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	<title>चौराहा</title>
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	<description>वो चौराहा था जहां लोग कम रिश्ते ज्यादा हुआ करते थे...</description>
	<pubDate>Sat, 03 May 2008 11:04:41 +0000</pubDate>
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		<title>चचा सैम और अधनंगे फकीरों-सपेरों की भूख&#8230;</title>
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		<pubDate>Sat, 03 May 2008 11:04:41 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[खा-खा के मुटियाए अमेरिकियों पर उनकी नज़र नहीं जाती। दस में नौ सर्वे चिल्लाते रहते हैं कि अमेरिकी मोटापे से बेजार हैं। वजह भी सबको पता है। लेकिन अपने बारे में इस तरह की ख़बरें उन्हें परेशान नहीं करती बल्कि उनका सीना और चौड़ा हो जाता है। पैसे के अगाध स्रोत में अंधराए अमेरिकियों के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p>खा-खा के मुटियाए अमेरिकियों पर उनकी नज़र नहीं जाती। दस में नौ सर्वे चिल्लाते रहते हैं कि अमेरिकी मोटापे से बेजार हैं। वजह भी सबको पता है। लेकिन अपने बारे में इस तरह की ख़बरें उन्हें परेशान नहीं करती बल्कि उनका सीना और चौड़ा हो जाता है। पैसे के अगाध स्रोत में अंधराए अमेरिकियों के पास करने को कम है इसलिए खाना उनकी उच्च प्राथमिकता में आता है। सर्वे तो ये भी बताते हैं कि मन भर खाने के बाद जितना जूठा खाना अमेरिकी नदी नालों में बहा देते हैं उतने में दरिद्रई के शिकार छोटे मोटे अफ्रीकी देशों की पूरी जनसंख्या का पेट भर जाय और &#8220;जुग-जुग जियो&#8221; का आशीर्वाद मुफ्त में मिले। पर ये बाते न तो राष्ट्रपति महोदय को नज़र आती हैं न ही उनकी विदेशमंत्री कोंडलिज़ा ख़ातून को।</p>
<p>हफ्ते भर पहले खातून ने हिंदुस्तानियों को ज्यादा खाने-पीने के लिए जिम्मेदार ठहराया था, और इसे ही दुनिया में खाद्यान की समस्या का कारण बताया था। अब हफ्ते भर बाद चचा सैम ने भी हिंदुस्तानियों के खान-पान की लानत-मलानत की है। उनके मुताबिक भारत का मध्य वर्ग जब से पैसे वाला हुआ है उनकी खान-पान की जरूरत बढ़ गई हैं। यहां के 35 करोड़ मध्यवर्गियों ने मिलकर पूरी दुनिया की नाक में दम कर दिया है। दुनिया को खाने की मोहताजगी हो गई है। पैसा आने के बाद भी किसी सर्वे में ये तो नहीं कहा गया कि हिंदुस्तानी खाना बर्बाद करते हैं। यहां अमेरिकियों की तरह खाने, मुटियाने की बात तो कोई नहीं कहता। तो फिर अपने गिरेबान में झाकने में तकलीफ क्यों है?</p>
<p>चचा सैम चाहते हैं कि हिंदुस्तानी हमेशा भूखे ही रहें। अधनंगे फकीरों, सपेरों का देश तो फिरंगियों ने पहले ही घोषित कर दिया था। लगता है चचा अभी भी उसी चश्मे से गाफिल हैं। दुनिया के ईंधन का चालीस फीसदी हिस्सा अकेले ढकारते वक्त उन्हें नहीं सूझता कि हम कुछ ज्यादा माल उड़ा रहे हैं। कुल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन का अस्सी फीसदी हिस्सा अकेले उगलते समय उन्हें दुनिया पर मंडराते ख़तरे का अंदाज़ा नहीं होता। तब तो उन्हें इसकी फिकर भी नहीं होती कि उनके कुकर्मों की सज़ा पूरी मानवजाति, समाज, पर्यावरण, जलवायु, जल, जंगल, ज़मीन, नदी, पहाड़, सागर को भुगतनी पड़ रही है। और आगे ये खटकरम दुनिया के सिर पर और भारी पड़ने वाला है। बेशर्मी की हद में इराक से लेकर ईरान तक तेल-तेल की हाय-हाय करते समय इन्हें दुनिया पर संकट नज़र नहीं आता। पर कुछ दशक पहले के भूखे भारतीयों का भरपेट खाना इनकी आंखों में गड़ रहा है। इतने महत्वपूर्ण काम को छोड़कर पूरा अमेरिकी सियासी कुनबा हिंदुस्तानियों के खान-पान पर निगाह रखने के अतिमहत्वपूर्ण काम में लग गया है। कितनी रोटी, कितना चावल, कितनी दाल मिलेगी इसका भी फैसला अब आठ हज़ार किलोमीटर दूर बैठे चचा ही करेंगे। हम तो यही कहेंगे कि भूखे पेट की हाय बहुत भारी पड़ती है। इसलिए मुंह का निवाला छीनने की कोशिश मत करो वरना बुरे फंसोगे।</p>
<p>अतुल चौरसिया</p>
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		<title>हमारा नेता चौड़े से&#8230;</title>
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		<pubDate>Fri, 02 May 2008 08:03:44 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[कई दिनों से लिखने का शगुन नहीं बन रहा था, या कहें कि कुछ मजेदार लिखने को सूझ नहीं रहा था। आप इसे अपन का तंग हाथ कह सकते हैं, तो सोचा कि एकाध इलाहाबादी दिनों का संस्मरण लिखा जाय। विश्वविद्यालय की घनी पेड़ों की छांव में पढ़ाई लिखाई संबंधित क्रिया-कलापों के अलावा बाकी सब [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p>कई दिनों से लिखने का शगुन नहीं बन रहा था, या कहें कि कुछ मजेदार लिखने को सूझ नहीं रहा था। आप इसे अपन का तंग हाथ कह सकते हैं, तो सोचा कि एकाध इलाहाबादी दिनों का संस्मरण लिखा जाय। विश्वविद्यालय की घनी पेड़ों की छांव में पढ़ाई लिखाई संबंधित क्रिया-कलापों के अलावा बाकी सब कुछ होता था। बम बनाने के गुर यहां के कुछ मठाधीश बुजुर्गवार (बाइज्जत सीनियर) बाकायदा नवांगतुकों को सिखाते रहते थे। बहरहाल इसके अलावा भी इस विद्यालय की एक ख़ास पहचान हैं-यहां के छात्र नेता। परिसर में छात्र कम कड़ियल झक सफेद खद्दरधारी छात्र नेता ज्यादा नज़र आते थे। यहां का मशहूर जुमला है विश्वविद्यालय परिसर राजनीति की पहली पाठशाला है। गणेश शंकर विद्यार्थी भवन का लतियाया-जुतियाया सीधे संसद भवन पहुंचता है।</p>
<p>बहरहाल यहां अपनी चर्चा का विषय कक्षा के वो छात्र है जिनके अंदर नेतागिरी का कीड़ा तो कुलबुलाता रहता था पर प्रतिभा की कमी या उससे भी ज्यादा पैसे की कमी की वजह से परिसर में उनका झंडा बुलंद नहीं हो पाता था। हर कक्षा में इस तरह के कीड़े से ग्रस्त दो चार प्राणी जरूर मिल जाते थे। और मज़े की बात ये थी कि क्लास में जी-10 भी हुआ करता था। ये ऐसे छात्रों का समूह था जिनकी राजनैतिक प्रतिबद्धताएं सुबह चाय-ब्रेड-बटर और शाम को चाट- समोसे के साथ बदल जातीं थीं। खासियत ये थी कि ये अपना शिकार भांपने के बाद पूरी ईमानदारी से उनके पीछे खड़ा होता था। नेतागिरी के कीड़े की कुलबुलाहट से परेशान नेता को इस बात का भान करवा दिया जाता था कि उनके पास अच्छा खासा छात्रों का समर्थन है। जी-10 के पास छात्रहित से जुड़े मुद्दों का रेडीमेड भंडार होता था। जिसके सहारे वो नेताजी को परिसर में धरना-हड़ताल-प्रदर्शन के लिए तैयार करते थे। नेताजी को भी अहसास हो जाता था कि इन्हीं खटकरमों से गुजर कर विश्वविद्यालय की गद्दी हथियायी जाती है। हर दिन परिसर में नेता जी का जुलूस निकलता। जी-10 उनके पीछे खड़ा रहता। नारे लगते हमारा नेता चौड़े से&#8212;बाकी नेता (सेंसरर्ड) से। क्यों पड़े हो चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में। मजे की बात ये थी कि छात्रों के स्कॉलरशिप से लेकर छात्रावास दिलाने तक हर मुद्दे की मांग में नारे यही लगा करते थे। स्कॉलरशिप, छात्रावास का जिक्र भी कानों में नहीं पड़ता था। इन तमाम चकल्लस के साथ जी-10 के नाश्ते-पानी का जुगाड़ एक सत्र के लिए हो जाता था।। नेताजी गद्दी पाने के सपने में चंपुओं से घिरे रहते लेकिन उन्हें इसका अहसास नहीं होता था या कि होने ही नहीं दिया जाता था। मजे की बात तो ये थी कि इन्हीं के बीच से जलूस के दौरान पत्थर फेंका जाता था। लेकिन जब सामने से घुड़सवार पुलिस का मुगलई काफिला लट्ठ पटकता हुआ पहुंचता था तो नेता जी भरे मैदान में अकेले नज़र आते। इसके बाद उन्हें अपने रंगरूटों का दुबारा से दर्शन अगली सुबह सीधे स्वरूपरानी हॉस्पिटल के बेड पर पड़े-पड़े ही हो जाता था। नेताजी को होश हवास में आने के बाद उन्हें फिर से इस बात का अहसास करा दिया जाता था कि बिना पुलिसिया लट्ठ खाए कोई नेता हो सकता है भला। पुलिस की लाठी खा कर ज़मीन पर गिरा नेता ही आगे चलकर ज़मीनी कहलाता है।</p>
<p>नेता जी चुनावी चक्कर में इस क़दर फंसते थे कि परीक्षा में फेल हो जाते। जी-10 अगले शिकार की खोज शुरू कर देता क्योंकि फेल नेता दुबारा से चुनाव नहीं लड़ सकता। गांव में मां-बाप खेती-किसानी से जुड़े थे। यहां लड़के को नेतागिरी की धुन सवार हो गई। जी टेन ने उन्हें संसद तक का सपना दिखाया था आज तक कोई अपन को यहां नज़र नहीं आया। यहां आया तो पता चला अब दिल्ली सिर्फ धर्मेद्र सिंह यादव, राहुल, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य, जितिन प्रसाद जैसे पहुंचते हैं। अब खेती किसानी वाला बाप मुलायम सिंह यादव की बराबरी तो कर नहीं सकता ना। अब गुस्से में भले ही कोई कह दे&#8211; इलाहाबाद में लाठी खाने के लिए हमारा बेटा और दिल्ली में मलाई काटने के लिए मुलायम का बेटा, पर कर भी क्या सकते हैं?</p>
<p>नतीजा, गए थे पढ़ लिख कर साहब बनने वापस आकर खेती किसानी में हाथ गंदे करने पड़ गए। बाप भी कितने दिन जवान बेटे को बैठाकर खिलाता। नेतागिरी का कीड़ा फिर भी रह-रहकर कुलांचे मारता लिहाजा गांव के परधानी के चुनाव में हाथ आजमाने से खुद को रोक न सके। लेकिन यहां भी किस्मत साथ नहीं दे सकी। यहां ठाकुर पंडित मिल गए, अहीरों का वोट कम पड़ गया ऊपर से हरिजन बस्ती ने भी आखिरी समय में हाथ खींच लिया। अब ये कोई विश्वविद्यालय का चुनाव तो है नहीं। यहां तो एक एक वोट जाति बिरादरी के तराजू पर तौल कर और रिश्तेदारी-पट्टीदारी की भट्टी में तपाकर दिए जाते हैं। लिहाजा बेचारे नेताजी को यहां भी हार से दो चार होना पड़ा। इधर अपन को इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संसद पहुंचने वाले नेता का अभी भी इंतज़ार है।<br />
अतुल चौरसिया</p>
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		<title>रेल का लालूकरण या बिहारीकरण या फिर बिहार का रेलीकरण</title>
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		<pubDate>Thu, 24 Apr 2008 06:28:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>chauraha</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[बात शुरू करने से पहले दो बातें डिस्क्लेमर के तौर पर लिख दूं कि अपन को बिहार से रत्ती भर भी परहेज, घृणा या उस तरह की कोई परेशानी नहीं है जिस तरह का पर्याय &#8220;बिहारी&#8221; शब्द देश के अलग-अलग हिस्सों में बन गया है। विषय हाल ही में मेरी रेल यात्रा और उसके यात्रियों [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><a href="http://chauraha.files.wordpress.com/2008/04/indiantrain2.jpg"><img class="alignnone size-thumbnail wp-image-61" src="http://chauraha.files.wordpress.com/2008/04/indiantrain2.jpg?w=128&h=85" alt="अपना देसी रेल है" width="128" height="85" /></a>बात शुरू करने से पहले दो बातें डिस्क्लेमर के तौर पर लिख दूं कि अपन को बिहार से रत्ती भर भी परहेज, घृणा या उस तरह की कोई परेशानी नहीं है जिस तरह का पर्याय &#8220;बिहारी&#8221; शब्द देश के अलग-अलग हिस्सों में बन गया है। विषय हाल ही में मेरी रेल यात्रा और उसके यात्रियों की बातचीत, सुविधा-असुविधा पर आधारित है जिसमें उपरोक्त शब्द (लालूकरण, बिहारीकरण, रेलीकरण) बार-बार लोगों की जुबान पर आए। इसे अन्यथा न लें&#8230;</p>
<p>चर्चा का बिंदु ये है कि जब से लालूजी ने रेलमंत्रालय संभाला है उनका दावा है कि रेल के यात्री किराए में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गई है। ये अलग बात है कि इसके बावजूद रेल को अपने जन्म के बाद से पहली बार मुनाफे का शगुन इन्हीं के कार्यकाल में देखने को मिला। लालू के इस दावे से कम से कम अपन इत्तेफाक नहीं रखते। उनकी बाजीगरी ये रही कि ज्यादातर ट्रेनों को उन्होंने एक्सप्रेस की श्रेणी में डाला और एक्सप्रेस श्रेणी का किराया अपने आप दूरी के परिमाण में बढ़ाने का प्रावधान किया। अब उन्होंने कोई ऐसी ट्रेन छोड़ी ही नहीं जिसे एक्सप्रेस की श्रेणी में न डाला गया हो। इस तरह से सबके किराए अपने आप ही बढ़ गए। शायद जनरल के किराए इससे अछूते रह गए हों।</p>
<p>ऊपर जो रेल के लालूकरण या बिहारीकरण की बात कही गई है वो साथ में यात्रा कर रहे दो बंधुओं की आपसी बातचीत से निकली। पूरे के पूरे कोच में कहने को तो ये शयनयान श्रेणी थी लेकिन गलियारे और बर्थों के बीच के स्थान पर भी पैर रखने की जगह नहीं थी। यानी पूरी बोगी खचाखच भरी थी। ऐसा नहीं था कि किसी के पास टिकट न रहा हो, लेकिन सबका टिकट वेटिंग का था। कुछ समय पहले तक हर ट्रेन की वेटिंग लिस्ट की एक सीमा होती थी। पर ऐसा लगता है कि अब ये सीमा रेलमंत्री महोदय ने खत्म कर दी है। पांच सौ से छह सौ तक वेटिंग का टिकट भी जारी करने में अब रेलवे को दिक्कत नहीं होती। तो फिर जनरल और शयनयान या फिर एसी में इस नीति के बाद क्या अंतर रहा। इसी बहस में भाइयों ने कहा रेल का भी लालूकरण कर दिया लालू ने। जिस तरह उन्होंने दस सालों में बिहार का बेड़ा गर्क किया था।</p>
<p>अब बात रेल के तत्काल दर्जे की कर ली जाय। पहले तत्काल सेवा का मतलब ही ये हुआ करता था कि जिस दिन रेल को रवाना होना है उसी दिन अगर उसमें कुछ बर्थ खाली रह गई हो तो उन्हें तत्काल के जरिए भर दिया जाय। तत्काल का मतलब ही था उपलब्ध होगा तो मिलेगा नहीं तो नहीं। आज क्या हो रहा है&#8211; तत्काल के अंतर्गत आप पांच दिन पहले टिकट ले सकते हैं (अब इस सीमा को और बढ़ाने का एलान भी हो गया है) ये कैसा तत्काल है। जहां दस दिन पहले ही आदमी को तत्काल का पता रहता है। और सुनिए अब तत्काल के लिए बाकायदा एक नई बोगी लगती है। तो फिर ये तत्काल का कॉन्सेप्ट क्या है भाई? करेले का नीमाभियान भी देखिए तत्काल सेवा में भी लालू की कृपा से वेटिंग का चक्कर चल रहा है। और दो चार नहीं दो सौ से ढाई सौ की वेटिंग लिस्ट तत्काल सेवा में जारी होती है। ये कैसा तत्काल है भाई! लालू से कोई पूछना। इस तरह से कुल मिलाकर लालू ने रेल का लालूकरण कर दिया। फायदे में रेल है या कोई मरीचिका इसका पता तो उनके मंत्रालय से हटने के बाद चलेगा लेकिन सुविधाओं का जो स्तर लालू ने रेल का किया है उसमें कोई शक नहीं कि अव्यवस्थ और भदेस से उनका पुराना नाता है। लाठी रैला जैसा विचित्र प्रयोग किए बिना उनकी क्षुधापूर्ति नहीं होती।</p>
<p>अपने एक भाई हैं पत्रकारिता के पेशे में, नाम है यशवंत देशमुख। कोई चार-पांच साल पहले की बात है, एक मुलाकात में उन्होंने लालू को सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा अगुवा करार दे दिया। महफिल में चक्रवात आ गया। सब के सब एक सुर से बिहार की दुर्दशा के लिए लालू को कोस रहे थे फिर ये उलटी बात यशवंत भाई ने कैसे कर दी। उन्होंने स्पष्टीकरण दिया बिहार के सामाजिक ताने बाने में बहुत ऊंच-नीच था। दस फीसदी लोग संपन्न थे, नब्बे फीसद फटेहाल थे जिनके शरीर का कपड़ा तार-तार हो चुका था। दस सालों में लालू ने क्या किया बाकी बचे दस लोगों को भी नंगा कर दिया। इस तरह से उन्होंने एक नई तरह की सामाजिक समरसता फैलाई बिहार में। सबको एकाकार कर दिया।</p>
<p>उस दिन ट्रेन में दो अनजान बंधु भी यशवंत भाई की याद दिला रहे थे। अंजाने में ये कैसा संयोग था। उधर ट्रेन के एक और यात्री ने कहा सा&#8230;.. इस देश में सिर्फ बिहार का ही रेलीकरण हुआ है। ये बात काफी हद तक विचारणीय है। हर साल रेल बजट की कसरत में भी ये परंपरा नज़र आती है। बिहार से आने वाले हमारे नेताओं में रेल का चस्का कुछ ज्यादा ही दिखाई देता है। नितीश, रामविलास के बाद लालू उस समृद्ध परंपरा के अगले ध्वजवाहकमात्र हैं।</p>
<p>कुल मिलाकर यशवंत भाई की छह साल पहले वाली बात के हिसाब से क्या लालू ने रेल का बिहारीकरण कर दिया या फिर सिर्फ उसका लालूकरण किया है या फिर सब मिलकर सिर्फ बिहार का रेलीकरण कर रहे हैं। है ना सब कुछ गड्डमड्ड। अपन को भी नहीं समझ आती क्या किसमें घुस गया है। यही लालू की सियासत है जहां सब कुछ गड्डमड्ड है। इस बार लालू बिहार की बजाय रेल की सामाजिक समरसता बढ़ा रहे हैं।</p>
<p>अतुल चौरसिया</p>
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		<title>वसुधा भव कुटुंबकम वाया आईपीएल</title>
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		<pubDate>Tue, 22 Apr 2008 08:01:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>chauraha</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[ब्रेट ली ने कैफ को आउट किया किसी को कष्ट नहीं हुआ। साइमंड ने इशांत को चौका मारा टेंशन नहीं हुआ। माइक हसी ने हिंदुस्तानी गेंदबाज़ों की धज्जी उड़ा दी लोग मजे से तालियां बजा रहे थे। रिकी पोंटिंग ने दो कैच पकड़े लोग खुशी से झूम रहे थे।
ये कुछ झलकियां हैं क्रिकेट के अफलातून [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p>ब्रेट ली ने कैफ को आउट किया किसी को कष्ट नहीं हुआ। साइमंड ने इशांत को चौका मारा टेंशन नहीं हुआ। माइक हसी ने हिंदुस्तानी गेंदबाज़ों की धज्जी उड़ा दी लोग मजे से तालियां बजा रहे थे। रिकी पोंटिंग ने दो कैच पकड़े लोग खुशी से झूम रहे थे।</p>
<p>ये कुछ झलकियां हैं क्रिकेट के अफलातून संस्करण टी-20 की और अगले महीने भर इसी तरह की तमाम हैरानी भरी घटनाओं का गवाह बन सकती है दुनिया। दो महीने पहले ऑस्ट्रेलिया दौरे पर सिडनी में भारत और ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटरों के बीच जिस दर्जे की कड़वाहट दिखी थी उसके बाद क्या कोई कल्पना कर सकता था कि पोंटिंग और गांगुली, द्रविड़ का विकेट लेकर आपस में गले मिलेंगे? साइमंड और लक्ष्मण विरोधी गेंदबाज़ी को तहस-नहस करने की जुगाड़पंथी में व्यस्त नज़र आएंगे। बहरहाल आईपीएल ने ये सब न सिर्फ कर दिखाया बल्कि इतने बड़े पैमाने पर कर दिखाया है कि एक बार को इस आयोजन को लेकर नाक भौं सिकोड़ रहे इंग्लैंड जैसे रूढ़िवादी क्रिकेट वाले देश भी अपनी राय बदलने को मजबूर हुए हैं।</p>
<p>रही बात क्रिकेट के असल संस्करण की मिट्टी पलीद होने की तो इस बात में शायद कोई खास दम नहीं है। एक तो क्रिकेट की नियामक संस्था इसे हर हाल में ज़िंदा रखने की कोशिश कर सकती है और करेगी। दूसरी बात इस तरह की बेबुनियाद बातें एकदिवसीय क्रिकेट के आने के बाद भी हुई थी लेकिन वो समय के साथ ग़लत साबित हो गईं। आज एक तबका टी-20 को लेकर भी इसी तरह के विधवा विलाप कर रहा है। क्रिकेट को मनोरंजन बना दिया गया&#8230;, टेस्ट को मार दिया गया&#8230;, नाच गाने का मंच बना दिया गया&#8230; आदि&#8230; आदि&#8230;।</p>
<p>अब इस विलाप पर क्या कहा जाय। दुनिया में कोई भी खेल हो, सदियों पुरानी परंपरा रही है, मानव सभ्यता के विकास के बाद से लेकर आज तक मनुष्य ने खेलों का ईज़ाद ही मनोरंजन के लिए किया है। खेल कोई सामाजिक क्रांति लाने के लिए नहीं खेले जाते। कालांतर में भले ही ये दो देशों के बीच सम्मान के मुद्दे पर खेले जाने लगे हों पर हमेशा गेम स्पिरिट की बात ही कही जाती है। इस लिहाज से आईपीएल ने खेलों की मूल भावना को एक क़दम और आगे भर बढाया है। आखिर क्रिकेट भी फुटबॉल की तरह नौ देशों से 109 देशों का खेल क्यों नहीं बनना चाहिए?</p>
<p>आईपीएल ने इसकी शुरुआत कर दी है और इतने सकारात्मक तरीके से की है कि ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, भारत, पाकिस्तान, वेस्टइंडीज, श्रीलंका, न्यूजीलैंड सब के सब एकाकार हो गए हैं। फिर चिंता काहे की। &#8220;वसुधा ही एक कुटुंब&#8221; की भारतीय शाश्वत परंपरा को भी भारत एक बार फिर से दुनिया के सामने पेश कर रहा है। परेशानी किसे है?</p>
<p>अतुल चौरसिया</p>
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		<title>इलाहाबाद विश्वविद्यालय का शोध उलटबयानी करता है</title>
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		<pubDate>Tue, 15 Apr 2008 07:06:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>chauraha</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[एक शोध के मुताबिक स्कूल कॉलेजों में लड़कियों की मौजूदगी से पढ़ाई का माहौल बेहतर बनता है। लड़कों की उद्दंडई काबू में रहती है। शिक्षकों और शिक्षार्थियों के बीच रिश्ते मजबूत और आत्मिक बनते हैं। भरी कक्षा में चाक-चिकोटी से लड़के परहेज करते हैं। लड़कियां कक्षा में सकारात्मक माहौल बनाती हैं। अब शोध किन पैमानों [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><a href="http://chauraha.files.wordpress.com/2008/04/classroom.png"><img class="alignnone size-thumbnail wp-image-58" src="http://chauraha.files.wordpress.com/2008/04/classroom.png?w=128&h=101" alt="" width="128" height="101" /></a>एक शोध के मुताबिक स्कूल कॉलेजों में लड़कियों की मौजूदगी से पढ़ाई का माहौल बेहतर बनता है। लड़कों की उद्दंडई काबू में रहती है। शिक्षकों और शिक्षार्थियों के बीच रिश्ते मजबूत और आत्मिक बनते हैं। भरी कक्षा में चाक-चिकोटी से लड़के परहेज करते हैं। लड़कियां कक्षा में सकारात्मक माहौल बनाती हैं। अब शोध किन पैमानों के आधार पर किया गया है, किस उम्र वर्ग के छात्रों के बीच किया गया है ये सवाल अपन से न पूछे, और ना ही अपना पाला कभी इन चीज़ो से पड़ा। पांचवी तक को एजुकेशन में पढ़े तब तक इन चीजों की समझ ही नहीं थी। इसके बाद बारहवीं तक की पढ़ाई एकलिंगी शिक्षा व्यवस्था के तहत हुई, यानी सिर्फ लड़कों के स्कूल में।</p>
<p>इसके बाद एक बार फिर से को-एड का सिलसिला शुरू हुआ इलाहाबाद विश्वविद्यालय में। यहां का अपना अनुभव शोध की रपट के बिल्कुल उलट कहानी कहता है। तकरीबन 80 से 90 फीसदी युवा छात्र ऊपर वर्णित हालातों से गुजर कर ही इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की दहलीज में प्रवेश करते हैं। यानी ज्यादातर गंवई पृष्ठभूमि वाले छात्र। यहां की को-एड क्लासेज़ में पहुंचने के शुरुआती दौर में ज्यादातर छात्र बौराने के मुहाने पर पहुंच जाते हैं। सब नहीं तो एक बड़ा तबका इस राह से दो-चार होता ही है।</p>
<p>कुछ एकतरफा प्यार की पींगे बढ़ाने लगते हैं। कोई फर्जी ही अपना चक्कर किसी से उछालता रहता है। दोस्तों के बीच में शुरआती साल दो साल इन्हीं सपनों के महल बनाने&#8211; बिगाड़ने और फिर से बनाने में गुजर जाते हैं। अक्सर इनका दुष्परिणाम भी कइयों को भुगतना पड़ता है। कुछ का इस उठा-पटक में किसी से प्यार व्यार हो भी जाता है। यहां आगे बढ़ने से पहले एक बात बतानी जरूरी है कि इस विश्वविद्यालय का चलन है कि अगर हॉस्टल में रहने वाले किसी लड़के का किसी दूसरे लड़के से पंगा हो गया तो ये मामला उस पूरे हॉस्टल की इज्जत से जुड़ा माना जाता है। और इसकी सज़ा उस छात्र को संबंधित हॉस्टल के सभी छात्र सरेआम विश्वविद्यालय परिसर में पिटाई करके देते है।</p>
<p>इस तरह से पहले और दूसरे साल के छात्रों की ख्याली प्यार मुहब्बत से जुड़ी लड़ाइयों का गवाह परिसर अमूमन हर रोज़ बनता है। कभी कभी तो कहानी इतनी हास्यास्पद हो जाती है कि वाकए का जिक्र करना लाजिमी हो जाता है। जैसे अपने ही एक मित्र थे, बेचारे अक्सर कहा करते थे फला लड़की हमेशा क्लास में उन्हें निहारती रहती है। पार्क बैठकर अक्सर उसी की चर्चा छेड़ देते थे। एक दिन विश्वविद्यालय से वापस घर पहुंचे तो आंख सूजी हुई और मुंह से खून निकल रहा था। पूछने पर पता चला कि एएन झा (हॉस्टल) के लड़कों ने पीटा है। कारण वो खुद भी नहीं बता सके। अगले दिन भाई साब तो नहीं पहुंचे पर अपन लोग फिर से क्लास में दाखिल हुए। कहानी क्या थी ये जानने का कीड़ा सबके मन में कुलबुला रहा था।</p>
<p>जैसे ही क्लास खत्म हुई सब एक दूसरे की थाह लेने लगे। बात बात में खुलासा कुछ यूं हुआ कि भाई साब जिस लड़की को अपने प्यार के पाश में बंधा समझ रहे थे वो दरअसल अपनी ही क्लास के एक दूसरे छात्र- जो ए एन झा का प्रवासी था- के प्यार में चूर थी। हर दिन जिसे वो प्यार की निगाह समझते रहे वो दरअसल नफरत की नज़र थी। बात की आखिरी परत कुछ यूं खुली कि इसी नज़र और प्यार के धोखे में उन्होंने एक कागज का टुकड़ा चलती क्लास में लड़की की तरफ उछाल दिया था। और ये कागज का टुकड़ा उनके लिए ताबूत की आखिरी कील बन गया। लड़की के प्रेमी ने अपने छात्रावासी सहयोगियों के साथ भाई साब की दुर्गति की थी। </p>
<p>बहरहाल व्यक्तिगत वाकए का जिक्र कहानी को मुद्दे से भटका रहा है पर इसका जिक्र भी जरूरी था। यहां आधे से ज्यादा लड़ाईयां प्यार मोहब्बत की इसी तरह की फर्जी कहानियों पर होती हैं। जो बड़बोलेपन में शुरू होती है और दुखद अंत को पहुंचती है। कोई ऐसा दिन नहीं जाता जब इस तरह की छोटी-मोटी लड़ाईयां क्लास के अंदर या बाहर न होती हों। कभी पिटने वाले को पता नहीं चलता कि उसका कसूर क्या है तो कभी पीटने वाला खुद बिना मतलब के फटे में टांग अड़ा रहा होता है। यानी बिना मतलब सिर्फ लड़की पर इंप्रेशन झाड़ने के चक्कर में।</p>
<p>बहरहाल ये शोध रपट तो तेल अवीव की है। अब दुनिया के संदर्भ में ये कितनी कारगर है अपन को नहीं पता। पर इलाहाबद के मामले में ये बात पक्की है कि मामला इसके उलट है। यहां लड़कियां ही आधी लड़ाई की जड़ में होती हैं। वो भी ऐसी लड़कियां जिन बेचारियों को खुद नहीं पता होता कि जूतम-पैजार उनकी वजह से हो रही है।</p>
<p>अतुल चौरसिया</p>
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		<title>प्रेस* ( * कंडीशन अप्लाई)</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Apr 2008 10:44:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>chauraha</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[टाइम्स ऑफ इंडिया की एक उड़ती पड़ती ख़बर पर एक मित्र ने बातों ही बातों में सबका ध्यान खींचा। वाकया कुछ यूं था कि एक कार ने किसी मोटरसाइकिल सवार को टक्कर मार दी थी। बात बहुत आम सी थी। जगह की किल्लत वाले इस शहर में हर दिन जाने कितनी टक्करें होती हैं। लोग [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p>टाइम्स ऑफ इंडिया की एक उड़ती पड़ती ख़बर पर एक मित्र ने बातों ही बातों में सबका ध्यान खींचा। वाकया कुछ यूं था कि एक कार ने किसी मोटरसाइकिल सवार को टक्कर मार दी थी। बात बहुत आम सी थी। जगह की किल्लत वाले इस शहर में हर दिन जाने कितनी टक्करें होती हैं। लोग उठते हैं धूल झाड़ के आगे बढ़ जाते हैं। कभी-कभी आपस में कानफोड़ू शब्दों का आदान प्रदान करके धूल झाड़ी जाती है। एकाध मरतबा जूतम पैजार के बाद भी धूल झाड़ी जाती है। तब हम जैसे लोगों की रोजी रोटी का जुगाड़ हो जाता है। एक-डेढ़ दिन तक &#8216;रोड रेज&#8217; के नाम पर खूब विधवा विलाप मचता है। तो फिर इस ख़बर में ख़ास क्या था? एक ख़ास बात थी इस ख़बर में जिसने पत्रकार मित्र का ध्यान खींचा था और हमारे बीच चर्चा का विषय बनाया था।</p>
<p>दरअसल एक्सिडेंट करने वाली कार पर &#8220;प्रेस&#8221; लिखा था। टक्कर के बाद मामला पुलिस के पास पहुंच चुका था। उनकी जांच शुरू हो गई थी। बातों ही बातों में किसी पुलिस वाले का ध्यान इस खासियत की ओर गया तो उसने ड्राइवर से पूछ लिया भाई किस प्रेस की गाड़ी है। बात खुली तो काफी दूर तलक चली गई। कार के चालक ने खुलासा किया कि दरअसल उनकी अपनी खुद की प्रिंटिंग प्रेस है लिहाजा प्रेस लिख लिया। आस-पास खड़े लोगों का क्या हाल हुआ ये तो पता नहीं चला पर दोस्तों के बीच इस ख़बर से मस्ती का सुरूर पैदा हो गया और बहस का मौका मिल गया। प्रिंटिंग प्रेस वाले ने प्रेस लिखा तो ग़लत क्या किया?</p>
<p>मित्रमंडली में इस ख़बर पर बहस शुरू हो गई और बहस का दायरा तो आप सबको पता ही है सीमाओं के बंधन नहीं मानता। ऊपर से बहस पत्रकारी जीवों के बीच हो तो क्या कहने। कहीं से एक भाई का बयान आया अरे यार अब सबको प्रेस लिखने की छूट होनी चाहिए (वैसे भी अभी कौन सा बंधन है) बस प्रेस के आगे एक स्टार (*) लगाना अनिवार्य हो जाय यानी कंडीशन अप्लाई। ताकि बाद में सबको अपने-अपने प्रेस की सफाई देने का मौका रहे। बाद में चाहे मीडिया का प्रेस बताए या प्रिंटिंग प्रेस बताए।</p>
<p>तभी एक और शिगूफा निकला&#8211; और मान लो किसी कपड़ा प्रेस करने वाले धोबी ने अपनी गाड़ी पर प्रेस लिखा हो तो। तो वो भी अपने प्रेस का स्पष्टीकरण कुछ इस तरह से दे सकेगा। प्रेस* (* स्त्री विशेषज्ञ)। यहां स्त्री विशेषज्ञ का क्या मतलब है? एक तीसरे मित्र का जवाब आया&#8211; हमारे देश में धोबी भाई लोग इतना पढ़े लिखे तो होते नहीं इसलिए इस्तिरी की जगह गलती से स्त्री लिख दिया है। और विशेषज्ञ यानी स्पेशलिस्ट यानी इस्तिरी में माहिर। मंडली से एक और सुझाव आया हां उन लड़कों को भी अपनी दुपहिया पर स्टार के साथ प्रेस लिखने का सुख मिल सकेगा जो कुकुरमुत्तों की तरह उग आए पत्रकारिता संस्थानों में पढ़ाई कर रहे हैं। आज नहीं तो कल ये भी इसी धक्कमपेल में शामिल होंगे। तो फिर अभी से प्रेस* लिखकर प्रैक्टिस शुरू करने में क्या बुराई है।</p>
<p>इस तरह सबके प्रेस के लिए कुछ न कुछ तार्किक सहारा मिल जाएगा और अपनी गाड़ियों पर शान से प्रेस लिखवाने की दिली इच्छा भी पूरी हो जाएगी। आप लोगों के पास भी किसी प्रेस के लिए कोई विचार हो तो लिखिए। बस * स्टार यानी &#8220;शर्तें लागू&#8221; का ध्यान रखिएगा। ये काफी कुछ उसी तरह होगा जैसे आजकल तमाम टीवी चैनल किसी कार्यक्रम की शुरुआत से पहले &#8220;डिसक्लेमर&#8221; लिख देते हैं। यानी दिखाएंगे पूरा, अच्छा रहा तो दावा&#8211; हमने पहले दिखाया और बुरा रहा तो&#8211; इस कार्यक्रम के किसी भी पात्र या घटना से हमारा कोई लेना देना नहीं है। बात वही हुई कि मीठा-मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू।</p>
<p>तो सबको अपनी गाड़ी पर प्रेस लिखने का संतोष मिलेगा और सबके प्रेस की अपनी परिभाषा होगी। बुरा लगे तो क्षमा।</p>
<p>अतुल चौरसिया</p>
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		<title>बंदूक के साए में शांति की मशाल&#8230;</title>
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		<pubDate>Thu, 10 Apr 2008 09:53:51 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[गाहे-बगाहे मौका मिले तो दिल्ली के दिल इंडिया गेट का नज़ारा लेने जाइएगा। इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन के बीच तकरीबन दो किलोमीटर लंबी सीधी-सपाट सड़क को किसी पिंजरे में तब्दील कर दिया गया है। राजपथ की लाल मिट्टी खाकीमय हो गई है। लोगों की आज़ादी की वकालत करने वाला देश एक ग़ैर लोकतांत्रिक देश [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><a href="http://chauraha.files.wordpress.com/2008/04/539w1.jpg"><img class="alignnone size-thumbnail wp-image-55" src="http://chauraha.files.wordpress.com/2008/04/539w1.jpg?w=128&h=89" alt="" width="128" height="89" /></a>गाहे-बगाहे मौका मिले तो दिल्ली के दिल इंडिया गेट का नज़ारा लेने जाइएगा। इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन के बीच तकरीबन दो किलोमीटर लंबी सीधी-सपाट सड़क को किसी पिंजरे में तब्दील कर दिया गया है। राजपथ की लाल मिट्टी खाकीमय हो गई है। लोगों की आज़ादी की वकालत करने वाला देश एक ग़ैर लोकतांत्रिक देश के पैरों की दासी की तरह व्यवहार कर रहा है। इसी से नाराज़ होकर प्रथम आईपीएस महिला ने ओलंपिक मशाल रिले दौड़ में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। नैतिकता की मांग क्या है? लोगों को शांति से विरोध करने का मौका दिया जाय। और शांति के प्रतीक खेलों की मशाल को आगे बढ़ाया जाय। लेकिन इसकी सुरक्षा पर पहली बार एनएसजी की पहरेदारी लगाई गई है। मानो तिब्बती विरोधी नहीं कोई आतंकवादी हैं। सरकार की तैयारियां ऐसा लगती हैं जैसे संसद पर किसी दूसरे हमले से निपटने की तैयारी हैं। सरकार का रवैया पूरी तरह से इस बात पर केंद्रित हो गया है कि चीन नाराज़ न हो, बाकी दुनिया से क्या लेना देना। लेकिन ये बाड़बंदी, ये शार्पशूटर, तीन किलोमीटर की यात्रा में तीस हजार सुरक्षाकर्मी भारत को एक जिम्मेदार देश के रूप में पेश नहीं कर रहे हैं, बल्कि भारत दुनिया के सामने एक ऐसे दब्बू देश के रूप में उभरा है जो अपने विकराल पड़ोसी की जम्हुआई से कांप गया है। कूटनीति भी किसी देश को इतना झुक कर चलने के लिए मजबूर नहीं करती। इसकी भी कुछ सीमाएं हैं। आखिर फ्रांस में भी तो मशाल का विरोध हुआ तो क्या फ्रांस दुनिया के सामने ग़ैरजिम्मेदार देश हो गया? क्या फ्रांस को पूरी दुनिया गाली देने लगी। लंदन में भी तो विरोध हुआ तो क्या वो शांति के विरोधी साबित हो गए? दरअसल ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि इन घटनाओं से उनकी छवि ऐसे जिम्मेदार देश के रूप में और मुखर हुई है जो लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हैं। जहां हर किसी को अपनी आवाज़ बुलंद करने की आज़ादी है। विरोध अपनी जगह है और ओलंपिक मशाल यात्रा अपनी जगह है। विरोध भी होगा और खेल भी होंगे। लेकिन भारत सरकार ने बंदूक के साए में शांति की मशाल दौड़ाने की जो प्रथा इस बार डाली है वो कहीं से भी जायज नहीं ठहरायी जा सकती। बीस से दो किलोमीटर और दो किलोमीटर से दो सौ मीटर तक ओलंपिक यात्रा का सिमटना ये बताता है कि सरकार चीन से कम तिब्बत के सच से ज्यादा घबरायी हुई है। अतुल चौरसिया  </p>
<img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/categories/chauraha.wordpress.com/51/" /> <img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/tags/chauraha.wordpress.com/51/" /> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/chauraha.wordpress.com/51/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/chauraha.wordpress.com/51/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/chauraha.wordpress.com/51/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/chauraha.wordpress.com/51/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/chauraha.wordpress.com/51/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/chauraha.wordpress.com/51/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/chauraha.wordpress.com/51/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/chauraha.wordpress.com/51/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/chauraha.wordpress.com/51/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/chauraha.wordpress.com/51/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=chauraha.wordpress.com&blog=2338187&post=51&subd=chauraha&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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		<title>चीनी माल है, पाकिस्तानियों ज़रा संभल के&#8230;</title>
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		<pubDate>Wed, 09 Apr 2008 07:35:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>chauraha</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[कुछ साल पहले देश के बाज़ारों में चीन में बने सामानों की बाढ़ आ गई थी। खिलौने से लेकर झालर-मालर सब चीन के बिकने लगे थे। दो रूपए में इलेक्ट्रिक टॉर्च से लेकर और जाने क्या क्या&#8230; सब कुछ ऐसा लगता था कौड़ियों के मोल मिलने लगा हैं। जिसे देखों वहीं चीन के गुण गाता [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><span style="color:#ff6600;"><a href="http://chauraha.files.wordpress.com/2008/04/china.jpg"><img class="alignnone size-medium wp-image-50" src="http://chauraha.files.wordpress.com/2008/04/china.jpg?w=203&h=152" alt="" width="203" height="152" /></a>कुछ साल पहले देश के बाज़ारों में चीन में बने सामानों की बाढ़ आ गई थी। खिलौने से लेकर झालर-मालर सब चीन के बिकने लगे थे। दो रूपए में इलेक्ट्रिक टॉर्च से लेकर और जाने क्या क्या&#8230; सब कुछ ऐसा लगता था कौड़ियों के मोल मिलने लगा हैं। जिसे देखों वहीं चीन के गुण गाता फिरता&#8211; &#8220;कम दामों में अगर बढ़िया सामान मिले तो कोई ये क्यों ले चीन वाला न ले।&#8221; चारो तरफ चिंताएं दिखने लगी। ये क्या चीन ने तो हमारे बाज़ारों पर कब्जा कर लिया। लोगों को इसमें चीन की साजिश भी नज़र आती थी। ज्ञान बांटने वालों की नज़र में चीन चतुरायी से भारत के माइक्रो लेवल (निचले दर्जे के) की अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर रहा था। हमारे यहां का मजदूर वर्ग बेरोजगार हो जाएगा। चीन दिवाली के दीए से लेकर होली के रंग तक बना कर हमारे लघु उद्योगों को बर्बाद करने की साजिश रच रहा है।  </span></p>
<p><span style="color:#ff6600;">बहरहाल तमाम चिताओं के बीच हवा से भरा ये गुब्बारा जल्द ही फुस्स होकर धड़ाम बोल गया। वजह थी रिलाएबिलिटी, विश्वसनीयता और गुणवत्ता। चीनी सामान इन सभी पैमानों पर लूले नज़र आने लगे। दस रूपए की टॉर्च दुकान से घर पहुंचते-पहुंचते कराहने लगती थी। दिवाली के झालर अगली दिवाली पर टिमटिमाना भूल जाते थे। खिलौने चलते चलते दम तोड़ देते थे। तब लोगों को इनकी असलियत का अंदाज़ा हुआ। आखिर भारतीय खरीददार ठहरा। हर चीज़ को ठोंक पीट कर उसकी मजबूती का अंदाज़ा लगा कर ही अंटी से पैसा ढीला करता है। यहां बात-बात में ये कहने का चलन तो आपको भी पता होगा कि, फलां चीज़ हमारे दादा के ज़माने की है। अब इस तरह की सामाजिक ताने बाने वाली मानसिकता में चीनी कब तक अपनी टुकटुकिया चमकाते। लिहाजा चार दिन की चांदनी के बाद आयी अंधेरी रात चीनी सामानों के लिए काल बन गई। </span></p>
<p><span style="color:#ff6600;">बहरहाल बेवक्त मुद्दे की भूमिका बनाने का मकसद था बीती रात पाकिस्तान से आयी एक ख़बर। पता चला कि वहां के खुशाब परमाणु संयत्र में धमाका हो गया। गैस के रिसाव से दो लोगों की मौत हो गई। बात तो गंभीर है। पर एक पहलू इसका ये है कि इस परमाणु संयत्र का निर्माण पाकिस्तान के सबसे अंतरंग मित्र चीन ने किया है। चीन ने पाकिस्तान से अपनी दोस्ती चमकाने के लिए तोहफे में यह संयत्र दिया है। टीवी के स्क्रीन पर ये ख़बर नज़र आते ही दोस्तों के बीच से एक सुर से हल्ला निकला चीनी माल पर भरोसा करोगे तो ऐसा ही होगा। भारत तो खेल खिलौनों से ही उनकी औकात जान गया। आप भी संभल जाओं, ये चीनी न किसी के हुए हैं न होंगे। आखिर भाई हो इसलिए बता रहे हैं। भले ही हमसे बैर रखो लेकिन चीन माल पर भरोसा मत करो। वरना क्या पता कल को खुशाब की तरह ही बाकी चीनी साजो सामान भी फेल हो गए तो फिर आतंकवाद से कैसे निपटोगे। खुद के पैरो पर खड़े होना सीखो। </span></p>
<p><span style="color:#ff6600;">अतुल चौरसिया    </span></p>
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		<title>जो हुआ ठीक ही हुआ</title>
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		<pubDate>Mon, 07 Apr 2008 13:49:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>chauraha</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[फ्रांस में ओलंपिक मशाल बुझा दी गई। जो इतिहास में अब तक नहीं हुआ वो अब हो गया। ये तो दस्तूर है जो अब तक नहीं हुआ है ये जरूरी नहीं है कि आगे भी नहीं होगी। तिब्बतियों के विरोध प्रदर्शन पर लोगों की अलग अलग राय हो सकती है। उनके विरोध प्रदर्शन के दौरान [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><span style="color:#008000;">फ्रांस में ओलंपिक मशाल बुझा दी गई। जो इतिहास में अब तक नहीं हुआ वो अब हो गया। ये तो दस्तूर है जो अब तक नहीं हुआ है ये जरूरी नहीं है कि आगे भी नहीं होगी। तिब्बतियों के विरोध प्रदर्शन पर लोगों की अलग अलग राय हो सकती है। उनके विरोध प्रदर्शन के दौरान ओलंपिक टॉर्च बुझ गई तो इसमें उनका क्या दोष है? किसी को आप कितने सालों तक दमित मर्दित रखेंगे। अपने आस्तित्व पर जब संकट आता है तो आदमी मुकाबला करता है। विरोधी मजबूत हुआ तो पिटता है, फिर भी सम्मान जिंदा रहा तो गालियां दे देकर अपनी भड़ास निकालता है। अपने वजूद का अहसास कराता है। इतने सालों से तिब्बतियों को मौका नहीं मिला था। अब ओलंपिक के बहाने उन्हें पूरी दुनिया के सामने अपनी व्यथा रखने का मौका मिला है तो वो ऐसा क्यों नहीं करेंगे।  </span></p>
<p><span style="color:#008000;">आखिर साठ सालों में इक्का-दुक्का मौको को छोड़ दिया जाय तो चुप बैठे तिब्बतियों के लिए चीन ने का प्रगति दिखाई सिवाय उनका मर्दन करने के। तो फिर अब ओलंपिक का विरोध तिब्बती नहीं करेंगे तो कौन करेगा? उनकी आवाज़ लोगों के कान में साठ सालों से नहीं पड़ रही है तो वो क्या करेंगे? ओलंपिक का विरोध करेंगे। आखिर बलवान भी तो तभी हार मानता है जब सामने वाला कमज़ोर थक हारकर पत्थर हाथ में उठा लेता है।</span></p>
<p><span style="color:#008000;">चीन के सामने दोगली नीतियों पर चल रही भारत सरकार की नीतियों की किसी ने आलोचना नहीं की ये इस देश का नया चलन देखने को मिल रहा है। आखिर क्यों दलाई लामा को भारत में रखा गया है? आखिर धर्मशाला की महत्ता क्या है इस देश के लिए? और ये सब तो छोड़ो जब हम खुद को गुट निरपेक्ष, स्वतंत्र विदेश नीति का अगुवा कहते हैं तो फिर उसे चीन के सामने रखने में दकियानूसी क्यों? तिब्बत के रखिए एक किनारे चीन को निडर, संप्रभुता संपन्न देश की तरह राय देने में भारत क्यों डर रहा है? दुनिया के सामने नई महाशक्ति बनने का दावा करने वाले देश के इस दुम हिलाऊ आचरण से कोई फायदा नहीं होगा। एक बार फिर से कमोबेश उसी तरह की परिस्थितियां खड़ी है&#8211; जब नेहरू हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा देते रहे और चीन ने 60 हज़ार वर्गमील जमीन कब्जिया ली। बीते एक साल में चीन से लगी सीमा पर चीनी सैनिक 60 से ज्यादा बार अतिक्रमण कर चुके हैं और मुखर्जी जी चीन के साथ संबंधों की दलील दे रहे हैं। तिब्बतियों को चेतावनी दे रहे हैं और तो और दलाई लामा को भी हिदायत बांट रहे हैं। क्या इस बार चीन को थाल में अरुणांचल परोस कर देने का इरादा है क्या? आखिर कब हम सीखेंगे? कब हम याद रखने की कला सीखेंगे? इन नेताओं ने साठ सालों में सिर्फ भूलने की ही कला इस देश के लोगों को सिखाई है। 47 में दंगे हुए भूल जाओ, 84 में दंगे हुए भूल जाओ, 2002 में दंगे हुए भूल जाओ। ऐसा ही करते रहे तो हालत बहादुर शाह जफर के जैसी हो जाएगी जिस हिंदुस्तानी शासक का राज लाल किले से निकल कर तगलकाबाद किले तक खत्म हो जाता था।<br />
रीढ़ तोड़कर कभी महाशक्ति नहीं बना जा सकता।<br />
अतुल चौरसिया</span></p>
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		<title>शिकारी लड़कियां !</title>
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		<pubDate>Mon, 31 Mar 2008 07:18:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>chauraha</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[बात ही बात में बैठे-बैठे वो घटना याद आ गई। इसे बीते छह साल हो चुके हैं लेकिन यादें एकदम ताज़ा है। सआदत हसन मंटो की कहानी &#8220;शिकारी औरतें&#8221; से मिलता जुलता शीर्षक होने पर भ्रम में न पड़े, इसका इस कहानी से कोई लेना-देना नहीं है। एक लड़का पहली पहली बार दिल्ली की सड़कों की खाक छानने उतरा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><font color="#993366">बात ही बात में बैठे-बैठे वो घटना याद आ गई। इसे बीते छह साल हो चुके हैं लेकिन यादें एकदम ताज़ा है। सआदत हसन मंटो की कहानी &#8220;शिकारी औरतें&#8221; से मिलता जुलता शीर्षक होने पर भ्रम में न पड़े, इसका इस कहानी से कोई लेना-देना नहीं है। एक लड़का पहली पहली बार दिल्ली की सड़कों की खाक छानने उतरा था। अपने भविष्य की सुनहरी दास्तान लिखने के लिए दूर से चमकते दमकते नज़र आने वाले इस शहर की ओर पलायन इधर बहुत आम हो चला है। दिल्ली में एक भी नजदीकी रिश्तेदार, यार या फिर घर परिवार का नहीं था। कॉलेज में एडमिशन के लिए दिल्ली के दो स्थानीय लोगों का रेफरेंस देना आवश्यक था। उसका जुगाड भी फर्जी तरीके से करना पड़ा। फर्जीवाड़े की शुरुआत शहर में पहला क़दम रखते ही हो गई थी। बहरहाल ये एक अलग बहस का मुद्दा है जिस पर चर्चा फिर कभी।</font></p>
<p><font color="#993366">शहर से 26 किलोमीटर की दूरी पर गाज़ियाबाद में इलाहाबाद के एक मित्र के चाचाजी रेल विभाग में कर्मचारी थे। कुल जमा यही एक व्यक्ति मिले थे जो इस अनजान नगर में रास्ता दिखा सकते थे। लड़का गाज़ियाबाद उतरा, अगले ही दिन पीजी के लिए प्रवेश परीक्षाएं होनी थी। दिल्ली में परीक्षा थी चाचजी ने सबकुछ समझा दिया था। बातों ही बातों में एक चीज़ उन्होंने समझायी जो उस समय बड़ी अटपटी लगी। एक घटना बतायी जो कुछ इस तरह थी कि यहां कुछ इस तरह की लड़कियां घूमती रहती हैं जो लड़कों को पहले बहलाती फुसलाती हैं और फिर उसके साथ लूटपाट करती हैं। इसके लिए वो अपने लड़की होने का पूरा फायदा उठाती हैं। इस दरम्यान चाचाजी ने ये भी बताया कि उनका ही एक सगा भांजा प्लाजा सिनेमाहॉल में इस तरह की घटना का शिकार हो चुका है। बात आई गई हो गई। ऐसे भी इस तरह की घटनाएं आम नहीं होती। और फिर जिसे प्रवेश परीक्षा देनी थी उसे इन चीज़ों से क्या लेना-देना।</font></p>
<p><font color="#993366">बहरहाल लड़का अगले दिन गाज़ियाबाद से ईएमयू पकड़ कर दिल्ली पहुंचा, वहां से परीक्षा के लिए नियत कॉलेज पहुंचा। परीक्षा दी और कॉलेज से बाहर निकला। थोड़ी देर आराम करने के लिए पास ही के एक पेड़ की छांव में खड़ा हो गया। अनजान जगह होने की वजह से किसी से कोई बातचीत भी नहीं थी। लिहाजा अकेले ही किनारे जाकर बैठ गया। बमुश्किल पांच मिनट ही बीता था कि सभ्रांत सी दिखने वाली लड़की जिसके हाथों में छाता भी था, आकर लड़के के सामने खड़ी हो गई।</font></p>
<p><font color="#993366">लड़की ने कहा- एक्सक्यूज़ मी&#8230;</font></p>
<p><font color="#993366">लड़का अनजान जगह पर अनजान लड़की के इस व्यवहार से अचकचा गया। कुछ कहने की बजाय हल्के से हंस भर दिया।</font></p>
<p><font color="#993366">लड़की ने फिर कहा- आप मेरी हेल्प कर सकते हैं।</font></p>
<p><font color="#993366">लड़के ने कहा- क्या हेल्प?</font></p>
<p><font color="#993366">लड़की- मुझे कुछ फोन करने हैं पर पैसे नहीं हैं।</font></p>
<p><font color="#993366">ये बड़ी आजीब बात था। लड़के ने ध्यान से देखा उसने लेवाइस की जींस पहन रखी थी। पर उसके पास पैसे नहीं थे। भले ही मोबाइल आम नहीं हुआ था लेकिन दो चार दस रूपए तो होते ही हैं।</font></p>
<p><font color="#993366">लड़के ने कहा- आप फोन कर लीजिए मैं पैसे दे दूंगा। कितने चाहिए।</font></p>
<p><font color="#993366">लड़की- आप खुद ही चल लीजिए पीसीओ तक।</font></p>
<p><font color="#993366">लड़का- अरे नहीं आप बताइए कितना चाहिए।</font></p>
<p><font color="#993366">लड़की- भइया चल कर आप ही कर दीजिए यहीं पास ही में तो पीसीओ है। मुझे क्या पता कितना लगेगा।</font></p>
<p><font color="#993366">लड़का- ठीक है।</font></p>
<p><font color="#993366">ऐसा कहते ही लड़की एक गली की तरफ जाने लगी। लड़के से उसने कहा कि गली की नुक्कड़ पर पीसीओ है। अनजान शहर में गंवई लड़के के साथ हो रही इस घटना से उसके दिमाग में कई तरह की बातें तो पहले से ही घुमड़ रही थी। आखिर क्यों लड़की पैसा लेने की बजाय खुद लड़के को पीसीओ तक ले जाने का ज़ोर डाल रही थी। उस पर एकाएक लड़के के दिमाग में चाचाजी की एक दिन पहले कही गई बात याद आ गई। इस ख्याल ने उसके मन में चल रही उथल पुथल को एकदम से आवेग प्रदान कर दिया। लड़का एखदम से पीछे पलटा और देखते ही देखते गली से निकल कर कॉलेज के सामने आ खड़ा हुआ जहां लड़के-लड़कियों का हुजूम खड़ा हो रखा था। तब जाकर उसकी जान में जान आयी। वो लड़की कहीं नज़र नहीं आ रही थी। लड़का इसके बाद चाचाजी के बताए के हिसाब से बस और ट्रेन पकड़ता हुआ गाज़ियाबाद की ओर रवाना हो गया। रास्ते भर उसके दिमाग में कुछ निश्चित बातें घूम रही थी, क्या वास्तव में चाचाजी की बात सच थी? इतनी जल्दी इस तरह की घटना से मेरा वाकया कैसे पड़ गया? क्या उस लड़की को वास्तव में पैसों की जरूरत थी? या फिर वो भी उन्ही लड़कियों के गिरोह की थी? या फिर क्या लड़के के माथे पर लिखा था कि वो नया है इस शहर में?</font></p>
<p><font color="#993366">वो लड़का खुद मैं ही था। कई साल बीतने के बाद भी वो बात जब तब हमारे बीच चर्चा का विषय बन जाती है। लेकिन उसका दूसरा छोर गायब है क्योकि उसी कॉलेज में पढ़ाई करने के बाद भी फिर न कभी इस तरह के वाकए से सामना हुआ न उस इलाके में कभी वो लड़की दिखी।</font></p>
<p><font color="#993366">अतुल चौरसिया</font></p>
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