कांग्रेस के एडिशनल प्रवक्ता आलोक मेहता और विनोद अग्निहोत्री

अगर किसी ने आज (22 नवंबर) नई दुनिया अखबार पढ़ा हो तो सबने पहले पन्ने की लीड खबर जरूर देखी होगी. इस खबर का मजमून कुछ यूं है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह रबर स्टैंप नहीं है. यह खबर कम, दो संपादकों की प्रधानमंत्री की महिमा में गाया गुणगान ज्यादा है. इसलिए मैं इसे लेख कहूंगा. इस लेख में क्रमश: कुछ फैसलों, कुछ नियुक्तियों का जिक्र करके ये साबित करने की कोशिश की गई है कि मनमोहन सिंह पीएमओ में महज रबर स्टैंप नहीं है, और भी बहुत कुछ हैं. नई दुनिया के दो शीर्ष संपादकों ने जिस तरह से यह लेख लिखा है उससे उनकी मौजूदा कांग्रेस सरकार के प्रति स्वामिभक्ति ज्यादा, एक निष्पक्ष पत्रकार का नजरिया कम दिखता है.
आज की तारीख में अगर कोई गंगा में गले तक डूब कर भी कसम खाए कि मनमोहन सिंह अपने फैसले स्वयं लेते हैं और दस जनपथ को दाहिने रखते हैं तो यह बात शायद ही किसी के गले उतरे. पर किन तथ्यों के आधार पर नई दुनिया ने इस महती कार्य का बीड़ा उठाया है समझ से परे है और संदेह भी पैदा करता है. इस लेख के पीछे मकसद की बू इसलिए भी आती है कि इस समय जब प्रधानमंत्री और उनकी सरकार चारो तरफ से संकटापन्न स्थिति में हैं तब उनकी जयजयकार वाला लेख लिखने का क्या अर्थ है यानी टाइमिंग का सवाल है.
लेख में दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने कुछ फैसलों का जिक्र किया है जिसमें प्रधानमंत्री की भूमिका होने और उनके दस्तखत की बात होने का जिक्र है. यहां एक बड़ी बात है कि इन वाकयों का जिक्र आखिर किस तरह से ये साबित करता है उस फैसले में दस जनपथ की भूमिका नहीं थी. और दस्तखत को क्या माना जाय, कोई फैसला सोनिया करें या राहुल दस्तखत तो संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का ही होगा तो इस प्रकाय तो यह बात स्वयंसिद्ध है कि प्रधानमंत्री सर्वशक्तिमान हैं फिर नई दुनिया का सिर्टिफिकेट क्यूं? अगर नहीं तो क्या दोनों संपादक तब यह मानेंगे कि प्रधानमंत्री रबर स्टैंप है जब उनकी बजाय दस जनपथ से ही कागजों पर दस्तखत होगा. यानी एक पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही जब खत्म हो जाएगी.
वैसे भी हवा के रुख के साथ जाना नई दुनिया की पहचान सी बन गई है. हंस के सालाना सम्मेलन में इन्हीं आलोकजी ने माओवादियों और सरकार के बीच बिचवई कर रहे स्वामी अग्निवेश की यह कहकर आलोचना कर डाली कि आपको क्या जरूरत थी सरकार और माओवादियों के बीच पड़ने की. क्या आप सरकार को नहीं जानते हैं. गौरतलब है कि सारा मामला माओवादी नेता आजाद और एक पत्रकार हेमदत्त पांडे की सुरक्षाबलों द्वारा हत्या का था. मान लिया कि स्वामी अग्निवेश सरकार के झांसे में आ गए थे, उन्हें इस बात का अनुभव नहीं था कि उनका इस्तेमाल करके सुरक्षाबल इस तरह से दो लोगों की हत्या कर देंगे. पर आलोकजी क्या भूमिका बनती थी. बजाय उन्होंने इस सरकारी कुटिल नीति की आलोचना अपने अखबार में करने के, उन्होंने उल्टे नेक नीयत से इस काम में कूदे आदमी की ही लानत मलानत कर डाली. चरणचंपन की इंतेहा हो गई. अगर आपको पता था कि सरकारें इतनी ही कुटिल होती है तो आपने पहले और बाद में सरकार की इस भूमिका को लोगों के सामने क्यों नहीं उजागर किया वह भी तब जब आपके पास इतना बडा माध्यम था?
मनमोहन सिंह रबर स्टैंप हैं या नहीं है, किसी अखबार से आप क्या उम्मीद करते है॒. वह तटस्थ रहते हुए इस मुद्दे का विश्लेषण करेगा खुद निर्णय देने की बजाय मामले के हर पहलू का तर्कसंगत मूल्यांकन आपके सामने रखेगा. पर यहां तो देश के दो आला संपादक ही मुद्दई, गवाह, जज, सब के सब बन बैठे.
ऊंचे पहुंच कर नीचे की चीजें छोटी दिखने लगती है. बड़ी लग्जरी कारों के काले शीशे के पार की दुनिया धुंधली दिखती है. आज के कलमकार इन्हीं दृष्टिदोषों के शिकार हैं. सत्ता की देवी अपनी स्याही के प्रवाह से जो चाहे लिखवा लेती है. पर प्रवक्ता ही बनना है तो उसके लिए दो रूपए की सदस्यता फीस चुकाकर लाल, हरी, केसरिया या फिर तिरंगी टोपी पहन कर करना ठीक होगा, नैतिक रूप से भी और अपनी पेशेवर प्रतिबद्धता के साथ भी, पत्रकारिता के नाम पर नहीं…

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आधी-अधूरी, अलोकतांत्रिक चर्चा

उदयन शर्मा की स्मृति मे कंस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित सेमिनार का विषय था, ”लॉबिइंग, पैसे के बदले खबर और समकालीन पत्रकारिता”. ज्यादातर महानुभावों ने अपनी मजबूरियां गिनाते हुए पैसे के महत्व को जायज ठहराने की कोशिशें की. एक रामबहादुर राय ने कुछ हिम्मतखेज बाते कह कर उम्मीदें जगाई, प्रभाषजी की याद दलाई और साथ ही जवान खून के समझौतावादी रुख पर बूढ़ी हड्डियों की प्रत्यंच तानी. एक और खास, बात पूरी बहस के दौरान मीडिया में पैसे के जोर की तो सबने जमकर चर्चा की लेकिन सेमिनार के पहले हिस्से लॉबिइंग को सब एक सिरे से भूल गए. हाल के दिनों में जिस तरह से देश के दो बड़े स्वनामन्य पत्रकारो के नाम लॉबिइंग की दुनिया में उछले हैं उसके बाद उम्मीद थी कि इस पर भी कोई सार्थक बहस होगी. लेकिन मीडिया की ज्यादातर बहसों की तरह ही यहां भी कुछ चीजों को नकार कर, कुछ चीजों को जानबूछ कर दरकिनार कर सभा विसर्जित हो गई. लॉबिइंग में पत्रकारों का शामिल होना क्या किसी खतरे की निशानी नहीं है. जिस नेता के लिए आज पत्रकार लॉबिग कर रहा है कल उसके कुकृत्य पर वह या उसका संस्थान क्या कोई खबर भी छाप या दिखा सकेगा? सवाल तमाम है. उदयन स्मृत व्याख्यान की प्रक्रिया बेहद अलोकतांत्रिक रही. वहां मंच पर बैठे वक्ताओं को बोलने का मौका दिया गया, सबने अपनी बात कही और चाय-पानी का दौर शुरू हो गया. कार्यक्रम का नाम संवाद था लेकिन श्रोताओं से किसी तरह का संवाद स्थापित करने की कोशिश तक नहीं की गई. कोई सवाल जवाब नहीं हुआ. ये एकतरफा संवाद बड़ा मजेदार लगा…

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धर्मेंद्र पाठक का पत्र : पाखंड पुराण

एक पिता अपनी बेटी को पत्र लिख कर किस तरह से इमोशनली ब्लैकमेल कर सकता है, किस हद तक कर सकता है, इमोशनल ब्लैकमेल के साथ धमकी के इशारे दे सकता है और इशारों के साथ पाखंड का जखीरा पेश कर सकता है इस सबका नमूना है धर्मेंद्र पाठक द्वारा अपनी बेटी (शायद उन्हें इसका अधिकार नहीं) को लिखा पत्र. पाठक बार-बार धर्म के प्रतिकूल आचरण पर विनाश की चेतावनी देते हैं और जाने अनजाने ही वे अपनी उस जातिगत कुलीन मानसिकता का परिचय भी देते जाते हैं जिसे उन्होंने इक्कीसवीं सदी में भी सनातन धर्म, परंपरा, शुचिता, आचरण के दोमुंहे खाल में छिपा कर जिंदा रखा है.

 खुद के पांव किस हद तक पांखंड के दलदल में बिंधे-गुथे हैं इसकी बानगी उनके पत्र के एक एक वाक्य से टपकती है. अपनी बेटी को नीचे कुल के वर के साथ न ब्याहने का उनका एकमात्र तर्क है सनातन परंपरा जिसमें इस रिश्ते की अनुमति नहीं है. पर उनकी मानसिकता से उन तालिबानी कट्टरपंथी जेहादियों की स्पष्ट बू आती है जो कुरान के ढाई हजार साल पुराने स्वरूप में किसी तरह की व्याख्या को सिरे से नकारते हैं, उनके शास्त्र में पूर्व की किसी गलत परंपरा को सुधारने की कोई गुंजाइश नहीं है बल्कि गलत परंपरा के नाम पर इंसानियत का बार-बार गला घोंटने की खुली छूट है. बस उनमें और तालिबानियों में अंतर इतना है कि इन्होंने शिक्षित और आधुनिकता की भेंड खाल ओढ़ रखी है जिसके अंदर भेंड़िये की आत्मा बार-बार कसमसाती है और जब-तब निरुपमा जैसियों की खून से अपनी प्यास बुझा लेती है.

पाखंड का सिरा पाठक परिवार के एक सिरे से शुरू होकर अंत तक चला जाता है. खुद एक बैंक के प्रबंधक पद पर तैनात पाठक जितनी आसानी से अपनी बेटी को लिखे पत्र में भारतीय संविधान के महज साठ साल का होने की बात कह हवा में उड़ा देते हैं उसी व्यवस्था की मलाईदार सुविधा उठाने में उनकी आत्मा कतई नहीं झिझकती. पाठक जिस सनातन परंपरा की दुहाई अपनी बेटी के वर के संबंध में देते हैं खुद उसी परंपरा के हिसाब से जीवन व्यतीत करने का उनका जी नहीं होता. भगवान जाने कितने कर्म-कुकर्म अपने बैंक प्रबंधकीय जीवन में उन्होंने खुद किए होंगे तब उनकी आत्मा कतई सनातन धर्म की बाट नहीं जोहती. पाठक यहीं आकर नहीं रुकते. अपने दोनों बेटों को उन्होंने उसी व्यवस्था के तहत इन्कम टैक्स विभाग और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का रिश्तेदार बनाने में उनकी सनातन परंपरा आड़े नहीं आती जिसके साठ साल का होने की खिल्ली वो एक झटके में उड़ा देते हैं.

उनका पाखंड पत्र के अगले हिस्सों में भी जारी रहता है. बेटी को वो समझाते हैं (धमकी देते हैं) कि मां-बेप बेटी को इसलिए पढ़ाते लिखाते हैं ताकि वो उनका यशवर्धन कर सके. साफ है कि ये बाप अपने यश और कीर्ति की लालसा में किसी हद तक जा सकता था. क्योंकि इसकी अगली ही पंक्ति में वो कहते हैं इसके विरुद्ध किया गया कोई भी आचरण तुम्हारा विनाश कर देगा. क्या निरुपमा के विनाश का ये पूर्व संकेत था जिसे वो समझ नहीं सकी थी. या मां-बाप और परिवार को मना लेने का आतिशय आत्मविश्वास जिसे परिवार के झूठे, पाखंडी अहम ने तार-तार कर दिया. कुल मिलाकर ये एक पाखंडी परिवार का कृत्य जान पड़ता है जिसकी एक एक कारगुजारी से कपट और पाखंड टपकता है लेकिन ये अपने ऊपर समाज के सबसे कुलीन और सभ्य होने का लबादा ओढ़ कर चलते हैं.

अतुल चौरसिया

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क्योंकि शाहरुख को आपकी जरूरत है-2

सपोर्ट शाहरुख-

क्योंकि उन्होंने अमिताभ और करण जौहर की तरह मांद के मेमनो से माफी मांगने से इनकार कर दिया.

क्योंकि उनके समर्थन में उन्हीं की जमात का कोई आगे नहीं आ रहा जबकि ज्यादतर इसके शिकार हो चुके हैं या हो सकते हैं.

क्योंकि शाहरुख को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए किसी ऐरे-गैरे की जरूरत नहीं है.

क्योकि ये ओछी वोट की राजनीति है

क्योंकि ये खुद को देश, कानून और संविधान से ऊपर समझने की खतरनाक कोशिश है

क्योंकि सचिन तेंदुलकर और मुकेश अंबानी को इसी तरह के बयानों पर न तो ज्यादा सफाई देने की जरूरत होती है नही इन लोगों की ज्यादा सफाई मांगने की हिम्मत होती है.

क्योंकि सिर्फ खान होना इस देश में कोई गुनाह नहीं है

क्योंकि मुंबई को सिर्फ तीन इडियट्स (बाल राज उद्धव ठाकरे) के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.

क्योंकि ये माफी मंगवा कर अपने अहं को तुष्ट करने की कोशिश है जो किसी भी समप्रभुता संपन्न व्यक्ति को स्वीकार नहीं होनी चाहिए.

क्योंकि अगर इस बार शाहरुख ने भी माफी मांग ली तो फिर प्रतिरोध की अंतिम उम्मीद भी खत्म हो जाएगी.

क्योंकि उनकी अपनी जमात के लोगों ने (आमिर, अमिताभ, करण) माफी मांग कर जिस रीढ हीनता का परिचय दिया है वो आदत इसके बाद एक परंपरा बन सकती है.

क्योंकि चुप बैठने से कुत्ता भी पैर पर सू-सू करने की हिम्मत कर बैठता है…

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क्योंकि उनको आपकी जरूरत है

सपोर्ट शाहरुख- क्योंकि उन्होंने अमिताभ और करण जौहर की तरह मांद के मेमनो से माफी मांगने से इनकार कर दिया.
क्योंकि उनके समर्थन में उन्हीं की जमात का कोई आगे नहीं आ रहा जबकि ज्यादतर इसके शिकार हो चुके हैं या हो सकते हैं.
क्योंकि शाहरुख को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए किसी ऐरे-गैरे की जरूरत नहीं है.
क्योकि ये ओछी वोट की राजनीति है
क्योंकि ये खुद को देश, कानून और संविधान से ऊपर समझने की खतरनाक कोशिश है
क्योंकि सचिन तेंदुलकर और मुकेश अंबानी को इसी तरह के बयानों पर न तो ज्यादा सफाई देने की जरूरत होती है नही इन लोगों की ज्यादा सफाई मांगने की हिम्मत होती है.
क्योंकि चुप बैठने से कुत्ता भी पैर पे सू-सू करने की हिम्मत कर बैठता है…

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गांधी की मानें की नेहरू की मानें

अगर सरकार के दो मंत्री तीन महीने तक, पांचसितारा होटल के, प्रेसिडेंशियल सूट में रहते हैं तो बहुतेरी कहानियां कही-लिखी जा सकती हैं. कहानियां अखिल भारतीय परंपरा अनुसार पक्ष में भी लिखी जा सकती हैं और विपक्ष में भी. कुछ बातें तो मंत्रियों ने खुद ही लोगों के सामने कह डालीं मसलन हमारा पैसा चाहे जैसे खर्च करें किसी को क्या. विशुद्ध वणिक सिद्धांतों की कसौटी पर बात खरी है. वैसे भी कौन सा उनका पैसा किसी और के काम आता या उससे बड़ी देश सेवा हो जाती या कि सामाजिक सरोकारों में पैसा लग जाता आदि-आदि. जैसे चाहे वैसे खर्च करें उनकी मर्जी. वैसे भी देश गांधी को छोड़कर बहुत आगे निकल चुका है. आज तो गंगा का बहुत पानी बह चुका है, समय की गति बदल रही है‘, जमाना कहां से कहां पहुंच चुका है आप वहीं अटके हुए हैंजैसी सनातन सत्य जुगालियों की आदत लोगों को पड़ चुकी है. ऐसे में यहां कमरों की बहस में पड़ना कहां कि समझदारी है. आज जब हम महाशक्ति बनने की राह पर हैं उस दौर में इस तरह के दकियानूसी विचार भला किस लिहाज से सही हो सकते हैं. महाशक्ति की बात करते समय हमारे सामने किसका चेहरा आता है- अमेरिका का ही तो आता है न. पिछली एक सदी से अगर किसी को महाशक्ति का दर्जा मिलना चाहिए, अगर किसी ने इस पद का स्वाद चखा है (अगर धरती नामक ग्रह पर महाशक्ति जैसी किसी परम सत्ता का कहीं अस्तित्व है तो) तो वो है अमेरिका. हम अगर उसी राह पर बढ़ना चाहते हैं तो प्रतीक भी अमेरिका ही होगा. इसी प्रेरणा की धार में दोनों मत्रीजी भी बह गए. वहां के नेता मंत्रियों की ठाठ से मुंह छिपाए कब तक बरदाश करते. और तीन महीने की क्या रट लगा रखी है- सत्यानाशी, उंगलीबाज, फटे में अड़ाने वाले अखबारियों को पता न चलता तो तीन साल भी रहने में बुराई क्या थी? किसी का सुख-चैन-शांति तो इनसे देखी नहीं जाती उल्टे बात-बात में दुनिया में अशांति-अस्थिरता-आतंक की चकर-चकर किए रहेंगे.  जहां तक बात-बात में गरीब, मजलूम, आम आदमी के नारे की बात है तो ये चीजें इस देश में द्रौपदी का चीर भर समझो जिसे कभी भाजपाई तो कभी कांग्रेसी और कभी-कभार दांव लग जाए तो तीसरे मोर्चे के दुशासन मौका और वक्त की नजाकत के साथ जम कर हरते रहते हैं. बेचारी द्रौपदी पांच हजार साल पहले द्वापरयुग में भी हरी गई और आज पांच हजार साल बाद कलियुग में भी उसकी नियति जस की तस है. भला हो गोकुल नंदन का जिन्होंने उस वक्त भी अस्मिता बचाई और आज भी किसी न किसी रूप में बचाते चल रहे हैं. ‘इस देश का भगवान ही मालिक हैकी तोतारंटत इसी परम श्रद्धा की परिणति है जिसे हर भारतीय परमब्रह्म की अवस्था में जब तब, चलते-फिरते दे मारता है.

जिस सवा अरब की आबादी में दो चार फीसदी लोगों के लिए भी पांच सितारा सुविधाओं में रहने की औकात न हो उसके जन प्रतिनिधि इस तरह का नंग प्रदर्शन कैसे कर सकते हैं? बात आदर्श और नैतिकता की हो रही है याद रखिएगा. पर काहें कि नैतिकता और कैसा आदर्श जहां मुख्यमंत्री जेल जाने की स्थिति में भी कुर्सी पर जमें रहने की कोई राह नहीं छोड़ता, जहां जीतेजी अपनी ही मूर्तियों की लड़ी बना कर पूरे शहर को पाट देने से भी आत्मा शर्मिंदा नहीं होती, 10 हजार साड़ियों और तीन हजार जोड़ी चप्पलों वाली नेता जिस देश में विराजमान हो, जिस देश का गृहमंत्री बम धमाकों के तीन घंटे के भीतर तीन जोड़ी कपड़े बदल डालता हो और जवाब में कहता हो मुझे मैडम का आशीर्वाद है, जिस देश में हजार-दो हजार हत्याओं के बाद भी नेता मुख्यमंत्री बना रह सकता हो वहां नैतिकता-फैतिकता का भाषण ज्यादा मत झाड़ा करो. और एक बात का ध्यान रखना बात-बात में गांधी-शास्त्री का उदाहरण देने की जरूरत नहीं है. उन्हें जाने कब का उन्हीं के लोगों ने किनारे लगा दिया है. ये नैतिकता कहीं किसी अवागाद्रो की किताबी परिभाषा में तो लिखी नहीं गई है कि इसे अंतिम सत्य मान लिया जाए. मानने की बात है, मानो तो देव नहीं पत्थर. गांधी-शास्त्री मानते थे नेहरू नहीं मानते थे. हम भी नहीं मानते

अतुल चौरसिया

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पिंक चड्ढी अभियान और महिलाओं की पहली जीत

sriramsena1विरोध का का अनोखा तरीका अपनाने वाली महिलाओं की कोशिश रंग लाई है. पिंक चड्ढी अभियान के जरिए प्रमोद मुतालिक और उनकी श्रीराम सेना का विरोघ करने की मुहिम रंग लाई. ख़बर है कि देश भर की महिलाओं और पुरुषों की तरफ से मिल रही चड्ढियों आजिज आकर और अगले एक-दो दिन में मिलने वाली चड्ढियों की मार से बचने के लिए प्रमोद मुतालिक ने अपने ऑफिस का पता बदल दिया है। अब वो अपने पुराने पते वाले कार्यालय को बंद कर रहे हैं. पर अभियान की सदस्य निशा सूज़न के मुताबिक लोग अपनी चड्ढियां उनके ब्लॉग पर दिए गए पतों, फोन नंबरो और चड्ढी कलेक्शन सेंटर पर जमा कर सकते हैं. यहां से उनके विरोध की प्रतीक चड्ढियां प्रमोद मुतालिक को भेज दी जाएंगी. विरोध के इस गांधीवादी तरीके ने छोटी ही सही पर पहली कामयाबी तो हासिल कर ही ली है. और मुतालिक का डर ये साबित कर रहा है कि उन्हें भी कहीं न कहीं इस बात का अहसास हो गया है कि वो बहुमत की नुमाइंदगी नहीं करते हैं.

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सुरेश चिपलूनकर की पिंक चड्डी से चिढ़न और जवाब

सुरेशजी आपने निशा के अभियान के चपेटे में तहलका को भी ले लिया है. इसलिए तहलका का एक पत्रकार होने के नाते आपकी कुछ बातों का जवाब देना बहुत जरूरी हो जाता है.
आपने तहलका का जिक्र किया है और लगे हाथ उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं. सिर्फ इस आधार पर कि निशा ने तहलका का पता दिया है. निशा तहलका की पत्रकार हैं और एक पता देने की जरूरत ने ऐसा करवाया. इसके अतिरिक्त तहलका का इस अभियान से किसी तरह का वास्ता नहीं है. और जिस तहलका की विश्वसनीयता को आप संदेहास्पद मानते हैं उसे आप जैसे किसी व्यक्ति के प्रमाण की दरकार नहीं हैं. आज तक तहलका ने जो किया है उसकी सत्यता पर किसी तरह की उंगली नहीं उठी है, देश के सर्वोच्च न्यायालय ने तहलका को प्रमाण दिया है. देश के करोड़ो लोग तहलका पर विश्वास करते हैं. लिहाजा अपना संदेह अपने पास रखें.
- रही बात एक एक मामले में निशा की हिस्सेदारी की तो आपको पता होना चाहिए कि देश में लाखों की संख्या में पत्रकार हैं और संभव नहीं कि हर विवाद में हर पत्रकार शिरकत करे ही करे. और तहलका को आपने खींचा है तो आपको पता होना चाहिए कि अकेले तहलका ने स्कारलेट बलात्कार-हत्याकांड को अपनी कवर स्टोरी बनाया है (29 मार्च 2008 अंक, गोइंग गोइंग गोवा)
- आपने पूछा है कि पिंक चड्डी भेजने से महिलाओं को नैतिक बल मिलेगा. अगर अबला, असहाय स्त्री को सरेआम पीटने से संस्कृति की रक्षा होती है तो पिंक चड्डी भेजने से नैतिक बल क्यों नहीं मिल सकता?
- दिल्ली की पत्रकार के बलात्कार की कितनी जानकारी निशा को है इसकी जानकारी तो आपको उनसे बात करके ही पता चलेगी. हो सकता है उनकी जानकारी आपको बगले झांकने पर मजबूर कर दे.
- तस्लीमा नसरीन के जरिए तहलका को घेरने की कोशिश भी की है आपने. आपकी जानकारी पर तरस आता है अकेले तहलका ऐसा संस्थान है जिसने दो-दो कवर स्टोरी तस्लीमा को देश से निकाले जाने के बाद की थी. इसके अलावा छोटी-मोटी खबरों की गिनती नहीं है. मुसलमानों को गरियाने वाली तस्लीमा की फिक्र है आपको पर एमएफ हुसैन की परवाह नहीं. ये दोगलापन क्यों?
आखिरी एक लाइन में श्रीराम सेना से अपना गला छुड़ा कर पोलिटिकली करेक्ट होना भी दोगलेपन की निशानी है. हिंदी में कहावत है गुण खाओ और गुलगुले से परहेज. इस भड़ास की वजह सिर्फ ये है कि आपने बिना जाच-पड़ताल किए जबरिया एक व्यक्तिगत अभियान में तहलका को घसीट लिया हैं. कोई और शंका हो तो संपर्क कर सकते हैं.
दो बातें और साफ कर दूं. शायद निशा के अभियान को आप ठीक से समझ नहीं सके हैं. उसने पहले ही साफ कर दिया था कि वैलेंटाइन डे से उसका कोई लेना-देना नहीं है, न ही वो उसकी समर्थक या बैरी है. उसका विरोध सिर्फ श्रीराम सेना के तरीके, उनकी स्वयंभू ठेकेदारी, दूसरों की व्यक्तिगत आजादी का फैसला कोई तीसरा करे जैसे कुछ बेहद मूल मसलों से है.

एक बेहद मौजू सवाल है कभी शांति से दो मिनट मिले तो विचार कीजिएगा. यदि अपकी पुत्री, पत्नी या बहन भरे बाजार इन मतिहीनों का शिकार हो जाने के बाद भी आपकी प्रतिक्रिया क्या यही रहेगी? किसी को भी किसी महिला से ज्यादती करने का अधिकार सिर्फ संस्कृति रक्षा के आडंबर तले दिया जा सकता है क्या?  उत्तर शायद नकारात्मक आए.

अतुल चौरसिया

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पिंक चड्ढी अभियान से जुड़े-बदलाव की शुरुआत करें

sriramsenaअगर हर दिन की लट्ठमार से ऊबे हुए हैं, जबर्दस्ती थोपे जा रहे संस्कारों से घुटन महसूस कर रहे हैं, कानून की परवाह न करने वालों से परेशान हैं, अपनी मनमानी करके खुद को सबका भाग्यविधाता समझने वालों से परेशान हैं, स्त्री को माता का दर्जा देने वाले उन्हें सरेआम पीटते हैं, अगर इससे परेशान हैं, गुंडई को अपना पौरुष समझने वालों की नादानी से पीड़ित हैं, तालिबानीकरण के दुष्प्रभावों से चिंतित हैं, मध्यकालीन पुरापाषाण काल में देश को धकेलने पर उतारू लोगों से त्रस्त हैं, दूसरों की आजादी का सम्मान न करने वालों से परेशान हैं, तो फिर एक आम हिंदुस्तानी के अभियान से जुड़िए और एक ऐसा आंदोलन खड़ा कीजिए कि ऐसा करने वाला दोबारा ऐसा करने की शर्मनाक जुर्रत ही न कर सके. अपना आंदोलन खड़ा कीजिए, निशा के अभियान में एक और हाथ जोड़िए. शायद नए भारत की शुरुआत यहीं से हो. पिंक चड्ढी अभियान इसी तरह कई अर्थों में अनोखा है. अभियान से जुड़ने संबंधी सारी जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें या पते पर भेजें.

http://www.thepinkchaddicampaign.blogspot.com/

Pramod Muthali,
Sri Rama Sene Office # 11, Behind new bus stand,
Gokhul road, Lakshmi park, Hubli – Karnataka

Contact persons:
Nithin (9886081269)
Nisha ( 9811893733)

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मुंबई टू मैंगलोर वाया अपनी अपनी सुविधा से

पहले मुंबई में राज समर्थकों की गुंडई पर जमकर सियासत हुई, अब मैंगलोर में वही कहानी दोहराई जा रही है. कांग्रेस जमकर हल्ला बोल रही है कि मुतालिक के रिश्ते भाजपा से हैं, उसे कर्नाटक की भाजपा सरकार का संरक्षण प्राप्त है. ये काफी कुछ मुंबई में मनसे के गुंडो द्वारा की गई गुंडई के रिप्ले जैसा ही है, बस मंगलोर में करने वाले मुंबई में कांग्रेस सरकार पर हमलावर मुद्रा में थे तो मुंबई में करने वाले मंगलोर में हमलावर बन गए हैं. मनसे की खुलेआम-बेलगाम गुंडई पर मूकदर्शक बने पुलिस और प्रशासन की भूमिका से ये बात समझते देर न लगी कि सत्तासीन कांग्रेस सरकार मनसे को शह देकर शिवसेना-भाजपा गठबंधन की गांठ में दरार डालना चाहती थी. ले देकर उसे इस बात का पूरा यकीन था कि मनसे वोटो का जितना काटापीटी करेगी वो शिवसेना-भाजपा के पाले से ही आएगा. और हर्र लगे न फिटकरी कांग्रेस की तूती महाराष्ट्र में बोलती रहेगी.
अब काफी कुछ ऐसा ही मंगलोर हादसे के बाद देखने को मिल रहा है. बस यहां पर मुंबई में कांग्रेस को घेरने वाली शिवसेना-बीजेपी यहां बचाव की मुद्रा में है तो मुंबई में रक्षात्मक रही कांग्रेस यहां हमलावर बन गई है. पर कुल मिलाकर निष्कर्ष यही है कि विचारधारा कोई भी हो राजनीति का रंग एक लगे है, इसका ढंग एक लगे है इसकी मोटी चमड़ी पर जल्दी शिकन-सिलवटें नहीं पड़ती.
टाइम्स नाउ पर कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी चिल्ला-चिल्ला कर लोकतांत्रिक मूल्यों के हनन की दलील दे रहे थे पर मुंबई की बात पर वो बेहयाई की हद तक बात को गोल मोल कर देते है. काफी कुछ ऐसा ही स्मिता ईरानी भाजपाई कुनबे की ओर से कर रही थी. पर पुरानी और सौ फीसदी खरी बात है- किसी के पास जितना कम सच होता है वो उतना ही ज्यादा हल्ला मचाता है.

दरअसल समस्या हमारी उस जड़ से जुड़ी है जिसे हमने किसी दौर में अपनी अस्मिता, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम के नाम पर दबे-छुपे ही गर्व के साथ स्वीकार किया था. 80-90 के दशक में जब पाकिस्तान के विरोध के नाम पर शिवसेना के गुंडे वानखेड़े से लेकर फिरोजशाह कोटला तक की पिचें खोद रहे थे तब हमने अंदर ही अंदर तहेदिल से इसका स्वागत किया था. कहीं न कहीं शिवसेना की ये फासीवादी हरकतें हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान की प्रतीक सी बन गई थी. वो हमारे दबे मनोभावों का प्रतिनिधित्व कर रही थीं. और उस अंध आवेग में हमने देश में पड़ रही एक विकृत परंपरा की विषबेल की अनदेखी ही नहीं की बल्कि उसे पनपाने में भी पूरी मदद की. लोकतांत्रिक देश में लाठी के जोर पर अपनी मनमानी करवाने की उस शुरुआती चरण को हमने पूरा समर्थन दिया, कहीं से भी सरकारों ने उसे ग़ैरकानूनी मानकर कार्रवाई की जहमत नहीं उठाई. ऐसा इसलिए भी था क्योंकि फासीवाद का ये चेहरा राष्ट्रवाद के मुखौटे में छिपकर हमसे रूबरू हो रहा था. दूसरे उसका निशाना हमारे मानस गहरे तक बैठ चुका स्थाई दुश्मन पाकिस्तान था इसलिए भी शायद दबे-छुपे ही सही सबने उसका स्वागत किया था. 1965 औऱ 71 के दौर की यादें अभी पूरी तरह से ओझल नहीं हुई थी, मन में कड़वाहट लिए ये पीढ़ी उस दौर की गुंडई पर मन ही मन मुस्करा रही थी. किसी ने भी अंदर ही अंदर फैलते उस भस्मासुर पर नजर नहीं डाली जो आज पूरी हिंदुस्तानी व्यवस्था का सर्वनाश करने पर उतारू है. गांधी के देश में लाठी के जोर से सबकुछ हासिल कर लेने की जो विनाशक लहर चल रही है इसका खामियाजा गृहयुद्ध से लेकर देश के एक और बंटवारे तक कुछ भी हो सकता है.हर पैमाने पर हम पीछे की ओर बढ़ रहे हैं. मध्ययुगीन परंपराओं के प्रति हिंदुस्तानियों का प्रेम बढ़ता जा रहा है. भारत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सहिष्णुता खत्म होती जा रही है. महिला पूजनीय होती है पर सरेआम उसकी पिटाई करने में हमें कतई शर्म नहीं आती है. माता स्वरूपा को निर्वस्त्र करने में 30-40 लफंगों का समूह बड़ी शान समझता है. और सत्ता के ऊपरी पायदान पर विराजमान लोग वहीं से इन मोहरों को मौन सहमति देते रहते हैं. अपने घर के भीतर जिनकी नहीं चलती वो लोग पूरे समाज को अपने इशारों पर चलाने की हवा-हवाई कल्पनाएं पाले जंगलराज फैला रहे हैं. समाज के सबसे बड़े हितैषी बनने का दावा कर रहे ये लोग एक बार अपने घरों में भी पूछ लें कि उनके इस कुकर्म से किस हद तक उनकी माताएं-बहने सहमत हैं. पर ऐसा नहीं होगा क्योंकि फासीवाद तर्क-वितर्क में विश्वास नहीं करता. उसे सिर्फ बंदूक की भाषा आती है उसी पर विश्वास करता है. एक औऱ तालिबान हिंदुस्तान में भी तेजी से पैर पसार रहा है कहना बहुत छोटी बात होगी.

विडंबना की बात है जिस देश ने अभी-अभी 26/11 देखा है, जिसके सामने विदेश से आयातित कट्टरपंथी आतंकवाद एक विकराल समस्या बन गया है वो खुद ही उन्हीं कट्टरपंथियों की राह पर चल रहा है, गाहे-बगाहे उन्हीं की भाषा बोल रहा है. जिन्हें 26 नवंबर को हम एक सुर से गरियाते फिरते हैं अगले दिन उन्हीं की राह अपनाने में हमें कोई शर्म नहीं आती है. एक बात और जो मन को बार-बार झिंझोड़ती है- पिताजी बचपन में सिखाते थे पढ़ लिख लो वरना कसाई टोले वालों की तरह मोटर मैकेनिक बन कर रह जाओगे. थोड़ा और बड़े हुए थे तो पिताजी समझाते थे पढ़ोगे लिखोगे नहीं तो क्या कश्मीर-पंजाब वालों की तरह हथियार लेकर लोगों की हत्या करोगे. बाद में जब घर से बाहर निकले तो पिताजी परेशान हो गए ये क्या हो रहा है पड़ोस में तालिबान का उदय हो रहा है. ये लोग औरतों महलाओं को पढ़ने-लिखने तक नहीं देते, उन्हें बाहर तक नहीं निकलने देते. पिताजी के विचार चाहे जो रहे हों, भले ही किसी तरह का भेदभाव रहा हो, भले ही किसी विशेष वर्ग के लिए कुंठा रही हो पर एक बात तो साफ थी ही कि उन्हें इस बात पर गर्व था कि इस देश का बहुसंख्यक समझदार, पढ़ा लिखा होता है, जाहिल नहीं होता. हमें इसी बात पर गर्व होता है कि हिंदुस्तानी कूप-मंडूक नहीं है. तालिबानियों की तरह हम किसी पर जंगली कानून नहीं थोपते, सभ्य समाज की भूमिका पर विश्वास करते हैं. पर क्या आज ये बातें किसी लिहाज से सच लगती हैं?
अतुल चौरसिया

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