February 29, 2008...0thUTC
टेलीविज़न की साप्ताहिक एडीटोरियल मीटिंग…
भड़ास कह लो, गुबार कह लो, जो चाहे समझ लो, पर होता यही है जो मैं आगे लिखने जा रहा हूं। टीवी पत्रकारिता के भी अपने निराले अंदाज़ हैं। हर आदमी खुद को बॉस समझता हैं (क्योंकि सबसे निरीह प्राणी इंटर्न छह महीने पुराने ट्रेनी को भी सर-सर पुकारता है) और हर महिला खुद को मैम।
बहरहाल भूमिका से परे बात करते हैं उस शुक्रवार की जो टीवी चैनलों की साप्ताहिक परिक्रमा है। छोटे से सफर में अपने को टीवी और प्रिंट दोनों का अनुभव हो चुका है। टीवी और प्रिंट के बीच जो सांस्कृतिक अंतर है वो ज़मीन आसमान, काले-सफेद, महिला-पुरुष के अंतर जितना ही बड़ा है। उस शुक्रवार को काफी गहमागहमी थी। बॉस के साथ मीटिंग होनी थी। आधों की फटी पड़ी थी। कुछ अखबारों के पन्ने पर पन्ने पलट कर अपना नर्वसनेस छिपा रहे थे। उधर रिपोर्टरों के गलियारे में फुसफुसाहट हुई साला कोई कायदे की ख़बर नहीं। अबे कोई आइडिया बता दे। वरना साला आज फिर से मार लेगा। शुक्रवार का दिन इसलिए अहम था क्योंकि इसी दिन हफ्ते भर की टीआरपी का लेखा जोखा लेकर एक्सक्युटिव प्रोड्यूसर तिवारी जी और उनके लेफ्टिनेंट आदित्य चंद्रकांत पेश होते थे। इसके बाद सबकी बारी बारी से धक्कमपेल होती थी। अंदरखाने की ख़बर ये थी तिवारी जी पोस्ट में भले ही चंद्रकांत जी से बड़े हों पर बॉस के सामने चंद्रकांत साहब की ही चलती थी। कुछ का कहना था कि नई-नई जिस आराधना पर आजकल तिवारीजी फिदा हैं दरअसल बॉस का दिल भी उसी पर आ गया था। इसीलिए तिवारीजी की पोजीशन कमज़ोर हो गई थी। हवा का रुख भाप गए कुछ चाटोत्तम भाई बंधु चंद्रकांत जी के पीछे लग गए थे। मस्काबाजी में थोड़ा तंगहाथ चाटुश्रेष्ठों की जमात अभी तक तिवारी जी के पीछे ही लगी थी।
रिपोर्टरों के गलियारे से आई फुसफुसहाट दरअसल हर सुबह की मगजमारी थी। इसलिए उनकी हालत चिकने घड़ों की हो चली थी। जिनके हाथ कोई बढ़िया स्टोरी होती वो पहले से ही उसे अपने लिए कंट्रोल एस कर लेता था। लड़कियां इस मामले में थोड़ी चतुर होती थी जो डेस्क वालों, रिसर्च वालों से अपना हवा-हवाई चक्कर चलाकर एकाध आइडिया हथिया ही लेती थी। मां-बहन होती थी ट्रेनी, मझोले दर्जे के रिपोर्टरों की। माध… से लेकर बहन… तक अलंकारों की अच्छी खासी श्रृंखला यहां संपादकीय कक्ष की शोभा बढ़ाती रहती है।
लेकिन शुक्रवार को तो सबकि आफत रहती थी। क्या इनपुट क्या आउटपुट क्या असाइनमेंट क्या को-ऑर्डिनेशन। हफ्ते भर के सुकर्मो कुकर्मो का बहीखाता यहीं खुल जाता था। एकाध मेजर ग़लतियां अगर ऊपरवाले (बॉस का यही नाम है यहां, जाने कब किसको लात मारके बाहर का रास्ता दिखा दे) की नज़रों से रह भी गई तो उसे चाटोत्तमों या चाटुश्रेष्ठों की जमात अपने नंबर बढ़ाने की नीयत से पेश कर देगी। और उसके बाद ग़लती करने वाले का मस्तकाभिषेक ऊपर लिखे अलंकारों से होता है। हर शुक्रवार को हिंदी सिनेमा के बॉक्स ऑफिस की तरह यहां भी कुछ फिल्में हिट होती हैं कुछ फ्लॉप। यानी किसी को बॉस की शाबासी तो किसी को गालियां। वैसे पुरुषो की जमात में एक बात पर सर्वसहमति थी कि बॉस लड़कियों की ही तारीफ करता है। हम लोगों की तो लगाने का बहाना खोजता रहता है।
बहरहाल, एक्सक्युटिव प्रोड्यूसर के साथ उनके डिप्टी तो थे ही साथ में असाइनमेंट हेड खरबंदाजी भी थे। ऊपर से तो तीनों विभागों के प्रमुखों में खूब प्यार मोहब्बत झलकता था लेकिन अंदरखाने में तीनों एक दूसरे की लेने में लगे रहते थे। मीटिंग में बॉस भी थे लिहाजा सबकी बंधी हुई थी। शुरुआत खरबंदा जी ने ही कि। उस दिन शर्लीन चोपड़ा का बॉबी डार्लिंग के साथ लफड़े वाली स्टोरी क्यों नहीं चलाई। उस दिन के बुलेटिन प्रोड्यूसर का चेहरा स्याह पड़ गया। हड़बड़ाते हुए बोला स..सर वो विजुअल अच्छे नहीं थे और बीच बीच में ग्लीच भी था। खरबंदाजी छोड़ने वालो में नहीं थे। ऐसा कैसे हो सकता है। सिमी ने उसके काउंटर लॉक करके दिए थे। तब तो सब कुछ सही था। दूसरे चैनलों ने स्टोरी को खूब ताना और तुम उस टाइम विदर्भ में किसानों की रैली पेल रहे थे। अपने सिपाही की दुर्गति देख आउटपुट हेड चंद्रकांत जी ने मैदान संभाल लिया। अरे उस समय वीटीआर में टेप में ग्लीच दिखा रहा था। अगले बुलेटिन में फिर हमने तानी तो थी उस ख़बर को। दो बड़ो के मैदान में उतरते देख बॉस ने कहा यार ध्यान दिया करो अगर सबसे पहले नहीं ठोकेंगे तो क्या होगा। पता है टीआरपी क्या है इस हफ्ते पांचवे नंबर हैं। दूरदर्शन ही बचा हुआ है हमसे नीचे। सब चुप खड़े थे।
चंद्रकांत जी कहां पीछे रहने वाले थे उन्होंने भी ठोंका। उस दिन पहले से ही असाइनमेंट और को-ऑर्डिनेशन वालों को बता दिया गया था कि चंद्र ग्रहण होने वाला है किसी चलते फिरते ज्योतिषी या बाबा को पकड़ के ले आओ क्यों नहीं आया कोई? ऊपर से एन मौके पर कह रहे थे कि ग्राफिक ठोंको। अरे जब कोई गेस्ट नहीं होगा तो ग्राफिक के दम पर अकेले एंकर कितनी देर तक बुलेटिन खींचता वो तो अच्छा हुआ कश्मीर में ब्लास्ट हो गया नहीं तो पता चल जाता। बॉस ने तिरछी निगाह असाइनमेंट वालों पर डाली। उनकी अपनी दिक्कतें हैं। स्ट्रिंगर साले एनजीओ वाली कहानियों को पब्लिक इंटरेस्ट की कहानी बनाकर पेश करते हैं। इसी चक्कर में काम की कई स्टोरी भी रह जाती हैं।
अब उसी दिन लीजिए, असाइनमेंट वालों ने पहले से ही आउटपुट वालों को यकीन दिलाया था कि इंडिया की हार पर बनारस से रिपोर्टर ने भीड़ को इकट्ठा करवाकर खूब तोड़फोड़ करवाई है। एक कार को भी आग लगा दी है। खिलाड़ियों का पुतला जलाने का भी विजुअल है। असाइनमेंट वालों का कहना था कि आधा घंटा बड़े आराम से तान सकते हो। फोन लाइने खोलकर एक घंटे भी खींच सकते हो। अब तो क्राइम से ज्यादा क्रिकेट बिकने लगा है। इसी भरोसे आउटपुट वाले बैठे रहे और अंत में असाइनमेंट ने कहलवा दिया कि रिलायंस का सर्वर डाउन है। विजुअल नहीं आ सकते। मच गई धमा चौकड़ी। किसी को कुछ समझ नहीं आया। किसी तरह से पुरानी खबरों से पांच बजे का बुलेटिन गया।
मीटिंग चल रही थी। सबकी अपनी मुश्किलें थी। अपनी मजबूरियां थी। बॉस के मन में चैनल को एक नंबर पर ले जाने का जज्बा था। जो अक्सर मीटिंग के अंत में बॉस के समापन भाषण के रूप में सामने आता था। तब तक पीछे तिवारी जी ने आवाज़ दी अबे अतुल पांच बजे के स्पेशल की क्या तैयारी है। या आज भी ऐसे ही जाएगा। अपन ने सीना फुलाकर कहा अरे सर आज तो माल तैयार है। दो सेक्स सर्वे आए हैं। एक भारत में कॉंडोम की साइज जरूरत से बड़ी है और दूसरी भारत की लड़कियों में पहली बार सेक्स करने की औसत उम्र 21 साल है जबकि दुनिया भर में ये औसत 16 साल है। इसी पर दो धांसू पैकेज तैयार करवाए हैं। मर्डर फिल्म का मल्लिका शेरावत और इमरान हाशमी का बेडसीन वाले शॉट की लूप कटवा लिया है। छूटते ही बोले अरे एंकर के साथ कोई सेक्सोलॉजिस्ट को बुलाया है कि नहीं। अपन बोले सर असाइनमेंट को बोला था (यहां जिम्मेदारियां दूसरे पर थोपने का चलन आम है, जिसने जिम्मेदारी ली उसकी ले ली जाती है)। उन्होंने फिर से ज्ञान दिया- एक काम करना तीनों फोन लाइनों को खोल कर रखना और जैसे ही कोई लड़की फोन करे उसे तान देना। अपन ने हां में सिर हिला दिया। को-ऑर्डिनेशन वाले को बोला गया अबे जल्दी से किसी सेक्सोलॉजिस्ट को सेट करो। धीरे-धीरे मीटिंग खत्म होने जा रही थी। खूब आरोप प्रत्यारोप लगे थे। अब सबका ध्यान पांच बजे के स्पेशल पर था। कुछ लोगों की शिफ्ट खत्म होने वाली थी। उन्हें घर जाने की जल्दी थी। पांच बजे का स्पेशल बुलेटिन शुरू हुआ मल्लिका इमरान के इंद्रियों को झनझना देने वाले शॉट के साथ। तिवारी जी बोले अबे ये कौन सी फिल्म है। बगल में खड़ा वीडियो एडिटर अपन से पहले ही बोल पड़ा सर- मर्डर फिल्म का है। नीचे एडिट बे पर पूरी फिल्म पड़ी है। तिवारी जी अपने से थोड़ा दूर हटकर एडिटर से बोले एक काम करना आज रात को इसकी एक सीडी राइट करके दे देना।
अतुल चौरसिया



1 Comment
March 2, 2008 at 0ndUTC
wah
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