April 7, 2008...0thUTC
जो हुआ ठीक ही हुआ
फ्रांस में ओलंपिक मशाल बुझा दी गई। जो इतिहास में अब तक नहीं हुआ वो अब हो गया। ये तो दस्तूर है जो अब तक नहीं हुआ है ये जरूरी नहीं है कि आगे भी नहीं होगी। तिब्बतियों के विरोध प्रदर्शन पर लोगों की अलग अलग राय हो सकती है। उनके विरोध प्रदर्शन के दौरान ओलंपिक टॉर्च बुझ गई तो इसमें उनका क्या दोष है? किसी को आप कितने सालों तक दमित मर्दित रखेंगे। अपने आस्तित्व पर जब संकट आता है तो आदमी मुकाबला करता है। विरोधी मजबूत हुआ तो पिटता है, फिर भी सम्मान जिंदा रहा तो गालियां दे देकर अपनी भड़ास निकालता है। अपने वजूद का अहसास कराता है। इतने सालों से तिब्बतियों को मौका नहीं मिला था। अब ओलंपिक के बहाने उन्हें पूरी दुनिया के सामने अपनी व्यथा रखने का मौका मिला है तो वो ऐसा क्यों नहीं करेंगे।
आखिर साठ सालों में इक्का-दुक्का मौको को छोड़ दिया जाय तो चुप बैठे तिब्बतियों के लिए चीन ने का प्रगति दिखाई सिवाय उनका मर्दन करने के। तो फिर अब ओलंपिक का विरोध तिब्बती नहीं करेंगे तो कौन करेगा? उनकी आवाज़ लोगों के कान में साठ सालों से नहीं पड़ रही है तो वो क्या करेंगे? ओलंपिक का विरोध करेंगे। आखिर बलवान भी तो तभी हार मानता है जब सामने वाला कमज़ोर थक हारकर पत्थर हाथ में उठा लेता है।
चीन के सामने दोगली नीतियों पर चल रही भारत सरकार की नीतियों की किसी ने आलोचना नहीं की ये इस देश का नया चलन देखने को मिल रहा है। आखिर क्यों दलाई लामा को भारत में रखा गया है? आखिर धर्मशाला की महत्ता क्या है इस देश के लिए? और ये सब तो छोड़ो जब हम खुद को गुट निरपेक्ष, स्वतंत्र विदेश नीति का अगुवा कहते हैं तो फिर उसे चीन के सामने रखने में दकियानूसी क्यों? तिब्बत के रखिए एक किनारे चीन को निडर, संप्रभुता संपन्न देश की तरह राय देने में भारत क्यों डर रहा है? दुनिया के सामने नई महाशक्ति बनने का दावा करने वाले देश के इस दुम हिलाऊ आचरण से कोई फायदा नहीं होगा। एक बार फिर से कमोबेश उसी तरह की परिस्थितियां खड़ी है– जब नेहरू हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा देते रहे और चीन ने 60 हज़ार वर्गमील जमीन कब्जिया ली। बीते एक साल में चीन से लगी सीमा पर चीनी सैनिक 60 से ज्यादा बार अतिक्रमण कर चुके हैं और मुखर्जी जी चीन के साथ संबंधों की दलील दे रहे हैं। तिब्बतियों को चेतावनी दे रहे हैं और तो और दलाई लामा को भी हिदायत बांट रहे हैं। क्या इस बार चीन को थाल में अरुणांचल परोस कर देने का इरादा है क्या? आखिर कब हम सीखेंगे? कब हम याद रखने की कला सीखेंगे? इन नेताओं ने साठ सालों में सिर्फ भूलने की ही कला इस देश के लोगों को सिखाई है। 47 में दंगे हुए भूल जाओ, 84 में दंगे हुए भूल जाओ, 2002 में दंगे हुए भूल जाओ। ऐसा ही करते रहे तो हालत बहादुर शाह जफर के जैसी हो जाएगी जिस हिंदुस्तानी शासक का राज लाल किले से निकल कर तगलकाबाद किले तक खत्म हो जाता था।
रीढ़ तोड़कर कभी महाशक्ति नहीं बना जा सकता।
अतुल चौरसिया



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April 7, 2008 at 0thUTC
होठ सिल जाने से एलान नहीं मर जाते.
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