May 3, 2008
चचा सैम और अधनंगे फकीरों-सपेरों की भूख…
खा-खा के मुटियाए अमेरिकियों पर उनकी नज़र नहीं जाती। दस में नौ सर्वे चिल्लाते रहते हैं कि अमेरिकी मोटापे से बेजार हैं। वजह भी सबको पता है। लेकिन अपने बारे में इस तरह की ख़बरें उन्हें परेशान नहीं करती बल्कि उनका सीना और चौड़ा हो जाता है। पैसे के अगाध स्रोत में अंधराए अमेरिकियों के पास करने को कम है इसलिए खाना उनकी उच्च प्राथमिकता में आता है। सर्वे तो ये भी बताते हैं कि मन भर खाने के बाद जितना जूठा खाना अमेरिकी नदी नालों में बहा देते हैं उतने में दरिद्रई के शिकार छोटे मोटे अफ्रीकी देशों की पूरी जनसंख्या का पेट भर जाय और “जुग-जुग जियो” का आशीर्वाद मुफ्त में मिले। पर ये बाते न तो राष्ट्रपति महोदय को नज़र आती हैं न ही उनकी विदेशमंत्री कोंडलिज़ा ख़ातून को।
हफ्ते भर पहले खातून ने हिंदुस्तानियों को ज्यादा खाने-पीने के लिए जिम्मेदार ठहराया था, और इसे ही दुनिया में खाद्यान की समस्या का कारण बताया था। अब हफ्ते भर बाद चचा सैम ने भी हिंदुस्तानियों के खान-पान की लानत-मलानत की है। उनके मुताबिक भारत का मध्य वर्ग जब से पैसे वाला हुआ है उनकी खान-पान की जरूरत बढ़ गई हैं। यहां के 35 करोड़ मध्यवर्गियों ने मिलकर पूरी दुनिया की नाक में दम कर दिया है। दुनिया को खाने की मोहताजगी हो गई है। पैसा आने के बाद भी किसी सर्वे में ये तो नहीं कहा गया कि हिंदुस्तानी खाना बर्बाद करते हैं। यहां अमेरिकियों की तरह खाने, मुटियाने की बात तो कोई नहीं कहता। तो फिर अपने गिरेबान में झाकने में तकलीफ क्यों है?
चचा सैम चाहते हैं कि हिंदुस्तानी हमेशा भूखे ही रहें। अधनंगे फकीरों, सपेरों का देश तो फिरंगियों ने पहले ही घोषित कर दिया था। लगता है चचा अभी भी उसी चश्मे से गाफिल हैं। दुनिया के ईंधन का चालीस फीसदी हिस्सा अकेले ढकारते वक्त उन्हें नहीं सूझता कि हम कुछ ज्यादा माल उड़ा रहे हैं। कुल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन का अस्सी फीसदी हिस्सा अकेले उगलते समय उन्हें दुनिया पर मंडराते ख़तरे का अंदाज़ा नहीं होता। तब तो उन्हें इसकी फिकर भी नहीं होती कि उनके कुकर्मों की सज़ा पूरी मानवजाति, समाज, पर्यावरण, जलवायु, जल, जंगल, ज़मीन, नदी, पहाड़, सागर को भुगतनी पड़ रही है। और आगे ये खटकरम दुनिया के सिर पर और भारी पड़ने वाला है। बेशर्मी की हद में इराक से लेकर ईरान तक तेल-तेल की हाय-हाय करते समय इन्हें दुनिया पर संकट नज़र नहीं आता। पर कुछ दशक पहले के भूखे भारतीयों का भरपेट खाना इनकी आंखों में गड़ रहा है। इतने महत्वपूर्ण काम को छोड़कर पूरा अमेरिकी सियासी कुनबा हिंदुस्तानियों के खान-पान पर निगाह रखने के अतिमहत्वपूर्ण काम में लग गया है। कितनी रोटी, कितना चावल, कितनी दाल मिलेगी इसका भी फैसला अब आठ हज़ार किलोमीटर दूर बैठे चचा ही करेंगे। हम तो यही कहेंगे कि भूखे पेट की हाय बहुत भारी पड़ती है। इसलिए मुंह का निवाला छीनने की कोशिश मत करो वरना बुरे फंसोगे।
अतुल चौरसिया






