April 11, 2008...0thUTC

प्रेस* ( * कंडीशन अप्लाई)

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टाइम्स ऑफ इंडिया की एक उड़ती पड़ती ख़बर पर एक मित्र ने बातों ही बातों में सबका ध्यान खींचा। वाकया कुछ यूं था कि एक कार ने किसी मोटरसाइकिल सवार को टक्कर मार दी थी। बात बहुत आम सी थी। जगह की किल्लत वाले इस शहर में हर दिन जाने कितनी टक्करें होती हैं। लोग उठते हैं धूल झाड़ के आगे बढ़ जाते हैं। कभी-कभी आपस में कानफोड़ू शब्दों का आदान प्रदान करके धूल झाड़ी जाती है। एकाध मरतबा जूतम पैजार के बाद भी धूल झाड़ी जाती है। तब हम जैसे लोगों की रोजी रोटी का जुगाड़ हो जाता है। एक-डेढ़ दिन तक ‘रोड रेज’ के नाम पर खूब विधवा विलाप मचता है। तो फिर इस ख़बर में ख़ास क्या था? एक ख़ास बात थी इस ख़बर में जिसने पत्रकार मित्र का ध्यान खींचा था और हमारे बीच चर्चा का विषय बनाया था।

दरअसल एक्सिडेंट करने वाली कार पर “प्रेस” लिखा था। टक्कर के बाद मामला पुलिस के पास पहुंच चुका था। उनकी जांच शुरू हो गई थी। बातों ही बातों में किसी पुलिस वाले का ध्यान इस खासियत की ओर गया तो उसने ड्राइवर से पूछ लिया भाई किस प्रेस की गाड़ी है। बात खुली तो काफी दूर तलक चली गई। कार के चालक ने खुलासा किया कि दरअसल उनकी अपनी खुद की प्रिंटिंग प्रेस है लिहाजा प्रेस लिख लिया। आस-पास खड़े लोगों का क्या हाल हुआ ये तो पता नहीं चला पर दोस्तों के बीच इस ख़बर से मस्ती का सुरूर पैदा हो गया और बहस का मौका मिल गया। प्रिंटिंग प्रेस वाले ने प्रेस लिखा तो ग़लत क्या किया?

मित्रमंडली में इस ख़बर पर बहस शुरू हो गई और बहस का दायरा तो आप सबको पता ही है सीमाओं के बंधन नहीं मानता। ऊपर से बहस पत्रकारी जीवों के बीच हो तो क्या कहने। कहीं से एक भाई का बयान आया अरे यार अब सबको प्रेस लिखने की छूट होनी चाहिए (वैसे भी अभी कौन सा बंधन है) बस प्रेस के आगे एक स्टार (*) लगाना अनिवार्य हो जाय यानी कंडीशन अप्लाई। ताकि बाद में सबको अपने-अपने प्रेस की सफाई देने का मौका रहे। बाद में चाहे मीडिया का प्रेस बताए या प्रिंटिंग प्रेस बताए।

तभी एक और शिगूफा निकला– और मान लो किसी कपड़ा प्रेस करने वाले धोबी ने अपनी गाड़ी पर प्रेस लिखा हो तो। तो वो भी अपने प्रेस का स्पष्टीकरण कुछ इस तरह से दे सकेगा। प्रेस* (* स्त्री विशेषज्ञ)। यहां स्त्री विशेषज्ञ का क्या मतलब है? एक तीसरे मित्र का जवाब आया– हमारे देश में धोबी भाई लोग इतना पढ़े लिखे तो होते नहीं इसलिए इस्तिरी की जगह गलती से स्त्री लिख दिया है। और विशेषज्ञ यानी स्पेशलिस्ट यानी इस्तिरी में माहिर। मंडली से एक और सुझाव आया हां उन लड़कों को भी अपनी दुपहिया पर स्टार के साथ प्रेस लिखने का सुख मिल सकेगा जो कुकुरमुत्तों की तरह उग आए पत्रकारिता संस्थानों में पढ़ाई कर रहे हैं। आज नहीं तो कल ये भी इसी धक्कमपेल में शामिल होंगे। तो फिर अभी से प्रेस* लिखकर प्रैक्टिस शुरू करने में क्या बुराई है।

इस तरह सबके प्रेस के लिए कुछ न कुछ तार्किक सहारा मिल जाएगा और अपनी गाड़ियों पर शान से प्रेस लिखवाने की दिली इच्छा भी पूरी हो जाएगी। आप लोगों के पास भी किसी प्रेस के लिए कोई विचार हो तो लिखिए। बस * स्टार यानी “शर्तें लागू” का ध्यान रखिएगा। ये काफी कुछ उसी तरह होगा जैसे आजकल तमाम टीवी चैनल किसी कार्यक्रम की शुरुआत से पहले “डिसक्लेमर” लिख देते हैं। यानी दिखाएंगे पूरा, अच्छा रहा तो दावा– हमने पहले दिखाया और बुरा रहा तो– इस कार्यक्रम के किसी भी पात्र या घटना से हमारा कोई लेना देना नहीं है। बात वही हुई कि मीठा-मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू।

तो सबको अपनी गाड़ी पर प्रेस लिखने का संतोष मिलेगा और सबके प्रेस की अपनी परिभाषा होगी। बुरा लगे तो क्षमा।

अतुल चौरसिया

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