल ही का एक और वाकया है तीस्ता सीतलवाड़ का। गुजरात दंगों के मामलों की सुनवायी में हो रही देरी पर उन्होंने कुछ कह दिया तो न्यायालय का अपमान हो गया। तीस्ता को दोषी ठहरा दिया गया। ये है हमारा लोकतंत्र जिसका एक पाया आज़ादी के 60 सालों बाद भी अपने भीतर झांकने को तैयार नही हैं। अरे अंग्रेज़ों के समय की व्यस्था तो समझ में आती थी क्योंकि उन्हें राज चलाना था। एक शोषण भरा राज। एक साम्राज्यवादी राज चलाना था। इसलिए जवाबदेही न होना, अपने हित की बात सोचना तो समझ में आता था। पर आज भी उसी ढर्रे पर चलने का क्या औचित्य है? सरकार बदल गई। नेता बदल गए। लोगों को वोट देने का अधिकार मिल गया। गड़बड़ ही सही पर राजनीति भी जवाबदेह है। अधिकारी भी मनमाना नहीं कर सकते। पत्रकारों को तो जब तब सरकारें अपने हिसाब से घुमा फिरा लेती हैं। न्यूज़ चैनल को दो महीने के लिए प्रतिबंधित करने पर कोई मजबूत आवाज़ नहीं उठती यहां। कुछ सवाल हैं जिन्हें एक एक कर लिख रहा हूं क्योंकि ऐसे तो जाने क्या क्या लिखता चला जाउंगा-
* क्या पत्रकार ने जो किया उसके पीछे उसकी मंशा अवमानना की थी या भ्रष्टाचार को सामने लाने की थी?
* एमनेस्टी जैसी संस्था हर साल भारत की जुडिशरी को पुलिस विभाग और भूमि प्रशासन विभाग के बाद सबसे करप्टतम विभाग का तमगा देती है। तब न्यायलय की अवमानना नहीं होती?
* विदेशी संस्था के गिरेबान तक हाथ नहीं पंहुचता तो सब ठीक है अपना कोई कहे तो इज्जत पर आंच आती है?
* अंग्रेज़ी पद्धति पर लोकतांत्रिक भारत में 60 साल बाद न्यायपालिका को चलाने का क्या मतलब है?
* लोकतंत्र जब सबको जवाबदेह होने की बात करता है तो फिर एक हिस्सा इससे अलग क्यों?
* क्या इस सच्चाई से इनकार किया जा सकता है कि न्यायपालिका में जवाबदेही न होने के कारण भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है?
* इसे उजागर करने वाला आपराधी है, या फिर फर्जी वारंट जारी करने वाला?
* आदर्श लोकतंत्र में माफी किसको किससे मांगनी चाहिए? ग़लत को सही से या सही को ग़लत से।
सवाल और भी बनेंगे। क्या आप लोग इस बहस को आगे बढ़ाएंगे? हो सकता है मेरा ये लेख भी न्यायलय को अवमानना लगे। देखते हैं। अगर यही लोकतंत्र का भविष्य है तो फिर क्या किया जा सकता है। अपन भी माफी मांग लेंगे। इतने विद्वान लोग वहां बैठे हैं उन्हें सही ग़लत का अंतर तो पता ही होगा। अगर यही लोकतंत्र का भविष्य है तो यही सही। वैसे अमेरिका भी तो खुद को लोकतंत्र कहता है। वहां तो लोग खूब उंगली उठाते हैं। क्योंकि ये उनके अभिव्यक्ति के अधिकार के दायरे में आता है।
February 18, 2008
वो भी दिन थे जब हर गली, हर मुहल्ले, हर नुक्कड़ पर रेडियो कान में सटाए लोग भारत की हार जीत का कानों देखा हाल जानने को बेताब रहते थे। बात तब की है जब अपन लोग बस क्रिकेट का क ख ग सीख रहे थे। टीवी का हल्लाबोल घर के ड्राइंग रूम में नहीं हुआ था। कहीं कहीं था भी तो क्रिकेट के मैचों के सीधे प्रसारण की आशा वो भी दूरदर्शन से बेमतलब थी। बात 90 के शुरुआती दशक की है। बाज़ारवाद की बस शुरुआत ही हुई थी। लेकिन क्रिकेट का धर्म रूपी स्वरूप काफी हद तक स्थापित हो चुका था। बात शुरू हुई थी रेडियो में क्रिकेट मैचों के कानों देखे हाल से। क्रिकेट के मैदान से हजारो मील दूर हम जैसे लोगों को जोड़ने का यही एक मात्र जरिया था। गजब लच्छेदार भाषा में लगातार चल रही कमेंट्री बस मज़े कर देती थी। उत्साह तीन चरणों में पूरा होता था पता नहीं टीवी की भाषा में बीच में कोई जेनरेशन लॉस होता था या नहीं। खिलाड़ी शॉट मारता था या विकेट गिरता था रेडियो में नेपथ्य से दर्शकों का हल्ला होता था, दूसरे चरण में कमेंटेटर की जुबान का पारा चढ़ जाता था अपनी भी समझ में आ जाता था कि कुछ स्पेशल हुआ है, तीसरे चरण में बात अपनी समझ में आती थी तो उत्साह या निराशा की दो निर्धारित ध्वनियां श्रीमुख से निकलती थी- वो मारा साले को या फिर धत तेरी…. की।
बाद के सालों में धीरे-धीरे उस गली से नाता टूटता गया। इस बीच क्रिकेट ऐसा पुष्पित-पल्लवित हुआ कि एक एक मैच का टीवी पर आंखो देखा हाल मिलने लगा। विकेट गिरने की बारीकी से लेकर चौके छक्के का संशय मिटाने में भी टीवी की भूमिका ग़ैर नज़रअंदाज हो गई। खिलाड़ियों द्वारा की जाने वाली नज़रफरेबियां भी लोगों की नज़रो में आ गई। रेडियो से नाता लगभग टूट रहा था लेकिन टीवी इस ख़ामोशी से ज़िंदगी में शामिल हुआ था कि किसी को रेडियो की कमी का अहसास नहीं हुआ। कुछ चीज़े टीवी अपने साथ एकदम ट्रेडमार्का ले आई थी। जैसे हर ओवर के बाद तेल साबुन के विज्ञापनों की बहार, खिलाड़ी ने गेंद मारी, कैमरा गेंद के पीछे जाते जाते अचानक बाउंड्री पर लगे ‘दिलजले’ अंडर गारमेंट (अपने देश में ये भी निराला चलन है कि अंडरगारमेंट कंपनियों के नाम- रूपा, तनु, मनोरमा- स्त्रियोचित ही होते हैं) के “सब कुछ अंदर है” वाले विज्ञापन बोर्ड से चिपक जाता है। कोई समझे चौका या छक्का इससे पहले कहानी आगे बढ़ जाती है। अंदाजा स्क्रीन पर फाइनल स्कोर देख कर लगा लो। मुफ्त में इससे ज्यादा नहीं मिलता। कमेंट्री भी निहायत ही शरीफाना आंदाज़ में होती है। पूरे ओवर के दौरान टीवी का कमेंटेटर एक दो बार अपनी चुप्पी तोड़ता है वो भी ज्ञान बांटने के लिए क्योंकि सारा स्कोर तो स्क्रीन पर दिख रहा है। वो रेडियो कमेट्री का मज़ा टीवी कमेंट्री में कहां। बाजुबानी एक मित्र के पिता जी की- वो क्रिकेट देखते तो टीवी पर हैं लेकिन कमेंट्री सुनने के लिए रेडियो पास में रखते हैं। तो कुछ इस तरह का नशा रेडियो पर मैच का हाल जानने का था।
पिछले दिनों फिर उसी गांव जाना हुआ जहां से सालों पहले अपन खुद ही अघोषित निर्वासन ले चुके हैं। भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच बॉक्सिंग डे का बहुचर्चित देवासुर संग्राम होना था। सोचा ठीक ही है खाली बैठे टीवी पर मैच का लुत्फ उठाएंगे। पर मैच के दिन सुबह ही सुबह अजब नज़ारा दिखा। हर जगह उसी अंदाज में रेडियो कान में सटाए लोगों का हुजूम चौराहे पर नज़र आया जैसा अपने छुटपन में हुआ करता था। पता किया तो कारण समझ आया- भैया यहां टीवी और मैच भूल जाइए 24 घंटे में चार घंटे बिजली बड़ी मुश्किल से दर्शन देती है। लिहाजा रेडियो ही एकमात्र सहारा है। सोचा ठीक ही है टीवी में हर पांच मिनट बाद तेल साबुन की पचर-पचर से तो अच्छा है रेडियो की धाराप्रवाह कमेंट्री का लुत्फ उठाया जा। कम से कम रेडियो में तो बाज़ार नहीं घुसा है। अपन भी चिपक गए रेडियो से। अपनी टीम बैटिंग कर रही थी। भावनाएं पूरे उफान पर थी। ऑस्ट्रेलिया को धूल चटाना था। थोड़ी ही देर में पता चल गया कि बाज़ार कितना शातिर है। गुपचुप ही इसने रेडियो में भी घुसपैठ कर ही ली।
यहां हर चौके या छक्के के बाद च्यवनप्राश वाले, टेलीफोन वाले चौका-छक्का लगवाते हैं। फिर भी अपनी टीम बल्लेबाजी कर रही थी तो सोचा ठीक ही है देसी कंपनी है अपने देश के चौके छक्के पर हल्ला कर भी रही है तो क्या हुआ। इससे तो देशप्रेम की भावना ही मजबूत होगा। ये अलग बात है कि बाज़ार की बड़ी कंपनियों के लिए रेडियो का स्रोता कोई मायने नहीं रखता उनके लिए तो मोटी पॉकेट वाला टीवी का दर्शक मायने रखता है। इसलिए रेडियो पर देशी कंपनियां ही सिरफुटौव्वल कर रही हैं। पर ये क्या! ऑस्ट्रेलिया की पारी शुरू हुई तो उनके भी हर चौके पर पीछे से आवाज़ आई दर्दे डिस्को दाद-ख़ाज मल्हम चौका, रामा रामा अंडर गारमेंट छक्का। अपन ने सोचा ये क्या है कंपनियां तो देसी हैं फिर विदेशी के शॉट पर क्यों कूद रही हैं। बेगानी शादी में दाद ख़ाज खुजली वाला दीवाना। अजब उलटबांसी है। अपनी टीम पिट रही है और घर के लोग जश्न मना रहे हैं। इस बाज़ार में क्या सब कुछ उल्टा ही चलता है? उधर ऑफिस के बगलवाला बनाता सिर्फ पराठा है और नाम “नॉट जस्ट पाराठाज़”। बाज़ार महाठगिन हम जानी- क्या रेडियो, क्या गली, क्या मोहल्ला सबको अपने खरीददार का पता मालुम है। टीवी वालों से सीख कर देसी वालों ने रेडियो पर आजमाया है। बेटा भूल जाओ देशभक्ती-सक्ती। चौका ऑस्ट्रेलिया मारे या भारत सुनोगे तो दाद वाले मल्हम या फिर अंदर बाहर वाले बनियान का ही नाम तो बस हो गया उनका काम। ये कथा है उस मादक कॉकटेल के निर्माण की जिसे रेडियो ने क्रिकेट और बाज़ार के साथ मिलकर तैयार किया है। लोगों पर भी इसका नशा सर चढ़कर बोल रहा है क्योंकि गांव में बिजली नहीं हैं जाओगे कहां? हम चिल्ला के कौन सा धौलागिरि उखाड़ लेंगे।
अतुल चौरसिया